श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 की व्याख्या श्लोकरहित (श्लोक 1 से 29 )
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 1
युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के विषाद और भ्रम को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का महत्व और कर्म के अंतिम लक्ष्य को समझा चुके हैं। इसके बावजूद अर्जुन को अभी भी भ्रम है। सच तो यही है कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण हम सभी अपने कर्मक्षेत्र में कर्मों को करने से किसी न किसी तरह से भागते हैं और चाहते हैं कि सीधे अंतिम मनवांछित फल को प्राप्त कर लें लेकिन दिक्कत है कि लक्ष्य प्राप्त करने का शॉर्टकट रास्ता नहीं होता है। जो रास्ता है वो कर्मयोग का ही है भले उसके अंत में कर्म सन्यास की बात हो। लेकिन हम मनुष्य हमेशा सबसे आसान रास्ता ही ढूंढते है , उसे अपनाने के लिए तरह तरह के तर्क और कुतर्क भी करते हैं, खुद से भी और दूसरों से भी।
इसी भाव में पड़ा अर्जुन भी तीसरे अध्याय की तरह एक बार फिर श्रीकृष्ण से दुबारा कहता है कि सन्यास और कर्म दोनों ही मार्ग अगर अच्छे हैं तो उसके लिए कौन हितकारी है। अर्जुन में एक परिवर्तन अवश्य हुआ है। अब यँहा वो आसान मार्ग नहीं पूछ रहा है , वह श्रेष्कर यानी हितकारी मार्ग पूछ रहा है अर्थात वह जानना चाहता है कि उसकी परिस्थिति में उसके लिए कर्म का मार्ग हितकारी है अथवा सन्यास का।
वैसे तो श्रीकृष्ण ने अबतक विभिन्न तरीकों से अर्जुन को और अर्जुन के माध्यम से हम सबको समझाया है कि जब आप इस संसार में आये हैं तो बिना कर्म किये आपको मुक्ति नहीं मिलने वाली और ये भी की जो कर्म करने है, वे नियत कर्म हैं और नियत कर्म करने के तरीके भी नियत हैं जो कर्मयोग है और इसके अंत में ही आपको कर्मों से मुक्ति मिलती है और तब आप सन्यास मार्ग पर अग्रसर होते हैं यानी बिना नियत कर्म नियत तरीके से किये आपको सन्यास नसीब नहीं होने वाला है, तथापि अर्जुन के द्वारा पुनः प्रश्न किये जाने को हम अन्यथा नहीं कह सकते क्योंकि भ्रम और भ्रमजनित पुवाग्रह इतनी आसानी से पीछा भी नहीं छोड़ते। इस प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने जो कुछ समझाया है उससे हमारा भ्रम भी दूर होगा और हम भी जान पाएंगे कि जब हम मनुष्य तन प्राप्त किये हैं तो हमें कौन से मार्ग पर चलना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2
जब मन में प्रश्न उठता है कि कर्मयोग और कर्मसन्यास में कौन सा मार्ग आसानी से अनुसरण करने योग्य है जिससे उत्तम परिणाम प्राप्त होता हो तो हमें सदा याद रखनी चाहिए कि कर्मयोग और कर्म सन्यास भले ही दोनों। का एक ही परिणाम है लेकिन हमारी स्थिति के अनुसार हमें अपनी यात्रा कर्मयोग के मार्ग से शुरू करनी है। आखिर ऐसा क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर हमें आगे मिलेगा, अभी तो हम इतना ही समझ लें कि कर्मसन्यास कर्मयोग के मार्ग की ही अगली मंजिल है और हम क्रमिक रूप से ही वँहा पहुंच सकते हैं, बीच के रास्ते को लाँघ कर आगे जाने का कोई उपाय नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3
श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की महत्ता और खासियत को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कर्म को छोड़कर भागने वाले के लिए उनकी शिक्षा में कोई स्थान नहीं है, बल्कि सन्यासी तो वो है जो कर्म के मार्ग पर चलायेमान है। वही व्यक्ति नित्य सन्यासी है जो (1) द्वेष से मुक्त है (2) जिसे किसी चीज की आकांक्षा नहीं है तथा (3) द्वंदात्मक युग्मों से जैसे जय-पराजय, सुख-दुख से मुक्त है।
ज्ञानी या सन्यासी होने के लिए, ज्ञानयोगी या सन्यासयोगी होने के लिए किसी अन्य चीज की कोई आवश्यकता नहीं है । आप यदि कर्मयोगी हैं तो ज्ञानयोगी या सन्यासी भी स्वतः ही है। ऐसा व्यक्ति ही स्वतः कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है बिना किसी प्रयास के ।
वस्तुतः ज्ञान या सन्यास मार्ग पर चलने के लिए किसी चीज को छोड़ने की जरूरत भी नहीं है। Renouncement की आवश्यकता नहीं होती बल्कि जरूरत होती है नकारात्मक गुणों (आसुरी गुणों) से मुक्त होना होता है।
व्यक्ति के अंदर यदि चिड़चिड़ाहट होता है तो वही गुस्से को जन्म देता है जो आगे चलकर घृणा का रूप ले लेता है। ऐसी अवस्था में व्यक्ति के अंदर सुख और दुख की अनुभूति उन चीजों से होती है जो उसके बाहर होते हैं , जिनपर उसका कदाचित कोई नियंत्रण भी नहीं होता है। घृणा या द्वेष की इस भावना के कारण व्यक्ति स्वयम को पीड़ा पहुंचाते रहता है। इससे हिंसा का जन्म होता है। लेकिन यदि अपने कर्मों को कर्तव्य मानकर करने से मन के अंदर किसी के प्रति द्वेष का भाव नहीं आता। द्वेष भाव से मुक्त होने से मन की पीड़ा जाती रहती है। व्यक्ति के अंदर द्वेष की भावना तब आती है जब व्यक्ति खुद के ईगो से जुड़ कर उसे ही अपना वास्तविक रूप मानने लगता है। ऐसी स्थिति में उसे किसी से लगाव होता है किसी के प्रति द्वेष। लेकिन यदि व्यक्ति इष्ट के प्रति, एक बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर कोई कर्म करता है तो उसे अपने अंदर के ईगो से जो जुड़ाव होता है उससे मुक्ति मिलती है। वह महसूस करता है कि वह जो कुछ कर रहा है उसका उद्देश्य उसका वह महान लक्ष्य है और फल में उसे जो प्राप्त होता है उसे उस लक्ष्य की देन मानकर खुशी अनुभव करता है वह व्यक्ति अपने अंदर किसी भी क्रोध के भाव को जन्मने नहीं देता है, उसे किसी से घृणा या वैर नहीं हो पाता है। यह निःस्वार्थ सेवा के भाव से सम्भव हो पाता है। जब व्यक्ति सेवा की भावना से कर्म करता है तो वह खुद के लिए कुछ नहीं कर रहा होता है। वह तो उस महान लक्ष्य के लिए सब कुछ कर रहा होता है। तब उसके अंदर खुद के ईगो को संतुष्ट करने का लोभ नहीं होता है। आप जब कर्म करते हैं तो मूल्यांकन करें कि आप वो कर्म किसके लिए कर रहें हैं। क्या आप अपने ईगो की संतुष्टि के लिए कोई काम कर रहें है, क्या आप अपने पूर्वाग्रहों और अपने अभिमान के लिए कुछ कर रहें हैं, क्या आप अपने पसन्द-नापसन्द के लिए कुछ कर रहें हैं? यदि ऐसा है तो फिर आपको अपने अपने ईगो पर निर्भर होना पड़ेगा और बाहरी परिणामों से सूखी या दुखी होने की बाध्यता रहेंगी जिससे आपके अंदर द्वेष बना रहेगा। लेकिन यदि आप सेवा की भावना से उच्चतर लक्ष्य के प्रति समर्पित होकर उसी के लिए कर्म करते हैं तो फिर ये नकारात्मकता स्वतः समाप्त हो जाती है।
इक्षाओं और कामनाओं के परिणाम में व्यक्ति फिर से उन्ही लगावों, और उससे निकले माया, मोह , ईर्ष्या, क्रोध आदि के चक्कर में पड़ता है लेकिन यदि आपको अपने कर्म के परिणाम से आसक्ति न हो और आपको लगे कि आप जो कर रहें हैं यही कर्म स्वतः आपका भी ध्यान रख लेगा तो बेवजह ही आप कामनाओं के पीछे नहीं भागेंगे।
अटैचमेंट या लगाव का परिणाम होता है कि व्यक्ति विपरीत के द्वंदात्मक अवयवों के चक्कर में पड़ जाता है। सुख-दुख, जय-पराजय जैसे युग्म उसे परेशान करते रहते हैं। यदि हर अच्छे बुरे के प्रति समान भाव रहे तो फिर कोई कष्ट नहीं होता है अन्यथा जीवन में एकांगी होकर हमेशा हर परिस्थिति में दुखी ही होते रहोगे।
इस प्रकार जो व्यक्ति अपने कर्मों में द्वेष, आकांक्षा और द्वंदात्मक युग्मों के प्रभाव से मुक्त होता है वही नित्य सन्यासी है , उसे सब कुछ है किंतु उसे किसी में आसक्ति नहीं है। यही व्यक्ति सुखपूर्वक कर्मबन्धन से मुक्त भी है जबकि वह सब कर्म करता भी है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 4 एवम 5
ज्ञान और कर्म के फल अलग अलग नहीं होते हैं। वस्तुतः आप जिस स्थिति में हैं आप अपना प्रयास उसी के अनुरूप प्रारंभ करें। जिस व्यक्ति को ये दोनों मार्ग अलग अलग फल देने वाले लगते हैं उसे दोनों में से किसी की जानकारी नहीं होती है। पूर्व में कर्मयोग की विस्तृत शिक्षा देते हुए दो बातें स्पष्ट की जा चुकी हैं।
1.आप अपने स्वभाव के अनुसार, अर्थात स्वधर्म के अनुसार अर्थात अपने गुणों की स्थिति के अनुसार अपना प्रयास प्रारम्भ करें न कि किसी की नकल कर।
2.कर्म करके ही आपको ज्ञान की प्राप्ति होती है , बिना कर्मयोग के अनुसार नियत कर्म किये ज्ञान की प्राप्ति का दावा पाखण्ड है।
इस प्रकार आपको ये तय करना है कि आप किस मार्ग के लिए उपयुक्त यात्री हैं। फल तो दोनों में एक परम की प्राप्ति ही है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 6
