अध्याय 4 की व्यख्या (श्लोकरहित श्लोक 1से 42तक)

अध्याय 4 की व्याख्या (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता चतुर्थ अध्याय पृष्ठभूमि

हम कौन हैं, हमारा क्या लक्ष्य है, उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, ये वो प्रश्न हैं जिनका सामाधान हम सभी खोजते हैं और इसी समाधान का सार्थक प्रयास है श्रीमद्भागवद्गीता के ज्ञान का प्रशिक्षण।  प्रथम अध्याय में हमारे अविवेक को दिखलाया गया है। शैक्षणिक स्तर पर हम विद्वान होने के वावजूद इस बात की कोई गारन्टी नहीं होती है कि हम उन तीन मौलिक प्रश्नों का उत्तर जाने हीं, कि (1) हम कौन हैं? (2).हमारा लक्ष्य क्या है? और (3) इस लक्ष्य को पाना कैसे है?
द्वितीय अध्याय में इन प्रश्नों का सारांशतः उत्तर बताया गया है जिसमें लोकप्रचलन, आत्मा, ज्ञान , कर्म और एनलाइटनमेंट यानी सिद्धि  की जानकारी दी गई है। किंतु सत्य ये है कि मनुष्य होने के नाते हम किसी व्यक्ति के द्वारा बताई बातों पर सहजन्ता से भरोसा न कर उनका परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करते हैं और परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करने का माध्यम प्रश्न करना होता है। साथ ही हम हमेशा सबसे सहज रास्ता का चुनाव करना चाहते हैं लेकिन इस क्रम में भूल जाते हैं कि विकास क्रमिक प्रगति है न कि रैंडम। सो तृतीय अध्याय में इन तीन प्रश्नों के उत्तर का मार्ग कर्मयोग के माध्यम से बताया गया है जिसके अंत में हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है।
       गीताकार ने युद्ध की पृष्ठभूमि में इन तीन प्रश्नों को उठाया है और युद्ध की पृष्ठभूमि में ही इनका उत्तर भी तलाशा है। इसका कारण ये है कि इन तीन प्रश्नों की उत्पत्ति ही द्वंद्व का परिणाम है। द्वंद्व न हो तो आगे बढ़ने, प्रश्न पूछने और उत्तर पाने की लालसा ही न रहे। द्वंद्व का अंत जानकारी का अभाव होता है। जब तक ज्ञान अप्राप्त रहता है मन में द्वंद्व लगा रहता है, सो श्रीमद्भागवद्गीता की पृष्ठभूमि में युद्ध यानी द्वंद्व है। 
  दूसरी बात कि श्रीमद्भागवद्गीता अर्जुन और श्रीकृष्ण के प्रश्नोत्तरी संवाद के रूप में प्रस्तुत है क्योंकि द्वंद्व से प्रश्न उपजते हैं जिनका निदान द्वंद्व की समाप्ति कर देता है। प्रथम अध्याय में इस द्वंद्व को अर्जुन के विषाद के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है, तो द्वितीय अध्याय में इस द्वंद्व का उत्तर लोकाचार, आत्मा यानी सेल्फ के ज्ञान, कर्मयोग , ज्ञानयोग और सिद्धि प्राप्ति के सम्बंध में श्रीकृष्ण के द्वारा दिये ज्ञान से बताया गया है। लेकिन व्यक्ति यानी अर्जुन यानी हम सभी प्राप्त होने वाले ज्ञान का उतना ही अंश प्राप्त कर पाते हैं जितना हमारे पूर्व संचित ज्ञान के पूर्वाग्रह अनुमति देते हैं। सो श्रीकृष्ण की बताई सभी बातें अर्जुन यानी हम सभी के पल्ले नहीं पड़ती और सबसे अधिक सहजता हमें सीधे अंत को प्राप्त कर लेना लगता है। तब श्रीकृष्ण तृतीय अध्याय में क्रम से मार्ग को बताते हैं जिसके अनुसार वे सबसे पहले निष्काम कर्मयोग को तृतीय अध्याय में फिर से समझाते हैं। कर्म करने की विधि बताते हैं और उसमें बरती जाने वाली सावधानियों को समझाते हैं। लेकिन इतने से हम तीन मौलिक प्रश्नों का उत्तर नहीं पा सकते सो इस चतुर्थ अध्याय में श्रीकृष्ण कर्मयोग को और अधिक स्पष्ट करते हुए ज्ञानयोग की शिक्षा देते हैं।
    चतुर्थ अध्याय में कुल 42 श्लोक हैं जिनका हम यथा सम्भव श्लोकवार प्रशिक्षण प्राप्त करेंगे।
।। 1 ।।
श्रीकृष्ण ने द्वितीय और तृतीय अध्याय में योग की शिक्षा दी है। चतुर्थ अध्याय के शुरुआत में ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि उनके द्वारा योग के सम्बंध में जो ज्ञान दिया गया है वह कोई नई बात नहीं है, बल्कि ये एक पुरातन शिक्षा है जो सृष्टि के प्रारम्बज से ही मौजूद है। वस्तुतः प्रत्येक युग में सिद्धि प्राप्त व्यक्ति को इसका ज्ञान रहा है जिसने इसे आगे बढ़ाया है। सिद्धि प्राप्त व्यक्ति वो है जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं। सूर्य सृष्टि प्रारंभ होने का प्रतीक है, साथ ही वह कॉस्मिक एनर्जी का भी प्रतीक है। सृष्टि के प्रारंभ से ये ज्ञान सर्वप्रथम मन में आता है और मन से इक्षा में। अर्थात योग का ज्ञान सर्वप्रथम हमारे अंदर मन मस्तिष्क में उतरता है। तब वह ज्ञान हमारी इक्षाओं को प्रभावित करता है यानी कि  ज्ञान की कामना होती है और हमारी इन्द्रियाँ (सेंस ऑर्गन) उसे अभिव्यक्त करती हैं। ये ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी चलता है यानी कि ये ज्ञान हमारी परम्परा  का भाग है जो हर पीढ़ी में निरंतरता के साथ बना हुआ है। दरअसल ज्ञान /सत्य तो मौजूद रहता है , जब तक हम उसे नहीं जानते है हम अज्ञान में जीते हैं। जब हम उसे पा लेते हैं तो लगता है कि हमने उसका अन्वेषण कर लिया है। ज्ञान की प्राप्ति का अर्थ है कि वह ज्ञान हमारी अभिव्यक्ति का अंश बन जाये और ये अभिव्यक्ति हमारी इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। दरअसल ज्ञान की उपयोगिता तभी है जब वह मन में तो हो ही साथ ही उसकी कामना और उसका अभ्यास हमारी इक्षाओं में भी हो ताकि वह अभिव्यक्त हो और उस ज्ञान को हम हर अगली पीढ़ी को देते जाएँ अर्थात उसे हम अपनी परम्परा का भाग बना लें।
।।2 एवम 3।।
परम्परा से प्राप्त योग की शिक्षा का ज्ञान मन एवम इक्षा से होते हुए उन व्यक्तियों को होता है जो राजर्षि थे अर्थात जिनमें राजोगुण भी थे और जो ऋषि तुल्य थे यानी जिनमें सत्वगुण भी थे किंतु समय के प्रवाह के साथ  धीरे धीरे ये ज्ञान विलुप्त भी हो गया। दरअसल समाज में  जब रजोगुण और सत्वगुण का ह्रास होता है तो योग की शिक्षा का भी विलोपन होते जाता है। लेकिन जिसे परम् पिता परमेश्वर से लगाव होता है उसे इस योग का ज्ञान पुनः होता है। समाज से सत्वगुण और रजोगुण के ह्रास के बावजूद अगर किसी व्यक्ति को ये गुण प्राप्त होते हैं तो उसे कर्म करने की योगबुद्धि प्राप्त होती ही है। जब व्यक्ति पथभ्रष्ट होता है तो कोई सिद्ध पुरुष उसे सही मार्ग बताता है। जब भी समाज में उथल पुथल मचता है, समाज से भली प्रवृतियों का विलोप होता है और आसुरी प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं तब कोई सिद्ध व्यक्ति समाज को रास्ता दिखाने , उसका मार्गदर्शन करने के लिए आगे आता है।
 ।।4।।
अध्याय 4 की शुरुआत में ही स्पष्ट हो चुका है कि योग सम्बंधित जिस शिक्षा को श्रीकृष्ण ने अर्जुन को बतलाया है वह शिक्षा कोई नई बात नहीं बताती है बल्कि, यदि श्लोकों के शाब्दिक अर्थ में लें तो समझते हैं कि इस शिक्षा को सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान ने सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र मनु से, और मनु ने इक्ष्वाकु से, और इस प्रकार होते हुए ये शिक्षा राजर्षियों तक पहुँची थी। तत्पश्चात समय के अंतराल में ये शिक्षा विलुप्त हो गई और अब भगवान पुनः उसे ही अर्जुन को बताते हैं क्योंकि अर्जुन उनका अनन्य भक्त और मित्र दोनों है। ऐसी स्थिति में अर्जुन को शंका होनी स्वाभाविक है कि श्रीकृष्ण का जन्म तो अर्जुन के जन्म के आस पास ही था तो उन्होंने इस ज्ञान को सूर्य को कैसे दिया होगा जो सृष्टि के प्रारम्भ से ही है। सो अर्जुन इस आशय का प्रश्न श्रीकृष्ण के समक्ष उठता है तो वह प्रश्न अतिस्वाभाविक है।
    अब जरा ध्यान दें कि आप अपने इस संशय को कैसे दूर करेंगे। वस्तुतः योग की शिक्षा सृष्टि के प्रारम्भ से ही है जो सृष्टि के संस्कार में प्रवाहित होती रही थी। मन और इक्षा से ये शिक्षा जुड़ी हुई थी,  इसीलिए इसका पीढ़ी दर पीढ़ी संचार होते रहा। जो बात पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होती है वही तो परम्परा है और यदि समाज के पीढ़ियों में संचारित होती है तो लोक परम्परा है। चुँकि इस शिक्षा में ज्ञान भी है और ज्ञान प्राप्ति का मार्ग कर्म भी निहित है सो इस शिक्षा के वाहक राजर्षी बने जो सत्वगुण और रजोगुण दोनों को धारण करते थे। लेकिन समय अंतराल में किसी भी चीज चाहे वो ज्ञान ही क्यों न हो उसमें कई अन्य बातें भी जुड़ती जाती हैं सो मूल का स्वरूप बदल जाता है। लेकिन फिर कभी किसी व्यक्ति के समक्ष ऐसे प्रश्न खड़े हो जाते हैं जिनके निदान के लिए उसे ज्ञान के मूल स्वरूप की तरफ लौटना ही पड़ता है। लेकिन इस शर्त के पूरा होने के लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है, एक कि उस व्यक्ति को मूल ज्ञान रखने वाले के प्रति पूर्ण श्रद्धा हो यानी उसके प्रति अनन्य भक्ति हो और दूसरा ये कि याचक व्यक्ति ज्ञानी व्यक्ति से इस तरह जुड़ा हो कि अपने मन के सारे संशय और विषाद को निःसंकोच कह सके यानी उससे मित्रवत भी हो। अर्जुन और श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में ये दोनों ही शर्त पूरे होते हैं। अर्जुन के समक्ष धर्म और कर्म को लेकर विषम संशय उत्पन्न हो चुका था, सो उसे मूल ज्ञान की आवश्यकता थी और जब भी हम भटकते हैं , हमारा मूल ही हमें सही मार्ग पर ले आता है। जीवन के मौलिक सिद्धान्त आज भी वही हैं, प्रेम, करुणा, सत्य, अहिंसा इत्यादि और योग के भी मौलिक सिद्धान्त यही हैं। हमारी समृद्धि चाहे जितनी बढ़े मनुष्य के रूप में जीवन के मौलिक तथ्य वही रहते हैं। सो ये ज्ञान परम्परा से , लोक परम्परा से भी बंधा हुआ है।
आगे की वार्ता में श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का समाधान करेंगे।
।।5।।
अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनके और अर्जु के कई जन्म हुए हैं जिसके बारे मे भले ही अर्जुन को ज्ञान नहीं है लेकिन श्रीकृष्ण को इस बात की जानकारी है।   इससे पुनर्जन्म के सिद्धांत की झलक मिलती है। 
    जिस प्रकार आत्मा और परमात्मा को भौतिक रूप से अनुभव करना सम्भव नहीं है, उसी प्रकार पुनर्जन्म की भी भौतिक रूप से व्याख्या करना सम्भव नहीं है। किन्तु व्यवहार के स्तर पर हम आत्मा और परमात्मा को न केवल महसूस कर सकते हैं बल्कि उनकी स्थिति को प्राप्त भी किया जा सकता है। योग का ज्ञान सृष्टि के प्रारम्भ से है और लोक परम्परा से इसका संचार वर्तमान तक हुआ है। इस बात को समझने के लिए जिस व्यवहार की समझ होनी चाहिए वो आपको अपने भौतिक ज्ञान से नहीं हो सकता। भौतिक ज्ञान का अपना महत्व है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता है। अर्जुन खुद बहुत बड़ा योद्धा था। उसका युद्ध कौशल उसका भौतिक ज्ञान है। श्रीकृष्ण कभी भी उसके इस भौतिक ज्ञान को नीचा नहीं दिखाते, बल्कि अर्जुन की संसार में पहचान उसके युद्ध कौशल के भौतिक ज्ञान के कारण ही है। तभी तो श्रीकृष्ण अर्जुन को परन्तप कह कर सम्बोधित करते हैं अर्थात जिसके ताप से  विरोधी त्रस्त हो जाते हैं। किंतु ये  भौतिक कौशल सफलता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं होते है। इसके लिए योगमार्ग का ज्ञान होना अनिवार्य होता है। कर्मयोग का ज्ञान ही वो मार्ग है जिसपर चलकर यदि हम अपने कौशल का उपयोग करते हैं तो वांछित सफलता प्राप्त करते हैं। यदि इस मार्ग पर चले बिना अपने कौशल का उपयोग करते हैं तो हमारा कौशल हमें  कुछ नहीं दे पाता है। इस तथ्य का ज्ञान हर युग में सिद्ध व्यक्तियों को होता है और सिद्ध व्यक्ति को पता है कि ये मार्ग सदा से चलते आया है भले एक पीढ़ी विशेष के कुछ या बहुतेरे लोग इससे अनभिज्ञ हों। इसे आप इस तरह से समझिए कि हमारे अज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि ज्ञान के मार्ग  का अस्तिव ही नही  है। 
 ॥6॥
अर्जुन के शंका समाधान के क्रम में श्रीकृष्ण ने उसे योग का महत्व तो समझाया ही है और ये भी बताया है कि यह योग सृष्टि के प्रारम्भ से ही है । अर्थात ये वो ज्ञान है जिसके कारण सृष्टि का सम्यक संचालन सम्भव है। जब श्रीकृष्ण की दी जा रही शिक्षा में ये भी शामिल है कि सिद्ध पुरुष यानी REALIZED MASTER कौन है जिसे न केवल योग पुर्ण ज्ञान है बल्कि उसका नियमित पालन भी करता है। इसी को विस्तारित करते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा, परमात्मा, कर्म, और अंततः ईश्वर से भी परिचित कराते हैं। 
     अपने व्यवहारिक सांसारिक जीवन में हम प्रायः ईश्वर का स्मरण करते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ईश्वर के अस्तित्व को या तो सिरे से नकार देते हैं या फिर इसे एक ऐसी कल्पना का सृजन मानते हैं जो मनुष्य के भय से उत्पन्न होता है। कुछ लोग ईश्वर को सत्ता हासिल करने के लिए गढ़ी गई कल्पना मानते हैं। कोई ईश्वर के निराकार स्वरूप की चर्चा करता है तो कोई साकार। श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण ने जिन मौलिक तथ्यों और रहस्यों को बार बार उद्घाटित किया है उनमें ईश्वर भी है। 
            ईश्वर सब का नियंता है, और प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों , तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण से मुक्त अपनी माया से प्रत्यक्ष होने वाला होता है। इस एक वक्तव्य में श्रीकृष्ण ने ईश्वर को समझने और जानने का मार्ग दे दिया है। द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण ने आत्मा के सम्बंध में अर्जुन को विस्तार से समझाते हुए बताया है कि आत्मा परमात्मा का अंश है जो प्रत्येक व्यक्ति का सेल्फ यानी उसका स्व है। इस कारण से आत्मा अजर, और अमर यानी न जीर्ण होने वाला है, न जन्म लेने वाला है और न मरने वाला अर्थात अपरिवर्तनीय है। पुनः यँहा भी वे कहते हैं कि ईश्वर अजन्मा है और अविनाशी है अर्थात वह जन्म मृत्यु के बन्धन से मुक्त है और नाश रहित है। इसके बावजूद उसका स्वरूप विद्यमान है। 
       अब हम देखें कि अर्जुन के प्रश्न पर श्रीकृष्ण कैसे सिलसिलेवार अपना यानी ईश्वर का परिचय देते हैं।
1.वे अजन्मा हैं अर्थात जन्म मरण के चक्र से मुक्त हैं।
2.वे अविनाशी हैं अर्थात उनका कभी नाश नहीं होता है।
3.वे काल से परे हैं क्योंकि जन्म मरण , नाश-विनाश से मुक्त हैं।
4.वे सम्पूर्ण सृष्टि के नियंता हैं।
5.वे अपनी प्रकृति और उसके तीनों गुणों को अपने ही अधीन रखकर अपनी माया से स्वरूप में प्रत्यक्ष होते हैं।
          हम देखते हैं कि हमारी पहचान हमारे ""मैं"" से होती है। इस "मैं" की अभिव्यक्ति इस मैं के शरीर से होती है। इस शरीर में विभिन्न अंग होते हैं , असंख्य कोशिकाएँ होती हैं। अलग अलग अंग अलग अलग कार्यों के लिए बने होते हैं और वे अपना अपना कार्य करते रहते हैं। परंतु उन सब का अपना अपना अलग अलग कार्य होते हुए भी वे सभी अंग एक दूसरे से मुक्त नहीं होते हैं बल्कि एक तारतम्य में एक "मैं" की सम्पूर्णता के लिए कार्य करते हैं। इन प्रत्येक अंग के कार्य का अपना महत्व तो होता है किंतु यदि उनको उनके "मैं" से हटाकर देखा जाए तो तो वे निर्थक प्रतीत होते हैं। हमारी असंख्य कोशिकाएँ भी नित्य अपने अपने कार्य में लगी रहती हैं। हमारे जीवित शरीर में ही उनका निरन्तर नाश और निरन्तर उतपत्ति भी होते रहता है। परंतु उन कोशिकाओं का कार्य भी सम्पूर्णता में हमारे "मैं"के लिए ही होता है, उनमें आपस में एक तंत्र बना रहता है, वे अपने आप में स्वतंत्र इकाई होकर भी अपने अस्तित्व के लिए एक वृहत्त इकाई का भाग होती हैं। इसी का विस्तार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में होता है, जिसमें पंचतत्व से बने विभिन्न पिंड होते हैं जिनका स्वतंत्र अस्तिव होते हुए भी सम्पूर्णता में वे सभी एक ब्रह्मांड के भाग मात्र होते हैं। जिस प्रकर "मैं" के शरीर को "मैं नियंत्रित करता है उसी प्रकार इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड के प्रत्येक अवयव को एक ईश्वर नियंत्रित करता है। जिस प्रकार एक व्यक्ति का प्रत्येक अंग, प्रत्येक कोशिका स्वतंत्र अस्तित्व रखते हुए भी उसके मैं के प्रति ही उत्तरदायी है उसी प्रकार इस ब्रह्मांड का प्रत्येक अवयव भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखते हुए उस एक ब्रह्मांड के प्रति ही उत्तरदायी है। जिस प्रकार मैं की सम्पूर्णता उसके प्रत्येक अंग और प्रत्येक कोशिका से अलग अलग व्यक्त होती है उसी उस एक ईश्वर की अभिव्यक्ति ब्रह्माण्ड के प्रत्येक अवयव में होते रहता है। प्रत्येक अवयव स्वतंत्र होकर भी उसी एक ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र होता है। इस प्रकार हम देखते है कि जिस प्रकार एक ही कॉन्सियसनेस का विस्तार न्यूनतम अवयव से लेकर बृहत्तम अवयव तक होता है जो सबको नियंत्रित करता है। इसी सम्पूर्णता का कॉन्सियसनेस जो हर न्यून से न्यून से लेकर वृहत्तम तक व्यक्त होता है, उसे नियंत्रित करता है वही ईश्वर है। इस प्रकार ये सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ईश्वर की अभिव्यक्ति है जो प्रकृति के नियमों से संचालित होते रहता है जो एक खास पैटर्न लिए होते हैं और जो इस कॉन्सियसनेस का विवेक होते हैं। ये उसी प्रकार से है जैसे प्रत्येक लहर एक लहर विशेष है लेकिन प्रत्येक लहर मात्र जल के पिण्ड का भाग मात्र है , उसकी अभिव्यक्ति भर है। इस प्रकार जल आत्मा है, लहर जीव है और जल का पिंड ईश्वर है। ये समझने के लिए एक रूपक मात्र है। इस प्रकार ईश्वर की अभिव्यक्ति प्रत्येक अभिव्यक्त स्वरूप में है, कोई भी इससे अलग नही है। इसी को द्वितीय अध्याय मे आत्मा और परमात्मा के परस्पर सम्बन्ध को समझते हुए श्री कृष्ण कह चुके हैं। इस प्रकार प्रत्येक इकाई एक अंतिम वृहत्तम के प्रति उत्तरदायी भी है और उसी की अभिव्यक्ति मात्र है।  इस प्रकार स्पष्ट है कि एक का अस्तित्व तभी है जब सम्पूर्णता का अस्तित्व है। यदि आप हैं , आपका अस्त्तिव सत्य है तो दूसरे का भी अस्तित्व, तीसरे का भी अस्तित्व और इस प्रकार ईश्वर का भी अस्तित्व सत्य है। और ये सभी प्रकृति के नियम की बौद्धिकता  से बंधे हुए हैं। अगर हम सत्य हैं तो आप सत्य हैं, यदि मैं हूँ तो आप भी हैं,  अन्य भी हैं। जिस प्रकार "मैं" का अस्तित्व सत्य है ईश्वर का अस्त्तित्व भी सत्य है। "मैं" कल्पना नही तो अन्य कैसे कल्पना है , ईश्वर कैसे कल्पना है? आप ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं, ईश्वर आपकी सम्पूर्णता है।
      ईश्वर सब का नियंता है। ऐसा कैसे हो सकता है? ईश्वर ही सब में है, सभी का सेल्फ है, सभी का कॉन्सियसनेस है, वही प्रकृति का नियम भी है सो वह सभी का नियंता भी है। सब का मालिक एक है। वह सभी का नियंता तो है , लेकिन वह किसी से नियंत्रित नहीं होता है। सो वह प्रकृति से नियंत्रित नहीं होता है, बल्कि प्रकृति उसके अधीन होती है, वह कर्तापन से मुक्त होता है। इस कारण उसका स्वरूप कुछ भी हो सकता है, वह खुद को किसी भी स्वरूप में व्यक्त हो सकता है। चुँकि वह कर्मों से नहीं बंधा होता है सो उसका स्वरूप भी जन्म की निरंतरता से मुक्त है और मृत्यु से परे है। वह भूत, भविष्य और वर्तमान से यानी काल से परे होता है।  ये तो मनुष्य की अपनी सुविधा है कि वह ईश्वर को किस स्वरूप में समझता है, इसके लिए वह भिन्न भिन्न रूपों में समझता है। जिसकी जैसी श्रद्धा है उसके लिए ईश्वर का वही स्वरूप सत्य है।
॥7॥
हमने अभी देखा समझा कि ईश्वर सर्वव्यापी है, प्रत्येक दृश्य और अदृश्य में ईश्वर है, से सभी ईश्वर के ही विभिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। इसी को विस्तार देते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि कब कब ईश्वर की अनुभूति प्रत्यक्ष होती है। ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति को ही अवतार का होना कहते हैं। 
समाज की सुचारू संरचना के लिए आवश्यक है कि समाज में यज्ञ भावना हो, अर्थात ये भावना हो कि "एक सब के लिए है और सब एक लिए है" (ONE FOR ALL AND ALL FOR ONE).। प्रकृति के नियमों के संचालन में बाधा नहीं डाली जाती है और मनुष्य का निजी और सामाजिक विवेक सभी मनुष्यों के उत्तरोत्तर उत्थान के लिए उपयोग में लाया जाता है तो वह अवस्था धर्म के उत्थान की अवस्था होती है जिसमें समाज और व्यक्ति की भौतिक और आध्यात्मिक उत्पादकता श्रेष्ठ स्थिति में होती है। अगर ऐसा नहीं होता होता है तो उस पतन को ही अधर्म का बढ़ना कहते हैं। जब ऐसा होता है तो व्यक्ति और  समाज दोनों के अंदर आसुरी प्रवृत्तयाँ जैसे असत्य, हिंसा, क्रोध, लोभ, घृणा जैसी प्रवृत्तियाँ बढ़ने लगती हैं जिसके कारण समाज में अनाचार, अत्याचार बढ़ते हैं और प्रकृति के नियम बाधित होते हैं। समाज का हर अंग इसके प्रभाव में आ जाता है। इसकी अभिव्यक्ति भौतिक से लेकर आध्यात्मिक क्षेत्र में उत्पादकता की पतनशीलता से परिलक्षित होती है। अधर्म की इस स्थिति में समाज के भीतर एक बेचैनी जन्म लेती है जो ईश्वरीय अभिव्यक्ति की आकांक्षी होती है। इस आकांक्षा से ईश्वर की अनुभूति प्रत्यक्ष होती है जिसे हम ईश्वर के प्रत्यक्ष अवतरण के रूप में लेते हैं। ईश्वर की यही प्रत्यक्ष अनुभूति ईश्वर का अवतार है । जिसके अंदर इस अनुभूति का संचार नहीं होता उसे ईश्वर के अवतार का भान तक नहीं होता है। महाभारत काल में श्रीकृष्ण को अवतार के रूप में पूजते हैं ।लेकिन कौन पूजता है? वही जिनके अंदर धर्म की हानि से बेचैनी होती है जैसे पाण्डव। दुर्योधन इस पतन का वाहक है तो उसके लिए श्रीकृष्ण ग्वाला मात्र हैं जिनको बेड़ियों में बाँधना चाहता है वह। इसी प्रकार शिशुपाल के लिए भी श्रीकृष्ण एक नीच कुल में जनमें धूर्त ग्वाला मात्र हैं। सो व्यक्ति को जब  अधर्म की वृद्धि पर बेचैनी होती है तो ईश्वरीय अनुभूति प्रत्यक्ष सामने आकर व्यक्ति का मार्गदर्शन करने लगती है तो उसे अपना वह मार्गदर्शक अवतार पुरुष प्रतीत होता है। वस्तुतः प्रकृति के नियम जब कभी , जँहा कँही अत्यधिक असन्तुलित कर दिए जाते हैं वंही उसका आंतरिक विवेक एक स्वरूप लेकर उसे ठीक करने के लिए क्रियाशील हो उठता है जो ईश्वरीय अवतरण का ही स्वरूप है। ईश्वर तो अजन्मा और अविनाशी है तो फिर जिसकी श्रद्धा धर्म के प्रति है उसके लिए ईश्वर का अवतार तो निरन्तर उसी के साथ है।
॥8॥
अवतार की समझ हो जाने से अवतार का उद्देश्य भी समझ में आ जाता है। ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति ही अवतार है और ये तभी सम्भव होता है जब व्यक्ति के मन में आसुरी प्रवृत्तियों का नाश होता है, उसका लोभ, काम, ईष्या, क्रोध, असत्य, हिंसा आदि का नाश होता है। इनकी वृद्धि ही अधर्म है, जो कुछ प्रकृति के स्वाभाविक नियम से विपरीत है वह अधर्म है, तमोगुण , जिसकी विस्तृत चर्चा हमने की है पहले वही अधर्म है, और इनके बदले प्रेम, सत्य , अहिंसा आदि गुणों की वृद्धि और प्रकृति के गुणों के संतुलन से  इन आसुरी प्रवृत्तियों का विनाश होता है। यही हमारे मन में ईश्वर के अवतार का परिणाम है जिसके कारण धर्म  की पुनः स्थापना होती है। धर्म की स्थापना का तात्पर्य योग अनुरूप आचरण का समाज में प्रवाह ही है।
।।9।।
श्रीकृष्ण अपना रहस्य बताते हुए आगे कहते हैं कि उनका जन्म और कर्म दोनों अलौकिक और दिव्य हैं अर्थात वे जन्म लेकर भी अजन्मा हैं और कर्म कर के भी अकर्ता हैं। इस अलौकिक स्वरूप को वही जान पाता है जो ईश्वर को तत्व से जानता है।
अब प्रश्न उठता है कि जब ईश्वर अजन्मा और अविनाशी हैं तो उनके जन्म की बात कँहा से आई। दरअसल ईश्वर की प्रत्यक्ष अनुभूति ही उनका जन्म है और वह तभी होता है जब व्यक्ति अधर्म के प्रति सचेत होकर धर्म के मार्ग पर अग्रसर होता है। यही अग्रसर होना तो कर्म है जिसमें ईश्वर व्यक्ति को उसके भावों के अनुरूप दिशा निर्देश देता है। तो फिर दूसरा प्रश्न उठता है कि ईश्वर की अनुभूति होती कैसे है। इसका मार्ग है तत्वज्ञान और तत्वज्ञान की प्राप्ति होती है कर्मयोग के मार्ग से चलकर ज्ञानयोग को प्राप्त करने से। जो भी इस मार्ग को अपनाता है उसे ईश्वर की अनुभूति होती है और वह स्वयं ईश्वरमय होकर उसी में लीन हो जाता है अर्थात वह भी ईश्वर की भाँति जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है।
      यँहा श्रीकृष्ण ईश्वर की अलौकिकता को स्पष्ट करते हुए व्यक्ति को संदेश देते हैं कि यदि हम तत्वज्ञान अर्थात योग के मार्ग पर चलें तो हमारे अंदर वे विशेषताएँ आती हैं जो हमें ये समझाती हैं कि इस मनुष्य शरीर में हमें क्या करना है और कैसे करना है। दूसरे और तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण ने इस मार्ग पर चलने की विधि को बताया है और आगे भी इसे पुनः बताते हैं। इस रहस्य को जब हम अपनी क्षुद्र मानसिकता से निकलकर समझते हैं, जब हम अपने पूर्वाग्रहों को त्याग कर इन बातों को समझने की कोशिश करते हैं तो ज्ञात होता है कि इनका सम्बन्ध किसी की अंध भक्ति से नहीं है बल्कि कर्म के उस मार्ग से है जिसमें व्यक्ति का उत्थान परोपकार के मार्ग पर चलने से होता है जिसके अंत में वह भी उसी स्थिति को हासिल कर लेता है जो परमात्मा की है। तत्व आत्मा है , उसकी समझ परमात्मा से व्यक्ति को एकीकृत करती है, लेकिन यह धुनि रमाने और संसार छोड़कर भागने से नहीं होती बल्कि इसी समाज में रहकर बताई गई विधि से कर्म करने से होती है।
      गीता की सम्पूर्ण समझ के लिए ये अनिवार्य है कि हम श्रीकृष्ण के द्वारा दूसरे-तीसरे अध्याय में दिए गए शिक्षा को हमेशा न सिर्फ याद रखें बल्कि उसका अपने व्यवहार में पालन भी करें।
॥10॥
अवतार की समझ और मोक्ष की प्राप्ति कोई काल्पनिक वस्तु नहीं होती, बल्कि एक व्यवहारिक ज्ञान है जिसकी समझ पाकर व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। श्रीकृष्ण जब अर्जुन को योग की शिक्षा दे रहें हैं तो उसे यह भी बताते हैं कि ये ज्ञान पहली बार उजागर नहीं हो रहा है बल्कि यह तो सृष्टि के प्रारम्भ से ही व्यक्ति और समाज का दिशा निर्देशन करता रहा है। अब पुनः बताते हैं कि इस योग ज्ञान से बहुतों ने अंतिम लक्ष्य यानी ईश्वर को प्राप्त किया है। तब स्वाभाविक रूप से ये जिज्ञासा होती है कि ऐसे लोग कौन थे। आप द्वितीय अध्याय में  श्रीकृष्ण द्वारा बताए गए सिद्ध पुरुष की विशेषताओं को स्मरण करेंगे तो बातें साफ हो जाएंगी। योगमार्ग पर चलने की पहली शर्त है कि व्यक्ति राग से यानी लगाव(ATTACHMENT) से मुक्त हो क्योंकि इसी वजह से व्यक्ति के अंदर भय और क्रोध का जन्म होता है। राग है तो उसके साथ भय भी है और क्रोध भी है जो व्यक्ति के विवेक को समाप्त कर देता है।
जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है। और उसके खोने की कल्पना भी बराबर साथ लगी रहती है जिससे भय भी बराबर लगा होता है।
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
जब व्यक्ती इस अत्यधिक लगाव की भावना से मुक्त होता है तो वह भय और क्रोध से भी मुक्त होता है। सो भय और क्रोध से बचने का मार्ग ये है कि सबसे पहले लगाव से बचे। और ये तभी सम्भव होता है जब व्यक्ति की प्राथमिकता स्व से आत्मसाक्षात्कार होती है। ध्यान रहे आत्मसाक्षात्कार का मार्ग पलायन का मार्ग कदापि नहीं है। ऐसा प्रचार अज्ञानी ही करते हैं जो ईश्वर की खोज पहाड़ों और गुफाओं में करते हैं। एकांत कल्याण का मार्ग नहीं होता बल्कि वही पलायन का मार्ग है। द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण कर्म करने की महत्ता को विस्तार से समझा चुके हैं। और ये भी बता चुके हैं कि योग का मार्ग तभी मिलता है जब लगाव से मुक्ति मिल जाती है। तब व्यक्ति निष्काम कर्म के रास्ते चलकर जिस अवस्था में परिणाम की चिंता से मुक्त होकर कर्म करने लगता है तब उस ज्ञान की समझ से परिपूर्ण होता है जिससे उसे सेल्फ यानी अपनी आत्मा की उपस्थिति का भान होता है। यही वह स्थिति है जब व्यक्ति के लिए ईश्वर कोई कौतूहल न होकर उसके इष्ट ,मित्र, मार्गदर्शक हो जाते हैं और उस व्यक्ति के लिए कण कण में दिखने लगते हैं। तब वह व्यक्ति सभी में अपना गई रूप देखता है और सभी को खुद में देखता है।
        इस अवस्था को कर्म के रास्ते प्राप्त ज्ञान से होता है। ज्ञान की साधना कर्म में निहित होती है। इस मार्ग के क्रमिक  पड़ाव होते हैं-

