श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 19
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 19
इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं। ।।19।।
4.
जिस व्यक्ति को कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है वह व्यक्ति अपने मन से हर द्वंदात्मक युग्म जैसे सुख-दुख, जय-पराजय, प्रेम-घृणा आदि में हमेशा समान भाव रखता है। इस तरह का व्यक्ति मन में हर अवस्था के प्रति समभाव रखने के कारण उत्तेजित या उद्वेलित नहीं होता है बल्कि वह शांत चित्त, प्रसन्न चित्त, अपने ही सेल्फ में बना रहता है, उसे किसी विषमता से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। और यह क्षमता व्यक्ति को अपने जीवन काल में ही आनी चाहिए। मृत्यु के बाद किसी अन्य उपलब्धि के लोभ में यह व्यक्ति नहीं होता है।
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