कर्मसंन्यास के मार्ग में कर्तापन का बोध नहीं रह जाता। व्यक्ति अपने मन ,इन्द्रिय और शरीर से कर्ता होने का बोध गँवा देता है। इस स्थिति में ममत्व और लगाव का अभाव हो जाता है और परिणाम में अहंकार भी नहीं रह जाता है। लेकिन ये स्थिति इस सिद्धान्त को रट कर, याद कर नहीं आती है। ये अभ्यास का परिणाम है। तो किस चीज का अभ्यास कीजियेगा कि लगाव, ममत्व, अहंकार, और कर्तापन के बोध से मुक्ति मिल सकता है? ये भाव हम एक ही तरीके सकते हैं, पा सकते हैं और वह तरीका है कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण जिसमें हम स्वधर्म के अनुसार , परिणाम के लगाव से मुक्त होकर, यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं। सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति के अंदर ढेरों ऐसे गुण होते हैं जो उसके अंदर तरह तरह की इक्षाओं और कामनाओं को जन्म देते रहते हैं। इस स्थिति में हमारी प्रतिक्रिया दो तरह से हो सकती है।
एक कि हम इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहें और परिणाम से ही सुख और दुख पाते रहें तो हम निरन्तर उन कामनाओं की पूर्ति में ही लगे रह जाते हैं, एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और ये अनवरत चलता रहता है। दूसरा कि हम बलात अपनी सारी इक्षाओं का दमन कर दें, उनसे भागने लगे, लेकिन तब संसार के आकर्षण बार बार हमें उन इक्षाओं की पूर्ति की तरफ खीचेंगे और जब भी मौका मिलेंगे हम उनकी पूर्ति में लग जाएंगे। इस प्रकार इन दोनों मार्गों में हमारे अंदर ऐसी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं जो हमें कर्म और कामनाओं की ओर आकर्षित करती रहती हैं।
किंतु यदि हम हम तीसरे विकल्प के रूप में कर्मयोग का रास्ता चुनते हैं तो हम कर्म भी करते हैं, कर्म के परिणाम से बंधते भी नहीं हैं और अंत में उससे मुक्त भी हो जाते हैं। तब हमारे अंदर उन दैवी सम्पदाओं की वृद्धि होती रहती है जिनकी मदद से हम लगाव और ममत्व, और अहंकार की प्रवृत्तियों से मुक्त हो पाते हैं। इसी लिए श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि बिना कर्मयोग के आचरण को अपनाए हम कर्मसंन्यास के मार्ग पर नही। चल सकते। ये एक क्रमिक विकास यात्रा है जिसमें सबसे पहले हम अपने कमियों को समझ कर अपने से श्रेष्ठ की शरण में जाते हैं, तब खुद के अंदर दैवी सम्पदाओं की यानी कर्मयोग के अनुरूप के गुणों को विकसित करते हैं, उसके पश्चात खुद की इन्द्रियों पर नियंत्रण कर पाते हैं और तब यज्ञ की भावना से नियत कर्म करते हैं तो हमारे अंदर के अहंकार, लोभ, लालच, ममत्व, मोह, भ्रम, ईर्ष्या इत्यादि हमारे कर्मों को प्रभावित नहीं कर पाते, तब हम सेवा की भावना से कर्म कर पाते हैं। उस अवस्था में विवेक मन की इक्षाओं पर नियंत्रण रखता है और इन्द्रियाँ मन के अनुरूप ही स्वच्छंद आचरण नहीं कर विवेक के अधीन अपना कर्म निष्पादित करती हैं। ये अवस्था सिद्धान्त को रट कर नहीं आ सकती, इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है सो बिना कर्मयोग के कर्म सन्यास की स्थिति जिसमें परिणाम से और अहंकार से मुक्त आचरण हो सके नही प्राप्त हो सकता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 7
अब श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि एक व्यक्ति के लिए कर्मयोगी बनने के लिए उसके अंदर कौन से गुण होने चाहिए। ये बात श्रीकृष्ण पूर्व में भी समझा चुके है, लेकिन हमारी समझ को और साफ करने के लिए फिर से कर्मयोगी के गुणों को बताते हैं। उद्देश्य है कि हम सीख सकें कि हमें किस तरह से अपने कर्मों को करना है ताकि हम कर्म करते हुए कर्म से मुक्त भी हो जाएं और समाज के लिए उपयोगी भी बने रहें और ज्ञान की उस सीमा तक पहुँच सकें जँहा से हम गिर नहीं सकें
कर्मयोगी के गुणों को समझाते हुए श्रीकृष्ण हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम
1.अपने मन को वश में रखें।
2.इन्द्रियों पर नियंत्रण हो।
3.हमारा अंतःकरण पूरी तरह से स्वक्ष हो।
अब आइये हम देखते हैं, कि इनका अर्थ क्या हुआ।
जब हम कर्मयोग का आचरण करते हैं तो स्वाभाविक रूप से कर्मसंन्यास का ही मार्ग चुने होते हैं, लगाव से, ममत्व से राग विहीन यानी वैरागी हुए होते हैं। कर्मयोग का फल ही वैराग्य है। इस अवस्था में हमें आंतरिक रूप से वैराग्य मिलता है और बाहरी तौर पर सम्पन्नता प्राप्त होती है। कर्मयोग की भावना के साथ कर्म करने से एक ओर कर्म होने के कारण बाहरी संसार में सम्पन्नता की बहुलता होती है तो दूसरी तरफ अपने कर्मों के फल से लगाव के अभाव के कारण हम कर्मफल से आसक्त नहीं होते हैं, जिसके कारण हमारे मन में उन कर्मफलों के लिए कोई राग या द्वेष नहीं होता सो हम फल का उत्पादन कर्तव्य हुए भी उनके साथ स्वामी भाव नहीं रखते, बल्कि राग द्वेष के अभाव में हम अंतःकरण से वैरागी ही होते हैं। इस प्रकार सब कर्म करते हुए भी कर्मसन्यास की स्थिति में ही रहते हैं। इस अवस्था में हम प्रसन्न और विशुद्ध आत्मा वाले होते हैं, हमारे मन में कोई गंदगी, कोई लोभ लालच नहीं होता है।
मन की विशुद्धता कर्मयोग का मार्ग अपनाने से ही आती है। इसे समझना जरूरी है कि मन की विशुद्धता और कर्मयोग के आचरण में क्या सम्बन्ध है। मन विचारों का भंडार होता है। मन के अंदर तरह तरह के विचार होते हैं और उन विचारों के अनुसार ही मन की अवस्था और कर्मयोग की स्थिति निर्भर करती है। हमने देखा है कि व्यक्ति तीन तरह के गुणों से मिलकर बनता है, तामसिक, राजसी और सात्विक। अब हमें ये स्पष्ट होना चाहिए कि जैसी गुणों की अवस्था होती है, विचार भी उसी के अनुरूप होते हैं और तदनुसार मन भी वैसा ही होता है और कर्मयोग में हमारी स्थिति भी वैसी ही होती है। विचारों की अवस्था अर्थात सात्विकता, उनकी मात्रा, उनका वेग अथवा उनकी गति और उनकी दिशा हमारे कर्मों को निर्धारित करती है। अब देखते हैं कि गुणों का कर्मों पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है।
1.तामसिक गुणों की अधिकता होने पर हमारे विचारों में आलस, लगाव, ममत्व, मोह, क्रोध, अवसाद, उदासी, अज्ञानता, भ्रम, आदि के विचार रहते हैं ।ये विचार हमारे मन को भी इन्हीं की दिशा में मोड़ देते हैं, नतीजा ये होता है कि हमारी इन्द्रियाँ हमारे कर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर इन्हीं विचारों के अनुरूप हमसे कर्म कराती हैं।
2.राजसी गुणों की अधिकता होने पर हमारे मन में जो विचार आते हैं उनका सम्बंध कामनाओं, इक्षाओं, उद्देश्यों, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या आदि के विचार होते हैं तो हमारी इन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के समस्त प्रयास ,सभी कर्म भी इन विचारों की पूर्ति में लग जाते हैं।
3.सात्विक गुणों की अधिकता होने पर हमारे विचारों में प्रेम, भाईचारा, सत्य, अहिंसा,शांति, ज्ञान-विज्ञान , विवेक, दया, क्षमा आदि की प्रचुरता होती है और हमारी इन्द्रियाँ भी उसी के अनुरूप हमारे कर्मेन्द्रियों को भी प्रभावित करती हैं।
कर्मयोग का अनुसरण करने से हमारे गुण तामसी से सात्विक की तरफ बढ़ते हैं या इस प्रकार समझें कि जब हम दैवी गुणों की वृद्धि अपने अंदर करते हैं तो हम कर्मयोग के मार्ग पर चलने लगते हैं।
कर्मयोग का एक परिणाम ये निकलता है कि हम अपने इन्द्रियों पर विवेक के अनुरूप नियंत्रण कर पाते हैं। इन्द्रियाँ अपनी इक्षा से हमें नहीं हाँक पाती हैं बल्कि हम अपने विवेक के अनुसार इन इन्द्रियों से इनके विनिर्दिष्ट कार्य करने का कमान दे पाते हैं, जिसका नतीजा ये निकलता है कि अपने कर्मों को तामसी से सात्विक की तरफ ले जा पाते हैं और गुणों की उन्नत अवस्था हमें सद्कर्मों के मार्ग पर ले जाती हैं। ये नियंत्रण जबरन नहीं होता है बल्कि अभ्यास से और ज्ञान से ये स्वाभाविक नियंत्रण हो जाता है।
इस प्रकार के व्यक्ति को इस बात की समझ हो पाती है कि जो वो है, वही दूसरे भी हैं, उसका सेल्फ और दूसरे का सेल्फ भिन्न नहीं है, वह दूसरे का विस्तार है, दूसरा उसका विस्तार हैं। किसी में कोई भेद भाव नहीं रह जाता है। सभी में एक ही सेल्फ, एक ही कॉन्सियसनेस , एक ही आत्मा है। ये सम्भव है कि हमारे बाहरी रूप भिन्न हों, हमारा मन-मस्तिष्क भिन्नं हो, हमारा विवेक भिन्न हो लेकिन हमारे विवेक को, मन मस्तिष्क को प्रकाशित करने वाला कॉन्सियसनेस या सेल्फ या आत्मा एक ही है।।जैसे एक ही बिजली को अपनी क्षमता(गुणों) के अनुसार अलग अलग मात्रा में प्राप्त कर अलग अलग बल्ब अलग अलग प्रकाश देते हैं उसी प्रकार हम सभी भी अपनी गुणों की अवस्था (क्षमता) के अनुसार अपने एक ही सेल्फ से अलग अलग प्रकाशित हो पाते हैं। यदि गुणों की अवस्था उन्नत होगी, जो कि कर्मयोग के आचरण को अपनाने से होती है तो हमारा सेल्फ हमें अधिक प्रकाशित कर पाता है। अपने विचारों को हम कितना साफ रख पाते हैं ये हमारे कर्मयोग की अवस्था पर निर्भर करता है। इस प्रकार से व्यक्ति कर्मयोग के उच्चतर स्तर पर पहुँच कर उच्च ज्ञान प्राप्त कर पाता है जो कर्म सन्यास के लिए अनिवार्य होता है। ये ज्ञान विषयों की जानकारी और उनके भंडारण से नही आता बल्कि कर्मयोग के आचरण से आता है।