इस मार्ग से चलकर ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान से विषय की समझदारी आती है। जो कुछ हम सुनते हैं, अनुभव करते हैं , यदि उसपर मनन चिंतन करते हैं तो उस विषय की समझदारी भी आती है। तब हम उसको व्यवहार रूप में लाने का अभ्यास करते हैं तो उसे आत्मसात कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में शंकाएँ दूर हो जाती हैं।  यही अवस्था होती है जब व्यक्ति आत्मसाक्षात्कर कर लेता है। तब व्यक्ति कर्तापन के बोझ से मुक्त होकर कर्म करता है। यही मोक्ष की स्थिति होती है। और महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ये स्थिति सभी को नहीं मिल जाती। इसके लिए व्यक्ति को अपना पूर्वाग्रह त्याग कर अहंकार रहित होना होता है क्योंकि तभी वह इसके पात्र हो पाता है। श्रीकृष्ण के शरणागत होने का तात्पर्य यही है कि यदि आप उपरोक्त स्थिति को पाना चाहते हैं तो पहले उस स्थिति की  श्रेष्ठता को मानना होगा। यदि आपके मन में इस अवस्था के प्रति थोड़ा भी शक संदेह है तो फिर आप उस मार्ग पर पूरे मनोयोग से चलेंगे ही नहीं और जब चलेंगे नहीं तो पहुँचेगे भला कैसे।
॥11॥
तब श्रीकृष्ण बताते हैं कि व्यक्ति की जैसी श्रद्धा होती है प्राप्ति भी वैसी ही होती है। हम जिस भाव , जिस इक्षा को लेकर साधना में लगते हैं हमें वही प्राप्त होता है। हम इसे दो तरह से समझ सकते हैं। पहला ये कि हम जिस श्रद्धा से ईश्वर के समीप जाते हैं ईश्वर वही हमें देता है। यदि हम ईश्वर की शरण में कष्ट दूर करने की इक्षा से जाते हैं, धन आदि के लिए जाते हैं, ज्ञान प्राप्ति के लिए जाते हैं अथवा मोक्ष की इक्षा से जाते हैं तो हमें वही प्राप्त होता है और यह प्राप्ति उचित समय पर होती ही है। दूसरी समझ यह बताती है कि हम जैसी श्रद्धा रखते हैं वही हमें प्रसाद रूप में प्राप्त होती है। अर्थात हमारे कर्म जैसे होते हैं परिणाम भी वैसा ही होता है। ईश्वर हमारे मार्गदर्शक बनकर हमें अपनी मंजिल तक पहूँचा देते हैं। अब यह हमपर निर्भर करता है कि हम अपना कल्याण किस मार्ग में चुनते हैं, हम अपना उत्थान चाहते हैं या पतन।
॥12॥
अब तक हम देखते आये हैं कि श्रीकृष्ण इस ज्ञान की शिक्षा देते रहें हैं कि कर्मों के फल में बिना आसक्त हुए कर्म करने चाहिए ताकि व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति हो। मोक्ष का अर्थ है व्यक्ति खुद की वस्त्विकता को पहचान पाये, अपनी आत्मा को समझ पाए, और इस प्रकार अपने परम् लक्ष्य को प्राप्त कर पाए। लेकिन उस समय क्या होता है जब व्यक्ति कर्म फल की इक्षा से कर्म करता है? श्रीकृष्ण पहले ही बता आये हैं कि इससे व्यक्ति कर्मबन्धन में बँधता चला जाता है। प्रत्येक फल एक नए कर्म की इक्षा को जन्म देता है और फलों का अनुरागी उन्हें ही पूरा करने में लगा होता है। यह तब भी होता है जब व्यक्ति के फल लोक कल्याणकारी हों। इस तरह के फलों की इक्षा रखने वाले क्या करते हैं? वे समग्र रूप से उत्थान की तो नहीं सोच पाते लेकिन हाँ वे उन दैवी गुणों का आह्वान करते हैं जिनसे उनकी मनोकामना पूरी होती है। जो इन दैवी गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं वे ही उन गुणों के देवता/देवी होते हैं। ऐसे आँशिक भाव से किये गए कर्म योग मार्ग के यज्ञ कर्म नहीं होते हैं लेकिन दैवी गुणों की वृद्धि भी व्यक्ति के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है। सो ये प्रयास भी सर्वथा मिथ्या नहीं है क्योंकि यदि व्यक्ति को यँहा से सही मार्ग सूझ गया तो वह आगे निष्काम कर्म के मार्ग पर बढ़ सकता है।
॥13॥
अर्जुन के विषाद को दूर करने के क्रम में श्रीकृष्ण अर्जुन को जिस योग मार्ग की शिक्षा दे रहें हैं वह कर्म यानी ACTION पर निर्भर करता है और उसका केंद्रीय भाव धर्म है यानी वह भावना है जिससे व्यक्ति और समाज दोनों का उत्थान होता है। इस मार्ग की विशेषता है कि कोई चाहे कितना भी नीच प्रवृत्ति का क्यों न हो यदि वह इस मार्ग को अपनाता है तो धीरे धीरे उसका उत्थान सम्भव हो जाता है और वह नीच से उच्च कोटि में परिवर्तित हो जाता है। लेकिन यह होता कैसे है? यह सम्भव होता है व्यक्ति के उस प्रयास से जिससे वह अपने गुणों को परिमार्जित करता है और उत्तरोत्तर विकसित होते गुणों के अनुसार अपना कर्म करता है, जिसके अंत में उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस यात्रा को प्रारम्भ करने के पूर्व हम ये समझें कि हमारे तात्कालिक गुण कौन से हैं जिनका हमें उत्थान करना है। कर्मयोग के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण बता आये हैं कि इसकी यात्रा स्वधर्म के अनुसार कर्म करने की शुरुआत से होती है और इसमें दूसरे के कर्म के नकल की कोई गुंजाइश नहीं होती है। अर्थात हमें शुरुआत में ही अपने स्वभाव से उत्पन्न गुण और कर्म को समझ कर कर्म करना होता है न कि दूसरे के नकल से। अब प्रश्न उठता है कि हम ये कैसे पहचानें कि हमारा स्वधर्म क्या है? इसे समझने के लिए हमें ये मौलिक बात समझनी होगी कि हमारा धर्म हमारे गुणों से निर्धारित होता है और हमारे कर्म हमारे गुणों के अनुसार ही होते हैं। सो यदि हमें गुणों की समझ है और उन गुणों से होने वाले कर्मों की समझ है तो हम अपने स्वधर्म का आकलन करने में सक्षम होते हैं। सो पहला कदम है कि हम समझे कि ये गुण कौन से हैं और तब ये समझें कि ये गुण कौन सा कर्म निर्धारित करते हैं।
     हमने देखा है कि गुणों का एक वर्गीकरण आसुरी और दैवी गुणों में होता है जिसकी चर्चा हम पहले किये हैं। सुविधा के लिए पुनः स्पष्ट कर रहें हैं कि कौन से कर्म आसुरी हैं और कौन से कर्म दैवी हैं।
दैवी गुण

