श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 24
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 24
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
जिस यज्ञ में अर्पण अर्थात स्रुवा आदि भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्मरूप कर्ता द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देना रूप क्रिया भी ब्रह्म है- उस ब्रह्मकर्म में स्थित रहने वाले योगी द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही हैं।
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अभी तक ये स्पष्ट हो चुका है कि कर्मयोग से कर्म करने के क्या मायने हैं, क्या तरीके हैं और इस प्रकार से किया गया कर्म ही श्रीकृष्ण की शब्दावली में यज्ञ है। यज्ञकर्म के सम्बंध में हमने तृतीय अध्याय से विस्तार से जाना है और उसे पुनः अभी दुबारा देखा समझा भी है। ये भी स्पष्ट हो चुका है कि जब व्यक्ति यज्ञ भावना से कर्मयोग में प्रवृत्त होकर कर्म करता है तो उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसका वास्तविक स्वरूप उसका भौतिक देह नहीं है बल्कि उसका सेल्फ यानी स्व है जिसे हम आत्मा के नाम से सम्बोधित करते हैं। ये आत्मा ही ब्रह्म है । व्यक्ति के दृष्टिकोण से जो आत्मा है वही सम्पूर्णता में ब्रह्म है यानी परमात्मा है। आत्मा की पहचान को द्वितीय अध्याय में हमने समझा है।
अब इस पृष्ठभूमि में हम जब इस श्लोक को ""ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥"" को समझने का प्रयास करते हैं तो स्पष्ट होता है कि कर्मयोग में कर्म, कर्म करने के साधन, कर्म में प्रयुक्त साधन, कर्म के इष्ट, कर्म के लक्ष्य , कर्म फल , सब कुछ अपनी आत्मा, अपने स्व का विस्तार मात्र हैं। इस दृष्टिकोण से जब व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता है यानी यज्ञ कर्म करता है तो फिर उसके लिए भेद भाव, द्वंद्व, असमानता, आदि सभी भाव गौण होते हैं और वह व्यक्ति हरेक में अपनी ही आत्मा का विस्तार पाता है और इस प्रकार उसका योग अपने परम लक्ष्य से हो जाता है। न तो वह ब्रह्म से अलग है न ब्रह्म उससे अलग है।
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