जब हम इस अवस्था में आते हैं तो कर्मबन्धन से मुक्त होते है, परिणामों के मोह में नहीं फंसे होते हैं सो जो कर्म करते हैं वो खुद की संतुष्टि के लिए नहीं करते बल्कि मात्र ये भाव होता है कि कर्म करना है, इन्द्रियों को उनकी स्वाभाविक गति से कर्म में प्रवृत्त होना है जिससे लोग बाग का भला हो सके। इस प्रकार के व्यक्ति का कर्म सेवा की चरम अवस्था का कर्म हो जाता है। वो जो कुछ करता है उससे दूसरों का भला होता है। उसके अंदर फल को लेकर कोई उत्तेजना नहीं होती सो वह खुद के अंदर एकदम शांत होता है और चुँकि उसके कर्म दूसरों की भलाई के लिए होते हैं सो बाहरी दुनिया में उसके कर्मों से समृद्धि बढ़ती है।
इस प्रकार कर्मयोग के मार्ग से ही ज्ञान की प्राप्ति होती है और व्यक्ति कर्मसन्यासी हो पाता है। सो अर्जुन को सम्बोधित करते हुए श्रीकृष्ण हम सभी को कर्मयोग का मार्ग अवनाने का आह्वान करते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 8 एवम 9
कर्म तो सभी करते हैं , जब तक प्राण शरीर में हैं क्रियाएँ होती ही रहती हैं किंतु जो व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते चलकर कर्म करता है और जो बिना उस मार्ग को अपनाए कर्म करता है, दोनों में अंतर है।
सामान्यतः जब हम कोई क्रिया करते हैं तो हम यह समझते हैं कि ये अमुक क्रिया या कर्म हम कर रहें हैं। ये समझना बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति खुद को अपने "मैं" से पहचानता है। उसे लगता है कि जो कुछ कर रहा है उसका "मैं" कर रहा है। यह "मैं" अर्थात अहम के करने का भाव यानी ""अहंकार"" ही उसके साथ होता है जो उसे बताता है कि जो कुछ हो रहा है वह उसका "मैं" कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के ईगो से बंधा होता है।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता है तो उसे कुछ विशेष तरह से कर्म करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे कि उसे अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करने हैं, कर्म करने में परिणाम से असंगत रहना है, जो कर्म कर रहें हैं उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित करना है, कर्म के जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनको प्रसाद भाव से ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखना है। जब व्यक्ति असंगत भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है तो वह अपनी इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए कर्म नहीं करता है बल्कि वह कर्तव्य भाव से कर्म करता है जिसमें उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रिया करती हैं , उनकी क्रियाओं में कोई अपेक्षा, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि के कोई भाव नहीं होते। इस प्रकार जब व्यक्ति कर्म करने में प्रशिक्षित होता है तो उसे पता होता है कि वस्तुतः उसके अहंकार की वजह से कोई कर्म नहीं हो रहा है। अहंकारमुक्त स्थिति में व्यक्ति "मैं कर्ता हूँ" के मोह से मुक्त हो गया रहता है और उसे पता होता है कि जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है उसमें उसका अपना कोई निमित्त नहीं है, उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि उसके कर्म उसकी इन्द्रियों के स्वाभाविक क्रियाओं की परिणति हैं जिनमें उसका अपना कुछ भी नही है। जो व्यक्ति इस स्थिति में होता है वही तत्व ज्ञानी होता है। तत्वज्ञानी अर्थात जो आत्म तत्व को जानता है, जिसे ज्ञात है कि उसका वास्तविक रूप उसके अहंकार से निर्धारित नहीं होता है, बल्कि वह तो मात्र पूर्ण का एक भाग है, उसी का प्रतीक है, जो दूसरे हैं वही वो है, जो वो है, वही दूसरे हैं अर्थात जो कुछ उसके कर्म हैं वे उसके गुणों से निर्धारित उसके स्वधर्म के अनुसार हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 10
श्रीकृष्ण ने बारम्बार इस बात पर जोर दिया है कि असंगत भाव से कर्म करना चाहिए। हम सभी तो दिन भर कर्म ही करते हैं लेकिन हर कर्म कर्मयोग के दायरे में नहीं आता, सिर्फ वही कर्म कर्मयोग केवनुसार कर्म होते हैं
1. जिनको करने में कर्म फल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती। अर्थात जब हम कर्म करते हैं तो उसके फल की अपेक्षा नहीं करते, हम कर्म इसलिए नहीं करते कि उसे करने से हमें कोई सुख की प्राप्ति हो, किसी विशेष फल की प्राप्ति हो। अगर ऐसी भावना रखकर कर्म करते हैं तो फिर उस फल से हम जुड़ जाते हैं। उसकी पूर्ति होने पर मोह, लोभ , लालच, अहंकार आदि भाव आ जाते है कि उसे फिर करें, फिर वही सुख मिले। और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती है तो क्रोध, ईर्ष्या , जलन, हिंसा आदि के भाव आते हैं। इस प्रकार दोनों ही स्थिति में हम कर्मों से बन्ध जाते हैं।
2. आसक्ति विहीन भाव से कर्म करने से ये होता है कि हम खुद के लिए कर्म नहीं करते यानी अपने ईगो की संतुष्टि के लिए कर्म नहीं करते। तब क्यों करते हैं? तब हमारे कर्म किसी अन्य उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होते हैं। इस प्रकार से कर्म करने पर कर्म में सेवा की भावना आ जाती है, समर्पण की भावना आ जाती है क्योंकि तब हम व्यक्तिगत लोभ से प्रेरित नहीं होते हैं। इस प्रकार से हम किसी उच्च आदर्श की प्राप्ति हेतु हम कर्म करते हैं तो मन में कोई लोभ, लालच, मोह, क्रोध, मोह जैसी कोई भावना नहीं होती और मन शांत रहता है। इस स्थिति में कर्म करने वाला व्यक्ति कर्मफल और कर्म से बन्धता नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गगीता अध्याउ5 श्लोक 11
ज्ञानयोग अथवा कर्मसन्यास का मार्ग कर्मयोग के रास्ते से चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है, ज्ञान या कर्मसन्यास की प्राप्ति का कोई अन्य मार्ग नहीं है। बिना कर्मयोग के रास्ते कर्म किये हमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है और न कर्मसन्यास की अवस्था ही प्राप्त हो सकती है। कोई भी व्यक्ति कर्मों का सम्पूर्ण त्याग नहीं कर सकता है। कुछ न कुछ कर्म हम सभी करते हीं हैं किंतु सभी कर्म हमें ज्ञान के मार्ग पर ले जा सकते हों यह भी नहीं होता है। जब असंगत भाव से बिना कर्तापन का अहंकार पाले कर्मयोग के अनुसार हम कर्म करते हैं तभी हम ज्ञानयोग/कर्मसन्यास के मार्ग पर चल पाते हैं। इसके आगे ध्यान की अवस्था मिलती है जब व्यक्ति अपने कर्मों में ही ध्यान की अवस्था को प्राप्त कर पाता है। दरअसल कर्म करने के क्रम में जब हम अपने उच्च आदर्शों जिसे हम ईश्वर कहते हैं के प्रति समर्पित होकर कर्म करते हैं। जब हम उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म में प्रवृत्त होते हैं तो उसी आदर्श उसी ईश्वर के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर कर्म करते हैं। इस अवस्था में हमारे अंदर अपने स्वार्थ को साधने के लिए नहीं बल्कि उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होने के भाव होते हैं और इसी भाव से अर्थात निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं। इस स्थिति में हम कर्म और कर्म के परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं सो हम किसी पाप के भागी नहीं होते। इस अवस्था में हम उस उच्च आदर्श , उस ईश्वर, उस ज्ञान के आकांक्षी होते हैं। यही तो योगी होने की अवस्था है हमारी। इस अवस्था में ही हमारे मन का, चित्त का, अन्तःकरण का अर्थात हमारे विचारों, हमारी सोच, हमारे गतिविधियों और क्रियाओं का शुद्धिकरण होता है यानी इनमें कोई पाप नहीं होता, एकदम निष्पाप होते हैं हम।