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अभयता

अन्तःकरण की शुद्धता

ध्यान में लग्न

सर्वस्व का समर्पण

इन्द्रियों पर नियंत्रण

अहिंसा

सत्य

क्रोध का न होना

कर्मफल का त्याग

चित्त की चंचलता का अभाव

सभी के प्रति दयाभाव

अनासक्ति

कोमलता

लक्ष्य के प्रति समर्पण

व्यर्थ की चेष्टा का अभाव

क्षमा

तेज

शत्रुभाव का अभाव

लालच का अभाव

पूजे जाने की भावना का अभाव

मान अपमान के भाव का अभाव


आसुरी गुण

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पाखण्ड

घमण्ड

अभिमान

क्रोध

कठोर वाणी

अज्ञानता

दम्भ

मान अपमान की चिंता

मद

कर्मफल में आसक्ति

इन्द्रियों में आसक्ति

निंदा

अहंकार

कामना

लोभ

मोह



अब देखते हैं कि प्रकृति से उत्पन्न गुणों को तीन भागों में बाँटते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। उपरोक्त आसुरी और दैवी गुण भी इन तीन वर्गों में समाहित होते हैं। अब एक एक कर हम इन तीन गुणों को देखते हैं कि आखिर ये क्या हैं।
सत्वगुण-
ज्ञान, विवेक, प्रसन्नता, शांति, विश्वास, सत्य, अहिंसा, इत्यादि।
रजोगुण-
कामना, इक्षा, घमंड, ईर्ष्या, क्रोध, भय, प्रेरणा इत्यादि।
तमोगुण-
आलस, अवसाद, उदासी,अविवेक, प्रेरणा का अभाव इत्यादि।
अब हम देखते हैं कि इन गुणों से किस प्रकार के कर्म होते हैं।
तमोगुण
इसकी उपस्थिति से व्यक्ति को कोई कर्म करने की इक्षा नहीं होती, वह बस निष्क्रिय पड़ा रहना चाहता है। वह खुद कुछ नहीं करना चाहता है। ध्यान रहे निष्क्रियता और निष्काम दो विपरीत भाव हैं, इनको पर्यावाची समझने की भूल की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
रजोगुण
सक्रियता आती है, लक्ष्य की तरफ बढ़ने की लालसा होती है।
सत्वगुण
समझ का विकास होता है, विवेक जागृत होता है।
उपरोक्त तीन विभाजन एयर टाइट कम्पार्टमेंट नहीं होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में एक साथ तीन अवस्थाएँ होती हैं।
एक कि सभी में ये तीनों गुण होते हैं, दुसरे कि इनकी अनुपातिक मात्रा से व्यक्ति का स्वभाव निर्धारित होता है और तीसरे कि एक ही व्यक्ति में अलग अलग समय में अलग अलग गुणों की अलग अलग मात्रा कार्य करती है।
   एक व्यक्ति में तीनों गुणों की आनुपातिक मात्रा के अनुसार ही उस व्यक्ति का प्रकार निर्धारित करती है जिसके अनुसार उसका वर्ण निर्धारित होता है। सनद रहे कि प्रत्येक युग की अपनी भाषा होती है और प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक रचना की भी अपनी भाषा होती है जिसे उसी परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है। शब्द वर्ण की जो विशेषता पौराणिक पुस्तकों में है हमें उसी रूप में समझा जा सकता है, यदि आज की शब्दावली में उसकी व्याख्या करेंगे तो निश्चित ही दिग्भ्रमित हो जाएंगे। गुणों और कर्मों के अनुसार चार प्रकार के व्यक्ति होते हैं।
ब्राह्मण
जब व्यक्ति में सत्वगुण की मात्रा सबसे अधिक हो उसे ब्राह्मण कहते हैं। यह व्यक्ति ज्ञान, विवेक, उच्च मूल्य, क्षमा , सत्य आदि के प्रति आग्रही होता है।
क्षत्रिय
जब व्यक्ति में रजोगुण की मात्रा सबसे अधिक हो और कुछ हद तक सात्विक गुण भी हो तो उसे क्षत्रिय कहते हैं। यह व्यक्ति कामना पूर्ति में सक्रिय रहता है लेकिन साथ ही इसमें अच्छाई की तरफ , ज्ञान और विवेक की तरफ झुकाव भी अधिक होता है, सेवा और त्याग की भी भावना होती है। इस व्यक्ति के कर्म में साहस, निडरता, समर्पण, समस्याओं से लड़ने की प्रवृत्ति, धैर्य, सजगता, स्वामीपन का भाव, दानशीलता आदि के भाव होते हैं।
वैश्य
जब व्यक्ति में रजोगुण की प्रधानता हो और कुछ हद तक तामसी गुण भी प्रभावी हो तो उसे वैश्य कहते हैं। ये वर्ग धन का उत्पादक और उसका संरक्षक होता है तथा धन को समाज में बढ़ाने और circulate करने वाला होता है। 
शुद्र
जब व्यक्ति में तमोगुण की प्रधानता हो और शेष दो गुणों का लगभग अभाव हो तो उसे शुद्र कहते हैं। यह वर्ग स्वयम तो कोई पहल नहीं करता है लेकिन आदेश/निर्देश प्राप्त होने पर कार्य कर देता है। उसे स्वप्रेरणा तो नहीं होती लेकिन प्रेरणा दिए जाने पर वह परिणाम देता है।
         प्रत्येक व्यक्ति में इनमें से कोई एक प्रवृत्ति प्रमुख रूप से होती ही है । साथ ही साथ प्रत्येक व्यक्ति में ये चारों प्रवृत्तियाँ भी होती हैं जो अलग अलग समय पर प्रमुखता से उजागर होती हैं। व्यक्ति के समग्र विकास के लिए इन चारों की उपयोगिता अलग अलग समय पर है। यदि कोई एक नहीं है तो उसका विकास सम्भव नहीं हो पाता। ध्यान रहे ये चारों वर्ग व्यक्ति की प्रकृति से उत्पन्न गुणों के अनुसार हैं और उन गुणों के अनुसार किये जाने वाले कर्मों से हैं। जिनका कोई भी सम्बन्ध उसकी विविकोपार्जन हेतु किये  जाने वाले व्यवसाय या कामों से कदापि नहीं है। किसी भी व्यवसाय के व्यक्ति में इन चारों में से कोई एक प्रमुखता से हो सकता है।
साथ ही इस विशेषता का कोई सम्बन्ध जन्म की परंपरा और कुल से नहीं है। इस बात को हमारे पौराणिक ग्रन्थ से लेकर आधुनिकतम प्रमाण तक बताते हैं। प्रह्लाद असुर कुल का होकर भी ब्राह्मण के आचरण वाला था और विभीषण , रावण और कुम्भकर्ण आपस में भाई होकर भी अलग अलग थे। वर्तमान में तो हम रोज ऐसे उदाहरणों से दो चार होते रहते हैं।
    अब यदि हम इन तीन गुणों और इनपर आधारित चार प्रकार के कर्मों को समझ पाते हैं तो हम ये तय कर पाने की स्थिति में होते हैं कि हम स्वयं किस कोटि में आते हैं और कर्मयोग की हमारी यात्रा वंही से प्रारम्भ होनी चाहिए। दैवी गुणों के उत्तरोत्तर वृद्धि की प्रक्रिया से गुजरते हुए कोई भी व्यक्ति शुद्र स्वभाव से वैश्य, वैश्य से क्षत्रिय और क्षत्रिय से ब्राह्मण स्वभाव के व्यक्ति में बदलता है। जब दैवी गुणों का अभाव होता है तो हम शुद्र होते हैं। अपने से श्रेष्ठ जनों की सेवा कर जब हम दैवी गुणों को प्राप्त करने लगते हैं तो हम वैश्य श्रेणी में आते हैं। लेकिन हमारे आसुरी गुण तब भी बने रहते हैं। इसके पश्चात हमारे आसुरी और दैवी गुणों में संघर्ष होता है जो क्षत्रिय की श्रेणी की होती है। इस स्थिति में हम आसुरी गुणों को पराजय करने की स्थिति में होते हैं। जब दैवी गुण ही प्रमुखता से रह जाते हैं तो हम ब्राह्मण श्रेणी में आ जाते हैं। सनद रहे कि ब्राह्मणत्व का प्रसार तभी होता है जब हमारे अंदर क्षत्रित्व हो । लेकिन इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमारे अंदर वैश्य की धनोत्पादकता भी होनी चाहिए क्योंकि बिना संसाधनों का  कोई भी विकास असम्भव है। लेकिन यदि हम में शुद्र के गुण नहीं हैं तो फिर हम इन तीन गुणों के रहते हुए भी अन्य लोगों की सेवा में खुद को समर्पित नहीं कर सकते और अहंकार भाव से पतनशील होते जाएंगे।
इस प्रकार यदि हम अपने स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार निष्काम भाव से समर्पण के साथ कर्मयोग के रास्ते चलते हैं तो चौथे पायदान पर ज्ञान प्राप्ति के पश्चात हम अपने सेल्फ यानी आत्मा से स्वयम साक्षात्कार कर पाते हैं जो हमारे मोक्ष का परिचायक है। 
    और ये सारी प्रक्रिया ईश्वर की देन है। विदित रहे कि समस्त संसार ही ईश्वर का स्वरूप है । तब स्वाभाविक रूप से ये गुण, कर्म, वर्ण भी ईश्वर की ही रचना हैं क्योंकि ये सभी भी इसी संसार में हैं।
     इतना होने पर भी ईश्वर खुद में कर्तापन का भाव नहीं रखते। श्रीकृष्ण की शिक्षा के अनुसार ईश्वर प्रकृति से परे है। और ये सब प्रकृति के गुणों की उपज हैं। सो ईश्वर कर्ता हो कर भी अकर्ता है। वह करता तो सब है लेकिन उसमें करने का अहम नहीं है सो वह अकर्ता ही है।
॥14॥
कर्मयोग के रास्ते कर्म करने की विधि बताते हुए श्रीकृष्ण उन दो उपायों को बताते हैं जिनको करने से व्यक्ति कर्मों के बन्धन में नहीं बंधता, पहला कि जब आप कर्म करें तो आपको उन कर्मों के फल से स्वयम को मुक्त रखना चाहिए, न कि फल की इक्षा से कोई कर्म करना चाहिए। यदि इक्षा रखकर कर्म करते हैं तो फिर उस इक्षा की पूर्ति के पश्चात फिर नई इक्षा का जन्म होता है और आप इस तरह कर्मों के जाल में उलझ जाते हैं। दूसरी बात कि जब कर्म फल में आप कोई आशा निराशा नहीं रखते तो फिर आप इस भाव से भी मुक्त होते हैं कि आप कर्म कर रहें हैं, बल्कि आप ये समझते हैं कि आप जो भी कर्म कर रहें हैं वो मात्र आपके स्वधर्म से निर्धारित कर्म हैं और आप किसी फल की इक्षा से कर्म नहीं कर रहें हैं। सो आपमें कर्ता होने का अभिमान भी नहीं होता।  
        जब ये दोनों भाव एक साथ होते हैं तब आप कर्म करते हुए उस ज्ञान को प्राप्त करते हैं जिनसे सत, चित्त, आनंद से परिपूर्ण अपनी आत्मा से आपका साक्षात्कार सम्भव हो पाता है और वही परमेश्वर की प्राप्ति कहलाता है।
॥15॥
अब तक दी गई शिक्षा का मूल बल कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण करना है। जिस समय श्रीकृष्ण अर्जुन से ये वार्तालाप कर रहें हैं , श्रीकृष्ण के अनुसार ही उसके भीत पहले से वे लोग जिनको मोक्ष की इक्षा रही है वे भी इसी मार्ग का अनुसरण कर कर्म करते रहे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ही अर्जुन को समझाते हैं कि ये कोई नूतन ज्ञान नहीं है बल्कि बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है लेकिन साथ ही ये भी जोड़ देते हैं कि इसका पालन वही करते हैं जिनको मोक्ष की इक्षा हो। अन्य नहीं। इसी मार्ग से व्यक्ति को अपने सेल्फ की पहचान होती है और उसे ज्ञात होता है कि वह भी वही है जो अन्य हैं, जो परमेश्वर है। हम सभी एक दूसरे का विस्तार हैं और हमारे सेल्फ का सर्वव्यपी विस्तार ही परमेश्वर है जिसके हम अंश हैं।
इस अध्याय के प्रारम्भ में ही ये बात आई है कि कर्मयोग के मार्ग का ज्ञान तो ईश्वर ने सृष्टि के शुरुआत में ही दिया था जिसे वे यँहा पुनः दुहरा रहें हैं ताकि मानव मात्र की स्मृति में ये ज्ञान पुनः आ सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 16
॥16।।
द्वितीय अध्याय से अभी तक हमने श्रीमद्भागवद्गीता में बार बार कर्मयोग के बारे में जाना है और ये भी जाना है कि इसे करने की विधि क्या है। कई स्थानों पर श्रीकृष्ण ने बड़े ही सरल तरीके से कर्म करने के तरीके को समझाया है और यह भी बताया है कि हम किस भाव से कर्म करेंगे तो परम् ज्ञान यानी मोक्ष की प्राप्ति होगी। एक बार पुनः श्रीकृष्ण सचेत करते हैं कि हमें कर्म और अकर्म को ठीक से समझना चाहिए क्योंकि हम जो करने जा रहें हैं उनके बारे में हमारी जानकारी भी पूरी होनी चाहिए अन्यथा हम जो करना चाहते हैं उसके विपरीत कर बैठेंगे। इसी कर्म की समझ से हम उस कर्मयोग के रास्ते चल पाएंगे जिससे होकर चलने से हमारे अंदर कर्मों के बन्धन का मोह समाप्त हो पाता है। इस समझने की प्रक्रिया में सावधानी की  जरुरत होती है क्योंकि कई बार जो खुद को ज्ञानी मानते हैं वे भी नहीं समझ पाते हैं कि वे जो कर रहें हैं वो वास्तव में कर्मयोग के अनुसार कर्म है भी अथवा नहीं।
॥17॥
हमने अभी अभी देखा -समझा है कि व्यक्ति का जीवन उसके द्वारा किये जा रहे कर्मों से ही निर्धारित होता है सो ये आवश्यक है कि हम सभी कर्मों को भली भाँति समझें ताकि हम समझ सकें कि हमें कौन सा कर्म करना है, और कौन नहीं और उन्हें कैसे करना है। इस सम्बंध में श्रीकृष्ण तीन तरह के कर्मों की चर्चा करते हैं
1.कर्म
2.अकर्म
3.विकर्म
हम यथा स्थान इनकी चर्चा भी सुनेंगे-समझेंगे।
।।18।।
श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण ने हर जगह कर्म करने के तरीके पर काफी बल दिया है और बारम्बार समझाया है कि हमें कर्म कैसे करने हैं। संसार के हर चर अचर की स्थिति कर्म पर ही निर्भर करती है। समस्त संसार ही कर्मों का परिणाम है। संसार की प्रत्येक गतिविधि बिना अपवाद के कर्मों के कारण ही है। सो कर्मों के सम्बंध में हम सभी को बहुत स्पष्ट होना चाहिए । इसी लिए श्रीकृष्ण बारम्बार अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझते रह रहे हैं कि कर्मयोग में किस आचरण का अनुसरण करना है। 
     कर्मयोग की मजबूत नीव द्वितीय अध्याय में डालते हुए श्रीकृष्ण कर्म करने की विधि को बहुत स्पष्ट कर दिए हैं। उस विधि में हम देखते हैं कि सबसे अधिक महत्व निष्काम भावना पर दी गई है अर्थात कर्म के परिणाम से स्वयम को अलग रखते हुए कर्म करने की शिक्षा दी गई है। इसी भाव से ज्ञान की प्राप्ति भी होती है और कर्म करने के बावजूद कर्तापन का भाव भी आता है जब व्यक्ति कर्म करते हुए भी इस बात के बन्धन में नहीं पड़ता कि चुँकि कर्म का कर्ता वो है सो परिणाम का हर्ष या विषाद भी उसी का है। जब कर्म करने की भावना निष्काम होती है तो कर्म कर के भी व्यक्ति नैष्कर्म्य की स्थिति में होता है, कर्म करके भी कर्ता भाव से मुक्त होता है और कर्म करके भी अकर्म ही करता है। जब कर्म स्वधर्म की स्थिति में परिणाम के बन्धन से मुक्त होकर किया जाता है तो व्यक्ति कर्तव्य भाव से कर्म करता है और इस प्रकार उसके कर्म ही अकर्म हो जाते हैं और कुछ नहीं कर के भी यह अकर्म उस नियत कर्म को करता है जिसे यज्ञ के रूप में श्रीकृष्ण पहले भी समझा चुके हैं।
चौथे अध्याय में आगे बढ़ने के पूर्व द्वितीय अध्याय के उस अंश को देखना जरूरी है जिसमें श्रीकृष्ण ने उस व्यक्ति की विशेषताओं को रेखांकित किया है जिसने कर्मयोग के मार्ग पर चलने की पूर्ण योग्यता हासिल कर ली है।
श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय 2 श्लोक 54 से 61

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स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण

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 स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा 


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54


 अर्जुन उवाच

 स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।

 स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥


अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।54।।


श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं---

1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं?

2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।

          स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वो है जिसका ज्ञान स्थिर है अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अंतिम सत्य प्राप्त हो चुका है।  हम सब जानते हैं कि हमारा ज्ञान निरन्तर परिष्कृत होता है। इस संसार के विषय में हम जितना पहले जानते थे उससे अधिक आज जानते हैं , और भविष्य में आज से भी अधिक जानेंगे। संसार नित्य परिवर्तनशील है सो इससे सम्बन्धित हमारा ज्ञान भी परिवर्तनशील होता है। वैज्ञानिक ज्ञान भी जिसके माध्यम से हम संसार की गतिविधि को समझते हैं वो निरन्तर परिष्कृत होते रहता है।  इस ज्ञान का कोई और छोर नहीं है, इसका कोई अंत नहीं। हम जितना जानते हैं उससे कई गुणा नहीं जानते हैं जिसे जानने के लिए हम नियमित अग्रसर रहते हैं। न तो प्रकृति में होने वाले परिवर्तन रुकेंगे, न ही हमारा प्रकृति का ज्ञान। सो भौतिक संसार का ज्ञान प्राप्त कर कोई भी अंतिम रूप से ज्ञानी नहीं हो सकता, सो ऐसे व्यक्ति का कोई अंतिम ज्ञानी हो ही नहीं सकता । अतएव इस तरह के व्यक्ति के सम्बंध में अर्जुन  का  कोई प्रश्न नहीं हो सकता है। 

      तो फिर कौन व्यक्ति स्तित्प्रज्ञ कौन है? स्तित्प्रज्ञ वो है जिसे अपरिवर्तनीय का ज्ञान प्राप्त है। अपरिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील, अक्षय, अविकारी हमारा सेल्फ है, हमारा स्व है, हमारी आत्मा है और जो अपने सेल्फ को जानता है वही स्थितप्रज्ञ है। यदि हम खुद को परिभाषित करते हैं तो हम खुद की वर्तमान स्थिति बताते हैं। ये स्थिति बदलती रहती है। लेकिन जो व्यक्ति नियत रास्ते पर चलकर , जो कर्मयोग का रास्ता है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा के अस्तित्व को पहचान लेता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्जुन इसी व्यक्ति की रहनी को समझना चाहता है।

     जो व्यक्ति उपरोक्त ढंग से स्थितप्रज्ञ है वो निश्चित ही समाधिस्थ है। समाधि में अवस्थिति का क्या अर्थ है? जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग समझा रहे होते हैं तो बताताते हैं कि कर्मयोगी विरागरत होता है। यही विराग समाधि की अवस्था होती है। समाधि की अवस्था ध्यान केंद्रित करने की अवस्था से भिन्न है। ध्यान केंद्रित करना एक मानसिक अवस्था होती है जिसमें हमारा ध्यान किसी एक चीज पर केंद्रित होता है, उसके अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर नहीं। लेकिन इस अवस्था में व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से भी विरागरत होता हो कोई आवश्यक नहीं, सो ध्यान की यह क्रिया जिसमें वैराग्य का भाव ही नहीं हो एक तन्द्रा मात्र है जिसके टूटते व्यक्ति फिर से उसी परिवर्तनशील संसार के मोहजाल, उसी परिणाम की दुनिया में लौट जाता है। लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से कर्म करते करते परिणाम के प्रभाव से मुक्त होकर वैराग्य की अवस्था में आता है तब उसको ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ता बल्कि वो तो सोते जागते अपने ही आत्मा में , अपने ही सेल्फ में रहता है। यही समाधि की स्थिति है। समाधि की स्थिति भभूत लगागकर, दाढ़ी मूँछ बढाकर, जटा लटकाकर, विचित्र भेष भूषा धारण कर नहीं मिलता  है।

      इस प्रकार जो स्थितप्रज्ञ है वो समाधिस्थ भी है हीं। यदि हम भी अपने सेल्फ को समझना जानना चाहते हैं तो ये आवश्यक है कि हम इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षणों को जाने समझें और आत्मसात करें। सो अर्जुन इस तरह के व्यक्ति के लक्षणों को जानने की इक्षा व्यक्त करता है।

    अर्जुन जानना चाहता है कि इस प्रकार का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता, बैठता और चलता है अर्थात वह जानना चाहता है कि इस प्रकार के व्यक्ति की रहनी कैसी होती है, उसका सामाजिक समव्यव्हार कैसा होता है। अर्थात यह व्यक्ति अपना सामाजिक जीवन कैसे व्यतीत करता है, अपने वातावरण से उसका सामाजिक लेन देन किस तरह से होता है।  

        यदि कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य तक पहुँचना चाहे तो दो बातें अनिवार्य हैं

1. पहला तो उसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, उसे स्पष्ट होना चाहिए कि दरअसल वो चाहता क्या है।

2.दूसरे की उसका लक्ष्य ही उसकी प्रेरणा हो। जब लक्ष्य प्रेरणा में बदल जाता है तो लक्ष्य स्वपोषित हो जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति को किसी अन्य उत्प्रेरक या प्रेरणाश्रोत की आवश्यकता नही रह जाती है। वह स्वतः हो उस लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जाता है। गीताकार ने अर्जुन के माध्यम से हमें समझाया है कि हम किस तरह से अपने को अपने सेल्फ को खोजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी चीज को देखने का दो नजरिया होता है। एक कि हम खुद उसे कैसे देखते हैं। और दूसरा की अन्य लोग उस चीज को कैसे देखते हैं। जब हम स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों  को जानना चाहते हैं तो एक नजरिया तो यह है कि वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति खुद को कैसे और किस रूप में देख पाता है और दूसरे कि हम उसे किस तरह से समझ पाते हैं। 

     सवाल उठता है कि अर्जुन इस प्रकार का प्रश्न ही क्यों करता है। जब हम गहरे विषाद की अवस्था में होते हैं और यदि उस समय हमें कर्मयोग सदृश्य समझ दी जाती है तो सहज ही कई प्रश्न मन में उठने लगते हैं, यथा हमें कर्म न कर मात्र बुद्धि के ही शरण में क्यों नही रहना चाहिए, क्यों हम वैराग्य और सन्यास की बात करें, क्यों न हम भी सारे जंजाल को छोड़कर वैराग्य और समाधि का मार्ग पकड़ लें, आदि आदि। हम सब वैराग्य और समाधि के उन प्रचलित अर्थों से ही वाकिफ होते हैं जो समाज में बोल चाल की भाषा में प्रचलित हैं। हम श्रीकृष्ण की शब्दावली में इनका अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं। दृष्टि को साफ कर देने के लिए, समझ से भ्रांति को दूर करने के लिए ये जरूरी है कि हम जाने कि श्रीकृष्ण जिस अवस्था को प्राप्त करने की शिक्षा दे रहें हैं उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति क्या और कैसे कुछ भी करता धरता है।

    अर्जुन का प्रश्न हमारी समझ को झझकोरता है, उद्वेलित करता है, हमें प्रेरित करता है कि कर्मयोग का व्यवहारिक  ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात हम समझ सकें कि हमे किस तरह के व्यक्ति के रुप में विकसित होना चाहिए।


     

जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की बुद्धि को समझा देते हैं तो अर्जुन उस व्यक्ति की विशिष्टताओं को जानने की इक्षा व्यक्त करता है कि जो  कर्मयोग की बुद्धि से युक्त होता है। तब श्रीकृष्ण इस तरह के व्यक्ति के विशेषताओं को भी बताते हैं जो निम्न हैं-

   स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण



1.कामना का सर्वथा अभाव


2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि


3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,


4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित


5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण


6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति


इनको समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 55, 



श्रीभगवानुवाच


 प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।


 आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥



श्री भगवान्‌ बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है


 ॥55॥



         अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।


          पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--



1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।


2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।


3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।


4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।


5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 



उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--


1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।


      हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं


   क. अस्तित्व की रक्षा


   ख. सुरक्षा


   ग. ज्ञान की प्राप्ति


   घ. सुख और आनंद की प्राप्ति


जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।


    लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है। 


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 56


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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।


 वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥



दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है


 ॥56॥


2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।


     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।


 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।


    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।



3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 


   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 


    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।


    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।



2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।


     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।


 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।


    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।



3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 


   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 


    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।


    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57


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यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।


 नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥



जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है


 ॥57॥


4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।


यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से  हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।


     तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।


    स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58


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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।


 इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥



और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)


 ॥58॥


5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है।


और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चलाये बल्कि व्यक्ति के अनुसार इन्द्रियाँ व्यवहार करें। हमारी इन्द्रियाँ हमें वाह्य संसार की अनुभूति कराती हैं। यदि हमारी  इन्द्रियों का हमपर नियंत्रण होगा तो हमारी समस्त चेष्टाएँ भी वाह्य संसार की प्रतिक्रिया में ही रह जाएंगी। हम हमेशा अस्थिर बने रहेंगे। तब भला स्व की खोज क्या कर पाएँगे।


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59,60


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विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।


 रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥



इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है


 ॥59॥



यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।


 इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥



हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं


 ॥60॥



6. .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।


     इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है वो भी इन्द्रियों के प्रभाव से तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसे अपने सेल्फ की समझ नहीं हो जाती और उस काल में वह व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के साथ पूर्ण आसक्ति मुक्त हुआ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर सिर्फ नियंत्रण ही नहीं होता है बल्कि उससे आगे जाकर इन्द्रियों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।


    इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक  से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।


    लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।


      हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी  इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे।  श्रीकृष्ण  समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।


श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोकन 61


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तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।


 वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥



इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है


 ॥61॥



अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि


स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण



1.कामना का सर्वथा अभाव


2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि


3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,


4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित


5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण


6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति


7.अहंकार का अभाव


      उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।


        हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द  हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।


      अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी ।  इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।


      उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
।19।।
श्रीमद्भागवद्गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक संख्या 54 से 61 तक में श्रीकृष्ण ने उस व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन किया है जिसे स्थितप्रज्ञ अर्थात REALIZED MASTER कहा जाता है अर्थात जिसने सम्पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर लिया है। अब एक बार पुनः उसी व्यक्ति को यँहा पंडित कह कर सम्बोधित किया गया है और बताया गया है कि इस पंडित व्यक्ति की विशेषताएँ क्या हैं। दरअसल श्रीकृष्ण बार बार ये समझाने की चेष्टा कर रहें हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलकर हमें किस तरह के व्यक्ति के रूप में विकसित होने की कोशिश करनी है। सो हम पुनः समझें कि कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए हमें किस तरह से विकसित होने की जरूरत है और किस तरह के व्यक्ति बनने की आवश्यकता है। दरअसल हमारा लक्ष्य इसी तरह के व्यक्ति के रूप में विकसित होना है जिसे यँहा पण्डित कह कर सम्बोधित किया गया है। हम क्रम से इस पण्डित व्यक्ति की विशेषताओं को देखते हैं।
1. कामना और संकल्प का अभाव

 पहली विशेषता है कि इस तरह के व्यक्ति की कामनाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं। इस तरह का व्यक्ति सब कुछ करते हुए भी प्रकृति के गुणों और खुद की स्वार्थपरक इक्षाओं से उत्पन्न कामनाओं से मुक्त हुआ रहता है। वह सब कुछ करता है लेकिन उसके कर्म उसकी अपनी किसी भी कामना और इक्षा से संचालित नहीं होते बल्कि उसे जो ज्ञान प्राप्त है कि उसका सेल्फ क्या है उसी से वह संचालित होता है। ऐसा व्यक्ति कारण और प्रभाव के वश में आकर कर्म नहीं करता है। उसे तो अपनी वस्त्विकता की जानकारी हो चुकी होती है , उसे ज्ञात है कि उसकी वस्त्विकता प्रकृति से निर्धारित नहीं है, किसी भी बाहरी कारक से उसका सेल्फ प्रभावित नहीं होने वाला है, सो वह मन , बुद्धि और शरीर से सब करता हुआ भी उनसे बंध कर कुछ नहीं करता है क्योंकि उसकी अपनी कोई कामना ही नही है। सो उसके कर्म तो उसके ज्ञान रूपी अग्नि  से भस्म हो जाते हैं, उससे बन्ध कर नहीं रहते हैं। 
।।20।।
अब श्रीकृष्ण इस ज्ञानी यानी पंडित व्यक्ति की दूसरी विशेषता को बताते हैं।

2.परिणाम से मुक्ति और कर्तापन का अभाव।

      पहले श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय में बता चुके हैं कि ज्ञानी व्यक्ति जिसे उस अध्याय में स्थितप्रज्ञ कहा गया है और जिसे यँहा पंडित कहा जा रहा है वह कर्म तो करता है लेकिन कर्म के परिणाम से मुक्त होता है। अर्थात पण्डित वो है जो कर्म परिणाम की इक्षा से नहीं करता है बल्कि वह तो कर्म सिर्फ अपने स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण के भाव से करता है । परिणाम से नहीं बंधे रहने के कारण और स्वधर्म और समर्पण के भाव से कर्म करने के कारण उसे अपने  कर्म में ही सारे सुख मिल जाते हैं, उसे सुख के लिए परिणाम जैसे बाहरी श्रोत पर निर्भर नहीं होना पड़ता है । चुँकि परिणाम भविष्य में होता है और कर्म वर्तमान में होता है सो वह सदा ही कर्म में चिर सुख को प्राप्त करता रहता है, उसे परिणाम से न तो सुख मिलता है न दुख, न हर्ष होता है न विषाद। परिणाम से मुक्त होने के कारण वह परिणाम से लगाव भी नहीं रखता सो परिणाम न तो उसे मोह से बाँध पाते हैं न ही उसे सुख-दुख, राग-द्वेष, ही दे पाते हैं। अतएव वह उद्वेलित नहीं होता है और न  ही कर्मों के बन्धन में बँधता ही है। ऐसी स्थिति में वह जो कुछ करता है उसका वह मात्र द्रष्टा होता है, उसे कर्तापन का कोई बोध नहीं होता कि मैंने ये कर दिया तो ये हो गया। सो वह सब कर्म करता हुआ भी अकर्ता ही रहता है। 
   तो क्या ज्ञानी व्यक्ति को इस संसार के लिए, इस समाज के लिए कुछ नहीं करना होता है? ये एक अति स्वाभाविक सवाल है जो किसी के मन में उठ सकता है। जी नहीं। ऐसी बात नहीं है। परिणाम से मुक्ति का अर्थ ये नहीं कि तो कर्म से विरक्त होईये। दरअसल परिणाम से मुक्ति का अर्थ है कि कर्मों के परिणाम के मोह से आप नहीं बंधते बल्कि आप वो करते हैं जो आपको अपने स्वधर्म के अनुसार करना है। वह तो निश्चित ही करना है और सिर्फ करना ही नहीं है बल्कि पूर्ण समर्पण से करना है। और जो करना है वह आपके पसन्द के अनुसार नहीं है बल्कि वह सही होने के कारण है। यानी ऐसे कर्म आप करते हैं जो like से नहीं right होने के कारण किये जाने हैं और सही वही है जो आपके स्वधर्म के अनुसार है। यँहा निष्काम भाव से कौन से कर्म करना है तो आप एक बार तृतीय अध्याय के यज्ञ कर्मों का स्मरण करें।
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अब श्रीकृष्ण इस पण्डित व्यक्ति की तीसरी विशेषता बताते हैं। यह विशेषता उसके द्वारा अपने सेंसेज यानी इन्द्रियों पर नियंत्रण से उत्पन्न होती है।
3.इन्द्रियों पर नियंत्रण
पण्डित व्यक्ति को कोई आशा या अपेक्षा नहीं होती है किसी से भी, उसका मन और शरीर उसके सम्पूर्ण नियंत्रण में होता है, किसी भी चीज को धारण करने, उसके स्वामित्व का भाव उसमें नहीं होता है, और वह मात्र शरीर के निर्वाह के लिए ही कर्म करता दिखता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी तरह के पाप से मुक्त होता है।
         अब भला ऐसा कैसे हो सकता है। लेकिन ऐसा एकदम सम्भव होता है। जब हम अपने स्वधर्म के अनुसार, कर्मों के परिणाम को त्याग कर कर्म करने लगते हैं तो उस समय हमारी इन्द्रियाँ हमारे सम्पूर्ण वश में होती हैं। द्वितीय अध्याय में हमने देखा और समझा है कि इन्द्रियों को कैसे नियंत्रित किया जाता है। दरअसल हमारी सारी प्रतिक्रिया वाह्य संसार के प्रति ही होती है। और वाह्य संसार का बोध हमें अपनी इन्द्रियों के माध्यम से ही होता है। जब परिणाम के प्रति कोई मोह नहीं होता है और कर्मों को विवेक संचालित करते हैं तो कर्म मोह के बन्धन से नहीं बाँधे जाते हैं। जब मोह से, लगाव से मुक्ति होती है तो अपेक्षाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं और कर्मों में कोई मिलावट नहीं हो पाता। तब हम वही करते हैं जिनको करना सही है , न कि हम किसी अपेक्षा, आशा, स्पृहा, लगाव, लालच, भय, से कुछ करते हैं। ऐसी स्थिति में मन की उद्वेलना, उत्तेजना समाप्त हो जाती है। तो फिर पाप कर्मों के होने का प्रश्न ही नहीं उठता है।
    तो क्या व्यक्ति को संसार से विरक्त होकर सिर्फ अपने शरीर निर्वाह के लिए जीना चाहिए? ये प्रश्न मन में उठना लाजमी है। लेकिन अब तक श्रीकृष्ण बार बार समझा चुके हैं कि राग से विरक्ति संसार के कल्याण से विरक्ति नहीं होती है। आपको,  हमको, सबको अपनी इन्द्रियों के बहकावे पर नियंत्रण रखना होता है, और नियत यज्ञ कर्म करने होते हैं ताकि हम निरन्तर सत्य की तरफ बढ़ते हुए संसार के हित में कर्मरत रहें। यदि इस बीच हमारे अंदर अपने कर्मों के परिणाम के प्रति मोह जगा तो फिर हम उनके इक्षित फलों को प्राप्त करने के लिए सही मार्ग छोड़कर पसन्द की तरफ घूम जाएंगे। नतीजा में हम लक्ष्य से विचलित होकर तमाम तरह के अय्याशी, शत्रुता, दाव-पेंच के मार्ग पर चलकर सिर्फ और सिर्फ पाप कर्म यानी अवांछित कर्म ही करेंगे।
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अब श्रीकृष्ण पण्डित यानी ज्ञानी व्यक्ति की चौथी विशेषता बताते हैं।
4.समत्व का भाव

