श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥

श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है। ।।2।।

जब मन में प्रश्न उठता है कि कर्मयोग और कर्मसन्यास में कौन सा मार्ग आसानी से अनुसरण करने योग्य है जिससे उत्तम परिणाम प्राप्त होता हो तो हमें सदा याद रखनी चाहिए कि कर्मयोग और कर्म सन्यास भले ही दोनों। का एक ही परिणाम है लेकिन हमारी स्थिति के अनुसार हमें अपनी यात्रा कर्मयोग के मार्ग से शुरू करनी है। आखिर ऐसा क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर हमें आगे मिलेगा, अभी तो हम इतना ही समझ लें कि कर्मसन्यास कर्मयोग के मार्ग की ही अगली मंजिल है और हम क्रमिक रूप से ही वँहा पहुंच सकते हैं, बीच के रास्ते को लाँघ कर आगे जाने का कोई उपाय नहीं है।

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