जब हम बिना किसी व्यक्तिगत हित के स्वार्थ के कार्य करते है, जब हम परिणाम से असंगत होते हैं, जब उच्च भाव के प्रति समर्पित होते हैं तो हमारे विचार भिन्न होते हैं। जब हमारे दृष्टिकोण में कर्मयोग की शिक्षा के भाव होते हैं तो फिर यह दृष्टिकोण हमारे अंदर ऐसे विचारों को गढ़ता है जिससे हमारे अंदर के नकारात्मक गुण समाप्त हो जाते हैं। इन विचारों से हमारे अंदर जो प्रतिबद्धता आती है उसके कारण हमारे स्वभाव में भी वही निष्काम कर्मयोग की विशेषताएँ आ जाती हैं, और यही हमारे विवेक का निर्धारक हो जाती हैं यह विवेक हमारे अंदर से काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, जलन जैसी नकारत्मकता को निकाल कर बाहर कर देता है।
जब हमें लगता है कि हम ही कर्ता हैं तो फिर हम अपने कर्मों से और उनके परिणाम से बन्ध जाते है और अपने इन्द्रियों, अपने अहम , अपने शरीर को सुख देने की ईक्षा से कर्म करते हैं और तब तमाम तरह के गलत कामों को करते हैं ताकि हम अपनी इन्द्रियों को सुख दे सकें और उनसे सुख प्राप्त कर सकें। हम अपने इन्द्रियों के वश में होते हैं और हम अपने लोभ जनित, मोह जनित विचारों के अनुसार यन्त्रवत उनसे संचालित होते रहते हैं। ऐसी स्थिति में मन में ढेरों कामनाएं सतत चलती रहती हैं और हम हमेशा उत्तेजित, उद्वेलित रहते हैं।
इसके विपरीत जब हम उच्च आदर्श, ईश्वर के प्रति समर्पण भाव से कर्म करते हैं , जब हमें ये भान होता है कि हम जो कर रहें हैं अपने उच्च आदर्श के प्रति सेवा है तब हमारे विचारों में से मोह, काम, क्रोध आदि का त्याग हो जाता है और तब इस अवस्था में मन इन शांति होती है, और चूँकि हमारे कर्म हमारे आदर्श के प्रति समर्पित होते हैं तो वे कर्म बाहर सम्पन्नता को जन्म देते हैं।
हम जिस भाव से कर्म करेंगे हमारे कर्मों का इस संसार के लिए वही परिणाम होगा। यदि हमारे विचारों में स्वार्थ, मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या , हिंसा आदि होंगे तो हमारे कर्म संसार को यही देंगे और यदि हमारे विचारों में समर्पण, सत्य, अहिंसा, प्रेम, भाईचारा आदि दैवी भाव होंगें तो हमारे कर्म इस संसार के प्रति सेवा भाव से होंगे, और संसार में सुख समृद्धि और शांति की बढ़ोतरी होगी।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 12
इस तथ्य को श्रीकृष्ण बार बार कह चुके हैं, बता चुके हैं अलग अलग ढंग से। दरअसल कर्म करने की जो विधि उन्होंने कर्मयोग में बताया है उसी का संक्षेप में पुनः उल्लेख किया है कि कर्मयोगी कैसे कर्म करता है। कर्मयोगी को कर्मफल से कोई मतलब नहीं होता है, उससे उसको कोई लगाव नहीं होता है, सो उसे परम् शांति की प्राप्ति होती है जिसके फलस्वरूप उसे ईश्वत की प्राप्ति होती है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते से कर्म नहीं करता है , वह कर्म तो करता है किंतु इक्षाओं के वशीभूत होकर कर्म में आसक्त होकर उनसे बन्धा हुआ रह जाता है, और उसे न तो शांति मिल पाती है , न ही ईश्वर की प्राप्ति ही होती है।
ये अंतर होता क्यों है, कर्म के परिणाम से बन्धने से ऐसा क्या होता है कि हमें शांति और परिणामस्वरूप भगवद प्राप्ति भी नहीं हो पाती है इसे समझना जरूरी है, भले ही हम इस तथ्य का प्रशिक्षण पूर्व में भी ले चुके हैं।
अध्याय 3 के श्लोक 9 में में हम इस बात को समझ चुके हैं। एक बार पुनः उसे दुहराते हैं--
"जब कर्मों को करने के पीछे कामनाएँ होती हैं और कर्मफल के साथ आसक्ति होती है तो हम जो कर्म करते हैं उनसे बन्धें होते हैं क्योंकि तब हम कर्म के परिणामों के अनुसार ही आगे का आचरण करते हैं। कामनाओं के आधार पर किये गए कर्मों के कारण निम्न में से कोई परिणाम प्राप्त होते हैं
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
इस प्रकार कामनाओं के वश में होकर किये गए कर्म कर्मबन्धन में बाँधते हैं। इसके विपरीत यदि हम परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं तो कर्मबन्धन में नहीं पड़ते।""
इस प्रकार सकाम भाव से कर्म करने के कारण हम हमेशा उद्वेलित रहते हैं,हमें शांति नहीं होती है , सो ऐसी अवस्था में हम अपनी आत्मा, अपने कॉन्सियसनेस, में खुद को अवस्थित नहीं कर पाते जबकि निष्काम भाव से कर्म करने पर ये उत्तेजना जाती रहती है और तब हम अपने सेल्फ को समझ पाते हैं क्योंकि मन और आत्मा से हम शांत रहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 13
कर्मयोग के मार्ग से कर्म करता हुआ व्यक्ति जब ज्ञान की मंजिल पर पहुँचता है तो उसके आचरण में जो खूबियाँ आई रहती हैं उनके बारे में श्रीकृष्ण ने पहले भी दो बार विस्तार से चर्चा किया है और पुनः उसी चर्चा को यँहा भी कहते हुए उस ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं के बारे में बात करते हैं जो कर्मयोग के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान प्राप्त करता है।
इन विशेषताओं को हम क्रम से फिर से समझते हैं।
1.इस तरह के व्यक्ति का अपने अन्तःकरण पर पूर्ण नियंत्रण होता है अर्थात जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते कर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसका अपने समस्त ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों पर अपने विवेक के माध्यम से पूरा नियंत्रण होता है। इंद्रियाँ विवेक को संचालित नहीं करती हैं बल्कि विवेक इन्द्रियों को दिशा देता है ताकि इंद्रियाँ अपने विषयों के अनुसार अपना कर्म तो करें किन्तु कर्मेन्द्रियों को उनमें आसक्त न होने दें।
2.व्यकि अपने शरीर को अपना प्रतिनिधि नहीं मानता बल्कि उस ज्ञानी व्यक्ति के शरीर उसके रहने का घर मात्र है। इसका अर्थ ये होता है कि व्यक्ति को ये समझ हो गई होती है कि उसका सेल्फ, उसकी आत्मा उसी परम् आत्मा का स्वरूप है जिसके स्वरूप सभी हैं और शरीर तो मात्र एक अभिव्यक्ति है।
3.चूँकि व्यक्ति अपने ईगो और सेल्फ के अंतर को समझता है सो उसे ज्ञात होता है कि उसमें कोई कर्तापन नहीं है बल्कि जो भी कर्म होते हैं वो स्वभाव के अनुसार इन्द्रियों की गतिविधियाँ हैं जिनका परम् उद्देश्य मात्र इतना ही है कि वे कर्म सभी के कल्याणार्थ होते रहें। उसे इसका भान है कि वास्तविकता के धरातल पर सभी एक ही परम् आत्मा के स्वरूप हैं, सभी के सेल्फ यानी सभी का कॉन्सियसनेस एक ही है तो फिर कर्तापन का कँहा प्रश्न उठता है।
4.इस बात को ज्ञानी व्यक्ति समझकर खुद को उसी परमात्मा में अवस्थित समझ पाता है । ऐसा व्यक्ति अहंकार और स्वार्थ से रहित होकर सबको एक ही परमात्मा का अंश के रूप में देखते हुए उन्हीं में लीन होता है अर्थात उन्हीं के हितार्थ जीवन व्यतीत करता है। ऐसी स्थिति में उसे कोई क्लेश नहीं होता , वह सत, चित्त, और आनंद का खुद स्वरूप हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 14
ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि
4. जब व्यक्ति यह जानता है कि प्रभु यानी ईश्वर किसी व्यक्ति के न तो कर्मों के रचयिता हैं न ही कर्मफल के तो ये भी तय जानता है कि ईश्वर किसी व्यक्ति के कर्तापन के लिए उत्तरदायी नहीं होते हैं।
लेकिन ध्यान रहें कि ज्ञान की ये अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति कर्मयोग के लिए निर्धारित आचरण को करते हुए कर्म कर इस अनुभूति को प्राप्त करता है। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए उस व्यक्ति के कर्मों और उनके फलों का निर्धारण ईश्वर के द्वारा किया जाना समझा जाता है, किन्तु यँहा पांचवे अध्याय के श्लोक संख्या 14 में श्रीकृष्ण साफ साफ समझाते हैं कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसके लिए ईश्वर को उत्तरदायी नही। कह सकता और न ही प्राप्त फलों के लिए ही वह ईश्वर को जबाबदेह बना सकता है।
वस्तुतः व्यक्ति जो करता है वह क्यों करता है अगर इसे समझना है तो हमें फिर उसी कर्मयोग पर लौटना होता है जिसके माध्यम से हमें ज्ञान की मंजिल मिलती है। कर्म तो स्वभाव से उतपन्न होते हैं जो हमारे अंदर के तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात पर निर्भर हैं। ये कर्म हमारे शरीर की इन्द्रियों के द्वारा सम्पादित होते हैं , उसके ईगो के द्वारा किये जाते हैं और फल भी उसी के अनुसार मिलते रहते हैं।