जब व्यक्ति स्वधर्म के अनुसार कर्म करता है, उसे परिणामों से लगाव नहीं होता है, जब उसे कर्म करने में ही आनंद की प्राप्ति होती है, जब उसकी इन्द्रियाँ और उसका शरीर उसके बुद्धि और विवेक के अधीन होती हैं तो वह व्यक्ति  राग -द्वेष, हर्ष-विषाद, सफलता-असफलता, सुख-दुख जैसे  द्वंद्वओं से भी मुक्त होता है। ऐसा व्यक्ति जीवन की हर प्राप्ति और अप्राप्ति से प्रसन्न और सुखी ही होता है और सो हमेशा संतुष्ट ही रहता है। जीवन उसके लिए प्रसाद की तरह ही होता है जिसका उपभोग वह पूरी श्रद्धा और प्रसन्नता के साथ करता है। ऐसी स्थिति में वह कर्म तो करता है लेकिन उन कर्मों से बँधता नहीं है।
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     इसके पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इस प्रकार के ज्ञानी व्यक्ति की पाँचवी विशेषता क्या होती है।
5.यज्ञकर्म का सम्पादन
अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि पंडित व्यक्ति को किसी चीज से लगाव यानी attachment नहीं होता है और उसका मन मस्तिष्क ज्ञान में अवस्थित होता है क्योंकि उसे अपने सेल्फ यानी स्व यानी अपनी आत्मा अर्थात अपने conciousness का भान होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन उसके कर्म यज्ञ ही होते हैं। यज्ञ का अर्थ अग्नि में जौ तिल का हवन नहीं होता है बल्कि यज्ञ का अर्थ तृतीय अध्याय में श्री कृष्ण समझा चुके हैं। ऐसे कर्म उस व्यक्ति द्वारा होकर भी उस व्यक्ति के लिए होते नहीं हैं। अर्थात वे कर्म होकर भी उस व्यक्ति पर जो कर्म करता है उसके ऊपर कोई छाप नहीं छोड़ पाते। वह करता भी है और कर के भी कुछ नहीं करता है। इस प्रकार इस संसार में जीवित रहकर भी पण्डित व्यक्ति कर्म कर के भी कुछ करता हुआ यानी कर्मों में बंधा हुआ नहीं रहता है। अध्याय 3 के श्लोक 9 से 18 तक यज्ञकर्म और उसे करने की विधि को श्रीकृष्ण विस्तार से समझा आये हैं । हम चाहें तो पुनः उन श्लोकों में दी गई शिक्षा का स्मरण कर सकते हैं। इस हेतु सुलभ प्रसंगवश उनका उनका उद्धरण पुनः किया जा रहा है।
श्रीमद्भभागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 9
अर्जुन को समझते हए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि बिना कर्म किये  कल्याण नहीं हो सकता, फिर बता चुके हैं कि हमें नियत कर्म करने होते हैं। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि नियत कर्म क्या है जिसको नहीं कर अन्य कर्म करने से कर्मों के बंधन में हम उलझ जाते हैं।
      जब कर्मों को करने के पीछे कामनाएँ होती हैं और कर्मफल के साथ आसक्ति होती है तो हम जो कर्म करते हैं उनसे बन्धें होते हैं क्योंकि तब हम कर्म के परिणामों के अनुसार ही आगे का आचरण करते हैं। कामनाओं के आधार पर किये गए कर्मों के कारण  निम्न में से कोई परिणाम प्राप्त होते हैं
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
 इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर  घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
     वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी  हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
          इस प्रकार कामनाओं के वश में होकर किये गए कर्म कर्मबन्धन में बाँधते हैं।  इसके विपरीत यदि हम परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं तो कर्मबन्धन में नहीं पड़ते।  यँहा श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यज्ञकर्म करें। यह यज्ञकर्म क्या है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में नहीं पड़ते। वस्तुतः कर्मयोग के बुद्धि के अनुसार जब हम कर्म करते हैं तो वही यज्ञ है जिसे द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया है। इस बुद्धि के अनुसार कर्म करने का दृष्टिकोण निम्नवत है जिसे हमने द्वितीय अध्याय में भी देखा है, लेकिन समग्र समझ के लिए इसे पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है
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अगर हमें कुछ प्राप्त करना होता है तो उसके निम्न चार  चरण हैं
1.उद्देश्य का निर्धारण और उसकी समझ
2.उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग की जानकारी
3.उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग पर चलना
4.मार्ग पर अंत तक चलकर उस उद्देश्य को प्राप्त करना।
ये चारों चरण क्रमिक हैं, किसी को लाँघ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध करने की तैयारी के साथ पहुँच कर दिग्भ्रमित और विषादयुक हो जाता है। उसे उद्देश्य का ज्ञान नहीं रहता है सो भटक जाता है। ऐसे में उसके अनुरोध पर श्रीकृष्ण उसकी रक्षा में आगे आते हैं, उसके भ्रम को समाप्त करने हेतु। अर्जुन की नजर में उसका उद्देश्य युद्ध है सो युद्ध की सम्भावित विभीषिका और परिणाम से वह व्यथित हो जाता है। तब श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं , ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान उक्त चार चरणों में है। क्रमिक है।
    सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके उद्देश्य से परिचित कराते हैं। उद्देश्य वही है जो सबका है, अर्थात आत्मसाक्षात्कार करना यानी अपनी आत्मा का बोध करना यानी सेल्फ को खोजना और उसे प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाना। युद्ध तो मात्र इस मार्ग के क्रम में घटित होने वाली घटना है जिसका निर्वहन अनिवार्य है ताकि क्रमिक रूप से आगे बढ़ा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नित्य नए नए अवसर आते रहते हैं जिनका उसे निर्वहन करना होता है, उनको छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आपको पढ़ना है, परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, कमाना है, आदि आदि। लेकिन ये सब आपके उद्देश्य नहीं हैं। आपका हमारा उद्देश्य है अपने स्व को पाना और उसे पाकर परमात्मा से मिल जाना। सर्वप्रथम इसी उद्देश्य को श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक परिभाषित करते हैं। यही साँख्य योग है। योग यानी खुद से जुड़ना। जब हम जन्म लेते हैं और धीरे धीरे बड़े होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर और बौद्धिकता का तो ज्ञान होता है लेकिन हम अपनी आत्मा से ,अपने स्व/सेल्फ से अनजान बने रहते हैं। जब हमें इसका भान होता है , जब हमें लगता है कि हमें ये पता नहीं कि हम वास्तव में कौन हैं तब हम अपने सेल्फ की खोज का उद्देश्य पाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यह पहली सीढ़ी है जिसपर हमें चढ़ना होता है। जीवन का लक्ष्य बड़ा पद, पैसा आदि ही होते तो हम उन्हें पाकर हमेशा सन्तुष्ट , प्रसन्न और सुखी होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है अर्थात ये सब जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, बीच की अवस्थाएँ हैं। अंतिम लक्ष्य तो स्व की प्राप्ति और उस प्राप्ति के साथ परमात्मा से मिलन है। अर्थात सत् की प्राप्ति हमारा उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के साथ जीवन के प्रति  हमारा भय समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण की यही शिक्षा सांख्ययोग है।
   द्वितीय चरण में श्रीकृष्ण उस मार्ग का ज्ञान देते हैं जिससे इस सत् की प्राप्ति होती है। ये मार्ग योग और कर्म का है। इसे श्रीकृष्ण कर्मयोग कहते है । लेकिन उसके पूर्व द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए। 
     तब हम तृतीय चरण में प्रवेश करते हैं यानी अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं जो कर्मयोग के मार्ग से चलती है।
  अंत में हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं । उद्देश्य की प्राप्ति के साथ ही मार्ग से मुक्त हो जाते हैं। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!
कर्मयोग का प्रारंभिक परिचय देने के पश्चात श्रीकृष्ण कर्मयोग के महत्व और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। हम आप देखते हैं कि जब हम सामान्य सांसारिक कार्यों को सामान्य सांसारिक दृष्टिकोण से करते हैं तो दो बातें होती हैं
1.ये कोई भी कार्य स्थाई नही  होता है। 
2.चूँकि कार्य करने का हमारा दृष्टिकोण भी सामान्य सांसारिक होता है हम कार्य के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं, जो निम्न प्रकार के हो सकते हैं
1. हो सकता है कि हम अपने कार्य में सफल हो तब हमें  प्रसन्नता होती है, हम सुख का अनुभव करते हैं।
2.हो सकता है कि हम असफल हो, तब दुखी होते हैं, विरह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं
3.हो सकता है कि हमें जो परिणाम मिले वो अपेक्षित ही न हो, सोचते कुछ हों और हो कुछ जाए जो हमारे मनोकुल भी हो सकता है या नहीं भी और उसी के अनुसार हम खुशी या दुख का भी अनुभव करते हैं
     इस प्रकार हम बराबर अपने कार्यों के परिणाम से प्रभावित होते रहते  हैं और उन परिणामों के अनुसार ही दुख सुख पाते रहते हैं। इस प्रकार हममें स्थायित्व नहीं रहता और दिन भर में कई बार हमारे मनोभाव बदलते रहते हैं। इतने अस्थिर चित्त से हम सत्य की खोज नहीं कर सकते और नहीं कर पाते। परिणाम के प्रति हमारा लगाव के कारण हम परिणाम के प्रभाव से हमेशा डरे रहते हैं। सफलता असफलता, लाभ हानि, जय पराजय के डर से हमारा जीवन इतना हलचल भरा होता है कि हमें हमेशा अपने तात्कालिक स्थान से गिरने का भय लगा रहता है। अब आप खुद के जीवन को देखें। हम आप बराबर इसी डर में रहते हैं और नतीजा में एकदम बेचैन हुए रहते हैं।
    अब समझने की कोशिश करें कि श्रीकृष्ण इस विषय में क्या कह रहे हैं। जब हम कर्तव्य के परिणाम के प्रति समत्व भाव यानी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम भाव से रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिणाम के प्रति हम निरपेक्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें तो पाते हैं यदि हम अपने कर्मों के परिणाम से अप्रभावित/निरपेक्ष होते हैं तो फिर हमपर इस बात का कोई असर नही। पड़ता कि हमारे कर्तव्य पालन का क्या परिणाम निकलता है। 
यँहा एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। परिणाम के प्रति समत्व का भाव यदि समझ में नहीं आता तो इस शिक्षा से आपको नकरारात्मता भी आ सकती है, हम निश्चिंत हो सकते है कि हमारा काम तो कर देना है बाकी भगवान जाने कि क्या फल देंगे। समत्व भाव का अर्थ ये कदापि नहीं है कि परिणाम के लिए हम ईश्वर पर निर्भर करें। श्रीमद्भागवत गीता में ही श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि भगवान न कुछ करते है न कुछ कराते हैं।  बल्कि ये हमारा प्रयास है और प्रयास के पीछे हमारी श्रद्धा है जो निर्धारित करती है कि परिणाम कैसा होगा।
समत्व भाव की शिक्षा का तात्पर्य ये है कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में परिणाम के प्रभाव में बह नही जाना चाहिए । अगर हम इन प्रभावों से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो असफलता की स्थिति में भी हतोत्साहित नहीं होते बल्कि इस बात पर ध्यान देते हैं कि कर्तव्य पालन में हम पूरी सावधानी बरतें ताकि कोई चूक न हो जाये। ऐसी स्थिति में हम पूरे सावधानी से कर्तव्य पालन करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इसमें बीज का नाश नही होता अर्थात  एक बार धुनि लग गई तो मन की भावनाएँ, इन्द्रियों के प्रयास संयमित हो जाते हैं , हम अस्थिर होकर भटकते नहीं बल्कि अपने लक्ष्य जो स्व की प्राप्ति है और जो कर्म करने से ही पाप्त होता है उसी में शांत चित्त लगे रहते हैं।
  सनद रहे कि श्रीकृष्ण ने कर्म को अभी तक परिभाषित नहीं किया है। कर्म को आगे के अध्याय में स्पष्ट करेंगे। अभी तो मात्र निष्काम कर्म करने में बरतने जाने वाली सावधानियों और कर्म की विशेषता पर ही वे चर्चा कर रहें हैं।
कर्मयोग की विशेषताओं को  बताते हुए श्रीकृष्ण आगे मनुष्य जीवन के लक्ष्य प्राप्ति के सम्बंध में समझाते हैं। हमारे जीवन के लक्ष्य क्या होने चाहिए , इसका निर्णय कैसे होता है। इसका निर्णय मनुष्य की बुद्धि से होता है। किंतु मनुष्य की बुद्धि हो तो कैसी हो जो उसके लक्ष्यों को निर्धारित  करें।
बुद्धि दो तरह की हो सकती है
1.एक ऐसी बुद्धि जो  एक लक्ष्य को सामने रखे, उसमें कोई विवाद न हो। जिसे साँख्य का ज्ञान है उसका लक्ष्य तो निर्धारित है। उसका लक्ष्य उसकी बुद्धि के अनुसार अपने आत्मबोध का परिचय प्राप्त करना होता है। 
2.दूसरी तरफ बुद्धि अस्थिर भी हो सकती है जिसमें लक्ष्यों की भरमार तो हो लेकिन जो आत्मपरिचय के लक्ष्य से दूर हो। यह बुद्धि उन्ही चीजों को लक्ष्य बनाती है जिसे हमारी इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं और चूँकि इन्द्रियों का अनुभव भिन्न भिन्न प्रकार का होता है लक्ष्य भी भिन्न भिन्न तरह के हो जाते हैं । नतीजा ये निकलता है कि इस तरह का मनुष्य बार बार भ्रमित होते रहता है, एक छोर से दूसरे छोर तक जीवन भर भागते रह जाता है। 
        अगर हमें स्थिर बुद्धि आत्मबोध के लक्ष्य के साथ चाहिए तो दृढ़ता से उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। इस तरह के ज्ञान प्राप्ति के लिए निम्न तरीके हैं---
1प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा, जो हमें इन्द्रियों के अनुभव से प्राप्त होते हैं,
2.किसी एक जानकारी से दूसरी जानकारी का निष्कर्ष निकाल कर,
3. अज्ञात की  तुलना ज्ञात से कर के,
4. परिणाम और उसके कारक को समझ कर
5. प्रमाणिक पुस्तक/शास्त्र एवम उसके शिक्षक से, तथा
6.किसी की अनुपस्थिति को जानकर।
     मनुष्य की बौद्धिकता प्रतिरोधात्मक होती है यानी वह नए ज्ञान को सहजता से नहीं स्वीकारती। इसी कारण जब लक्ष्यों की पोषक बुद्धि को एक निश्चयात्मक होने का निर्देश दिया जाता है तो वह प्रतिरोध के रूप में विवाद करती है, इन्द्रिय जनित सुख देने वाले लक्ष्यों से हटना नहीं चाहती।वह चाहता तो है सुख, शांति, अमरत्व, स्वतंत्रता लेकिन इसके लिए साधनों का उपयोग करना चाहता है उससे उसे ये सब मिल नहीं सकते।  इन साध्यों को प्राप्त करने के लिए हमारी बुद्धि का उधेश्य उस ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए जिसे पाकर हम परम् सत्य यानी आत्मबोध को प्राप्त कर सकें। 
आदमी का क्या लक्ष्य होना चहिये ये समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझते हैं कि जब इंसान के जीवन में परम् लक्ष्य न होकर कई भोग विलास से सम्बंधित लक्ष्यों को पालता है तो उसका क्या व्यवहार होता है। जब हमारी नजर सिर्फ सुख, सुविधा , धन संपत्ति, पर होती है तो फिर ऐसी स्थिति में हम सिर्फ इसी उपाय में लगे रहते हैं कि किस प्रकार हमारे भौतिक सुखों में हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहे।
    इस प्रकार के लक्ष्यों को रखने वाले लोग भी दो तरह के होते हैं।
एक वैसे लोग होते हैं जो हमेशा हर कीमत पर सिर्फ अपने भौतिक उपलब्धियों को पूरा करने में लगे रहते हैं। इस हेतु यदि उनको लगता है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ गलत भी करना हो तो ये लोग नहीं हिचकते हैं। ऐसे मनुष्य इस बात में यकीन करते हैं कि यदि कोई वस्तु या सामग्री या कोई भी चीज यदि उनके सामर्थ्य में है तो हर हालत में वो उनको मिलनी चाहिए चाहे इसके लिए अनैतिक कार्य करना हो तो वो भी कर लेंगे।
       दूसरे उस तरह के लोग होते हैं जो अनैतिक कामों से तो बचना चाहते हैं लेकिन उनकी नजर भी उन्हीं सुख सुविधाओं पर टिकी रहती है और इसके लिए वे शास्त्रों में वर्णित तरह तरह के कर्मकांड में लिप्त रहते हैं। ये लोग स्वर्ग की कल्पना और उसकी इक्षा में लगे रहते हैं। ऐसे लोग जीवन की सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं। सुख, सुविधा, भौतिक ऐशो आराम, बाल बच्चों का उज्ज्वल भविष्य बस यही सब उनका लक्ष्य होते हैं। सुविधाओं में बढ़ोत्तरी ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
       हमारा प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ भौतिक सुख सुविधाओं में बढ़ोत्तरी, धन संपत्ति में बढ़ोत्तरी, बच्चों के भविष्य, उच्च पद प्रतिष्ठा जैसी चीजें ही होती हैं तो फिर इनको सही ठहराने के लिए आलंकारिक भाषा में कई तर्क भी देते रहते हैं जिनमें वे आध्यात्मिकता का पुट भी डालते रहते हैं ताकि उनके तर्क आकर्षक बन सके।
    जब हमारे पास इतने काम हों, जब हमारे पास इतने लक्ष्य हों तो फिर स्थिर मन से भला कब हम आत्मसाक्षात्कार का प्रयास कर पाएंगे। सुख सुविधा को पूरा करने के चक्कर में चंचल मन भला कब समय निकाल पाए कि उसे आत्मशोध करने का समय मिले।
        जब हम सिर्फ भौतिक सुख सुविधा के भँवर में फँसे होते है तब हम क्या करते हैं जरा इसका अवलोकन करें।  सुबह से शाम तक हम इसी प्रयास में लगे होते हैं कि हम कौन उपाय करें कि हमारी संपत्ति बढ़ जाये, कैसे हमारा ऐश्वर्य और सुख सुविधा बढ़ जाये , कैसे हमारा पद बढ़ जाये, आदि। इस स्थिति में हम अनैतिक साधन अपनाने से भी परहेज नहीं करते। या फिर कुछ लोग परलोक की चिंता में पूण्य बटोरने के चक्कर में , अपने जीवन में सुख सुविधा बढाने के लिए तरह तरह के कर्म कांड भी करते हैं। 
        अंतिम लक्ष्य तो सुख की प्राप्ति ही होता है लेकिन ये सुख भौतिक और शारीरिक होता है और इसको पूरा करने का मार्ग ऐसा होता है जिसमें हमें फुर्सत ही नहीं मिलता। एक सुख मिला नहीं कि दूसरे के फेरा में पर गए! पूरा जीवन इसी में बीत गया। ऐसे इंसान के जीवन में सुख मृगमरीचिका है।
      इसी प्रकार सुख की इक्षा पूर्ति के लिए तरह तरह के कर्मकांडी भी सुख तो कभी नहीं पाते लेकिन सुख की चाह में हमेशा दर दर भटकते दुखी ही रह जाते हैं। कभी  अपने लिए, कभी पत्नी के लिए , कभी सन्तान के लिए, कभी पूण्य बटोरने के लिए, कभी पापकर्म के प्रभाव को काटने के लिए। अंतहीन सिलसिला है। तब सुख कँहा है? 
सुख तो उसी दृढ़ बुद्धि में है जो ये सिखाती है कि हम अपने अंदर सुख खोजे, इस हेतु निर्धारित तरीके से जिये यानी निष्काम भाव से।
        एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या जीवन को बेहतर बनाने के जो भौतिक प्रयास किये जाते हैं वे अर्थहीन हैं? कदापि नहीं। निष्काम कर्मयोग की शिक्षा कदापि कर्महीनता नहीं है। कर्म तो करना ही है। कर्म कर के ही हम उस सुखद स्थिति को पाते हैं जिसमें सुख के उपरांत दुख नहीं है। लेकिन कर्मयोग कर्म करने की विधि को बताता है जिसे  श्लोक 39-40 में हम देखे हैं और जिसके बारे में आगे विस्तार से श्रीकृष्ण व्यक्त भी करेंगे। अभी के लिए इतना ही कि निष्काम कर्मयोग का तातपर्य कर्महीनता नहीं है बल्कि कर्म करने की वो विधि है जिसमें कर्म के परिणाम के प्रति आसक्ति और मोह नहीं होता है। ये कैसे सम्भव है आगे देखेंगे।
   श्रीकृष्ण ऊपर समझायें हैं कि भौतिक भोगो की अभिलाषा में रत मनुष्य भौतिक सुख सविधाओं की प्राप्ति का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए शास्त्रों (वेद) का तर्क देते हैं। सभी व्यक्ति जो ये प्रयास करते हैं कि भौतिकता में उनकी अनुरक्तता को आध्यात्मिक मान्यता मिल जाये वे यह दिखाने की कोशिश करते रहते हैं कि उनके आचरण को अध्यात्म अथवा धर्म का समर्थन हासिल है , सो वे अपने पक्ष में वेदों यानी धर्म शास्त्रों का उदाहरण देते हैं। हम देखते हैं कि समाज की हर रीति कुरीति को सही ठहराने के लिए उसके समर्थक धार्मिकता का आवरण चढ़ाने से बाज नहीं आते और तरह तरह की क्रियाओं से अपने आचरण को आडम्बरयुक्त कर उसे महिमामंडित करने की कोशिश करते रहते हैं। प्रतिदिन हमारे समक्ष ऐसे अगिनत उदाहरण आते रहते हैं। तकनीक के इस युग में संचार के अतिसुलभ साधन उपलब्ध हैं,यथा टेलीविजन और इंटरनेट आधारित उपकरण। सोशल मीडिया के माध्यम से एक जगह बैठा एक व्यक्ति एक ही समय में अत्यंत तीव्र गति से असंख्य लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसका परिणाम होता है कि हर भौतिक भोग विलास के पक्ष में एक धार्मिक उद्धरण सहजता से प्रचलित कर देते हैं जबकि उनका वास्तविक  प्रसंग कुछ अन्य ही होता है।
   श्रीकृष्ण बताते हैं कि शास्त्र के वे पक्ष जो भौतिक भोगों की पूर्ति से जुड़े हैं वे मनुष्य के तीनों गुणों यथा सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न आवश्यकताओं की ही पूर्ति करते हैं। ये जरूरी भले सकते हों अनिवार्य और अंतिम सत्य तो नहीं हैं क्योंकि जब तक हम इन गुणों में उलझे रहते हैं हमारे सामने नित्य नई नई आवश्यकताएँ और क्रियाएँ और भावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं जिनकी पूर्ति में लगा मनुष्य  सारा समय उसी पूर्ति के प्रयास में गँवा देता है। इस स्थिति में आपको फुर्सत कँहा कि हम आप आत्मसाक्षात्कार का प्रयास भी कर पाएं। सो हम अपने सेल्फ से, अपनी आत्मा से दूर चले जाते हैं। हमारा सारा समय जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की कोशिश यानी योग और जो है उसको बचाने में यानी क्षेम में निकल जाता है।
