श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 17

तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥

जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं। ।।17।।

 अब श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्त व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हैं। वे पूर्व में भी समझाये हैं कि व्यक्ति जब कर्मयोग के मार्ग से चलकर कर्म करता है तो उसे ज्ञान प्राप्ति के बाद उसकी विशेषताएँ क्या होती हैं। तो आइए हम एक एक कर समझें कि वे कौन सी विशेषताएँ हैं जो एक कर्मयोगी ज्ञानी व्यक्ति की होती हैं।

1.
जब ये ज्ञान प्राप्त होता है तो व्यक्ति की बुद्धि, उसकी समझदारी, उसका ज्ञान परमतत्व में अवस्थित हो जाता है। तब व्यक्ति की बुद्धि, उसका विवेक ये समझने में सक्षम होता है कि उसका सेल्फ क्या है, वह वास्तव में वो नहीं है जो उसका ईगो है, बल्कि वो तो ईगो से परे सेल्फ है, वह विस्तृत कॉन्सियसनेस्स का ही एक भाग है, वह परमात्मा का ही एक अंश है जैसा अन्य सभी हैं । भले वो व्यक्ति इस तथ्य को अनुभव में न देख पाए न व्यक्त कर पाए किंतु वो अपने बुद्धि विवेक से ये समझता जरूर है।
       यह समझदारी व्यक्ति की अज्ञानता को समाप्त करता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे किसी छात्र की कोई प्रमेय तो परिणाम तो पता है लेकिन उसे ये नहीं पता कि ये है कैसे। लेकिन जब छात्र को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उस प्रमेय कों सिद्ध कैसे करते हैं तो वह समझ पाता है कि इस प्रमेय के पीछे का गणित क्या है जिससे इस प्रमेय की वास्तविकता और सत्यता प्रमाणित होती है। अज्ञानता के दूर होने से व्यक्ति समझ पाता है कि सत्य क्या है, ज्ञान क्या है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो बार बार समझने की जरूरत है। यही सत्य खुद के सेल्फ, खुद के कॉन्सियसनेस्स और आत्मा को समझने के लिए भी है। अगर समझ नहीं हो पाई हो तो बारम्बार चिंतन आवश्यक है।
          ध्यान रहे जब हमारा दिमाग किसी तथ्य को स्वीकार भर करता है तो वह विश्वास कहलाता है लेकिन जब हमारी बुद्धि, हमारा विवेक  जब किसी तथ्य को समझ लेता है तो वह ज्ञान कहलाता है। विश्वास ज्ञान नहीं है। विश्वास  किया हुआ तथ्य सही हो सकता है, लेकिन उस तथ्य की समझदारी भी हो ही गई हो ये कतई जरूरी नहीं है। जैसे पढ़कर, या सुनकर हम जानते हैं कि हम ही ब्रह्म हैं लेकिन ये जानना भर तो मात्र विश्वास है, ये जानना ज्ञान नहीं है। विश्वास होना भावना के स्तर पर होता है। लेकिन बुद्धि विश्वास पर नहीं टिकी होती है। बुद्धि और विवेक तो तर्क करते हैं , तर्क करेंगे ही यदि वे बुद्धि और विवेक हैं तो। भावना के स्तर पर हम प्रेम, घृणा, मित्रता , शत्रुता जैसी चीजों पर विश्वास कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि कंही कोई ईश्वर है जो हमारी परवाह कर रहा है, किंतु तर्क , बुद्धि , विवेक इसे मान भर कर सन्तुष्ट नहीं होते हैं , बल्कि वे इन तथ्यों कों समझने की कोशिश करते हैं। बुद्धि से जो समझते हैं हो सकता है कि वह विश्वास से भिन्न हो तब भी बुद्धि उसी पर भरोसा करती है जिसे वो समझ पा रही है। इस कारण से विश्वास और बुद्धि में निरंतर रस्सा कस्सी होते रहता है।  विश्वास अंधविश्वास में  परिणत हो सकता है, इसकी आशंका बनी रहती है। ये तब होता है जब बिना बुद्धि और विवेक से समझे हम विश्वास करने लगते हैं। इसलिए ज्ञान का बहुत महत्व है जो सही साधनों से, सही तरीकों से आनी चाहिए। मान लें आपको कुछ देखना है तो आप आँखों से ही देखिएगा न। आँखों को बंद कर तो नहीं देख पाइयेगा। इसी प्रकार जब हमें ज्ञान चाहिए तो हमें ज्ञानी के शरण में जाना होता है जो हमारा मार्गदर्शन करता है, बताता है कि हम वो कौन सी क्रिया करें कि हम तथ्य को समझ सकें। अगर हमें ये समझना है कि हम वास्तव में कौन हैं तो हमारा शिक्षक हमें रास्ता दिखाता है जिसपर चलकर हम अपनी अज्ञानता को समझकर उसे दूर कर ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। यँहा श्रीकृष्ण उसी मार्ग, कर्मयोग को हमें दिखा कर हमें समझाना चाह रहे हैं कि हम कौन सी क्रिया करें कि हम समझ पाए कि हम वास्तव में हैं कौन और हमारे दायित्व क्या हैं।