व्यक्ति के कर्तापन का सम्बंध उसके अहंकार यानी "मेरे द्वारा किया जाने वाला या किया गया" से होता है और इस समझ का सम्बंध उसके तीनों गुणों की परस्पर अवस्था और उन गुणों के परस्पर संयोग पर निर्भर करता है। कर्मयोग की शिक्षा का हम स्मरण करें तो पाते हैं कि जब व्यक्ति अपने गुणों की अवस्था में उत्तरोत्तर विकास करता है तो उसके गुण आसुरी से दैवी तक हो जाते हैं। पूर्व में ही श्रीकृष्ण ने समझाया भी है कि ये ज्ञान सभी के लिए है अर्थात अधम के लिए भी और उत्तम के लिए भी। यँहा श्रीकृष्ण ये शिक्षा दे रहें हैं कि मनुष्य खुद के कर्मों के और उनके फ़लों का उत्तरदायी है, वह ईश्वर पर, परमात्मा पर इनका बोझ डालकर दोषरहित नहीं हो सकता है। आपको हमको सबको ये बात समझनी चाहिए कि व्यक्ति रूप, रंग, नाम और शरीर से भिन्न भिन्न भले हो सभी उसी एक आत्मा के अंश हैं जिसका प्रसार सम्पूर्ण दृश्य से अदृश्य तक है और शरीर के रूप में उसका अलग महत्व मात्र इतना ही है कि गुणों की अवस्था अलग अलग है और सभी को गुणों की उसी चरम अवस्था पर पहुँचने का मार्ग पकड़ना चाहिए जिससे गुणों से मुक्त होकर अपनी आत्मा में विलीन हो जाएं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15
व्यक्ति के ज्ञान और अज्ञान के फर्क को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति ज्ञानी नहीं है वह यही समझता है कि परमात्मा उसके पाप कर्मों और पुण्यकर्मों को ग्रहण कर उसके अनुसार उसे फल प्रदान करते हैं। पीछे श्रीकृष्ण बताये हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हुई है उसे इस बात की समझ है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता या कराता है वह सब वह अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात तीन गुणों के अनुपातिक उपस्थिति के अनुसार ही करता या कराता है और उसमें परमात्मा की कोई भूमिका नहीं होती है अर्थात व्यक्ति अपने कर्मों और उन कर्मों के फल के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है न कि परमात्मा। यँहा इसी तथ्य को पुनः रेखांकित करते हैं कि जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके पूण्य कर्म और पाप कर्म दोनों को परमात्मा ग्रहण कर उसके अनुसार फल देते हैं तो यह उसके ज्ञान का अभाव ही है। एक संशय हो सकता है कि कर्मयोग की शिक्षा में प्रशिक्षण देते समय ये बताया गया है कि हमें अपने कर्मों को परमात्मा को समर्पित कर करना चाहिए। इसका तातपर्य है कि कर्म करते समय हमारे लक्ष्य ऊँचे होने चाहिए, हमारे आदर्श उच्च होने चाहिए और हमें प्रशिक्षित होना चाहिए इस भाव से कर्म करने के लिए कि हम हो कर्म कर रहें हैं वो खुद के लिए नहीं कर रहें हैं बल्कि उस उच्च आदर्श की सेवा करने के लिए कर रहें हैं। हमारा दायित्व इतना भर ही है। फिर उसका परिणाम क्या आया ये न तो हमारे हाथ में है और न ही परमात्मा द्वारा निर्धारित है बल्कि प्रकृति के स्थापित नियम उसके परिणाम को तय करते हैं। जैसे यदि हम अग्नि में हाथ डालते हैं तो प्रकृति के नियमानुसार हाथ जलता है। इसके लिए परमात्मा उत्तरदायी नहीं है।
वस्तुतः यँहा श्रीकृष्ण हमारे उन पलायनवादी विचारों पर चोट कर रहें हैं जिसमें हम अपने कर्मफलों के लिए परमात्मा को उत्तरदायी ठहराते हैं और खुद को अपने कर्मफलों से मुक्त रखने का कुप्रयास करते हैं। ईश्वर कँही बाहरी दुनिया में नहीं होता है बल्कि हमारा सेल्फ ही विस्तारित रूप से परम् आत्मा है। इसकी अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति को इसका ज्ञान होता है कि वह अपने शरीर और शरीर जनित ईगो का प्रतिनिधि नहीं है बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप तो उस सर्वव्यापी सेल्फ का एक अंश है जो सभी में समान रूप से व्याप्त है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16
यह तो हमें ज्ञात हो ही गया है कि खुद के लिए कर्तापन का बोध होना और यह समझना कि प्रभु करते कराते हैं, वे हमारे कर्मों के फलों के दाता हैं, रचियता हैं समझना अज्ञानता है। लेकिन इसका बोध मात्र होने से यह अज्ञानता दूर नहीं होती है जब तक हम खुद के अभ्यास से ये न समझ लें। आपको ये सिद्धान्त तो याद हो गया लेकिन कर्मफल से आपकी सम्बद्धता गई नहीं हो, उससे लगाव बना हुआ हो, इन्द्रियाँ उस लगाव के अनुसार आचरण कर रहीं हो तो अपने कर्मों को करते हुए हमें यही लगता है कि ये हम हीं कर रहें हैं, या फिर ईश्वर हमसे करा रहे हैं और फल भी उन्हीं के हाथों में है। इसी भाव से प्रेरित होकर मन में कई कामनाओं को पाले उनकी पूर्ति के लिए हम तरह तरह के जतन करते रहते हैं, और इसी क्रम में विभिन्न इक्षाओं की पूर्ति हेतु कई जगह माथा भी टेकते हैं, कई तरह के देवी देवताओं के शरण में जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि हम अच्छा भला भी कर्म करते हों तो भी कर्म से अधिक हम इस बात से जुड़े होते हैं कि हमें मन वांछित फल मिल जाये। कर्मफल से इतनी गहरी सम्बद्धता उसमें आसक्ति प्रदान करती है। फिर चाहे हम जितना भी सिद्धान्त रटे हुए हों वो हमारे काम नहीं आता है।
तो फिर ये सिद्धान्त आत्मसात कैसे होता है? तो इसके लिए कर्मयोग के आचरण का अभ्यास अनिवार्य है। श्रीमद्भागवद्गीता के पूर्व के अध्यायों में और पुनः इस अध्याय में भी हमने सीखा था कि जो खुद के सेल्फ यानी कॉन्सियसनेस अथवा आत्मा की समझ रखता है वह तत्व ज्ञानी माना जाता है यानी उसे इस मूल बात का व्यवहारिक ज्ञान होता है कि वह विस्तृत परमात्मा का ही एक भाग है । इसी अध्याय में थोड़ा सा पीछे जाने पर हम देखते हैं कि हमें यह शिक्षा मिलती है कि "सामान्यतः जब हम कोई क्रिया करते हैं तो हम यह समझते हैं कि ये अमुक क्रिया या कर्म हम कर रहें हैं। ये समझना बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति खुद को अपने "मैं" से पहचानता है। उसे लगता है कि जो कुछ कर रहा है उसका "मैं" कर रहा है। यह "मैं" अर्थात अहम के करने का भाव यानी ""अहंकार"" ही उसके साथ होता है जो उसे बताता है कि जो कुछ हो रहा है वह उसका "मैं" कर रहा है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के ईगो से बंधा होता है।
लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलता है तो उसे कुछ विशेष तरह से कर्म करने का प्रशिक्षण मिलता है जैसे कि उसे अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करने हैं, कर्म करने में परिणाम से असंगत रहना है, जो कर्म कर रहें हैं उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित करना है, कर्म के जो परिणाम प्राप्त होते हैं उनको प्रसाद भाव से ग्रहण करने की प्रवृत्ति रखना है। जब व्यक्ति असंगत भाव से कर्म में प्रवृत्त होता है तो वह अपनी इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिए कर्म नहीं करता है बल्कि वह कर्तव्य भाव से कर्म करता है जिसमें उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रिया करती हैं , उनकी क्रियाओं में कोई अपेक्षा, लोभ, लालच, ईर्ष्या, आदि के कोई भाव नहीं होते। इस प्रकार जब व्यक्ति कर्म करने में प्रशिक्षित होता है तो उसे पता होता है कि वस्तुतः उसके अहंकार की वजह से कोई कर्म नहीं हो रहा है। अहंकारमुक्त स्थिति में व्यक्ति "मैं कर्ता हूँ" के मोह से मुक्त हो गया रहता है और उसे पता होता है कि जो कुछ उसके द्वारा किया जा रहा है उसमें उसका अपना कोई निमित्त नहीं है, उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं है बल्कि उसके कर्म उसकी इन्द्रियों के स्वाभाविक क्रियाओं की परिणति हैं जिनमें उसका अपना कुछ भी नही है। जो व्यक्ति इस स्थिति में होता है वही तत्व ज्ञानी होता है। तत्वज्ञानी अर्थात जो आत्म तत्व को जानता है, जिसे ज्ञात है कि उसका वास्तविक रूप उसके अहंकार से निर्धारित नहीं होता है, बल्कि वह तो मात्र पूर्ण का एक भाग है, उसी का प्रतीक है, जो दूसरे हैं वही वो है, जो वो है, वही दूसरे हैं अर्थात जो कुछ उसके कर्म हैं वे उसके गुणों से निर्धारित उसके स्वधर्म के अनुसार हैं। " इसी के अभ्यास से प्राप्त ज्ञान तत्व ज्ञान है जो हमारे अंदर के अज्ञानता को समाप्त करता है। जैसे जैसे हमारे अंदर इस ज्ञान का फैलते जाता है खुद के अहंकार और अदृश्य शक्ति से फल प्राप्ति का अज्ञान, ईश्वर के द्वारा कुछ करने , कराने का अज्ञान समाप्त होते जाता है। तब होता क्या है? तब हम इस सत्य से प्रकाशित खुद के अंदर ही परमात्मा में अवस्थित शांत मन से आनंदित रहे हैं यानी हम स्वयं ही सचिदानंद की अवस्था में आ जाते हैं। यह अवस्था तो देवत्व की प्राप्ति का अंतिम सोपान हो तो है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 17
अब श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्त व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हैं। वे पूर्व में भी समझाये हैं कि व्यक्ति जब कर्मयोग के मार्ग से चलकर कर्म करता है तो उसे ज्ञान प्राप्ति के बाद उसकी विशेषताएँ क्या होती हैं। तो आइए हम एक एक कर समझें कि वे कौन सी विशेषताएँ हैं जो एक कर्मयोगी ज्ञानी व्यक्ति की होती हैं।
1.