   इसी स्थिति को ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से सभी मनुष्यों को ये संदेश दिया है कि हम इंसान अपने गुणों के प्रभाव से बाहर निकलें, गुणों से परे हों। अगर हम थोड़ा सा ध्यान दें तो तो पाते हैं कि पशु पक्षी आदि जो भी करते हैं वे सभी उनके गुणों के अनुसार ही होते हैं। प्रशिक्षण देने पर कुछेक पशुओं  के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन तो होता है लेकिन वो भी स्थाई नहीं है। मनुष्य ही एकमात्र जीव है जिसमें अपने गुणों को काटने की क्षमता होती है। जो जितना त्रिगुणों से परे होता है वो उतना ही निश्चिंत और शांत होता है। तब वह व्यक्ति सारी आवश्यकताओं के रहते और उनकी पूर्ति करते भी उन आवश्यकताओं से बंधता नही है।
वे आवश्यकताएँ उसके लिए मोह का कारण नहीं बंध पाते। सो इस तरह का मनुष्य सत्य के प्रति विशेष आग्रह रखता है, उसका सत्य होता है  उसका अपना सेल्फ/अपनी आत्मा। इन्द्रियों और इन्द्रीयजनित बुद्धि से आगे जाकर वह व्यक्ति सत को खोजता है। उसे न तो किसी वस्तु विशेष को पाने की बेचैनी होती है , न ही जो सुख सुविधा  है खोने का डर होता है। वह इन बेचैनियों से मुक्त आत्म में निष्ठ होता है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण मनुष्य को जब तीनों गुणों से बाहर निकलने की बात कहते हैं तो उसके लिए चार तरीकों को बताया भी है
1.न तो किसी वस्तु को जो उसके पास नहीं है को पाने का प्रयास, न ही जो है उसे सुरक्षित रखने का प्रयास।
2.इस प्रकार का निर्विकार मनुष्य लाभ- हानि, जय-पराजय, हर्ष-विषाद के विरोधाभासी द्वंद्व से मुक्ति।
3.उक्त विशेषता से युक्त मनुष्य के अंदर के तमोंगुण ,रजोगुण और सत्वगुण नष्ट हो जाते हैं और मात्र सत्य का आग्रह होता है। मन और बुद्धि से परे व्यक्ति अहंकार, मोह आदि से अलग हो चुका होता है,शुद्ध रूप में आतंदर्शन की तरफ अग्रसर होता है।
4.इस स्थिति में व्यक्ति आत्मावान यानी आत्मिक अवस्था में ही होता है।
     इस तरह हम देखते हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलता व्यक्ति किस तरह से कर्म करते  आत्मसाक्षात्कार के तरफ अग्रसर होता है। उपरोक्त चारों को यदि हम उल्टे क्रम से देखेंगे तो पाएंगे कि आत्मनिष्ठ व्यक्ति की प्रकृति किस तरह की होती है जिसे श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के अंत में थोड़ा विस्तार से बताएंगे। उपरोक्त क्रमों के अभ्यास से हम भी, आप भी, सभी  भ्रम और मोह और उनसे जनित व्याधियों से मुक्त हो सकते हैं। ये अवस्था अभ्यास से मिलती है। यदि दैनिक जीवन के प्रत्येक प्रसंग में हम इनका अभ्यास करें तो स्वाभाविक रुप से हम भी वही पहुँचते हैं जँहा श्रीकृष्ण जाने के लिए कहते हैं।
निष्काम भाव से कर्म करते करते आत्मवान बनने की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन और अर्जुन के माध्यम से हम सबको  समझाते हैं कि जब हम आत्मवान होते हैं अर्थात जब हम नियत तरीके से जीवन को जीते हैं , जैसा कि ऊपर बतलाया गया है तब हम मन बुद्धि और कर्म यानी तीनों गुणों से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जैसा कि पूर्व में श्रीकृष्ण बता आये हैं कि आत्मशोधन की इस यात्रा में हम अपनी इन्द्रियों और उनसे जनित सुखों से अलग होते जाते हैं, समत्व के भाव में आते जाते हैं, ऐसी स्थिति में वो धार्मिक विधि  विशेष भी बहुत महत्व नहीं रखती जिससे हम इस लोक या परलोक में सुख की अपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में सांसारिक सुखों की कामनाओं से युक्त वेदों का भी उस व्यक्ति के लिए विशेष महत्व नहीं होता। परम् सुख की अवस्था में ये सब अब निष्प्रभावी लगने लगते हैं।
  जब मनुष्य इस परम् लक्ष्य के मार्ग पर चलता है तो मार्ग के छोटे छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति से उसे कोई बहुत मतलब नहीं होता है।  इस प्रकार से जब हम कार्य करने हेतु प्रवृत्त होते हैं तो चूंकि इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण और उनसे उत्पन्न प्रभाव भी अत्यल्प से अत्यल्प होते जाते हैं  हमारे अंदर सत्वगुण की मात्रा बढ़ती जाती है जिसके कारण हम परम् की यात्रा के दौरान जो कुछ अन्य कार्य भी करते हैं उनका सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है भले इनसे हमें कोई विशेष मतलब हो नहीं हो। 
   इसीप्रकार चूँकि आतंबोध की यात्रा में द्वंद्व को छोड़ते जाते हैं हमारी बुद्धि भी साथ साथ अपनी बेचैनी को भी छोड़ते जाते हैं। इस तरह से हमें जीवन की विषमता प्रभावित नहीं कर पाते।
      इस अवस्था में जब व्यक्ति अपनी यात्रा को पूरी करता है उसे परम् सुख और शांति प्राप्त होती है। ध्यान रहे जब तक व्यक्ति इस अवस्था को नहीं पाता तब तक वह उन चीजों में सुख खोजता है जो उसके बाहर इस संसार में है।  एक ही वस्तु कभी उसे अच्छी लगती है तो कभी किसी अन्य अवस्था में वही चीज उसके लिए सूखकर नही रह जाता। जो आज प्रिय है कल अप्रिय। इस प्रकार वस्तु तो वही रहता है परंतु व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था में परिवर्तन के कारण उसे कभी पसन्द कर सुख प्राप्त करता है तो कभी नापसन्द कर दुखी भी होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सुख हमारे बाहर नहीं होता है। मन की शांत अवस्था में जब हम द्वंद्व से मुक्त होते हैं हमें उस सुख-शांति की प्राप्ति होती है जो किसी वस्तु या मानसिक अवस्था में परिवर्तन पर नहीं निर्भर करते हैं। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में मिलती है। इस कारण से इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख देने वाले भोग विलास सुख सुविधा का कोई महत्व नहीं होता है। जिसे अपनी परम्  अवस्था प्राप्त हो जाती है उसे तो सुख ही सुख है तो जो भी सुख उसे अन्यत्र भौतिक रूप से मिल सकता था वो भो उसके परम् अवस्था में स्वतः सम्मिलित होते हैं।
  ध्यान रहे गुणातीत यानी गुणों से मुक्त होने की ये अवस्था अचानक ही नहीं प्राप्त होती है, बल्कि ये अवस्था क्रमिक रूप से ही मिल सकती है, क्रम क्रम से ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होता है, समत्व में आता है, विपरीत प्रभावों के द्वंद्वात्मक जोड़े के प्रभाव को खत्म करता है। सो उस अवस्था में पहुँच जाने के बाद भी इस क्रम का महत्व बना रहता है। दूसरे व्यक्तियों को भी अगर उस अवस्था में पहुंचना है तो इसी क्रम को अपनाना है।
कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। 
      श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।
      ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं-----
1.जब हम कर्म करते हैं तो हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में होता है उसके परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता है। श्रीकृष्ण पहले समझा आये हैं कि जब हम कर्म करें तो हमारी बुद्धि एकनिष्ठ होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हम तरह तरह की उम्मीद पाल बैठते हैं, तरह तरह के लक्ष्य बना लेते हैं जिसका नतीजा होता है कि हम सदा उनको पूरा करने की दौड़ धूप में लगे रहते हैं, हमारा मन हमारी इन्द्रियों  से मिलने वाले तरह तरह के अनुभवों से बेचैन हुआ रहता है। जब मन विभिन्न   लक्ष्य की पूर्ति हेतु भटकता रहता है तो फिर मन में शांति नहीं होती और बिना शांति के हम परम् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वस्तुनिष्ठ ढंग से ध्यानमग्न नहीं हो पाते। थोड़ा ये भी मिल जाये, थोड़ा वो भी मिल जाये, थोड़ा उसे भी प्राप्त कर लिया जाए, अच्छा जब ये पूरा कर लेते हैं तब उस परम लक्ष्य के बारे में सोचेंगे, फिर वह मिला नहीं कि दूसरा काम आ गया है पहले उसे कर लें, थोड़ा और भोग की वस्तु को इकठ्ठा कर लें तो थोड़ा वो भी कर लें। ऐसी स्थिति में शांति कँहा!
   इस स्थिति में हम अपने गुणों-तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की अवस्था के अधीन होकर उनके अनुसार अपनी क्रियाएँ करते रहते हैं और मानसिक रूप से उद्वेलित हुए रहते हैं। यदि परम् लक्ष्य की चाह है तो इस गुणों से मुक्त होना ही होगा और तभी साँख्य की प्राप्ति होगी। इस हेतु जरूरी है कि हम ध्यान करें ।लेकिन क्या जबरन ध्यान सम्भव है?  कदापि नहीं। होता ये है कि हम अपने स्व की तलाश में  सुख चाहते हैं। लेकिन जब तक अपने तीनों गुणों के प्रभाव में होते हैं हम अपने वास्तविक सेल्फ यानी आत्मबोध को नहीं पहचान पाते। तब हम सुख की चाहत में अपने बाहर देखते हैं, अपने बाहर भटकते हैं, जो हमारे बाहर है उसमें हम सुख खोजते हैं जँहा हमारी खुशी , हमारा सुख होता ही नहीं। वो तो हमारे अंदर है जिसे हम उपासना और ध्यान कर ही प्राप्त कर सकते हैं। और ये अवस्था जबरन नहीं हासिल होती है। ये अवस्था सही कर्म कर के ही मिलती है, सही ढंग से कर्मपथ पर चलकर ही हम सब उस अवस्था में पहुंचते हैं जँहा ध्यान करने के अधिकारी बन पाते हैं। बिना गुणों से पार पाए ध्यान सम्भव नहीं । यदि हम करते हैं तो जितनी देर ध्यान करते हैं हमारे मन में कुछ न कुछ चलते रहता है, हमारे अंदर की इक्षाएँ जोर मरती रहती हैं। जिनसे निकलने का एक मात्र तरीका गुणों के प्रभाव से मुक्त होना ही है। लेकिन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो तो कैसे हों? ये प्रश्न तो है। इसका इकलौता तरीका है कि हम सही तरह से कर्म करें , निर्धारित तरीके से कर्म करें। तब जाकर हमको  वह अवस्था मिलती है जब हम कर्मों से मुक्त हो पाते हैं। तभी हमें आत्मसाक्षात्कार हो पाता है। यदि हम बीच में चाहें कि आत्मसाक्षात्कार हो जाये और इसके लिए हम कर्म का मार्ग छोड़ दें तो मुँह के बल गिर जाएंगे अर्थात हमारा पतन हो जाएगा, हम पथभ्रष्ट हो जाएंगे। अतएव कर्म कर के ही हम उस ऊंचाई को प्राप्त कर सकते हैं जँहा पहुँच कर हम कर्म को छोड़ भी देते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तब हम आत्मसाक्षात्केकार की स्थिति में होते हैं। 
     उपरोक्त से स्पष्ट है कि यदि हम अपना वास्तविक स्वरूप जानना चाहते हैं , आत्मबोध करना चाहते हैं , ब्रह्म को पाना चाहते हैं, वो सुख चाहते हैं जिसे प्राप्त कर कभी दुखी न हों , ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, मोक्ष चाहते हैं तो हमको सबसे पहले कर्म ही करना होगा क्योंकि कर्म करके ही हम अपने अंदर के तीनों गुणों को समाप्त कर सकते है और जब ये गुण खत्म हो जाते हैं तब हम साफ नजर से अपनी आत्मा यानी अपने स्व को देख समझ पाते है और तभी हम आतंबोध भी कर पाते हैं। 
   सो आतंबोध की यात्रा में पहली अनिवार्य शर्त है कर्म करना।
2. ये स्पष्ट है कि हमारा अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम क्या होगा ये हमारे अधिकार से बाहर है। हम मात्र कर्म कर भर  सकते हैं परिणाम तो प्रकृति देती है। 
   जब हमारा अधिकार  कर्म करने भर पर है तो फिर तीन परिस्थिति में से कोई एक हो सकती है
  (क) हम कर्म कर सकते हैं,
  (ख) हम कर्म नहीं कर सकते हैं
  (ग) हम कर्म किसी अन्य तरीके से भी कर       सकते हैं। 
        हमारे मन में तरह तरह के विचार आते रहते हैं। ये विचार हमारे  समय , काल और परिस्थिति के अनुसार तो होते हैं और बराबर बदलते भी रहते हैं। इन विचारों की गुणवत्ता हमारे अपने गुणों की अवस्था पर भी निर्भर करती है और प्रतिक्रिया स्वरूप हम क्या करते हैं उन विचारों के साथ ये भी हमारे समय, काल, परिस्थिति और हमारे गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। एक ही विचार के प्रति एक ही व्यक्ति की अलग अलग परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया हो सकती है और अलग अलग व्यक्तियों की भी प्रतिक्रिया अलग अलग हो सकती है। ये व्यक्ति के अपने समय, काल और परिस्थिति और उसके तीनों गुणों के अनुपातिक  प्रभाव के अनुसार ही होती है। इस प्रकार अपनी इक्षाओं के प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है ये इन्हीं चार चीजो से तय होती है , हम इक्षा के प्रति समर्पित हो सकते हैं, उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं और खुद को किसी अन्य चीज में भी व्यस्त कर सकते हैं।इस प्रकार कर्म पर हमारा अधिकार होता है जो हम अपने समय , काल, परिस्थिति और गुणों की  परिस्थिति पर निर्भर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्मों को करने पर हमारा अधिकार है और जो हम करते हैं उसके लिए हम ही उत्तरदायी भी हैं। यदि हम अपने गुणों के सम्बंध में सचेत रहते हैं, तमोगुण और रजोगुण को नियंत्रित कर सत्वगुण की मात्रा को बढ़ाते है तो फिर हमारे कर्मों की कोटि भी उत्तम होगी। 
3.परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। हम जो करते हैं उसपर तो हमारा नियंत्रण है लेकिन परिणाम कई ऐसी चीजों पर निर्भर करता है जिसके बारे में हमें कुछ भी जानकारी नहीं होती। ध्यान रहे  we perform action, we don't perform results; results come. जब परिणाम पर हमारा अपना कोई अधिकार ही नहीं तो फिर परिणाम पर क्यों माथापच्ची करना। हमारा अधिकार कर्म पर है तो हमारी सारी सावधानी कर्म करने में ही होनी चाहिए।
4. इसके आलोक में परिणाम , जिसपर हमारा वश नहीं उसके प्रति कोई मोह रखना भी तो गलत ही है। सो हमें चाहिए कि हम अपने कर्मों को कर उनसे सुख को प्राप्त करें क्योंकि ये कर्म ही हैं जिनको हम अपने अनुसार कर सकते हैं, परिणाम के सम्बंध में तो कोई निश्चितता नहीं है, सिर्फ अनुमान भर ही लगा सकते हैं। सो हमें चाहिए कि हम आने कर्मों को कर उनसे सुख प्राप्त करें। यदि हमारी स्पृहा परिणाम में लगी रहेगी तो देखिए कितनी बड़ी मूर्खता हम करते हैं। जिस चीज पर हमारा वश है उसको तो कर हम सुख नहीं प्राप्त कर रहें और जिस परिणाम पर हमारा कोई वश नहीं उसकी चिंता में हम गले जा रहें हैं , उससे भी सुख नहीं मिल रहा है। 
5.इसे अन्य प्रकार से भी देखें। कर्म हम वर्तमान में करते हैं और परिणाम भविष्य में आता है। अब देखिए, वर्तमान में किये जा रहे कर्म से हमें सुख नहीं मिल रहा है और हम सुख के लिए परिणाम पर निर्भर हो कर अपने ही कर्मों से मिल सकने वाले सुख को भविष्य में मिलने वाले अनिश्चित परिणाम पर टाल रहें हैं। इस प्रकार हम खुद ही अपने से अपने सुख को विलग कर रहें हैं। भला ये कौन सी समझदारी है!! अब सोचिए कोई एक काम करता है और सोचता है कि इस काम का जब उसके मनोकुल परिणाम आएगा तब वो खुशी मनाएगा। इस प्रकार उस काम को करने से मिल सकने वाली खुशी को वो खुद ही बर्बाद कर देता है इस उम्मीद में कि जब उसे भविष्य में मनोकुल  परिणाम  मिलेगा तो वो खुश होगा। अब सोचिए यदि उसे मनोकुल परिणाम मिल जाये तो क्या हो सकता है। सुख के एक निष्चित अवसर को उसने गँवा कर इसे वो प्राप्त करता है। ये भी सम्भव है कि जब उसे वो इक्षित परिणाम मिले तब तक उसकी परिस्थिति, उसकी आवश्यकता, उसके मनोभाव ही बदल चुके हों और इक्षित परिणाम मिलने पर भी वो सुख न प्राप्त कर सके। ये भी सम्भव है कि उसे मनवांछित परिणाम मील ही न पाए। तब तो वो व्यक्ति दोगुने दुख को ही न अनुभव करेगा! अगर हमारा सुख हमारे कर्म में नहीं अनिश्चित परिणाम में है तब तो हम जीवन भर  निश्चित कर्म वाले सुख को छोड़कर उसी अनिश्चित परिणाम वाली अनिश्चित खुशी के लिए इधर से उधर भागते रह जाएंगे।
6.एक और बात अति महत्वपूर्ण है। यदि हम कर्म को छोड़कर उसके परिणाम पर ही केंद्रित रहते हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हम वर्तमान से अधिक भविष्य की चिंता में जी रहें हैं । कर्म तो हम आज करते हैं , लेकिन भविष्य में मिलने वाले परिणाम से लगाव के कारण हम चाहते हैं कि हम भविष्य में भी रहे  और भविष्य में भी कर्म करते रहे और इस प्रकार हम खुद को कर्मों के बंधन में बाँध लेते हैं, उनसे मुक्त नही हो पाते। कर्मों के इसी बन्धन से तो पुनर्जन्म का सिद्धांत निकल कर आता है । तब भला आत्मसाक्षात्कार का कँहा अवसर मिलता है। तब तो हम कर्मों से मिलने वाली शांति भी गँवा देते है।  और हमेशा एक उत्तेजित मानसिक अवस्था में रहते हैं। इस प्रकार हम खुद को गुणों  में बाँध कर रखते हैं। इस बन्धन के कारण हम आत्मसाक्षात्कार से वंचित हुए रहते हैं।
7. तो क्या कर्मों को त्यागने से परिणाम की चिंता खत्म हो जाएगी? चूँकि लगाव परिणाम से है सो उस मोह के कारण चिंता तो खत्म नहीं होगी, उल्टे कर्मों को नहीं करने से कर्म कर अपने गुणों से मुक्त होने, सुख को प्राप्त करने और अंततः आत्मसाक्षात्कार करने के अवसर को भी हम गँवा देते हैं। 
          कर्मयोग को समझने के लिए ये एक अतिमहत्वपूर्ण पड़ाव है जँहा यदि हम इसे नही समझ सके तो फिर कभी नहीं समझ पाएंगे, सो जरूरी है कि इसे आत्मसात करने के लिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण की शिक्षा को बारंबार पढ़ें, अपने जीवन चरित्र में अभ्यास में लाये।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म करने के सम्बंध में चार बाते समझाई हैं
1.आपका अधिकार मात्र कर्म करने में है।
2.फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है।
3.फल से लगाव मत रखें। फल भविष्य में मिलता है, सो फल के लगाव से मुक्त होकर आप भविष्य के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
4.कर्म नहीं करने में आपकी कोई श्रद्धा नहीं हो।
    ये चारों बातें जिस चीज को समझाती हैं उनको श्रीकृष्ण एक बार फिर से कहते हैं कि आपको कर्म तो करना  लेकिन उसे योग भाव से करना है। इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि ये योग है द्वंद्वात्मक विलोम के युग्मों से मुक्त होकर कर्म करना अर्थात जय-पराजय, लाभ-हानि, हर्ष-विषाद, सफलता-असफलता, रिद्धियों-सिद्धियों से मुक्त होकर कर्म करना,। यानी परिणाम जो हो सभी में समान भाव रखकर कर्म करना। हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है, फल के निर्धारण में नहीं। सो फल के चरित्र से मुक्त होना चाहिए कर्म करते वक्त। मतलब समान भाव अर्थात समत्व योग! हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को सही ढंग से करना न कि किये गए या किये जा रहे या किये जाने वाले कर्मों का परिणाम सोचकर करना। जो उचित है, सत्य है, अर्थात जो rigjteous है उसे करना, भले परिणाम जो हो। 
 ध्यान रहे WE SHOULD DO WHAT IS RIGHT AND NOT WHAT IS OUR LIKE. जरूरी नहीं कि हम जो पसन्द करते हों वो सही भी हो। जो सही नहीं नहीं है , जो धर्मानुकूल नहीं है वो भले हमें प्रिये हो हमें नही। करना चाहिए। सनद रहे कि हमें अपने कर्मों पर ही अधिकार है, परिणाम पर नहीं। चूँकि हमें ये अधिकार है कि हम सही या गलत जो कर्म चाहें कर सकते हैं तो फिर हमें फिर सही , (righeous) कर्म ही करना चाहिए भले ही हो सकता है कि उस कर्म का वो परिणाम हमें नहीं मिल पाए जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। वस्तुतः हमको तो इसी उम्मीद को त्यागने की शिक्षा श्रीकृष्ण दे रहें हैं क्योंकि उम्मीद तो एक अनुमान भर है जो हमारे अधिकार से बाहर है, जिसके पूरा होने या न होने पर हमारा कोई वश नहीं है।
        इस प्रकार कर्म करने में कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार निम्न पाँच तरह की सावधानियों  को बरतने की जरूरत होती है:-
1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अOच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 
      इन सभी के संयोग से किया गया कर्म ही कर्मयोग है जिसे कर के साँख्य यानी परम् ज्ञान की प्राप्ति होती है जो अपनी आत्मा का साक्षात्कार कराता है। 
श्रीकृष्ण ने गत समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी  हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इसी स्थिति में हम अपने अंदर से प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। ये प्रसन्नता हमारे अंदर से निकलती है जो चिरस्थाई होती है क्योंकि उस समय हम अपनी आत्मा में ही अवस्थित होते हैं जो हमारा परम् लक्ष्य रहा है। लेकिन जो व्यक्ति इस बुद्धि से कर्म नहीं करते वे तो परिणाम से ही सुखी और दुखी होते रहते हैं, कर्म की गुणवत्ता से उनको प्रसन्नता नहीं मिलती। वे तो भविष्य में मिलने वाले परिणाम से सूखी या दुखी होते रहते हैं। ऐसे लोग परिणाम से बंधे होते हैं। वे अपने कर्म से नही। आनंदित होते हैं। वे इंतजार करते हैं अच्छे परिणामों की ताकि वे प्रसन्नता को पा सकें। उनके लिए अनेक लक्ष्य होते हैं और हर लक्ष्य के परिणाम से सुखी दुखी होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था भी विचलित होते रहती है। ध्यान रहे , परिणाम तो भविष्य में मिलता है। हम जो कर्म पहले किये थे उसका परिणाम आज मिलता है। अब यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिला तो आज का भी कर्म हम अच्छे से नही कर पाते सो आज के कर्म का भी परिणाम हमारे मनोकुल नहीं आने वाला। इस प्रकार भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणाम से बंधकर हम खुद को भविष्य से बाँध लेते हैं। चूँकि ऐसे लोग प्रसन्नता और स्थायित्व अपने बाहर खोजते हैं तो नित परिवर्तनशील संसार के परिवर्तनों से हम सुखी दुखी होकर अस्थिर होते रहते हैं। ऐसे में सत्य यानी आत्मा यानी सेल्फ यानी चिरस्थाई प्रसन्नता कँहा मिलने वाली।

