श्रीमद्भागवद्गीता अद्याय 5 श्लोक 10
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 10
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥
जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता।
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श्रीकृष्ण ने बारम्बार इस बात पर जोर दिया है कि असंगत भाव से कर्म करना चाहिए। हम सभी तो दिन भर कर्म ही करते हैं लेकिन हर कर्म कर्मयोग के दायरे में नहीं आता, सिर्फ वही कर्म कर्मयोग केवनुसार कर्म होते हैं
1. जिनको करने में कर्म फल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती। अर्थात जब हम कर्म करते हैं तो उसके फल की अपेक्षा नहीं करते, हम कर्म इसलिए नहीं करते कि उसे करने से हमें कोई सुख की प्राप्ति हो, किसी विशेष फल की प्राप्ति हो। अगर ऐसी भावना रखकर कर्म करते हैं तो फिर उस फल से हम जुड़ जाते हैं। उसकी पूर्ति होने पर मोह, लोभ , लालच, अहंकार आदि भाव आ जाते है कि उसे फिर करें, फिर वही सुख मिले। और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती है तो क्रोध, ईर्ष्या , जलन, हिंसा आदि के भाव आते हैं। इस प्रकार दोनों ही स्थिति में हम कर्मों से बन्ध जाते हैं।
2. आसक्ति विहीन भाव से कर्म करने से ये होता है कि हम खुद के लिए कर्म नहीं करते यानी अपने ईगो की संतुष्टि के लिए कर्म नहीं करते। तब क्यों करते हैं? तब हमारे कर्म किसी अन्य उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होते हैं। इस प्रकार से कर्म करने पर कर्म में सेवा की भावना आ जाती है, समर्पण की भावना आ जाती है क्योंकि तब हम व्यक्तिगत लोभ से प्रेरित नहीं होते हैं। इस प्रकार से हम किसी उच्च आदर्श की प्राप्ति हेतु हम कर्म करते हैं तो मन में कोई लोभ, लालच, मोह, क्रोध, मोह जैसी कोई भावना नहीं होती और मन शांत रहता है। इस स्थिति में कर्म करने वाला व्यक्ति कर्मफल और कर्म से बन्धता नहीं है।
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