श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 11
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 11
कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥
कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। ।।11।।
ज्ञानयोग अथवा कर्मसन्यास का मार्ग कर्मयोग के रास्ते से चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है, ज्ञान या कर्मसन्यास की प्राप्ति का कोई अन्य मार्ग नहीं है। बिना कर्मयोग के रास्ते कर्म किये हमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है और न कर्मसन्यास की अवस्था ही प्राप्त हो सकती है। कोई भी व्यक्ति कर्मों का सम्पूर्ण त्याग नहीं कर सकता है। कुछ न कुछ कर्म हम सभी करते हीं हैं किंतु सभी कर्म हमें ज्ञान के मार्ग पर ले जा सकते हों यह भी नहीं होता है। जब असंगत भाव से बिना कर्तापन का अहंकार पाले कर्मयोग के अनुसार हम कर्म करते हैं तभी हम ज्ञानयोग/कर्मसन्यास के मार्ग पर चल पाते हैं। इसके आगे ध्यान की अवस्था मिलती है जब व्यक्ति अपने कर्मों में ही ध्यान की अवस्था को प्राप्त कर पाता है। दरअसल कर्म करने के क्रम में जब हम अपने उच्च आदर्शों जिसे हम ईश्वर कहते हैं के प्रति समर्पित होकर कर्म करते हैं। जब हम उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म में प्रवृत्त होते हैं तो उसी आदर्श उसी ईश्वर के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर कर्म करते हैं। इस अवस्था में हमारे अंदर अपने स्वार्थ को साधने के लिए नहीं बल्कि उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होने के भाव होते हैं और इसी भाव से अर्थात निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं। इस स्थिति में हम कर्म और कर्म के परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं सो हम किसी पाप के भागी नहीं होते। इस अवस्था में हम उस उच्च आदर्श , उस ईश्वर, उस ज्ञान के आकांक्षी होते हैं। यही तो योगी होने की अवस्था है हमारी। इस अवस्था में ही हमारे मन का, चित्त का, अन्तःकरण का अर्थात हमारे विचारों, हमारी सोच, हमारे गतिविधियों और क्रियाओं का शुद्धिकरण होता है यानी इनमें कोई पाप नहीं होता, एकदम निष्पाप होते हैं हम।
जब हम बिना किसी व्यक्तिगत हित के स्वार्थ के कार्य करते है, जब हम परिणाम से असंगत होते हैं, जब उच्च भाव के प्रति समर्पित होते हैं तो हमारे विचार भिन्न होते हैं। जब हमारे दृष्टिकोण में कर्मयोग की शिक्षा के भाव होते हैं तो फिर यह दृष्टिकोण हमारे अंदर ऐसे विचारों को गढ़ता है जिससे हमारे अंदर के नकारात्मक गुण समाप्त हो जाते हैं। इन विचारों से हमारे अंदर जो प्रतिबद्धता आती है उसके कारण हमारे स्वभाव में भी वही निष्काम कर्मयोग की विशेषताएँ आ जाती हैं, और यही हमारे विवेक का निर्धारक हो जाती हैं यह विवेक हमारे अंदर से काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, जलन जैसी नकारत्मकता को निकाल कर बाहर कर देता है।
जब हमें लगता है कि हम ही कर्ता हैं तो फिर हम अपने कर्मों से और उनके परिणाम से बन्ध जाते है और अपने इन्द्रियों, अपने अहम , अपने शरीर को सुख देने की ईक्षा से कर्म करते हैं और तब तमाम तरह के गलत कामों को करते हैं ताकि हम अपनी इन्द्रियों को सुख दे सकें और उनसे सुख प्राप्त कर सकें। हम अपने इन्द्रियों के वश में होते हैं और हम अपने लोभ जनित, मोह जनित विचारों के अनुसार यन्त्रवत उनसे संचालित होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में मन में ढेरों कामनाएं सतत चलती रहती हैं और हम हमेशा उत्तेजित, उद्वेलित रहते हैं।
इसके विपरीत जब हम उच्च आदर्श, ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से कर्म करते हैं , जब हमें ये भान होता है कि हम जो कर रहें हैं अपने उच्च आदर्श के प्रति सेवा है तब हमारे विचारों में से मोह, काम, क्रोध आदि का त्याग हो जाता है और तब इस अवस्था में मन इन शांति होती है, और चूँकि हमारे कर्म हमारे आदर्श के प्रति समर्पित होते हैं तो वे कर्म बाहर सम्पन्नता को जन्म देते हैं।
हम जिस भाव से कर्म करेंगे हमारे कर्मों का इस संसार के लिए वही परिणाम होगा। यदि हमारे विचारों में स्वार्थ, मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या , हिंसा आदि होंगे तो हमारे कर्म संसार को यही देंगे और यदि हमारे विचारों में समर्पण, सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा आदि दैवी भाव होंगें तो हमारे कर्म इस संसार के प्रति सेवा भाव से होंगे, और संसार में सुख समृद्धि और शांति की बढ़ोतरी होगी।
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