     इस प्रकार कर्मयोग से युक्त कर्म और सामान्य कर्म में कर्म में प्रयुक्त बुद्धि या दृष्टिकोण का महत्व होता है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। लेकिन जिस कर्म में कर्मयोग की बुद्धि सन्निहित होती है अर्थात जो कर्म कर्मयोग की उपरोक्त बुद्धि से युक्त होकर किया जाता है अर्थात जिसे करने में स्वधर्म, समत्व, असंगत, समर्पण और प्रसाद बुद्धि होती है वो कर्म तो कर्मयोग का कर्म है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाता है, शेष जो इन बुद्धियों या दृष्टिकोण से युक्त नही होते वे सामान्य कर्म हैं जो पीड़ादायक होते हैं। इसलिए ये सामान्य कर्म निम्नकोटि के होते हैं।

      जब भी हम कोई कर्म करते हैं दो तरह के परिणाम मिलते हैं, एक हमारे बाहर और दूसरा हमारे अपने अंदर। यदि हम बाहरी परिणाम से प्रभावित होते हैं तो परिणाम के स्वरूप के अनुसार कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी क्योंकि दोनों तरह के परिणाम मिलते रहते हैं। बाहरी संसार तो हमेशा परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के कारण हम भी परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि हम इनके प्रभाव में होते हैं। लेकिन यदि हम आंतरिक परिणाम के वश में हों, बाहरी परिणाम में समत्व हो, उनसे असंगत हों तो फिर हम अपने कर्म से ही आनंदित होते रहते हैं, स्थायित्व रहता है हममे जो हमें चिर आनंद की तरफ ले जाता है। 

   यदि बाहरी परिणाम हमपर हावी हैं और परिणाम बुरा आ गया तो हममे अपने कर्म के प्रति , अपने मानसिक अवस्था के प्रति नकरात्मकता आ जाती है। ये नकस्रात्मकता आगे के कर्मों को भी दूषित कर देती है। नतीजा होता है कि इस नकस्रात्मकता से बाहर आना सहज नहीं रह जाता। ये तभी सम्भव हो पाता है जब हम कर्मयोग की बुद्धि का अभ्यास शुरू करते हैं। आइये देखते हैं कि कर्मयोग से हीन बुद्धि के अनुसार कर्म करने से किस तरह से हम नकारात्मकता को प्राप्त होते हैं, किस तरह से हमारा पतन हो जाता है।

