श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 18

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्श होते हैं। ।।18।।


  
2.
जब व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है तो उसके पास विद्या और विनय दोनों होते हैं। इससे स्पष्ट है कि यदि व्यक्ति विद्वान है लेकिन विनयशील नहीं है तो ज्ञानी नहीं है।

3.
यह व्यक्ति जीव में जीव की हैसियत, उसके स्वरूप अथवा प्रकार के कारण भेद नहीं बरतता है। उसके लिए संसार के सभी प्राणी एक समान प्रिय होते हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि वह यह तथ्य समझता है कि सभी के अंदर एक ही सेल्फ है, एक ही आत्मा है, सभी एक ही विस्तृत , सर्वव्यापी सत्य के रूप हैं। इस कारण उसके अंदर सभी के प्रति प्रेम, सेवा और अहिंसा का भाव होता है। उसे किसी से न तो विशेष अनुराग होता है, न ही विराग।
      लेकिन यँहा ध्यान देने की बात है कि यह व्यक्ति भी जिसे इन विशेषताओं के कारण , पण्डित कह कर सम्बोधित किया गया है वह व्यवहार के स्तर पर सभी से समान भाव रखते हुए भी उन सभी के कर्मों के अनुरूप ही व्यवहार करता है। इसी लिए राम ने विभीषण की अच्छाइयों को देखते हुए उसे मित्रवत व्यवहार दिया और रावण को उसकी बुराइयों का दण्ड भी दिया। किन्तु राम ने  रावण से कोई बैर कभी नहीं रखा। व्यक्ति के शरीर के कर्म और उन कर्मों पर ज्ञानी व्यक्ति की प्रतिक्रिया शरीर के स्तर पर ही होती है न कि उसके सेल्फ के स्तर पर।


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