श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।
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व्यक्ति के ज्ञान और अज्ञान के फर्क को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति ज्ञानी नहीं है वह यही समझता है कि परमात्मा उसके पाप कर्मों और पुण्यकर्मों को ग्रहण कर उसके अनुसार उसे फल प्रदान करते हैं। पीछे श्रीकृष्ण बताये हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हुई है उसे इस बात की समझ है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता या कराता है वह सब वह अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात तीन गुणों के अनुपातिक उपस्थिति के अनुसार ही करता या कराता है और उसमें परमात्मा की कोई भूमिका नहीं होती है अर्थात व्यक्ति अपने कर्मों और उन कर्मों के फल के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है न कि परमात्मा। यँहा इसी तथ्य को पुनः रेखांकित करते हैं कि जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके पूण्य कर्म और पाप कर्म दोनों को परमात्मा ग्रहण कर उसके अनुसार फल देते हैं तो यह उसके ज्ञान का अभाव ही है। एक संशय हो सकता है कि कर्मयोग की शिक्षा में प्रशिक्षण देते समय ये बताया गया है कि हमें अपने कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर करना चाहिए। इसका तातपर्य है कि कर्म करते समय हमारे लक्ष्य ऊँचे होने चाहिए, हमारे आदर्श उच्च होने चाहिए और हमें प्रशिक्षित होना चाहिए इस भाव से कर्म करने के लिए कि हम हो कर्म कर रहें हैं वो खुद के लिए नहीं कर रहें हैं बल्कि उस उच्च आदर्श की सेवा करने के लिए कर रहें हैं। हमारा दायित्व इतना भर ही है। फिर उसका परिणाम क्या आया ये न तो हमारे हाथ में है और न ही परमात्मा द्वारा निर्धारित है बल्कि प्रकृति के स्थापित नियम उसके परिणाम को तय करते हैं। जैसे यदि हम अग्नि में हाथ डालते हैं तो प्रकृति के नियमानुसार हाथ जलता है। इसके लिए परमात्मा उत्तरदायी नहीं है।
वस्तुतः यँहा श्रीकृष्ण हमारे उन पलायनवादी विचारों पर चोट कर रहें हैं जिसमें हम अपने कर्मफलों के लिए परमात्मा को उत्तरदायी ठहराते हैं और खुद को अपने कर्मफलों से मुक्त रखने का कुप्रयास करते हैं। ईश्वर कँही बाहरी दुनिया में नहीं होता है बल्कि हमारा सेल्फ ही विस्तारित रूप से परम् आत्मा है। इसकी अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति को इसका ज्ञान होता है कि वह अपने शरीर और शरीर जनित ईगो का प्रतिनिधि नहीं है बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप तो उस सर्वव्यापी सेल्फ का एक अंश है जो सभी में समान रूप से व्याप्त है।
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