1.जब हम अपने स्वधर्म  के अनुसार ही  करटे हैं तो सही कर्म करते हैं । इस तरह के कर्म में हम ध्यान रखते की हम धर्म के अनुसार ही कोई कार्य करें। इसके विपरीत जब हम स्वधर्म का ख्याल रखे बिना कोई कर्म करते हैं तो हम अपनी पसंद नापसन्द के अनुसार कोई कर्म करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें धर्म का ध्यान नहीं रहता बल्कि हमें जो अच्छा लगता है वही करते हैं। इस स्थिति में हम अपने मोह, माया ,आवेश, गर्व, अहंकार, भ्रम, मित्रता, शत्रुता , भय आदि के भाव के वश में होकर कर्म करते हैं। इस तरह के कर्म से उद्धार की बात सोचना भी बेमानी ही है।
2.जब हमारे कर्मों में समत्व का भाव होता है तो परिणाम से लगाव के बिना बड़ी निश्चिंतता से हम कर्म भी करते हैं और करने वक़्त आनंदित भी रहते हैं। ये आनंद परिणाम में नहीं कर्म में निहित होती है। लेकिन जब हम समत्व के भाव के बिना कर्म करते हैं तो परिणाम के लिए ही कर्म करते हैं। तब हम कर्म करने वक़्त उत्तेजित और बेचैन हुए रहते हैं। हम नसम की अवस्था में होते हैं , परिणामतः अपने कर्मों से हम भी हम असन्तुलन ही पैदा करते हैं.
3.जब हमारे कर्म में ईश के प्रति समर्पण का भाव होता है तो हम बड़े कैनवास पर काम करते हैं। हमारे कर्मों का उद्देश्य जीव का कल्याण होता है। लेकिन जब ये समर्पण ईश के प्रति न होकर खुद के प्रति ही होता है तब हम जो भी करते हैं उसमें अपनी भलाई का भाव रहता है। तब हम ये नहीं सोचते कि जो हम कर रहें हैं उससे समाज का कितना भला होगा, जीव मात्र का कितना भला होगा। ये संकुचित दृष्टिकोण स्वार्थ को जन्म देता है जिससे जन कल्याण की बात हम नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में हमारे कर्मों से समाज को नुकसान नुकसान पहुंच सकता है।
4. जब हम परिणाम से असंगत होते हैं अर्थात उससे जुड़े नहीं होते तो परिणामों का हमपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लेकिन जब हमारे कर्मों में असंगत का भाव नहीं होता तब हम अपने कर्मों के परिणाम के अनुसार ही प्रतिक्रिया भी देते हैं और आगे का अपना कर्म भी निर्धारित करते हैं। यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिले तो हम दुखी हो जाते हैं, गुस्सा से भर जाते हैं, और अपने अगले बगल के लोगों को भी  अपने  व्यवहार से विचलित कर देते हैं। इस तरह जब हम परिणाम से बन्ध जाते हैं तो लगता है कि जो करते हैं हम ही करते हैं, और परिणाम स्वरूप सभी को कोसने लगते हैं। हमारे अगल बगल का भी माहौल खराब हो जाता है। खुद हम भी आगे के अपने कर्म पूर्व के परुणामों के अनुसाय तय कर किसी का भी बुरा करने पर उद्धत हो जाते हैं।
5. प्रसाद बुद्धि से युक्त कर्म में जो भी परिणाम प्राप्त होता है उसे स्थिर भाव से हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत प्रसाद बुद्धि से हीन कर्म में कर्म के परिणामस्वरुप जो भी हमें मिलता है उससे हमें असन्तोष ही बना रहता है, जिसके कारण हमारी मनः स्थिति हमेशा दुख की बनी रहती है। हम चिरसन्तोषी और चिर दुखी हुए रहते हैं। प्रसन्ता के साथ स्वीकार नहीं करने के कारण हम हमेशा हमेशा दुःखी ही बने रहते हैं।
  इन कारणों से कर्मयोग के बुद्धि से विहीन कर्म हीन ही है। सो इसे त्यागने में ही भलाई है। अतः हमें सामान्य  कर्मों को छोड़कर इस कर्मयोग की बुद्धि ही अपनानी चाहिए। तभी हमारा कल्याण सम्भव है। तभी हम कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त हो सकते हैं । अन्यथा सामान्य कर्मों को करते हम हमेशा कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं। ध्यान रहे कर्म करना कर्मयोग नही है। कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करना ही कर्मयोग है। जो ऐसा नहीं कर पाते वे कृपण हैं अर्थात कंजूस हैं। उनमें क्षमता तो होती है लेकिन वे इस क्षमता का उपयोग नहीं करते और स्व यानी अपनी आत्मा को नहीं पहचान कर बन्धन में बंधे रह जाते हैं।
श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि को स्पष्ट कर देने के बाद इस बुद्धि की अन्य विशेषता पर प्रकाश डालते हुए आगे कहते हैं कि मनुष्य को लगता है कि इस जीवन में उसके द्वारा अर्जित पूण्य और पाप की उसकी उपलब्धि हैं। लेकिन हमारे पूण्य और पाप भी इसी जन्म कर्म के बंधन हैं जो हमें हमारा सेल्फ यानी आत्मा का बोध नहीं करा पाते। परिणामों के बंधन ने बन्धा मन आत्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है। लेकिन यदि हममे कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार कर्म करने की कुशलता आ जाती है तो हम इस पाप पुण्य के द्वंद्वात्मक युग्म से बाहर निकल आते हैं क्योंकि तब हमारे पास परिणाम के प्रभाव से मुक्त रह पाने की दक्षता होती है।
   जब हम परिणाम से बढ़ी नहीं होते तो भविष्य की चिंता से न तो खुश होते हैं न दुखी। इसी प्रकार अतीत के प्रभाव से भी हम मुक्त रहते हैं क्योंकि अतीत के कर्मों का ही परिणाम भविष्य में मिलता है। सो हमारी दृष्टि मात्र वर्तमान के कर्म पर टिक जाती है और हमारा सारा प्रयास उस कर्म को उच्च कोटि का बनाने में होता है। पाप और पुण्य तो अतीत के कर्म और भविष्य के फल हैं लेकिन जब इनसे हम पार चले जाते हैं तो हमारी दृष्टि वर्तमान पर ही होती है, जब हम कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म पर ध्यान देते हैं और इसे कर हम बन्धन से मुक्त होते हैं। 
कर्मयोग बुद्धि के परिणामों को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जब इस तरह की समत्व की बुद्धि  प्राप्त व्यक्ति ही ज्ञानी कहलाता है। परिणाम से निर्विकार व्यक्ति के लिए परिणाम बन्धनकारी नही हो पाते। जब हम फल से बँधे रहेंगे तब न हमें परिणामों के कारण सुख या दुख की अनुभूति होगी। जब परिणाम का बंधन ही नहीं तो फिर उनके कारण सुख या दुख कैसा! इस स्थिति में तो हमें सिर्फ कर्म करने से प्राप्त अवश्यम्भावी प्रसन्नताआ ही मिलती है। समर्पण के साथ एवम स्वधर्म के अनुरूप किये गए कर्म में तो कर्म करने में प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। सो हम चिर प्रसन्न रहते हैं। दुख या क्षणिक सुख देने वाला परिणाम तो बेअसर है समत्व बुद्धि वाले ज्ञानी व्यक्ति पर। इस तरह की चिरस्थाई प्रसन्नता मन को स्थिर करती है। स्थिर मन व्यक्ति ही अपने स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ को देख समझ पाता है। सुख दुख के बीच झूलते व्यक्ति की बुद्धि, मन, दृष्टि आदि सभी चायमान होते हैं। सारी इन्द्रियाँ एक साथ ही सक्रिय हुई होती हैं। आप खुद अपनी ही अवस्था पर दृष्टि डाल लें। क्षण में इधर, क्षण में उधर। मन के अंदर भारी उथल पुथल और कोलाहल रहता है परिणामों या परिणामों की उम्मीद अथवा आशंका से। लेकिन परिणाम से निर्विकार समत्व बुद्धि युक्त व्यक्ति शांतचित्त, प्रन्नचित्त, रहते हुए स्वम् की अनुभूति में लीन रहता है। अपने स्व के माध्यम से वह खुद को परमात्मा के समीप पाता है। जब व्यक्ति परमात्मा के समीप ही है तो फिर उसे जन मृत्य के बंधन कैसे बाँध सकते, वह तो इनसे मुक्त रहता है। आप याद करें प्रारम्भ में अर्जुन युद्ध करने से क्यों मना कर रहा था? उसकी दृष्टि युद्ध यानी कर्म पर नहीं थी, उसकी दृष्टि युद्ध के परिणाम पर थी जिसमें उसे जय और पराजय दोनों से मिलने वाले परिणामों से असन्तुष्टि थी। वह सम्भावित परिणामों से निर्विकार नहीं होता बल्कि उनसे बन्धनकारी ही मानता है तभी तो दुखी हो रहा था, तभी तो त्रिलोक का साम्राज्य मिल जाने वाला परिणाम भी उसे स्वीकार नहीं था। लेकिन ये उसके परिणामों के साथ गहरे बन्धन के कारण था। लेकिन श्रीकृष्ण तो यँहा उसे कर्मबुद्धि के द्वारा जन्म मृत्यु के चक्र से ही छूट जाने का ज्ञान दे रहे हैं जो उन परिणामों से बहुत आगे है। 
  सो हमारा उद्देश्य समत्व की प्राप्ति होनी चाहिए न कि क्षुद्र परिणामों पर हमारी नजर होनी चाहिए।
जब व्यक्ति परिणामों से विच्छेदित होना सिख लेता है तब उसमें मोह नहीं रह जाता। जब आपका मोह समाप्त हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि तब आपको परिणाम से लगाव नही। रह जाता।  परिणामों के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति को किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। तो क्या ये सम्भव है? सुनने में तो ये सम्भव नहीं लगता कि परिणाम के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होकर भूत , वर्तमान और भविष्य की सारी आसक्तियों से मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि परिणाम के प्रति आकर्षण बना हुआ है। लेकिन जैसे जैसे अभ्यास करते जाते हैं धीरे धीरे परिणाम की चिंता कम से कमतर होती जाती है। कर्मयोग की बुद्धि का निरन्तर अभ्यास परिणामों के प्रभाव को कम करता है। इस बुद्धि को , यानी इस ज्ञान को सतत स्मरण में रखिये। कर्म की महत्ता को समझने से परिणाम की चिंता कम होती है। जब व्यक्ति की कर्मयोग की बुद्धि व्यक्ति के अंदर के परिणाम से लगाव की आसक्ति को पार कर जाती है तो भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त आसक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति इस अवस्था में  पहुँचता है तब माना जाता है कि वह वैराग की अवस्था में आ गया है।
यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण ने अभी जिस वैराग्य की चर्चा की है वह किस चीज से है?  भोगो से वैराग्य की बात कही गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। भोग परिणाम ही हैं कर्म के। परिणाम के प्रति समत्व में स्थित व्यक्ति को जब परिणाम प्रभावित करने में असमर्थ हो जाते हैं तो वह वैराग्य की अवस्था है। सनद रहे इस वैराग्य में कँही भी कर्म से वैराग्य की बात नहीं की गई है, अतएव हमें इस भ्रम में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण कर्म से विरत होने को कह रहे हैं, वे मात्र कर्म के परिणाम में समत्व की ही शिक्षा दे रहें हैं। इस अवस्था में मन शांत हो चलता है और तब हम इस अवस्था में आ जाते हैं कि हम सेल्फ को यानी अपने वास्तविक रूप को समझ पाए कि दरअसल हम कौन हैं। स्वयम को जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि स्वयं का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान होना है।  व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य भोगों ( धनात्मक और ऋणात्मक दोनों,) को ही भोगना नहीं है। जब हम कर्म करते हुए परिणाम के प्रति समत्व की भावना रखते हूं अर्थात अच्छे परिणाम से प्रसन्न नही। होते और बुरे परिणाम से दुखी नहीं होते बल्कि दोनों को समान भाव रखते हैं तो मन शांत होता है। इस अवस्था में जीवन में मिल चुके, मिल रहे और मिल सकने वाले भोगों से भी नही। प्रभावित नहीं होते। ये वैराग्य की अवस्था है, जिसमें मन, चित्त शांत होता है, आनंदित रहता है और यही सत्य की अवस्था है अर्थात हमारा सच्चिदानंद स्वरूप इसी अवस्था में हमें मिलता है।
       ये बातें थोड़ी रहस्यमयी लग सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे जब तक हम मोह में लगे हैं , परिणाम में हमारी आसक्ति बनी हुई है तभी तक ये बातें रहस्यमयी प्रतीति होती हैं । जैसे ही कर्मयोग के अभ्यास से हम परिणाम जनित प्रभाव से हम खुद को अलग करते हैं प्रसन्नता अनुभव करते हैं , मन शांत और हल्का हो जाता है। दैनिक जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप छोटे बच्चों के साथ खेल रहें हैं और बच्चे आपको हरा देते हैं। आप हार कर भी दुखी नही होते। उसी प्रकार यदि आप बच्चों को हरा देते हैं तो भी आप फरव  नहीं करते। बल्कि आप तो दोनों परिणामों को समान रूप से लेते हैं और परिणाम के प्रभाव में नहीं होते। इसे विस्तारित करने पर हम अपने कर्म में इसे देख समझ सकते हैं। मनुष्य का जीवन ही अपने स्व की प्राप्ति के लिए हुआ है। यदि हम आप कर्म में स्वधर्म और समर्पण से रत हैं और परिणाम के प्रभाव से मुक्त हैं तो इसी वैराग्य की अवस्था में हैं। वैराग्य के लिए न तो कोई उम्र निर्धारित है, न ही विशेष भेषभूषा या कोई विधि विशेष हीं। वैराग्य को श्रीकृष्ण ने जिस तरह यँहा प्रस्तुत किया है वह एकदम अनुकरणीय है बशर्ते कि कर्मयोग का अभ्यास करते करते हम अपनी बुद्धि पर पड़े माया और मोह के आवरण को हटा सकें। कर्मयोग का आचरण करने पर ऐसा होगा ही ये भी निश्चित ही है।
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जिज्ञासा होती है, जानने की इक्षा होती है। यही जिज्ञासा व्यक्ति को अन्वेषण के मार्ग पर ले जाती है। इस संसार में कर्म करने के सम्बंध में भी तरह तरह के सिद्धान्त, ज्ञान मौजूद हैं। व्यक्ति अपने जिज्ञासा वश इनके सम्पर्क में आता है और भाँती भाँति के तर्कों को सुनकर, जानकर दिग्भ्रमित भी हो जाता है। किंतु यदि वह अपनी बुद्धि कर्मयोग में स्थिर करता है और अब तक बताए गये मार्ग पर चलता है तो उसकी बुद्धि का भ्रम दूर होता है जैसा कि पूर्व की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। जब बुद्धि का भ्रम छँट जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सेल्फ/स्व/उसकी आत्मा क्या है, उसे ज्ञात होता है कि वह वास्तव में कौन है। उसे समझ में आ जाता है कि वह देह नहीं है, दिमाग भी नहीं है, किसी कुल का प्रतिनिधि भी नहीं है , किसी जाति और धर्म का सदस्य नहीं है, कोई पेशेवर नहीं है बल्कि वह तो विशुद्ध आत्मा यानी परमात्मा स्वरूप ही है। ये बात पढ़कर, रट कर समझने की बात नहीं है बल्कि कर्मयोग के रास्ते चलकर अनुभूत करने वाला ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद इस व्यक्ति की बुद्धि संसार से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है यानी व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा का संयोग हो जाता है। यही अवस्था योग की है। उसी अवस्था में व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म भी करता है जिसका एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण ही होता है क्योंकि ईश्वर जन जन में होता है। यह बात वह व्यक्ति पढ़कर , रट कर नहीं बल्कि अनुभूति कर समझता है। 
       इसकी प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है। इसे निम्न चरणों में सरलता से समझा जा सकता है।
(1) व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है। जिज्ञासा की हद तो देखिए, दूध पीता शिशु भी चाँद और तारों की जिद्द करता है। आप खुद देख लें कि व्यक्ति अपने शैशव अवस्था से ही कितना कुछ जानने के लिए विकल रहता है।
(2) अब समझने वाली बात है कि सत्य तो एक ही होता है, बाकी सब असत्य ही होते हैं। हर व्यक्ति इस सत्य को पकड़ने और जानने के लिए प्रश्नवाचक मानसिकता/बौद्धिकता लिए अपनी समझ के अनुसार सत्य खोजते रहता है। 
(3) व्यक्ति की जिज्ञासा उसे तरह तरह के ज्ञान और अनुभव से रु ब रु कराती है। लेकिन होता ये है कि सत्य पाने की जगह वह इन भाँति भाँति के ज्ञान और अनुभव के चक्कर में पड़कर भ्रम और आज्ञान का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में उसकी भ्रमित बुद्धि उसे एकलौते सत्य से दूर लेकर चली जाती है। आज भी आप सामाजिक विज्ञान पढिये या दर्शन या भौतिकी, रसायन या जीवशास्त्र, आप हम सब अंतिम सत्य की खोज में लगे होते हैं लेकिन ज्ञान के नाम पर अज्ञानता के कचड़े में फंस जाने की वजग से सत्य तक नहीं पहुँच पाते। 
(4) अज्ञानता के मकड़जाल में फड़फड़ाते हम सब तो अर्जुन हीं है न! श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इतने अज्ञानता से पार पाना है तो हमें कर्मयोग की बुद्धि पर भरोसा करना होगा जो अपने तकनीक से हमारी बुद्धि के भ्रम और भ्रम की जननी माया को समाप्त कर देता है। तब हम सत्य को देख पाते हैं। तब हमारी जिज्ञासाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि तब हमें अपने प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर मिलने लगते हैं।
(5) जिज्ञासा के शांत होने से बुद्धि भी शान्त होती है, प्रश्न करने की ललक कम होती है क्योंकि तब एक एक कर हमारे प्रश्न खत्म होते जाते हैं , उनके उत्तर मिल जाते हैं।
(6) इस प्रकार से शांत चित्त की अवस्था में हमें वैराग्य का ज्ञान होता है और हम अपने स्व को समझने की योग्यता पाते हैं।
(7) अब स्व को समझ कर हम जीवन का समाधान कर सकते हैं यानी समाधिस्थ हो जाते हैं।
(8) समाधि की इस अवस्था में हम जान पा लेते हैं कि हम किस तरह से परमात्मा के ही अंश हैं, हमारी आत्मा परमात्मा के साथ संयोग कर लेती है। 
(9) ये वो अवस्था है जब हमारे सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हो जाते हैं । इस अवस्था में हम न केवल अपने अंदर को खोज पाते हैं बल्कि बाहरी संसार के रहस्यों को भी सहजता से समझ सकते हैं।
(10)  ये अवस्था कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा है।
       आगे श्रीकृष्ण इसी  तरह से कर्मयोग के सैद्धान्तिक पहलुओं और इसके क्रियात्मकता को और भी स्पष्ट करते हैं, जिसके लिए हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा।""
इस उद्धरण को देने के पीछे उद्देश्य यह है कि हम श्रीकृष्ण की उस शिक्षा का पुनः स्मरण कर सकें जिससे यज्ञ का अर्थ स्पष्ट होता है। वस्तुतः जब हम पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों को समर्पित हो कर बिना परिणाम से जुड़े स्वधर्म के अनुसार कर्म करते हैं तो यही यज्ञ है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में बंधते नहीं हैं और कर्म भी करते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 10
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि के पृष्ठभूमि में समझाते हैं कि ये यज्ञ भावना सृष्टि के प्रारम्भ से व्यक्तियों के साथ है और यदि मनुष्य इस यज्ञ भावना से काम करता है तो उसे हर इक्षित वस्तु प्राप्त होती है।  ये यज्ञ भावना वही है जो हम कर्मयोग की बुद्धि में सीखे हैं जो द्वितीय अध्याय में वर्णित है और जिसका एक अंश ऊपर भी दिया गया है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस सृष्टि में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम निःस्वार्थ भाव से अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण समर्पण के साथ करते हैं तो इससे पूरी व्यवस्था को लाभ होता है और वही व्यवस्था हमारी आवश्यकताओं का भी ख्याल रखती है। यदि इस व्यवस्था में कोई एक यूनिट स्वार्थवश होकर कार्य करने लगता है तो संतुलन गड़बड़ा जाता है। हम इसे सबसे बेहतर ढंग से खुद के शरीर के कार्यप्रणाली से समझ सकते हैं। हम जो खाना खाते हैं वह मुँह होते हुए पांचन तंत्र से होता हुआ सभी कोशिकाओं को उनके आवश्यकता के अनुसार पोषण देता है। यदि किसी अंग को ज्यादा या किसी विशेष पोषण की आवश्यकता होती है तो उसे वह प्रदान किया जाता है। सभी कोशिकाएँ  पूरे शारीरिक तंत्र के लिए कार्य करती हैं। यदि शरीर के किसी एक भाग की कार्यप्रणाली गड़बड़ाती है तो पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता है लेकिन यदि सभी कोशिकाएँ अपने निर्धारित कार्य को करती है तो शरीर भी स्वस्थ रहता है और बदले में कोशिकाएँ और सभी अंग भी स्वस्थ रहते हैं। आधुनिक ज्ञान में इसे ही TEAM WORK,  COOPERATIVE, SYNERGY आदि नामों से पुकारा जाता है। यज्ञ की भावना का सार है कि
ONE FOR ALL & ALL FOR ONE. जब हम इस भावना से कार्य करते हैं तो स्वस्थ समाज की रचना होती है, जिस समाज की समृद्धि से हम सभी लाभान्वित होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 11
अब श्रीकृष्ण मनुष्य और उन गुणों जो मनुष्य का उत्थान करते हैं उनके बीच के परस्पर सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश डालते हैं। देव् क्या है? क्या देवता परम् ईश्वर से भिन्न कोई सत्ता होता है? नहीं । परमब्रह्म एक ही है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति भिन्न भिन्न तरह से होती है। यही अभिव्यक्ति देव  या देवता है जो भिन्न भिन्न गुणों यानी दैवी गुणों से प्रकट होकर व्यक्ति को प्रखर करती है, प्रकाशित करती है। दैवी गुण ही देवता हैं। जब व्यक्ति इन गुणों यानी इन देवताओं की शरण में जाकर उनके प्रति समर्पित होता है तो ये गुण बढ़ते हैं, समृद्ध होते हैं और साथ ही साथ ये व्यक्तियों का भी उत्थान करते हैं। ये परस्पर होता है। यदि हम खुद की बौद्धिकता को तराशते हैं , उनको माँजते हैं तो उनकी चमक, उनकी धार हमें प्रकाशित करती है, हमें धार प्रदान करती है। एक की वृद्धि दुसरे की भी वृद्धि सुनिशित करती है। बिना इसके व्यक्ति के उत्थान की कल्पना भी नहीं है। यही तो यज्ञभावना है।
  यज्ञ की भावना क्या है? हम पीछे देखते हैं कि परस्पर उन्नति की भवना ही यज्ञभावना है, यानी निःस्वार्थ भाव से दूसरे की सेवा करना ही यज्ञ भावना है। जब सहयोग और अनुशासन में रहकर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म में प्रवृत्त होते हैं तो पूरे मनोयोग से उसे करते हैं और यही तो उस कर्म की उत्पादन क्षमता भी होती है जो प्रकट होकर हमारी समृद्धि को बढ़ाती है। इसके विपरीत यदि हम तुक्ष आसक्ति भाव से खुद के लिए जब कार्य करते हैं जिसमें समष्टि के प्रति कोई समर्पण नहीं होता है तो हमारे कर्म से उन महान उद्देश्यों का भला नहीं हो पाता, उसकी उत्पादन क्षमता गिर जाती है, उन सद्गुणों का जो उन कर्मों की धार होते हैं उनमें वृद्धि नहीं हो पाती और नतीजा में कर्म निष्फल होकर रह जाते हैं, उनसे दैवी सद्गुणों का विकास नहीं होता जिसके परिणाम स्वरूप न तो व्यक्ति का न ही समष्टि का ही कल्याण हो पाता है।  व्यक्ति जिस हद तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म करता है उस हद तक व्यक्ति और समाज का पतन होता है। सो ये जरूरी है कि हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर कर्म करें। जब हम उच्च आदर्श को अपना लक्ष्य मानकर , उस आदर्श की सेवा करते हैं , उसके प्रति ही समर्पित होते हैं तो वही आदर्श हमारा कल्याण करता है। यह व्यक्ति के लिए सही है, तो साथ साथ व्यक्तियों के समूहों, संगठनों , समाज के लिए भी सही है। सम्पूर्ण हार्मोनी ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। व्यक्ति मैं नहीं हम की भावना से चलती है। यदि किसी संगीत समारोह में सभी वादक अपना अपना साज अपनी अपनी इक्षा से बजाने लगे तो सिर्फ और सिर्फ शोर पैदा होता है लेकिन यदि एक राग विशेष के लिए सभी उस राग को जन्म देने  के उद्देश्य से साजों को बजाते हैं तो मधुर संगीत निकलता है। साजों की हार्मोनी से राग बनते हैं न कि जबरन साजों का महत्व साबित करने के लिए उनको लगातार बजाने से। प्रत्येक व्यक्ति यदि खुद से अधिक दूसरे के महत्व को तवज्जो देता है तो इस हार्मोनी की पैदाइश होती है। इस प्रकार यज्ञ भावना एक सामूहिक प्रयास है उच्च आदर्शों के प्रति और यही उच्च आदर्श पूर्ण होकर व्यक्ति का कल्याण करता है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह इन दैवी सद्गुणों का विकास करे जो अंततः उस व्यक्ति को उसके परमलक्ष्य की प्राप्ति को सम्भव करता है। सो हमें चाहिए कि हम इस संसार के साथ हार्मोनी यानी सजातीय प्रवृत्तियों , उन प्रवृत्तियों जिनसे यज्ञ भावना बलवती होती है उनके साथ हार्मोनी में रहें। 
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 12 , 13
श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि यज्ञ भावना से व्यक्ति किस तरह लाभान्वित होता है। जब हम सम्पूर्ण समर्पण से, बिना परिणाम की अपेक्षा किये, अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो दैवी सम्पदाओं में तो उन्नति होती ही है साथ ही कर्म के मार्ग में कर्म की उतपादक क्षमता भी बढ़ती है जिससे वो व्यक्ति भी जो कर्म में क्रियाशील है वो भी लाभान्वित होता है। व्यक्ति जब सामूहिक हित की वृद्धि में अपना योगदान देता है तो वही सामूहिक हित व्यक्ति के हित का ख्याल कर उसकी पूर्ति भी करता है। लेकिन समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना सामूहिक हित, बिना दैवी सम्पदाओं की उन्नति में अपना योगदान दिए सामूहिक हित के लाभों का उपभोग भी करना चाहते हैं। ऐसे लोग चोर हैं। बिना अपने हिस्से का दायित्व निभाये, बिना कर्म किये जो चाहता है कि उसकी उन्नति हो , उसका भला हो, उसका प्रयोजन सिद्ध हो वो व्यक्ति दूसरे के हिस्से को मारता है सो वह निश्चित ही चोर है। इस प्रकार दैवी सम्पद यानी उत्पादन क्षमता का त्याग और समर्पण की भावना पर आधारित कर्म द्वारा पोषण होता है जिससे उनमें वृद्धि होती है  और बदले में उस उत्पादन क्षमता यानी दैवी सम्पदाओं में हुई वृद्धि से समाज की इकाई के रूप में उस व्यक्ति की भी वृद्धि होती है।  यदि कोई व्यक्ति सामूहिकता के इस सिद्धान्त को तोड़कर ये चाहे कि इस कॉमन गुड में वो अपना योगदान भी न दे यानी उस कॉमन गुड़ के प्रति अपना निर्धारित कर्म भी न करे और कॉमन गुड़ से होने वाले लाभ का फायदा भी उठाए तो फिर वह व्यक्ति तो चोर ही  कहलायेगा न!  समाज का वह व्यक्ति जो बिना उत्पादन किये समाज की सपंत्ति का उपभोग करे वो व्यक्ति निश्चित रूप से समाज का अपराधी भी है और समाज पर बोझ भी है। इस तरह के व्यक्ति के अंदर नाकारात्मक प्रवृत्तियाँ, अंधकार , आदि की ही वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति समाज के हित को दरकिनार कर सिर्फ अपने बारे में सोचता है। जो सिर्फ अपने हित की वृद्धि की बात सोचता है वह व्यक्ति निरन्तर समाज की उपेक्षा करता है, वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का दमन करता है और इस प्रकार वह सिर्फ अपने पाप को ही बढ़ाता है।
   लेकिन इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने हिस्से का कर्म कर उस कर्मफल को प्रसाद की तरह लेता है वही श्रेष्ठ होता है क्योंकि वह सम्पूर्ण सामाजिक हित में अपना योगदान देकर उनसे प्राप्त फल को प्रसाद की तरह पाता है। हम जो अर्पित करते हैं बदले में भी वही पाते हैं। जो हम हम अर्पित करते हैं वही  कर्म अर्पण के पश्चात प्रसाद कहलाते हैं और वही हमें बदले में मिलते भी हैं।  जो व्यक्ति अपने हिस्से के कर्म को पूर्ण समर्पण की भावना से उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर करता है उसे जो फल प्राप्त होता उसे वह प्रसाद की तरह लेता है और उस स्थिति में उसे पूर्ण मानसिक शांति की प्राप्ति होती है जिसके कारण उसकी यात्रा अपने पूर्णता की तरफ होती है। वह पूर्ण संतोष को, पूर्ण प्रसन्नता को प्राप्त होता है।  लेकिन इसके विपरीत जो सिर्फ अपने लाभ के विषय में सोचता है, भले इससे लोगों का अनिष्ट होता रहे तो वह व्यक्ति पाप यानी अशुद्धि यानी गन्दगी ही पकाता और खाता है अर्थात उसके अंदर सिर्फ और सिर्फ अशुद्धि यानी गंदगी का ही विकास होता है, आसुरी सम्पदाओं की ही वृद्धि होती है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को हम सारांश में इन सोपानों में समझ सकते हैं--
1.व्यक्ति को निश्चित ही अपना कर्म करना चाहिए।
2. उसे अपने हिस्से का कर्म करना चाहिये।
3.उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण की भावना से कर्म करने चाहिए।
4. उसे कर्म करते समय सिर्फ अपने लाभ के विषय में न सोचकर समस्त व्यवस्था के वृद्धि के विषय में सोचना चाहिए, यानी स्वार्थ नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से कर्म करने चाहिए।
5.जब व्यक्ति इस तरह से कर्म करता है तो उसे जो मिलता है वह वही होता है जिससे सामूहिक हित का पोषण होता है। इसी पोषण से उसका भी पोषण होता है।
6.इस तरह व्यक्ति को पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का सन्तुष्ट व्यक्ति परम् शांति और सुख को प्राप्त करता है।
7. जो ऐसा नही कर सिर्फ अपनी भलाई की सोचता है वह व्यक्ति समाज के सामूहिक हित का अहित कर अपना लाभ बढाना चाहता है।  इस प्रकार के व्यक्ति के अंदर नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा दूसरों को दुख देने, उनका हक मारने, दूसरों से धोखाधड़ी करने, दूसरों से दुर्व्यवहार करने, उनसे झूठ बोलने,की वृद्धि होती है।
8. जो हम उच्च आदर्शों को समर्पित करते हैं वही हमें प्रसाद के रूप में प्राप्त होता है। सो हमें चाहिए कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करें ताकि हमें जो मीले वो भी सर्वश्रेष्ठ हो। 
9. इस प्रकार जब हम ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम उच्च आदर्शों के प्रति  समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम निस्वार्थ भाव से सामूहिक कल्याण और सामूहिक वृद्धि की भावना से कर्म करते हैं तो प्रसाद में भी उन्नति ही हमें मिलती है। लेकिन यदि हम स्वार्थवश होकर कर्म करते हैं , सिर्फ अपने हित को साधने के लिए दूसरों को कष्ट देने के उद्देश्य से कर्म करते हैं तो हमें बदले में वही अहितकारी, नाकारात्मक , चीजें प्राप्त होती हैं जिससे हम निरन्तर असन्तुष्ट ही रह जाते हैं, बेचैन ही रह जाते हैं।
10. जो व्यक्ति बिना समाज के व्यापक हित में योगदान दिए सिर्फ अपना ही हित साधने के चक्कर में रहता है वह सिर्फ अशुद्धि को यानी नाकारात्मकता यानी आसुरी सम्पदाओं जैसे लोभ, मोह, क्रोध, छल, हिंसा, आदि को बढ़ाता है।
     हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म नही अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 14 एवम 15
हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म भी अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।
  इस यज्ञभावना को स्मरण रखते हुए  श्रीकृष्ण की शिक्षा को समझने के लिए हम आगे बढ़ते हैं तो समझते हैं कि परमपिता परमेश्वर ही सर्वज्ञानी होता है, और उसी से ज्ञान की सरिता बहती है। ये हमेशा ध्यान रखने की बात है कि ज्ञान से ही कर्म की उत्पत्ति होती है। जब हमारे अंदर ज्ञान की भावना होती है तो हमारे कर्म यज्ञ भावना से संचालित होते हैं। यज्ञभावना से किये गए कर्म अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं जिनसे इक्षित व्यस्तुओं जिनसे हमारा भरण पोषण हो सकता है उत्पन्न होते हैं। यदि कर्म ज्ञान आधारित न हों, स्वेक्षाचार से संचालित हों तो फिर उनमें यज्ञ भावना नहीं हो सकती और बिना यज्ञ भावना के हमारा भरण पोषण करने वाले इक्षित फल भी अप्राप्त रहेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म की यज्ञभावना में ईश्वर का वास है।
प्रत्येक कार्य क्षेत्र में उपभोग्य लाभ होता है जो उस कार्य क्षेत्र का अन्न है जिसमें भरण पोषण करने की क्षमता होती है। यह उपभोग्य लाभ तभी प्राप्त होता है जब उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हों यह अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि होती है जो निःस्वार्थ त्याग और सेवाभाव से किये गए स्वदाव्यित्व निर्वहन वाले कर्मों से सम्भव हो पाता है। यही कर्म यज्ञ हैं। जब परिस्थिति अनुकूल होती है तो उस कार्यक्षेत्र के उपभोग्य लाभ प्राप्त होते हैं जो उस कार्य क्षेत्र में लगे व्यक्तियों को उनके इक्षित फल प्रदान करते हैं यानी उनका भरण पोषण करते हैं।
     अब आइये इसे थोड़ा और विस्तार से समझें। जब हम किसी तंत्र को पूरी तरह से जानते समझते हैं तभी हम तय कर सकते हैं कि उस तंत्र के लिए क्या सही है क्या गलत है। इसी प्रकार संसार की पूरी समझ जब होती है तभी ज्ञात हो पाता है कि संसार के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है।  चेतना (consciousness) ही ज्ञान है। कोई वस्तु या पदार्थ उपलब्ध है, कोई जानकारी उपलब्ध है ये तबतक हमारे लिए अर्थहीन है जब तक उसकी चेतना यानी उसके सम्बन्ध में हमें consciousness नहीं है। यही चेतना ब्रह्म है, वेद है। हमें नित्य होने वाले परिवर्तनों की चेतना होती है। सूक्ष्म परिवर्तनों की भी चेतना हमें होती है। परिवर्तनों को वही चेतना समझ सकती है जो स्वयम अपरिवर्तनशील हो। यदि वह चेतना भी खुद परिवर्तनशील है तो फिर होने वाले परिवर्तनों को वह चेतना समझ पाने में सक्षम नहीं हो सकती। इसी कारण यह ब्रह्म अपरिवर्तनशील, और क्षरनरहित यानी अक्षर है। और यही अक्षर हमारा अपना सेल्फ है, अपनी आत्मा है। इसी चेतना से कर्म करने की क्षमता उत्पन्न होती है। कर्म करने की क्षमता सभी में होती है। लेकिन सभी कर्मों से सकारात्मकता नहीं उत्पन्न होती। जब कर्म निःस्वार्थ भाव से किये जाते हैं , जब उनमें अन्य के कल्याण की भावना होती है, जब अन्य के लिए समर्पण और त्याग की भावना होती है तो उस कर्म को यज्ञ की संज्ञा दी जाती है। इस यज्ञ भावना के कारण ही हमारे बन्धन खत्म हो पाते हैं। जब हम अन्य के प्रति समर्पित होकर, उसके लिए त्याग की भावना से कर्म करते हैं तो हम खुद की परिधि से बाहर निकल कर जीने लगते हैं। हमारे समर्पण और त्याग की सीमा जितनी बड़ी होती है हम खुद से बाहर निकल कर उतनी दूरी तक विस्तारित होते हैं। स्वार्थ के कारण हम I , ME,  & MY से बाहर नहीं निकल पाते। हम खुद के शरीर से बन्धें रहते हैं। लेकिन जब हम सेवा, त्याग और समर्पण की भावना से कर्म करते हैं तो हमारे सेल्फ का विस्तार हमारे अपने अस्तित्व से बाहर जाकर होता है, हम खुद से बाहर निकल कर परिवार, समाज, देश और पूरे संसार तक फैल सकते हैं। हम अपने बन्धनों से बाहर निकल जाते हैं। यही भवना यज्ञ की भावना है। इसी भावना से वृष्टि होती है यानी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि है जो अन्न उत्पादन को सम्भव करती है। अन्न वो वस्तु है जिसका हम उपभोग करते हैं। जब समाज से सदस्य इस यज्ञ भावना से कार्य करते हैं अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं, जिनके कारण समाज इक्षित व्यस्तुओं और परिणामों को जन्म दे पाता है जो उसके सदस्यों के लिए इक्षित होते हैं। अतएव व्यक्ति और समग्र तंत्र के विकास के लिए ये जरूरी है कि सभी व्यक्ति इस यज्ञ भावना से कर्म करें, इसी TEAM SPIRIT से कार्य करें। इससे उत्पादन होता है। जितनी अधिक यज्ञ भावना होगी उतनी ही अनुकूल स्थिति होगी और उत्पादन क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी और परिणाम में तंत्र के सदस्यों का भरण पोषण भी उतने  ही अच्छे तरह से होगा। इस प्रकार ही कर्मों से तंत्र का विकास होता है और तंत्र बदले में हमारा विकास करता है। ये भरण पोषण भौतिक और आध्यात्मिक सभी तथ्यों पर लागू होता है। इससे स्पष्ट है कि ब्रह्म यानी SUPREME REALITY इस यज्ञ भावना में ही वास करता है। जब हम कर्म, कर्म के परिणाम और अंततः स्वयम को SUPREME REALITY के प्रति समर्पित कर देते हैं तो बदले में हम उस ब्रह्म यानी SUPREME REALITY को प्राप्त करते हैं। ये ठीक उसी प्रकार होता है जैसे वर्षा की बूंद अगर सागर में गिरती है तो सागर बन जाती है, गंगा में गिरती है तो गंगा बन जाती है। इसी प्रकार यदि हम खुद को जिस त्याग और समर्पण की भावना से समर्पित करते हैं उसी रूप में खुद को पाते हैं। यदि हम सम्पूर्णता से अपने को, अपने ईगो को परम के प्रति यानी TOTAL REALITY के प्रति समर्पित करते हैं तो बदले में हम परमब्रह्म यानी TOTAL REALITY ही पाते हैं। हमारा समर्पण, हमारा त्याग ही तय करता है कि हमारी उपलब्धि क्या होगी। इस भावना से कर्म करने पर हम स्वयम को, स्वयम के सेल्फ को समझ पाते हैं और ब्रह्म में अधिष्ठापित हो पाते हैं। इस स्थिति में हम बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार कर्म ही यज्ञ बनकर हमें कर्मबन्धनों से मुक्त करता है। 
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 16
तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यही एक तरीका है (जिसका वर्णन ऊपर किया गया है) जीवन जीने का। जो व्यक्ति कर्मपथ में यज्ञ की भावना से नहीं बढ़ता, कर्म नहीं करता, वैसा व्यक्ति हमेशा अपने इन्द्रियों के सुखों की पूर्ति में लगा रहता है, और सो माया, मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, जैसी भावनाओं में डूबा रहता है। इस तरह के व्यक्ति का जीवन जिसमें समर्पण , परमार्थ, त्याग नहीं होता, जिसमें  नियत सृष्टि चक्र के साथ सामंजन नहीं होता नाकारात्मकता से यानी पाप से यानी काम, लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या आदि से अभिशप्त हुआ व्यर्थ होता है क्योंकि इससे न तो उस व्यक्ति का कल्याण होता है न ही समाज का।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 17 एवम 18
श्रीकृष्ण बता चुके हैं कि कर्मनकरने का एकमात्र दृष्टिकोण यज्ञभावना है और यज्ञ भावना क्या है ये भी समझा चुके हैं। वे यह भी समझा चुके हैं कि इसी यज्ञ भावना से कर्म करने पर व्यक्ति कर्म के बंधनों से मुक्त होता है यानी परम् नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त कर पाता है।  अब श्रीकृष्ण समझते हैं कि जब कोई व्यक्ति इस यज्ञ भवना से संचालित होकर कर्म करने लगता है तो वह व्यक्ति आत्मनिष्ठ हो जाता है। यह वह अवस्था होती है जब व्यक्ति अपना अहंकार यानी अपना ईगो त्याग कर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा से एकात्मक हो जाता है। । त्याग, परमार्थ, सेवा और समर्पण की भावना से ओतप्रोत ये व्यक्ति अपने ईगो से मुक्त होता है और वह सब जीवों में अपनी आत्मा का प्रसार पाता है। हम जो अपने बारे में सोचते हैं और उस सोच के अनुसार अपना जो इमेज गढ़ते हैं वो हमारा ईगो होता है लेकिन हम जब खुद के इमेज से बाहर निकल कर यज्ञ की भावना से परिपूर्ण होते हैं तो हमारा ईगो नष्ट हो जाता है और हम सब तरफ अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं, सभी में अपना ही स्वरूप पाते हैं और अपने में सबको पाते हैं। इस अवस्था में हम आत्मनिष्ठ होते हैं और इस अवस्था में कोई कर्म करने को शेष नहीं रह जाता यानी कोई निर्धारित कर्म नहीं होता जिसे हमें करना ही हो।
इस अवस्था में जब व्यक्ति आ जाता है तो उसे किसी कर्म को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उसे न तो किसी चीज की आवश्यकता रह जाती है , न ही उसका किसी में कोई स्वार्थ शेष रह जाता है। फिर भी ऐसा व्यक्ति कर्म करता है । उसका कर्म किसी स्वार्थ या आवश्यकता पर नहीं आधारित होता, बल्कि वह तो मात्र प्रेम और अनुकम्पा के कारण कर्म करता है, उसके कर्म उन लोगों के लिए पथप्रदर्शन के लिए होते हैं जो अभी यज्ञ मार्ग पर चलना सीख रहे होते हैं।
    कर्मयोग यानी यज्ञ मार्ग पर चलकर व्यक्ति  को संतोष और तृप्ति की प्राप्ति होती है। विदित हो कि सारे व्यक्ति तृप्ति और संतोष के लिए ही सब कर्म करते हैं , लेकिन जब तृप्ति और संतोष मिल ही जाए तो फिर कोई इक्षा कँहा बची रह जाती है और इक्षा से मुक्त हुए व्यक्ति के लिए कर्म करने का क्या उद्देश्य रह जाता है। सो कर्म करना आवश्यक नही रह जाता। द्वितीय अध्याय में हमने स्थितप्रज्ञ व्यक्ति यानी ENLIGHTENED MASTER के लक्षणों को देखा था, सो इस प्रसंग को समझने के लिए एकबार पुनः हम उस प्रसंग पर दृष्टिपात कर सकते हैं।