जब ये ज्ञान प्राप्त होता है तो व्यक्ति की बुद्धि, उसकी समझदारी, उसका ज्ञान परमतत्व में अवस्थित हो जाता है। तब व्यक्ति की बुद्धि, उसका विवेक ये समझने में सक्षम होता है कि उसका सेल्फ क्या है, वह वास्तव में वो नहीं है जो उसका ईगो है, बल्कि वो तो ईगो से परे सेल्फ है, वह विस्तृत कॉन्सियसनेस्स का ही एक भाग है, वह परमात्मा का ही एक अंश है जैसा अन्य सभी हैं । भले वो व्यक्ति इस तथ्य को अनुभव में न देख पाए न व्यक्त कर पाए किंतु वो अपने बुद्धि विवेक से ये समझता जरूर है।
यह समझदारी व्यक्ति की अज्ञानता को समाप्त करता है। ये ठीक वैसा ही है जैसे किसी छात्र की कोई प्रमेय तो परिणाम तो पता है लेकिन उसे ये नहीं पता कि ये है कैसे। लेकिन जब छात्र को इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उस प्रमेय कों सिद्ध कैसे करते हैं तो वह समझ पाता है कि इस प्रमेय के पीछे का गणित क्या है जिससे इस प्रमेय की वास्तविकता और सत्यता प्रमाणित होती है। अज्ञानता के दूर होने से व्यक्ति समझ पाता है कि सत्य क्या है, ज्ञान क्या है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो बार बार समझने की जरूरत है। यही सत्य खुद के सेल्फ, खुद के कॉन्सियसनेस्स और आत्मा को समझने के लिए भी है। अगर समझ नहीं हो पाई हो तो बारम्बार चिंतन आवश्यक है।
ध्यान रहे जब हमारा दिमाग किसी तथ्य को स्वीकार भर करता है तो वह विश्वास कहलाता है लेकिन जब हमारी बुद्धि, हमारा विवेक जब किसी तथ्य को समझ लेता है तो वह ज्ञान कहलाता है। विश्वास ज्ञान नहीं है। विश्वास किया हुआ तथ्य सही हो सकता है, लेकिन उस तथ्य की समझदारी भी हो ही गई हो ये कतई जरूरी नहीं है। जैसे पढ़कर, या सुनकर हम जानते हैं कि हम ही ब्रह्म हैं लेकिन ये जानना भर तो मात्र विश्वास है, ये जानना ज्ञान नहीं है। विश्वास होना भावना के स्तर पर होता है। लेकिन बुद्धि विश्वास पर नहीं टिकी होती है। बुद्धि और विवेक तो तर्क करते हैं , तर्क करेंगे ही यदि वे बुद्धि और विवेक हैं तो। भावना के स्तर पर हम प्रेम, घृणा, मित्रता , शत्रुता जैसी चीजों पर विश्वास कर लेते हैं। हम मान लेते हैं कि कंही कोई ईश्वर है जो हमारी परवाह कर रहा है, किंतु तर्क , बुद्धि , विवेक इसे मान भर कर सन्तुष्ट नहीं होते हैं , बल्कि वे इन तथ्यों कों समझने की कोशिश करते हैं। बुद्धि से जो समझते हैं हो सकता है कि वह विश्वास से भिन्न हो तब भी बुद्धि उसी पर भरोसा करती है जिसे वो समझ पा रही है। इस कारण से विश्वास और बुद्धि में निरंतर रस्सा कस्सी होते रहता है। विश्वास अंधविश्वास में परिणत हो सकता है, इसकी आशंका बनी रहती है। ये तब होता है जब बिना बुद्धि और विवेक से समझे हम विश्वास करने लगते हैं। इसलिए ज्ञान का बहुत महत्व है जो सही साधनों से, सही तरीकों से आनी चाहिए। मान लें आपको कुछ देखना है तो आप आँखों से ही देखिएगा न। आँखों को बंद कर तो नहीं देख पाइयेगा। इसी प्रकार जब हमें ज्ञान चाहिए तो हमें ज्ञानी के शरण में जाना होता है जो हमारा मार्गदर्शन करता है, बताता है कि हम वो कौन सी क्रिया करें कि हम तथ्य को समझ सकें। अगर हमें ये समझना है कि हम वास्तव में कौन हैं तो हमारा शिक्षक हमें रास्ता दिखाता है जिसपर चलकर हम अपनी अज्ञानता को समझकर उसे दूर कर ज्ञान प्राप्त कर पाते हैं। यँहा श्रीकृष्ण उसी मार्ग, कर्मयोग को हमें दिखा कर हमें समझाना चाह रहे हैं कि हम कौन सी क्रिया करें कि हम समझ पाए कि हम वास्तव में हैं कौन और हमारे दायित्व क्या हैं।
जैसे जैसे हम समझते हैं कि लगाव, मोह क्या हैं हम उन बहुत चीजों को भी समझते हैं जो इनसे जुड़ी हैं और नकारात्म हैं, जैसे जैसे हम समझते जाते हैं कि ये नकारात्मक हैं हमारा मोह, लगाव, लोभ, क्रोध, ईर्षा, हिंसा आदि के भाव समाप्त होते जाते हैं। ये मात्र भरोसा करने से नहीं हो पाता, बल्कि इसका आचरण करना होता है ताकि ये सत्य आत्मसात हो सके। जैसे जैसे ये आत्मसात होते जाता है, आत्मा पर पड़ा अंधकार का पर्दा भी छंटते जाता है। अंधकार में जो सत्य लगता है, प्रकाश होने पर ज्ञात होता है कि अंधकार में हम जिसे सत्य समझ रहे थे वो तो असत्य था। वस्तुतः ज्ञान परिमार्जन की प्रक्रिया है जो हमारे अंदर पूर्व से उपस्थित सत्य को हमारे समक्ष उद्घाटित कर हमें ज्ञानी बनाती है। ज्ञान कँही बाहर नहीं होता है,वह आपके अंदर ही होता है, लेकिन खुद के अज्ञान से ढँके होने की वजह से उसका भान भी नहीं होता है। एक प्रशिक्षित शिक्षक, एक ऐसा व्यक्ति जिसे पता है कि आपको क्या सिखाया जाएगा तो आपको अपने अज्ञानता से छुटकारा मिल सकेगा उसके सम्पर्क में आने पर आप सीख पाते हैं कि कैसे आप अपने अज्ञान के अंधकार को छाँट कर अपने ज्ञान को पा सकें। आप एक बढई को लकड़ी का टुकड़ा देते हैं वह उसे तराश कर खूबसूरत फर्नीचर में बदल देता है। फर्नीचर तराशी हुई लकड़ी ही तो है। यही बात सभी तरह के ज्ञान पर लागू होती है।
ज्ञान व्यक्ति के पूर्व स्वरूप को पूरी तरह बदल देता है।ज्ञान बुद्धि में होता है जो हमारे सेल्फ को समझने के लिए अनिवार्य है। बुद्धि और उससे प्राप्त ज्ञान से व्यक्ति आने सेल्फ को समझ पाने में समर्थ होता है। वह समझ पाता है कि उसका सेल्फ विस्तृत कॉन्सियसनेस्स का ही एक अंश मात्र है, उसकी आत्मा परम् आत्मा का ही अंश है। अर्थात परम् ब्रह्म ही उसका सेल्फ है यानी सम्पूर्ण जगत में व्यप्त कॉन्सियसनेस्स ही उसका सेल्फ है। यह ज्ञान व्यक्ति को स्वयं के सेल्फ के प्रति पूरी तरह से निष्ठावान बनाता है। इस प्रकार व्यक्ति खुद के सेल्फ जो परम् का ही स्वरूप है उसमें अवस्थित हो जाता है। यह समझदारी बुधि के निरंतर अभ्यास और उपयोग से आती है, जो कर्मयोग के अनुसार आचरण कर होता है और यही आचरण हमें निरन्तर मनन , चिन्तनऔर ध्यान में प्रवृत्त करती है जिससे बुद्धि ज्ञान की तरफ ले जाती है और ज्ञान सेल्फ की तरफ जो अंतिम लक्ष्य हो जाता है। इससे व्यक्ति की सारी अशुद्धियाँ अर्थात अज्ञानता समाप्त होकर विशुद्ध सेल्फ ही बचा रह जाता है। इस प्रकार का व्यक्ति कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। कर्मबन्धन से मुक्ति ही जन्म-मृत्यु से मुक्ति है। कई लोगों को पुनर्जन्म में विश्वास नहीं होता है। लेकिन बुद्गी से जो ज्ञान मिलता है वह व्यक्ति को उसके सेल्फ में टिका देता है और व्यक्ति समझता है कि ये सेल्फ और कुछ नहीं बल्कि सर्वव्यापी कंक्सियसनेस्स ही है। जब ये ज्ञान आ जाता है और इसका अनुभव हो जाता है तो फिर कर्मों के बंधन से पूरी तरह मुक्ति मिल जाती है। कर्म होते हुए भी कर्म होने का भान तक नहीं होता है। यही अवस्था मुक्ति की अवस्था है जो जीवित रहते ही मिल सकती है क्योंकि जीवित अवस्था में ही हम बुद्धि से ये ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं और ज्ञान ही मुक्ति देता है। तब ऐसे ज्ञानी को ही परमात्मा में अवस्थित हुआ कहते हैं जिसके लिए सामुहिक कल्याण ही एक मात्र कृत्य रह जाता है क्योंकि वह समझ पाता है कि कोई भी उससे भिन्न नहीं है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 18
2.