        जैसे जैसे हम समझते हैं कि लगाव, मोह क्या हैं हम उन बहुत चीजों को भी समझते हैं जो इनसे जुड़ी हैं और नकारात्म हैं, जैसे जैसे हम समझते जाते हैं कि ये नकारात्मक हैं हमारा मोह, लगाव, लोभ, क्रोध, ईर्षा, हिंसा आदि के भाव समाप्त होते जाते हैं। ये मात्र भरोसा करने से नहीं हो पाता, बल्कि इसका आचरण करना होता है ताकि ये सत्य आत्मसात हो सके। जैसे जैसे ये आत्मसात होते जाता है, आत्मा पर पड़ा अंधकार का  पर्दा भी छंटते जाता है। अंधकार में जो सत्य लगता है, प्रकाश होने पर ज्ञात होता है कि अंधकार में हम जिसे सत्य समझ रहे थे वो तो असत्य था। वस्तुतः ज्ञान परिमार्जन की प्रक्रिया है जो हमारे अंदर पूर्व से उपस्थित सत्य को हमारे समक्ष उद्घाटित कर हमें ज्ञानी बनाती है। ज्ञान कँही बाहर नहीं होता है,वह आपके अंदर ही होता है, लेकिन खुद के अज्ञान से ढँके होने की वजह से उसका भान भी नहीं होता है। एक प्रशिक्षित शिक्षक, एक ऐसा व्यक्ति जिसे पता है कि  आपको  क्या सिखाया जाएगा तो आपको अपने अज्ञानता से छुटकारा मिल सकेगा उसके सम्पर्क में आने पर आप सीख पाते हैं कि कैसे आप अपने अज्ञान के अंधकार को छाँट कर अपने ज्ञान को पा सकें। आप एक बढई को लकड़ी का टुकड़ा देते हैं वह उसे तराश कर खूबसूरत फर्नीचर में बदल देता है। फर्नीचर तराशी हुई लकड़ी ही तो है। यही बात सभी तरह के ज्ञान पर लागू होती है।
        ज्ञान व्यक्ति के पूर्व स्वरूप को पूरी तरह बदल देता है।ज्ञान बुद्धि में होता है जो हमारे सेल्फ को समझने के लिए अनिवार्य है। बुद्धि और उससे प्राप्त ज्ञान से व्यक्ति आने सेल्फ को समझ पाने में समर्थ होता है। वह समझ पाता है कि उसका सेल्फ विस्तृत कॉन्सियसनेस्स का ही एक अंश  मात्र है, उसकी आत्मा परम् आत्मा का ही अंश है। अर्थात परम् ब्रह्म ही उसका सेल्फ है यानी सम्पूर्ण जगत में व्यप्त कॉन्सियसनेस्स ही उसका सेल्फ है। यह ज्ञान व्यक्ति को स्वयं के सेल्फ के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान बनाता है। इस प्रकार व्यक्ति खुद के सेल्फ जो परम् का ही स्वरूप है उसमें अवस्थित हो जाता है। यह समझदारी बुधि के निरंतर अभ्यास और उपयोग से आती है, जो कर्मयोग के अनुसार आचरण कर होता है और यही आचरण हमें  निरन्तर मनन , चिन्तनऔर ध्यान में प्रवृत्त करती है जिससे  बुद्धि ज्ञान की तरफ ले जाती है और ज्ञान सेल्फ की तरफ जो अंतिम लक्ष्य हो जाता है। इससे व्यक्ति की सारी अशुद्धियाँ अर्थात अज्ञानता समाप्त होकर विशुद्ध सेल्फ ही बचा रह जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। कर्मबन्धन से मुक्ति ही जन्म-मृत्यु से मुक्ति है। कई लोगों को पुनर्जन्म में विश्वास नहीं होता है। लेकिन बुद्गी  से  जो ज्ञान मिलता है वह व्यक्ति को उसके सेल्फ में टिका देता है और व्यक्ति समझता है कि ये सेल्फ और कुछ नहीं बल्कि सर्वव्यापी कंक्सियसनेस्स ही है। जब ये ज्ञान आ जाता है और इसका अनुभव हो जाता है तो फिर कर्मों के बंधन से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है। कर्म होते हुए भी कर्म होने का भान तक नहीं होता है। यही अवस्था मुक्ति की अवस्था है जो जीवित रहते ही मिल सकती है क्योंकि जीवित अवस्था में ही हम बुद्धि से ये ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और ज्ञान ही मुक्ति देता है। तब ऐसे ज्ञानी को ही परमात्मा में अवस्थित हुआ कहते हैं जिसके लिए सामुहिक कल्याण ही एक मात्र कृत्य रह जाता है क्योंकि वह समझ पाता है कि कोई भी उससे भिन्न नहीं है।

Comments

Popular posts from this blog

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

Geeta Chapter 3.1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय