श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 13
सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। ।।13।।
कर्मयोग के मार्ग से कर्म करता हुआ व्यक्ति जब ज्ञान की मंजिल पर पहुँचता है तो उसके आचरण में जो खूबियाँ आई रहती हैं उनके बारे में श्रीकृष्ण ने पहले भी दो बार विस्तार से चर्चा किया है और पुनः उसी चर्चा को यँहा भी कहते हुए उस ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं के बारे में बात करते हैं जो कर्मयोग के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान प्राप्त करता है।
इन विशेषताओं को हम क्रम से फिर से समझते हैं।
1.इस तरह के व्यक्ति का अपने अन्तःकरण पर पूर्ण नियंत्रण होता है अर्थात जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते कर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसका अपने समस्त ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों पर अपने विवेक के माध्यम से पूरा नियंत्रण होता है। इंद्रियाँ विवेक को संचालित नहीं करती हैं बल्कि विवेक इन्द्रियों को दिशा देता है ताकि इंद्रियाँ अपने विषयों के अनुसार अपना कर्म तो करें किन्तु कर्मेन्द्रियों को उनमें आसक्त न होने दें।
2.व्यकि अपने शरीर को अपना प्रतिनिधि नहीं मानता बल्कि उस ज्ञानी व्यक्ति के शरीर उसके रहने का घर मात्र है। इसका अर्थ ये होता है कि व्यक्ति को ये समझ हो गई होती है कि उसका सेल्फ, उसकी आत्मा उसी परम् आत्मा का स्वरूप है जिसके स्वरूप सभी हैं और शरीर तो मात्र एक अभिव्यक्ति है।
3.चूँकि व्यक्ति अपने ईगो और सेल्फ के अंतर को समझता है सो उसे ज्ञात होता है कि उसमें कोई कर्तापन नहीं है बल्कि जो भी कर्म होते हैं वो स्वभाव के अनुसार इन्द्रियों की गतिविधियाँ हैं जिनका परम् उद्देश्य मात्र इतना ही है कि वे कर्म सभी के कल्याणार्थ होते रहें। उसे इसका भान है कि वास्तविकता के धरातल पर सभी एक ही परम् आत्मा के स्वरूप हैं, सभी के सेल्फ यानी सभी का कॉन्सियसनेस एक ही है तो फिर कर्तापन का कँहा प्रश्न उठता है।
4.इस बात को ज्ञानी व्यक्ति समझकर खुद को उसी परमात्मा में अवस्थित समझ पाता है । ऐसा व्यक्ति अहंकार और स्वार्थ से रहित होकर सबको एक ही परमात्मा का अंश के रूप में देखते हुए उन्हीं में लीन होता है अर्थात उन्हीं के हितार्थ जीवन व्यतीत करता है। ऐसी स्थिति में उसे कोई क्लेश नहीं होता , वह सत, चित्त, और आनंद का खुद स्वरूप हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 14
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है। ।।14।।
ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि
4. जब व्यक्ति यह जानता है कि प्रभु यानी ईश्वर किसी व्यक्ति के न तो कर्मों के रचयिता हैं न ही कर्मफल के तो ये भी तय जानता है कि ईश्वर किसी व्यक्ति के कर्तापन के लिए उत्तरदायी नहीं होते हैं।
लेकिन ध्यान रहें कि ज्ञान की ये अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति कर्मयोग के लिए निर्धारित आचरण को करते हुए कर्म कर इस अनुभूति को प्राप्त करता है। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए उस व्यक्ति के कर्मों और उनके फलों का निर्धारण ईश्वर के द्वारा किया जाना समझा जाता है, किन्तु यँहा पांचवे अध्याय के श्लोक संख्या 14 में श्रीकृष्ण साफ साफ समझाते हैं कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसके लिए ईश्वर को उत्तरदायी नही। कह सकता और न ही प्राप्त फलों के लिए ही वह ईश्वर को जबाबदेह बना सकता है।
वस्तुतः व्यक्ति जो करता है वह क्यों करता है अगर इसे समझना है तो हमें फिर उसी कर्मयोग पर लौटना होता है जिसके माध्यम से हमें ज्ञान की मंजिल मिलती है। कर्म तो स्वभाव से उतपन्न होते हैं जो हमारे अंदर के तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात पर निर्भर हैं। ये कर्म हमारे शरीर की इन्द्रियों के द्वारा सम्पादित होते हैं , उसके ईगो के द्वारा किये जाते हैं और फल भी उसी के अनुसार मिलते रहते हैं।
व्यक्ति के कर्तापन का सम्बंध उसके अहंकार यानी "मेरे द्वारा किया जाने वाला या किया गया" से होता है और इस समझ का सम्बंध उसके तीनों गुणों की परस्पर अवस्था और उन गुणों के परस्पर संयोग पर निर्भर करता है। कर्मयोग की शिक्षा का हम स्मरण करें तो पाते हैं कि जब व्यक्ति अपने गुणों की अवस्था में उत्तरोत्तर विकास करता है तो उसके गुण आसुरी से दैवी तक हो जाते हैं। पूर्व में ही श्रीकृष्ण ने समझाया भी है कि ये ज्ञान सभी के लिए है अर्थात अधम के लिए भी और उत्तम के लिए भी। यँहा श्रीकृष्ण ये शिक्षा दे रहें हैं कि मनुष्य खुद के कर्मों के और उनके फ़लों का उत्तरदायी है, वह ईश्वर पर, परमात्मा पर इनका बोझ डालकर दोषरहित नहीं हो सकता है। आपको हमको सबको ये बात समझनी चाहिए कि व्यक्ति रूप, रंग, नाम और शरीर से भिन्न भिन्न भले हो सभी उसी एक आत्मा के अंश हैं जिसका प्रसार सम्पूर्ण दृश्य से अदृश्य तक है और शरीर के रूप में उसका अलग महत्व मात्र इतना ही है कि गुणों की अवस्था अलग अलग है और सभी को गुणों की उसी चरम अवस्था पर पहुँचने का मार्ग पकड़ना चाहिए जिससे गुणों से मुक्त होकर अपनी आत्मा में विलीन हो जाएं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं।
।।15।।
व्यक्ति के ज्ञान और अज्ञान के फर्क को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति ज्ञानी नहीं है वह यही समझता है कि परमात्मा उसके पाप कर्मों और पुण्यकर्मों को ग्रहण कर उसके अनुसार उसे फल प्रदान करते हैं। पीछे श्रीकृष्ण बताये हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हुई है उसे इस बात की समझ है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता या कराता है वह सब वह अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात तीन गुणों के अनुपातिक उपस्थिति के अनुसार ही करता या कराता है और उसमें परमात्मा की कोई भूमिका नहीं होती है अर्थात व्यक्ति अपने कर्मों और उन कर्मों के फल के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है न कि परमात्मा। यँहा इसी तथ्य को पुनः रेखांकित करते हैं कि जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके पूण्य कर्म और पाप कर्म दोनों को परमात्मा ग्रहण कर उसके अनुसार फल देते हैं तो यह उसके ज्ञान का अभाव ही है। एक संशय हो सकता है कि कर्मयोग की शिक्षा में प्रशिक्षण देते समय ये बताया गया है कि हमें अपने कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर करना चाहिए। इसका तातपर्य है कि कर्म करते समय हमारे लक्ष्य ऊँचे होने चाहिए, हमारे आदर्श उच्च होने चाहिए और हमें प्रशिक्षित होना चाहिए इस भाव से कर्म करने के लिए कि हम हो कर्म कर रहें हैं वो खुद के लिए नहीं कर रहें हैं बल्कि उस उच्च आदर्श की सेवा करने के लिए कर रहें हैं। हमारा दायित्व इतना भर ही है। फिर उसका परिणाम क्या आया ये न तो हमारे हाथ में है और न ही परमात्मा द्वारा निर्धारित है बल्कि प्रकृति के स्थापित नियम उसके परिणाम को तय करते हैं। जैसे यदि हम अग्नि में हाथ डालते हैं तो प्रकृति के नियमानुसार हाथ जलता है। इसके लिए परमात्मा उत्तरदायी नहीं है।
वस्तुतः यँहा श्रीकृष्ण हमारे उन पलायनवादी विचारों पर चोट कर रहें हैं जिसमें हम अपने कर्मफलों के लिए परमात्मा को उत्तरदायी ठहराते हैं और खुद को अपने कर्मफलों से मुक्त रखने का कुप्रयास करते हैं। ईश्वर कँही बाहरी दुनिया में नहीं होता है बल्कि हमारा सेल्फ ही विस्तारित रूप से परम् आत्मा है। इसकी अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति को इसका ज्ञान होता है कि वह अपने शरीर और शरीर जनित ईगो का प्रतिनिधि नहीं है बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप तो उस सर्वव्यापी सेल्फ का एक अंश है जो सभी में समान रूप से व्याप्त है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥
परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। ।।16।।
यह तो हमें ज्ञात हो ही गया है कि खुद के लिए कर्तापन का बोध होना और यह समझना कि प्रभु करते कराते हैं, वे हमारे कर्मों के फलों के दाता हैं, रचियता हैं समझना अज्ञानता है। लेकिन इसका बोध मात्र होने से यह अज्ञानता दूर नहीं होती है जब तक हम खुद के अभ्यास से ये न समझ लें। आपको ये सिद्धान्त तो याद हो गया लेकिन कर्मफल से आपकी सम्बद्धता गई नहीं हो, उससे लगाव बना हुआ हो, इन्द्रियाँ उस लगाव के अनुसार आचरण कर रहीं हो तो अपने कर्मों को करते हुए हमें यही लगता है कि ये हम हीं कर रहें हैं, या फिर ईश्वर हमसे करा रहे हैं और फल भी उन्हीं के हाथों में है। इसी भाव से प्रेरित होकर मन में कई कामनाओं को पाले उनकी पूर्ति के लिए हम तरह तरह के जतन करते रहते हैं, और इसी क्रम में विभिन्न इक्षाओं की पूर्ति हेतु कई जगह माथा भी टेकते हैं, कई तरह के देवी देवताओं के शरण में जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हम अच्छा भला भी कर्म करते हों तो भी कर्म से अधिक हम इस बात से जुड़े होते हैं कि हमें मन वांछित फल मिल जाये। कर्मफल से इतनी गहरी सम्बद्धता उसमें आसक्ति प्रदान करती है। फिर चाहे हम जितना भी सिद्धान्त रटे हुए हों वो हमारे काम नहीं आता है।
तो फिर ये सिद्धान्त आत्मसात कैसे होता है? तो इसके लिए कर्मयोग के आचरण का अभ्यास अनिवार्य है। श्रीमद्भागवद्गीता के पूर्व के अध्यायों में और पुनः इस अध्याय में भी हमने सीखा था कि जो खुद के सेल्फ यानी कॉन्सियसनेस अथवा आत्मा की समझ रखता है वह तत्व ज्ञानी माना जाता है यानी उसे इस मूल बात का व्यवहारिक ज्ञान होता है कि वह विस्तृत परमात्मा का ही एक भाग है । इसी अध्याय में थोड़ा सा पीछे जाने पर हम देखते हैं कि हमें यह शिक्षा मिलती है कि "सामान्यतः जब हम कोई क्रिया करते हैं तो हम यह समझते हैं कि ये अमुक क्रिया या कर्म हम कर रहें हैं। ये समझना बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति खुद को अपने "मैं" से पहचानता है। उसे लगता है कि जो कुछ कर रहा है उसका "मैं" कर रहा है। यह "मैं" अर्थात अहम के करने का भाव यानी ""अहंकार"" ही उसके साथ होता है जो उसे बताता है कि जो कुछ हो रहा है वह उसका "मैं" कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के ईगो से बंधा होता है।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता है तो उसे कुछ विशेष तरह से कर्म करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे कि उसे अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करने हैं, कर्म करने में परिणाम से असंगत रहना है, जो कर्म कर रहें हैं उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित करना है, कर्म के जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनको प्रसाद भाव से ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखना है। जब व्यक्ति असंगत भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है तो वह अपनी इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए कर्म नहीं करता है बल्कि वह कर्तव्य भाव से कर्म करता है जिसमें उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रिया करती हैं , उनकी क्रियाओं में कोई अपेक्षा, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि के कोई भाव नहीं होते। इस प्रकार जब व्यक्ति कर्म करने में प्रशिक्षित होता है तो उसे पता होता है कि वस्तुतः उसके अहंकार की वजह से कोई कर्म नहीं हो रहा है। अहंकारमुक्त स्थिति में व्यक्ति "मैं कर्ता हूँ" के मोह से मुक्त हो गया रहता है और उसे पता होता है कि जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है उसमें उसका अपना कोई निमित्त नहीं है, उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि उसके कर्म उसकी इन्द्रियों के स्वाभाविक क्रियाओं की परिणति हैं जिनमें उसका अपना कुछ भी नही है। जो व्यक्ति इस स्थिति में होता है वही तत्व ज्ञानी होता है। तत्वज्ञानी अर्थात जो आत्म तत्व को जानता है, जिसे ज्ञात है कि उसका वास्तविक रूप उसके अहंकार से निर्धारित नहीं होता है, बल्कि वह तो मात्र पूर्ण का एक भाग है, उसी का प्रतीक है, जो दूसरे हैं वही वो है, जो वो है, वही दूसरे हैं अर्थात जो कुछ उसके कर्म हैं वे उसके गुणों से निर्धारित उसके स्वधर्म के अनुसार हैं। " इसी के अभ्यास से प्राप्त ज्ञान तत्व ज्ञान है जो हमारे अंदर के अज्ञानता को समाप्त करता है। जैसे जैसे हमारे अंदर इस ज्ञान का फैलते जाता है खुद के अहंकार और अदृश्य शक्ति से फल प्राप्ति का अज्ञान, ईश्वर के द्वारा कुछ करने , कराने का अज्ञान समाप्त होते जाता है। तब होता क्या है? तब हम इस सत्य से प्रकाशित खुद के अंदर ही परमात्मा में अवस्थित शांत मन से आनंदित रहे हैं यानी हम स्वयं ही सचिदानंद की अवस्था में आ जाते हैं। यह अवस्था तो देवत्व की प्राप्ति का अंतिम सोपान हो तो है।
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