जब व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है तो उसके पास विद्या और विनय दोनों होते हैं। इससे स्पष्ट है कि यदि व्यक्ति विद्वान है लेकिन विनयशील नहीं है तो ज्ञानी नहीं है।
3.
यह व्यक्ति जीव में जीव की हैसियत, उसके स्वरूप अथवा प्रकार के कारण भेद नहीं बरतता है। उसके लिए संसार के सभी प्राणी एक समान प्रिय होते हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि वह यह तथ्य समझता है कि सभी के अंदर एक ही सेल्फ है, एक ही आत्मा है, सभी एक ही विस्तृत , सर्वव्यापी सत्य के रूप हैं। इस कारण उसके अंदर सभी के प्रति प्रेम, सेवा और अहिंसा का भाव होता है। उसे किसी से न तो विशेष अनुराग होता है, न ही विराग।
लेकिन यँहा ध्यान देने की बात है कि यह व्यक्ति भी जिसे इन विशेषताओं के कारण , पण्डित कह कर सम्बोधित किया गया है वह व्यवहार के स्तर पर सभी से समान भाव रखते हुए भी उन सभी के कर्मों के अनुरूप ही व्यवहार करता है। इसी लिए राम ने विभीषण की अच्छाइयों को देखते हुए उसे मित्रवत व्यवहार दिया और रावण को उसकी बुराइयों का दण्ड भी दिया। किन्तु राम ने रावण से कोई बैर कभी नहीं रखा। व्यक्ति के शरीर के कर्म और उन कर्मों पर ज्ञानी व्यक्ति की प्रतिक्रिया शरीर के स्तर पर ही होती है न कि उसके सेल्फ के स्तर पर।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 19
4.
जिस व्यक्ति को कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है वह व्यक्ति अपने मन से हर द्वंदात्मक युग्म जैसे सुख-दुख, जय-पराजय, प्रेम-घृणा आदि में हमेशा समान भाव रखता है। इस तरह का व्यक्ति मन में हर अवस्था के प्रति समभाव रखने के कारण उत्तेजित या उद्वेलित नहीं होता है बल्कि वह शांत चित्त, प्रसन्न चित्त, अपने ही सेल्फ में बना रहता है, उसे किसी विषमता से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। और यह क्षमता व्यक्ति को अपने जीवन काल में ही आनी चाहिए। मृत्यु के बाद किसी अन्य उपलब्धि के लोभ में यह व्यक्ति नहीं होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 20
5.
अब आगे हम देखते हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो इस ज्ञान को आत्मसात कर चुका है वो व्यक्ति सारे संसार को अपने से बाहर नहीं देखता समझता है। सम्पूर्ण विस्तार के सेल्फ के साथ स्वयम का एकीकरण सापेक्षता को समाप्त कर देता है है। उसके लिए उसकी बुद्धि इस एक सेल्फ के ज्ञान में स्थिर होती है जिसके कारण वह परम सत्य के साथ एकीकृत हुआ रहता है। ऐसी अवस्था में जो कुछ घट रहा होता है वह उस व्यक्ति के लिए उस सम्पूर्ण विस्तार का ही स्वरूप होता है, जिसके कारण उसे प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति भी एक सी प्रतीत होती है, वह न तो प्रिय को प्राप्त कर प्रसन्नता महसूस करता है न ही अप्रिय उसे उद्विग्न कर पाते हैं। क्योंकि
(क) उस व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती है,
(ख) उस व्यक्ति के लिए प्रत्येक परिणाम समान होता है,
(ग) उसके लिए उसकी इन्द्रियों की क्रिया उन इन्द्रियों की अपनी गति से घट रही क्रिया मात्र होती है।
जब व्यक्ति सभी में खुद के विस्तार को ही समझने का आदि हो चुका होता है तो उसके लिए भला क्या प्रिय और क्या अप्रिय। ऐसे इंसान के लिए तो हर परिणाम ही मात्र एक ऐसी घटना मात्र है जो अपनी प्रकृति से सामने आती है और फिर चली जाती है। इस व्यक्ति की प्रसन्नताआ किसी अन्य पर निर्भर नहीं होती है।
जब तक व्यक्ति की बुद्धि इस एकात्मकता में स्थिर नहीं होती है तब तक उसे लगता है कि फलाना उसका है, फलाना वैरी है , ये अपना है, वो पराया है, जो अपना है उससे उसकी भावनाएँ जुड़ जाती हैं और तब उसे खुशी और दुख, प्रसन्नता और उद्विग्नता का अनुभव होता है। लेकिन जब उसे सब कुछ एक ही सेल्फ का विस्तार का ज्ञान होता है तो उसके लिए कुछ भी सापेक्ष नहीं रह जाता, सभी मात्र प्रकृति के विभिन्न क्रियाओं की तरह उसके सामने घटते रहते हैं और वह उनसे प्रभावित नहीं होता है। लेकिन ये तब होता है जब उसकी बुद्धि इस परम् ज्ञान में स्थिर हो, वो इस सत्य को आत्मसात कर चुका हो। यह तब होता है जब कर्मयोग से प्राप्त अनुभव स्मरण से आगे व्यक्ति की समझदारी से जुड़ी होती है। जब ज्ञान समझदारी में अवस्थित होता है तब उसे याद नहीं रखना होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 21
6.
हम बार बार देखे हैं, समझे हैं कि व्यक्ति अपनी पराकाष्ठा पर उस समय पहुँच पाता है जब उसे वो सुख मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता है। चूँकि व्यक्ति अपने ही आत्मा, यानी अपने ही सेल्फ अथवा कॉन्सियसनेस में स्थिर हो चुका होता है सो उसे जो भी सुख मिलता है वह उसे खुद से प्राप्त होता है क्योंकि वह खुद को शरीर मात्र नहीं समझ कर सम्पूर्ण विस्तार का अंश समझता है। जब व्यक्ति अपने सेंसेस यानी इन्द्रियों पर निर्भर होता है तो इंसान को अपने सुख के लिए खुद से बाहर की तरफ देखना होता है जो उसे अपनी इन्द्रियों के द्वारा मिल पाता है लेकिन वह सुख स्थाई नहीं होता है क्योंकि बाहरी संसार तो नित परिवर्तनशील है और उस परिवर्तन से उसे उसकी इन्द्रियों को कभी सुख की अनुभूति होती है तो कभी दुख और सन्ताप की। किन्तु जब व्यक्ति परम् ज्ञान की अवस्था को प्राप्त कर लेता है तो उसे इस सत्य का ज्ञान होता है कि जो कुछ उसके बाहर है वो नित परिवर्तनीय और क्षय होने वाला है। इसके विपरीत उसका खुद का सेल्फ तो उस परम परमात्मा यानी कॉन्सियसनेस का अंश है जो सभी में समान है , जो सदा अपरिवर्तनशील है और जो बाहरी सन्ताप से अछूता है। इस अवस्था में व्यक्ति व्यापक सत्य का ही एक अंश होता है, उसी का एक सम्पूर्ण प्रतिनिधि होता है सो उसका सुख अक्षय यानी नहीं समाप्त होने वाला होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 22
7.
जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है न वह व्यक्ति इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुख के अभिलाषी नहीं होते हैं। उनको इस बात की समझ होती है कि इन्द्रियों से मिलने वाले सुख सुख नहीं बल्कि अंततः दुखों के ही कारण बनते हैं। ऐसा इसलिये होता है क्योंकि जब व्यक्ति इन्द्रियों से मिलने वाले सुख में रमने लगता है तो उनसे उसे लगाव होने लगता है। तब यदि किसी कारणवश वे सुख कम होते हैं या छूटते हैं तो दुख होता है क्योंकि तबतक इन्द्रियों के सुख से लगाव हो चुका होता है। वस्तुतः ये सुख व्यक्ति के लिए उसका व्यसन बन चुके होते हैं, नशा का रूप ले चुके होते हैं जिनका मिलना और नहीं मिल पाना दोनों व्यक्ति के लिए घातक होता है। यदि वे सुख मिल रहे होते हैं तो व्यक्ति उसी को बचाने और बढ़ाने के फेरे में रहता है, वह उन्ही सुखों के लोभ में लगा रहा जाता है जिसके कारण दिन रात वह उन्हीं में लगा होता है, उसे खुद के अंदर देखने की फुर्सत नहीं होती। और यदि ये इन्द्रिय जनित सुख किसी कारण से छूटते हैं तो व्यक्ति उनको बचाने, उनको वापस पाने के लिए व्यकुल होने लगता है, उस अवस्था में उसे चिड़चिड़ाहट, गुस्सा, अवसाद, ईर्ष्या आदि होने लगते हैं। इस स्थिति में भी व्यक्ति को खुद के अंदर झाँकने, खुद को समझने की फुर्सत नहीं मिल पाता है। इस प्रकार दोनों ही स्थिति में व्यक्ति इन्द्रिय जनित सुखों के कारण उद्वेलित होकर गलत काम करने के लिए प्रेरित होता है। संसार के अधिकांश अपराधों की जड़ में व्यक्ति का अपनी इन्द्रियों के सुखों के लगाव ही होता है। ये सुख तो नश्वर होते हैं जो समय, काल, स्थान के सापेक्ष होते हैं। इन्हीं कारणों से वह व्यक्ति जिसे कर्मयोग के मार्ग पर चलने से ज्ञान मिल चुका होता है वह इन्द्रिय जनित सुखों के लोभ में नहीं रहता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 23
8.
ज्ञानी व्यक्ति का अन्य लक्षण होता है कि वह कामनाओं और क्रोध के प्रभाव में नहीं आता। और यह क्षमता व्यक्ति को जीवित अवस्था में ही प्राप्त हो जाता है। इस समझदारी से ये बात स्पष्ट हो जाती है कि ज्ञान और मुक्ति का लक्ष्य जीवित रहते ही प्राप्त करना सम्भव है।
काम और क्रोध उसी तरह से व्यक्ति के विवेक को प्रभावित करते हैं जैसे राग और द्वेष। जब व्यक्ति कामनाओं और क्रोध के प्रभाव में होता है तो वह उद्वेलित रहता है, उसकी नजर बराबर खुद के बाहर के कारकों पर टिकी रहती है। इस उद्वेगना में सम्भव नहीं है कि व्यक्ति चिरस्थाई सुख और शांति को पा सके। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह कामनाओं और कामना जनित क्रोध से खुद को मुक्त करे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 24
9.
जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते चलकर ज्ञान को समझता है तो इस प्रकार का ज्ञानी व्यक्ति अपने सुखों के अपने से बाहर की चीजों पर निर्भर नहीं करता है बल्कि इस प्रकार से ज्ञान अर्जित कर इंसान खुद के सेल्फ/अपनी ही आत्मा में लीन रहकर उसी में सुख का अनुभव करता है। बाहरी कामनाओं और इक्षाओं का उसके जीवन में कोई अर्थ नहीं रह जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति को स्वयम से जो तारतम्य स्थापित होता है उसके कारण उसे असीम शांति की प्राप्ति होती है और उसके सारे उद्वेग समाप्त हो जाते हैं। सो ऐसा व्यक्ति सम्पूर्ण विस्तार यानी परमात्मा में ही स्थिर हो जाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 25
10
इस प्रकार ज्ञान प्राप्त व्यक्ति को ऋषि यानी सत्यद्रष्टा कहते हैं जिसने सत्य को जानकर ये अपनी अज्ञानता को दूर कर लिया है। ज्ञान के कारण उसे ये समझ मिल चुका होता है कि उसका वास्तविक स्वरूप उसका भौतिक रूप नहीं बल्कि उसकी आत्मा यानी उसका सेल्फ है और इस अवस्था में उसके अंदर की सारी अशुद्धियाँ यानी पाप और सभी तरह के संशय समाप्त हो चुके होते हैं। संशय तभी दूर होता है जब ज्ञान की प्राप्ति हो पाती है। जैसे जैसे ज्ञान मिलता जाता है व्यक्ति का संशय दूर होते जाता है। अंततः सारे संशय दूर हो जाते हैं। ऐसा व्यक्ति सत्य को बिना किसी माध्यम के देख पाता है। इस अवस्था में ज्ञान संचालित होकर मन और इन्द्रियाँ पूर्णतः उस व्यक्ति के नियंत्रण में रहती हैं। चूँकि सारी लालसाओं का अंत कर ही ज्ञान मिल पाता है सो इन्द्रियों और मन को कोई वहज नहीं होता है कि वे इधर उधर भटकें। इस समय भी व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन उस इंसान के सारे कर्म दूसरों के हितार्थ ही होते हैं।
जब ज्ञान की इस अवस्था में व्यक्ति आ जाता है तब वह अपने सम्पूर्ण सांसारिक परिसर के साथ पूर्ण सामंजन में होता है, उसे कोई उद्वेग नहीं रह जाता है। इस शांत अवस्था में व्यक्ति शरीर होते हुए भी अपनी आत्मा से ही सब कुछ संचालित करते हुए आत्मा में स्थित होता है। व्यक्ति का सेल्फ व्यपाक सत्य का ही एक अंश है, इसे जान समझ कर , इस सत्य को ही जिता हुआ ज्ञान से परिपूर्ण इंसान खुद को परमात्मा में ही अवस्थित पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 26
जिस व्यक्ति ने कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ज्ञान प्राप्त किया है, उस व्यक्ति के मन में बाह्य माध्यमों से सुख प्राप्ति की कोई लालसा नहीं रह जाती क्योंकि उसे पता है कि यदि इस तरह की कोई कामना रहेगी मन में तो कामना पूर्ति के बाद भी और कामनाएँ जन्म लेंगी अर्थात उसके मन में लोभ उतपन्न होगा और बार बार कामनाओं की पूर्ति के प्रयास में लगे रहने से उसका ध्यान भी बार बार भंग होगा और कामनाओं का कोई अंत भी नहीं होगा। इसी प्रकार वह ये तथ्य भी जानता है कि यदि कामनाओं की पूर्ति में कोई बाधा आएगी तो फिर ईर्ष्या और क्रोध होगा। सो ज्ञानी व्यक्ति खुद को कामनाओं से मुक्त करता है। काममुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ और मन हमेशा संयत होते हैं , उनमें किसी प्रकार की उत्तेजना नहीं होती , वे सुख प्राप्ति के लिए बाहरी माध्यमों की तरफ नहीं भागते हैं बल्कि खुद की तरफ आते हैं, खुद के सेल्फ में स्थिर होते हैं। इस तरह से काम मुक्त इंसान के लिए परमात्मा कोई दूर लोक में बसने वाले नहीं होते बल्कि परमात्मा तो स्वयम उसका सेल्फ यानी उसकी आत्मा ही होती है। जब आप कामना, अपेक्षा , फल, जैसी भावना से मुक्त होकर मन शरीर और विवेक से स्वतः क्रियाशील रहते हैं तो हमेशा दूसरों के हितार्थ कर्म करते हैं, जिसे सेवा कहते हैं। यह सेवा भाव आपको असीम शांति देता है जिससे अक्षय सुख की प्राप्ति होती है। यही अक्षय सुख जो खुद आपके ही अंदर से आ रहा होता है परमात्मा है, जिसमें आप स्थित होकर खुद के अहम से मुक्त हो गए होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 27 एवम 28
कर्मयोग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त व्यक्ति के गुणों को बताने के बाद अब श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्ति के बाद कि स्थिति यानी ध्यान करने की विधि को समझाते हैं। लेकिन ध्यान यानी मैडिटेशन सभी नहीं कर सकते हैं। इसका कारण है कि जब तक व्यक्ति अपने इन्द्रियों के वश में रहता है, इन्द्रिय जनित बाहरी सुख और दुख के फेरे में रहता है वह ध्यान की अवस्था को नहीं प्राप्त कर सकता है क्योंकि इन्द्रियों के वश में रहने वाला व्यक्ति शब्द,स्पर्श, रूप, रस, गन्ध से मिलने वाली अनुभूतियों के चलते चंचल हुआ रहता है। जब हमें हमारे मन और विवेक पर इन्द्रियाँ हावी होती हैं तो फिर हमें खुद के अंदर देखने की फुर्सत नहीं मिल पाता है। इस अवस्था में हमारा मन शांत नहीं हो सकता और अशांत मन से हम ध्यान नहीं कर सकते।
जब हम इन्द्रियों के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं, जब कर्मयोग के मार्ग पर चलकर कर्म करते हैं तब हमारा उद्देश्य कर्मबन्धन से मुक्त होना होता है और यही मुक्ति मोक्ष कहलाता है जो जीवित अवस्था में ही प्राप्य है। इस अवस्था में ध्यान की विधि के तरीके में शामिल है कि जब हम बाहरी इक्षाओं और बाहरी संकल्पों को अंदर नहीं आने देते हैं और अंदर के संकल्पों को बाहर नहीं जाने देते हैं बल्कि दोनों में सम अवस्था में होते हैं, और दृष्टि दोनों भृकुटियों के मध्य स्थित हो और यह दृष्टि आराध्य पर टिकी होती है। यह अवस्था ध्यान की है जिसे ज्ञानी व्यक्ति हर स्थिति में धारण किये होता है। इसके लिए उसे कोई पर्यास नहीं करना होता है। इस अवस्था में व्यक्ति स्वयम में परम् प्रसन्नता की स्थिति में होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2
जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते चलकर ज्ञान को समझ कर ग्रहण कर लेता है तब उसे इस तथ्य की अनुभूति होती है कि वह उस परम से भिन्न नहीं है जो उसके यज्ञकर्म, तपकर्म को ग्रहण करता है, जो उसके साथ निरन्तर मित्र भाव से बना रहता है, जिसमें कोई स्वार्थ नहीं होता है और जो सदा सहयोगी ही होता है। जब व्यक्ति को अपने सेल्फ की प्राप्ति की अनुभूति हो जाती है तो उसे महसूस हो पाता है कि उसका स्वरूप चाहे जो हो, उसकी सांसारिक पहचान चाहे जो हो लेकिन वास्तव में वह विस्तृत सत्य का प्रतिरूप है, उसी का अंश है, सो उसके जो भी कर्म हैं उनका भोक्ता भी वही विस्तृत सत्य है जिसे हम ईश्वर कहते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति यह अनुभव कर लेता है कि उसकी वास्तविकता उसी सम्पूर्ण सत्य में निहित है ठीक वैसे ही जैसे समुद्र की लहर समुद्र का ही अंश है, वह उठती भी समुद्र के जल से है और मिलती भी उसी जल में है। उठने और मिलने के बीच की अवस्था में उसके स्वरूप को हम लहर नाम देते हैं जो सम्पूर्ण जल से अलग नहीं है और मिलने के पश्चात फिर शांत हो जाती है। यही स्थिति मनुष्य की भी है जो परम् सत्य से निकल कर कर्मयोग का आचरण कर फिर परम् सत्य में लीन होकर शांति को प्राप्त हो जाता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्यायः।
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