श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3
ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। ।।3।।
श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की महत्ता और खासियत को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कर्म को छोड़कर भागने वाले के लिए उनकी शिक्षा में कोई स्थान नहीं है, बल्कि सन्यासी तो वो है जो कर्म के मार्ग पर चलायेमान है। वही व्यक्ति नित्य सन्यासी है जो (1) द्वेष गसे मुक्त है (2) जिसे किसी चीज की आकांक्षा नहीं है तथा (3) द्वंदात्मक युग्मों से जैसे जय-पराजय, सुख-दुख से मुक्त है।
ज्ञानी या सन्यासी होने के लिए, ज्ञानयोगी या सन्यासयोगी होने के लिए किसी अन्य चीज की कोई आवश्यकता नहीं है । आप यदि कर्मयोगी हैं तो ज्ञानयोगी या सन्यासी भी स्वतः ही है। ऐसा व्यक्ति ही स्वतः कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है बिना किसी प्रयास के ।
वस्तुतः ज्ञान या सन्यास मार्ग पर चलने के लिए किसी चीज को छोड़ने की जरूरत भी नहीं है। Renouncement की आवश्यकता नहीं होती बल्कि जरूरत होती है नकारात्मक गुणों (आसुरी गुणों) से मुक्त होना होता है।
व्यक्ति के अंदर यदि चिड़चिड़ाहट होता है तो वही गुस्से को जन्म देता है जो आगे चलकर घृणा का रूप ले लेता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति के अंदर सुख और दुख की अनुभूति उन चीजों से होती है जो उसके बाहर होते हैं , जिनपर उसका कदाचित कोई नियंत्रण भी नहीं होता है। घृणा या द्वेष की इस भावना के कारण व्यक्ति स्वयम को पीड़ा पहुंचाते रहता है। इससे हिंसा का जन्म होता है। लेकिन यदि अपने कर्मों को कर्तव्य मानकर करने से मन के अंदर किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं आता। द्वेष भाव से मुक्त होने से मन की पीड़ा जाती रहती है। व्यक्ति के अंदर द्वेष की भावना तब आती है जब व्यक्ति खुद के ईगो से जुड़ कर उसे ही अपना वास्तविक रूप मानने लगता है। ऐसी स्थिति में उसे किसी से लगाव होता है किसी के प्रति द्वेष। लेकिन यदि व्यक्ति इष्ट के प्रति, एक बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर कोई कर्म करता है तो उसे अपने अंदर के ईगो से जो जुड़ाव होता है उससे मुक्ति मिलती है। वह महसूस करता है कि वह जो कुछ कर रहा है उसका उद्देश्य उसका वह महान लक्ष्य है और फल में उसे जो प्राप्त होता है उसे उस लक्ष्य की देन मानकर खुशी अनुभव करता है वह व्यक्ति अपने अंदर किसी भी क्रोध के भाव को जन्मने नहीं देता है, उसे किसी से घृणा या वैर नहीं हो पाता है। यह निःस्वार्थ सेवा के भाव से सम्भव हो पाता है। जब व्यक्ति सेवा की भावना से कर्म करता है तो वह खुद के लिए कुछ नहीं कर रहा होता है। वह तो उस महान लक्ष्य के लिए सब कुछ कर रहा होता है। तब उसके अंदर खुद के ईगो को संतुष्ट करने का लोभ नहीं होता है। आप जब कर्म करते हैं तो मूल्यांकन करें कि आप वो कर्म किसके लिए कर रहें हैं। क्या आप अपने ईगो की संतुष्टि के लिए कोई काम कर रहें है, क्या आप अपने पूर्वाग्रहों और अपने अभिमान के लिए कुछ कर रहें हैं, क्या आप अपने पसन्द-नापसन्द के लिए कुछ कर रहें हैं? यदि ऐसा है तो फिर आपको अपने अपने ईगो पर निर्भर होना पड़ेगा और बाहरी परिणामों से सूखी या दुखी होने की बाध्यता रहेंगी जिससे आपके अंदर द्वेष बना रहेगा। लेकिन यदि आप सेवा की भावना से उच्चतर लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर उसी के लिए कर्म करते हैं तो फिर ये नकारात्मकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
इक्षाओं और कामनाओं के परिणाम में व्यक्ति फिर से उन्ही लगावों, और उससे निकले माया, मोह , ईर्ष्या, क्रोध आदि के चक्कर में पड़ता है लेकिन यदि आपको अपने कर्म के परिणाम से आसक्ति न हो और आपको लगे कि आप जो कर रहें हैं यही कर्म स्वतः आपका भी ध्यान रख लेगा तो बेवजह ही आप कामनाओं के पूछे नहीं भागेंगे।
अटैचमेंट या लगाव का परिणाम होता है कि व्यक्ति विपरीत के द्वंदात्मक अवयवों के चक्कर में पड़ जाता है। सुख-दुख, जय-पराजय जैसे युग्म उसे परेशान करते रहते हैं। यदि हर अच्छे बुरे के प्रति समान भाव रहे तो फिर कोई कष्ट नहीं होता है अन्यथा जीवन में एकांगी होकर हमेशा हर परिस्थिति में दुखी ही होते रहोगे।
इस प्रकार जो व्यक्ति अपने कर्मों में द्वेष, आकांक्षा और द्वंदात्मक युग्मों के प्रभाव से मुक्त होता है वही नित्य सन्यासी है , उसे सब कुछ है किंतु उसे किसी में आसक्ति नहीं है। यही व्यक्ति सुखपूर्वक कर्मबन्धन से मुक्त भी है जबकि वह सब कर्म करता भी है।
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