      
##श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं---
1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं?
2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।
          स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वो है जिसका ज्ञान स्थिर है अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अंतिम सत्य प्राप्त हो चुका है।  हम सब जानते हैं कि हमारा ज्ञान निरन्तर परिष्कृत होता है। इस संसार के विषय में हम जितना पहले जानते थे उससे अधिक आज जानते हैं , और भविष्य में आज से भी अधिक जानेंगे। संसार नित्य परिवर्तनशील है सो इससे सम्बन्धित हमारा ज्ञान भी परिवर्तनशील होता है। वैज्ञानिक ज्ञान भी जिसके माध्यम से हम संसार की गतिविधि को समझते हैं वो निरन्तर परिष्कृत होते रहता है।  इस ज्ञान का कोई और छोर नहीं है, इसका कोई अंत नहीं। हम जितना जानते हैं उससे कई गुणा नहीं जानते हैं जिसे जानने के लिए हम नियमित अग्रसर रहते हैं। न तो प्रकृति में होने वाले परिवर्तन रुकेंगे, न ही हमारा प्रकृति का ज्ञान। सो भौतिक संसार का ज्ञान प्राप्त कर कोई भी अंतिम रूप से ज्ञानी नहीं हो सकता, सो ऐसे व्यक्ति का कोई अंतिम ज्ञानी हो ही नहीं सकता । अतएव इस तरह के व्यक्ति के सम्बंध में अर्जुन  का  कोई प्रश्न नहीं हो सकता है। 
      तो फिर कौन व्यक्ति स्तित्प्रज्ञ कौन है? स्तित्प्रज्ञ वो है जिसे अपरिवर्तनीय का ज्ञान प्राप्त है। अपरिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील, अक्षय, अविकारी हमारा सेल्फ है, हमारा स्व है, हमारी आत्मा है और जो अपने सेल्फ को जनता है वही स्थितप्रज्ञ है। यदि हम खुद को परिभाषित करते हैं तो हम खुद की वर्तमान स्थिति बताते हैं। ये स्थिति बदलती रहती है। लेकिन जो व्यक्ति नियत रास्ते पर चलकर , जो कर्मयोग का रास्ता है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा के अस्तित्व को पहचान लेता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्जुन इसी व्यक्ति की रहनी को समझना चाहता है।
     जो व्यक्ति उपरोक्त ढंग से स्थितप्रज्ञ है वो निश्चित ही समाधिस्थ है। समाधि में अवस्थिति का क्या अर्थ है? जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग समझा रहे होते हैं तो बताताते हैं कि कर्मयोगी विरागरत होता है। यही विराग समाधि की अवस्था होती है। समाधि की अवस्था ध्यान केंद्रित करने की अवस्था से भिन्न है। ध्यान केंद्रित करना एक मानसिक अवस्था होती है जिसमें हमारा ध्यान किसी एक चीज पर केंद्रित होता है, उसके अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर नहीं। लेकिन इस अवस्था में व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से भी विरागरत होता हो कोई आवश्यक नहीं, सो ध्यान की यह क्रिया जिसमें वैराग्य का भाव ही नहीं हो एक तन्द्रा मात्र है जिसके टूटते व्यक्ति फिर से उसी परिवर्तनशील संसार के मोहजाल, उसी परिणाम की दुनिया में लौट जाता है। लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से कर्म करते करते परिणाम के प्रभाव से मुक्त होकर वैराग्य की अवस्था में आता है तब उसको ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ता बल्कि वो तो सोते जागते अपने ही आत्मा में , अपने ही सेल्फ में रहता है। यही समाधि की स्थिति है। समाधि की स्थिति भभूत लगागकर, दाढ़ी मूँछ बढाकर, जटा लटकाकर, विचित्र भेष भूषा धारण कर नहीं मिलता  है।
      इस प्रकार जो स्थितप्रज्ञ है वो समाधिस्थ भी है हीं। यदि हम भी अपने सेल्फ को समझना जानना चाहते हैं तो ये आवश्यक है कि हम इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षणों को जाने समझें और आत्मसात करें। सो अर्जुन इस तरह के व्यक्ति के लक्षणों को जानने की इक्षा व्यक्त करता है।
    अर्जुन जानना चाहता है कि इस प्रकार का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता, बैठता और चलता है अर्थात वह जानना चाहता है कि इस प्रकार के व्यक्ति की रहनी कैसी होती है, उसका सामाजिक समव्यव्हार कैसा होता है। अर्थात यह व्यक्ति अपना सामाजिक जीवन कैसे व्यतीत करता है, अपने वातावरण से उसका सामाजिक लेन देन किस तरह से होता है।  
        यदि कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य तक पहुँचना चाहे तो दो बातें अनिवार्य हैं
1. पहला तो उसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, उसे स्पष्ट होना चाहिए कि दरअसल वो चाहता क्या है।
2.दूसरे की उसका लक्ष्य ही उसकी प्रेरणा हो। जब लक्ष्य प्रेरणा में बदल जाता है तो लक्ष्य स्वपोषित हो जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति को किसी अन्य उत्प्रेरक या प्रेरणाश्रोत की आवश्यकता नही रह जाती है। वह स्वतः हो उस लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जाता है। गीताकार ने अर्जुन के माध्यम से हमें समझाया है कि हम किस तरह से अपने को अपने सेल्फ को खोजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी चीज को देखने का दो नजरिया होता है। एक कि हम खुद उसे कैसे देखते हैं। और दूसरा की अन्य लोग उस चीज को कैसे देखते हैं। जब हम स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों  को जानना चाहते हैं तो एक नजरिया तो यह है कि वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति खुद को कैसे और किस रूप में देख पाता है और दूसरे कि हम उसे किस तरह से समझ पाते हैं। 
     सवाल उठता है कि अर्जुन इस प्रकार का प्रश्न ही क्यों करता है। जब हम गहरे विषाद की अवस्था में होते हैं और यदि उस समय हमें कर्मयोग सदृश्य समझ दी जाती है तो सहज ही कई प्रश्न मन में उठने लगते हैं, यथा हमें कर्म न कर मात्र बुद्धि के ही शरण में क्यों नही रहना चाहिए, क्यों हम वैराग्य और सन्यास की बात करें, क्यों न हम भी सारे जंजाल को छोड़कर वैराग्य और समाधि का मार्ग पकड़ लें, आदि आदि। हम सब वैराग्य और समाधि के उन प्रचलित अर्थों से ही वाकिफ होते हैं जो समाज में बोल चाल की भाषा में प्रचलित हैं। हम श्रीकृष्ण की शब्दावली में इनका अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं। दृष्टि को साफ कर देने के लिए, समझ से भ्रांति को दूर करने के लिए ये जरूरी है कि हम जाने कि श्रीकृष्ण जिस अवस्था को प्राप्त करने की शिक्षा दे रहें हैं उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति क्या और कैसे कुछ भी करता धरता है।
    अर्जुन का प्रश्न हमारी समझ को झझकोरता है, उद्वेलित करता है, हमें प्रेरित करता है कि कर्मयोग का व्यवहारिक  ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात हम समझ सकें कि हमे किस तरह के व्यक्ति के रुप में विकसित होना चाहिए।

     
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की बुद्धि को समझा देते हैं तो अर्जुन उस व्यक्ति की विशिष्टताओं को जानने की इक्षा व्यक्त करता है कि जो  कर्मयोग की बुद्धि से युक्त होता है। तब श्रीकृष्ण इस तरह के व्यक्ति के विशेषताओं को भी बताते हैं जो निम्न हैं-
   स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण


1.कामना का सर्वथा अभाव

2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि

3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,

4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित

5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण

6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति

इनको समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि



         अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।

          पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--


1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।

2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।

3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।

4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।

5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 


उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--

1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।

      हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं

   क. अस्तित्व की रक्षा

   ख. सुरक्षा

   ग. ज्ञान की प्राप्ति

   घ. सुख और आनंद की प्राप्ति

जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।

    लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है। 



2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।

     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।

 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।

    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।


3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 

   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 

    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।

    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।


2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।

     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।

 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।

    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।


3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 

   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 

    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।

    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।



4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।

यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से  हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।

     तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।

    स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।



5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है।

और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चलाये बल्कि व्यक्ति के अनुसार इन्द्रियाँ व्यवहार करें। हमारी इन्द्रियाँ हमें वाह्य संसार की अनुभूति कराती हैं। यदि हमारी  इन्द्रियों का हमपर नियंत्रण होगा तो हमारी समस्त चेष्टाएँ भी वाह्य संसार की प्रतिक्रिया में ही रह जाएंगी। हम हमेशा अस्थिर बने रहेंगे। तब भला स्व की खोज क्या कर पाएँगे।




6. .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

     इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है वो भी इन्द्रियों के प्रभाव से तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसे अपने सेल्फ की समझ नहीं हो जाती और उस काल में वह व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के साथ पूर्ण आसक्ति मुक्त हुआ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर सिर्फ नियंत्रण ही नहीं होता है बल्कि उससे आगे जाकर इन्द्रियों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।

    इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक  से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।

    लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।

      हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी  इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे।  श्रीकृष्ण  समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।



अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण


1.कामना का सर्वथा अभाव

2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि

3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,

4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित

5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण

6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति

7.अहंकार का अभाव

      उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।

        हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द  हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।

      अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी ।  इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।

      उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
।।24।।
अभी तक ये स्पष्ट हो चुका है कि कर्मयोग से कर्म करने के क्या मायने हैं, क्या तरीके हैं और इस प्रकार से किया गया कर्म ही श्रीकृष्ण की शब्दावली में यज्ञ है। यज्ञकर्म के सम्बंध में हमने तृतीय अध्याय से विस्तार से जाना है और उसे पुनः अभी दुबारा देखा समझा भी है। ये भी स्पष्ट हो चुका है कि जब व्यक्ति यज्ञ भावना से कर्मयोग में प्रवृत्त होकर कर्म करता है तो उसे इस बात का ज्ञान हो जाता है कि उसका वास्तविक स्वरूप उसका भौतिक देह नहीं है बल्कि उसका सेल्फ यानी स्व है जिसे हम आत्मा के नाम से सम्बोधित करते हैं। ये आत्मा ही ब्रह्म है । व्यक्ति के दृष्टिकोण से जो आत्मा है वही सम्पूर्णता में ब्रह्म है यानी परमात्मा है। आत्मा की पहचान को द्वितीय अध्याय में हमने समझा है।
        अब इस पृष्ठभूमि में हम जब इस श्लोक को ""ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्रौ ब्रह्मणा हुतम्‌। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥"" को समझने का प्रयास करते हैं तो स्पष्ट होता है कि कर्मयोग में कर्म, कर्म करने के साधन, कर्म में प्रयुक्त साधन, कर्म के इष्ट, कर्म के लक्ष्य , कर्म फल , सब कुछ अपनी आत्मा, अपने स्व का विस्तार मात्र हैं। इस दृष्टिकोण से जब व्यक्ति कर्मयोग का आचरण करता है यानी यज्ञ कर्म करता है तो फिर उसके लिए भेद भाव, द्वंद्व, असमानता, आदि सभी भाव गौण होते हैं और वह व्यक्ति हरेक में अपनी ही आत्मा का विस्तार पाता है और इस प्रकार उसका योग अपने परम लक्ष्य से हो जाता है। न तो वह ब्रह्म से अलग है न ब्रह्म उससे अलग है।
 ।।25।।
1.दैव यज्ञ
श्रीकृष्ण ने पूरी गीता में कर्मयोग के आचरण पर ही जोर दिया है और समझाया है कि कर्मयोग का आचरण कैसे करना है। कौन सा कर्म करना है इसे परिभाषित करते हुए समझाया है कि कि नियत कर्म करना है । नियत कर्म कौन सा है, इसे समझाते हुए कहा है कि नियत कर्म यज्ञ का कर्म है। अर्थात कर्मयोग में यज्ञकर्म करना है। यज्ञ कर्म क्या है , इसे हमने ऊपर देखा है तथा समझा है कि जब व्यक्ति यज्ञ कर्म के शिखर पर पहुँच जाता है तो उसके लिए सब कुछ ब्रह्म यानी आत्मस्वरूप हो जाता है। ऐसा व्यक्ति मात्र दूसरों के लिए ही कर्म करता है।
     लेकिन यह शिखर अचानक नहीं प्राप्त होता है, बल्कि क्रमिक सोपानों पर चढ़ते हुए व्यक्ति यज्ञ कर्म के शिखर तक पहुँचता है। तो शुरुआत कँहा से करें, इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण ने क्रमिक रूप से विभिन्न यज्ञ कर्मों को समझाया है।
      जब  व्यक्ति कर्मयोग के मार्ग पर चलना प्रारंभ करता है तो सबसे पहले उसे दैव यज्ञ करना है। इस यज्ञ में व्यक्ति देवता की पूजा आराधना करना शुरू करता है। वस्तुतः देवता क्या है? देवता दैवी गुणों को व्यक्त करता स्वरूप मात्र है। अर्थात कर्मयोग के आचरण के प्रथम सोपान, दैव यज्ञ में व्यक्ति को श्रेष्ठजन के सानिध्य में रहकर उनके मार्गदर्शन में अपने भीतर दैवी सम्पद की वृद्धि करनी होती है। यही कर्मयोग की प्रारंभिक अवस्था है, प्रवेशिका है। इसी रास्ते चलकर यानी अपने अंदर दैवी सम्पद की वृद्धि कर व्यक्ति आत्मस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है यानी उसे अपने सेल्फ का ज्ञान होता है। 
तत्पश्चात व्यक्ति दैवी सम्पद् की वृद्धि कर सदगुरू को ही उद्देश्य बनाकर उसका ध्यान करता है अर्थात व्यक्ति परम् लक्ष्य की तरफ बढ़ता है। इसका अर्थ ये समझें कि परम् को लक्ष्य बनाकर खुद के भीतर दैवी सम्पद की वृद्धि करने को ही दैव यज्ञ कहते हैं।
।।26।। एवम ।।27।।
कर्मयोग के माध्यम से व्यक्ति के उत्थान हेतु यज्ञ कर्म के क्रमबद्धता को बनाये रखना अति आवश्यक होता है। प्रथम चरण में व्यक्ति को अपने अंदर दैवी सम्पद की बृद्धि करनी होती है तो आइए देखें द्वितीय चरण का यज्ञ कौन सा है।
2.संयम यज्ञ
दैवी सम्पद की बृद्धि के उपरांत व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने इन्द्रिय पर विजय प्राप्त करे। इन्द्रियों पर नियंत्रण ही सयम कहलाता है। इन्द्रियों के वश में होकर व्यक्ति की चेष्टाएँ बाहर की तरफ भागती हैं । तब व्यक्ति को सयम रूपी अग्नि में इन्द्रियों की इन चेष्टाओं को भस्मसात करना होता है। ध्यान रहें , श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के उत्थान का मार्ग इसी जीवन में इसी संसार में बताया है सो इस संसार में रहकर जिन सावधानियों को बरतना है वही सयम यज्ञ में सिखलाई गई हैं।
     इन्द्रियों के प्रभाव और इनपर प्रभावी नियंत्रण के उपाय को श्रीकृष्ण ने द्वितीय और तृतीय अध्याय में भी बताया है। तो आइए देखें श्रीकृष्ण ने इस सम्बंध में जो कुछ पूर्व में कहा है उसका क्या तातपर्य है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28
हमने देखा है कि श्रीकृष्ण परिणाम से असंग(detached) होकर कर्म करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि कर्म के  परिणाम से खुद को विच्छेदित कर कर्म किया कैसे जाए। जब हम परिणाम से जुड़कर कर्म करते हैं तो ये प्रतीत होता है कि हम कर्म कर रहें हैं यानी कर्ता हम ही हैं। क्या ये सोच सही है? इसे समझने के लिए हमें अपनी आँखें थोड़ी और खोलनी होगी, अपने बौद्धिकता पर थोड़ा और बल देना होगा। हमें पुरुष और प्रकृति की अवधारणा को समझना होगा। प्रकृति मैटर को कहते हैं जबकि पुरुष उस प्रकृति का कॉन्सियसनेस है। यँहा पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष से नहीं है, बल्कि पुरुष यानी कॉन्सियसनेस से है। प्रकृति में तीन गुण विद्यमान रहते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। ये गुण प्रकृति में हमेशा ही विद्यमान होते हैं और यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। इनकी परस्पर मात्रा के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बनता है लेकिन यह व्यक्तित्व हमारे ईगो की दर्शाता है न कि हमारे स्व को।
तमोगुण यानी inertia यानी जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में बने रहने का गुण है। रजोगुण activity को व्यक्त करता है । मैटर अपने तमोगुण के कारण अपनी स्थिति में बना रहता है लेकिन रजोगुण उसे गति देता है। मैटर भले ही एक ही अवस्था में पड़ा रहे अपने तमोगुण के कारण, उसका रजोगुण उसे अंदर से चलायमान रखता है, परिवर्तनशील रखता है। अब आता है सत्वगुण यानी intellect जो मैटर को बुद्धि यानी intelligence यानी एक क्रमबद्धता प्रदान करता है। इन तीन गुणों की परस्पर जितनी मात्रा हमारे अंदर होती है हमारी प्रकृति भी उसी के अनुसार होती है।
इस प्रकृति में 24 तत्व होते  हैं।
प्रथम पाँच तत्व हैं-
आकाश, 
वायु, 
अग्नि, 
जल और 
पृथ्वी। 
 इन पाँच तत्वों की अपनी विशेषताएँ हैं, यथा
आकाश-ध्वनि sound
वायु- स्पर्श  touch
अग्नि-दृश्य/आकार/रंग sight
जल-स्वाद taste
पृथ्वी-गन्ध smell
ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। ये पाँच हमारी पाँच ऑर्गन्स ऑफ परसेप्शन को व्यक्त करते हैं
1.सुनने की क्षमता
2.स्पर्श की क्षमता
3.देखने की क्षमता
4.स्वाद की क्षमता
5.गन्ध (सूंघने) की क्षमता
ये  पाँच हमारी पाँच कर्मेन्द्रियों के कारक हैं, जो इस प्रकार हैं
1. जिह्वा speech
2.हाथ,
3.पैर , 
4.जननेन्द्रियां, 
5.उत्सर्जन के अंग,
ये पाँच व्हिकरण हैं। जिनके अतिरिक्त चार अंतःकरण के भी तत्व हैं जो निम्न हैं
1.मन mind
2.बुद्धि intellect
3.चित्त memory
4.अहंकार ego
ये कुल 24 तत्व प्रकृति के द्वारा जन्म लेते हैं और इन 24 तत्वों को के प्रति जागरूक है वह है कॉन्सियसनेस।
उपरोक्त 24 तत्वों को प्रकृति के तीनों गुण प्रभावित करते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयम के साथ ही बरतती रहती है और इस प्रकार कार्य और करण एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।सभी कर्म इन 24 तत्वों के समव्यव्हार के परिणाम होते हैं। इस प्रकार ये गुण और ये तत्व हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं। इससे "मैं" का जन्म होता है और ये आभास होता है कि मैं ही कर्ता हूँ। इससे अहंकार का जन्म होता है। इस अहंकार से ओतप्रोत ईगो को लगता है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सब कुछ करने और भोगने वाला हूँ। इस स्थिति में व्यक्ति आत्मा और ईगो में फर्क नहीं कर पाता है, उसे लगता है कि उसकी प्रकृति ही पुरुष है, उसका ईगो ही उसका सेल्फ है। एक उदाहरण लें। एक कंप्यूटर कई तरह के कार्य करता है लेकिन वह तभी कार्य करता है जब विद्दयुत की आपूर्ति होती है। तो क्या विद्युत कुछ करता है? नहीं । विद्युत कंप्यूटर को ऊर्जा प्रदान करता है जिसका उपयोग कर कंप्यूटर अपना कार्य कर पाता है। इसी प्रकार कर्म तो प्रकृति के द्वारा किया जाता है किंतु आत्मा के द्वारा उसकी प्रकृति को ऊर्जा प्रदान की जाती है, आत्मा कुछ नहीं कर रहा होता है, हम जो कुछ कर रहें होते हैं वह हमारी प्रकृति कर रही होती है। इस प्रकार प्रकृति को पुरुष से अलग कर देखने पर ज्ञात होता है कि हम जो कुछ कर रहें हैं वे सब हमारी प्रकृति के अनुसार कर रहें हैं, हमारा पुरुष यानी आत्मा तो मात्र करने की ऊर्जा भर है। वो हमारा न तो कर्म है न ही कर्म करने का परिणाम ही है।  इससे स्पष्ट है कि हमारे कर्म हमारी प्रकृति की देन है। सो अगर हम अपना अहंकार त्याग भी दें तो भी हम कर्म करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है। इसी नियम में बंध कर सभी कर्म करते हैं। लेकिन अहंकार से ढँके मन और बुद्धि को लगता है कि ये कर्म हमारे सेल्फ के कर्मों के परिणाम हैं। जब इस अहंकार का नाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम जो कर रहें हैं , हमारे कर्म हमारे प्रकृति की देन हैं। 
जो तत्वज्ञानी है उसे तत्वो और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है। तत्वज्ञानी को पता है कि सोचना, समझना, निर्णय लेना कर्म करना आदि सभी प्रकृति की देन हैं।  ये सब प्रकृति के नियमों की देन हैं। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सब कुछ का कोई न कोई कारण है, भले व्यक्तिगत रूप से हम उस कारण को जानते हों या नहीं। इस आज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि प्रकृति के नियमों का कोई कारण नहीं है। ये तो हमारी अज्ञानता के कारण होता है। जब हम उस नियम और उसकी व्यख्या को समझ जाते हैं तो हमें लगता है कि हमने कोई रहस्य पा लिया है या खोज लिया है। जो व्यक्ति गुणों और कर्म के इस सम्बंध को समझता है वही तत्वज्ञानी है। इस अवस्था में वह व्यक्ति आत्मा और प्रकृति के अंतर को समझ पाता है।  तब उसे समझ में आता है कि गुण गुण में ही बरतते हैं। ऐसा व्यक्ति कर्म और उसके परिणामो के बंधन में नहीं पड़ता, उसे ज्ञात होता है कि जो कुछ वह कर रहा है वे सब उसकी प्रकृति के कारण हैं, उसका सेल्फ उसके कर्मों से अलग है। इसका ज्ञान और अभ्यास आसक्ति से अलग करता है। यँहा भावना नहीं बुद्धि की प्रधानता होती है।
इसे यूँ समझें कि व्यक्ति के कर्म होते कैसे हैं। हमने अब तक देखा समझा है कि प्रकृति, उसके गुण और तत्व कर्मों के कारण हैं। तीनों में से जिस गुण की अधिकता हमारी प्रकृति में होती है हमारे कर्म भी उसी के अनुरूप होते हैं क्योंकि तब तत्वों का व्यवहार भी प्रमुखता के साथ उन उस गुण के अनुसार हो जाता है। हमारे मन के अंदर जो इक्षाएँ होती हैं वो हमारी प्रकृति के गुणों के अनुसार हीं होती हैं और उन इक्षाओं की अभिव्यक्ति कर्म के रूप में हमारे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होते हैं।  जब हम स्वप्न में होते हैं तो उस स्वप्न के साथ हमारा एक तादाम्य होता है और उसी के अनुसार हमें सुख और दुख का स्वप्न में बोध होता है, लेकिन उस  स्वप्न की और उससे जनित सुख और दुख की अनुभूति मात्र हमारी होती है। जैसे ही स्वप्न से ये तादाम्य टूटता है इस सुख और दुख से मुक्ति भी मिल जाती है। उसी प्रकार जब हम अपनी इक्षाओं से विच्छेदित हो जाते हैं तो उन इक्षाओं के अनुरूप मिल सकने वाले सुख और दुख भी समाप्त हो जाते हैं। तब हमसे जो कर्म होते हैं उनसे सुख या दुख नहीं मिलते। आसक्ति से तादाम्य का अभाव ही कर्म को कर्तव्य में परिवर्तित कर देता है । यही विवेक है। तत्वज्ञानी को ये विवेक सदा ही होता है। उसे कोई आसक्ति नहीं होती है, सो उसे पता होता है कि राग-द्वेष, सफलता-असफलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति ये सब मन के भाव हैं जिनसे कोई आसक्ति नहीं रखना है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता ही नहीं।
    अर्जुन महाबाहो है, अर्थात महावीर है । श्रीकृष्ण उसे ये सम्बोधन दे कर याद दिलाते हैं कि सच्ची वीरता युद्ध की ही वीरता नहीं होती है बल्कि आसक्ति पर विजय ही सच्ची वीरता है जिसे अर्जुन को वरण करना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।
            इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर  पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।
   इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43
अभी तक कि विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि कर्म से पथ भ्रष्ट करने वाला मूल कारण है व्यक्तो का इन्द्रियों के विषयों से विशेष अनुराग का होना। अतएव श्रीकृष्ण तार्किक ढंग से समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह से व्यक्ति अपने पापकर्म से मुक्त हो सकता है। इसके निम्न चरण होते हैं
1.सर्वप्रथम हमें ये समझना है कि व्यक्ति की कामनाएँ उसके इन्द्रियों से व्यक्त होती हैं। वाह्य जगत से हमारा सम्पर्क हमारी इन्द्रियाँ ही कराती हैं। इन इन्द्रियों के कारण ही कामनाएँ अपनी अभिव्यक्ति कर्मरूप में अभिव्यक्ति पाती हैं।  हम अपने राग द्वेष यानी like-dislike के प्रभाव मरीन होते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं। हम नहीं समझ पाते हैं कि क्या सही क्या गलत है बल्कि हम तो अपने राग और द्वेष के वशीभूत होकर कर्म किये जाते हैं।
2.इन्द्रियाँ मन से नियंत्रित होती हैं। जब किसी विषय में डूब जाते हैं, जब हम इन्द्रियों के विषय को पूर्णतः राग-द्वेष से ही निर्धारित करते रहते हैं तो इन विषयों के प्रति हमारा राग और द्वेष(like & dislike) उस विषय के प्रति प्रेम और घृणा (love & hate) में बदल जाते हैं और हम उन विषयों से अपने लगाव या विलगाव के प्रति घोर आसक्ति से भर जाते हैं।
3.तब हमारे कर्मों को तार्किक शक्ति प्रदान करने के लिए हम बुद्धि के स्तर पर अपने विषयों के प्रति अनुराग या विराग को तर्क का जामा पहनाते हैं, चाहते हैं कि हम अपनी बुद्धि से अपने अनुराग या विराग को सही ठहरा सकें।
      अतएव यदि हम कर्म के पथ से भ्रष्ट होना बचना चाहते हैं तो
1.सर्वप्रथम इन्द्रियों के विषयों से अनुरक्ति और विरक्ति दोनों से बचना होगा, कर्म लाइक और डिसलाइक से नहीं सही और गलत के दृष्टिकोण से करना चाहिए।
2.राग और विराग से अप्रभावित न होकर मन के स्तर पर इनके प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहिए ताकि मन में किसी के प्रति प्रेम या घृणा के भाव न होकर, समदर्शी हों।
3. इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बुद्धि के स्तर पर कुतर्क गढ़ने से बचें।
   इन तीन चरणों को क्रमिक रूप से अपनाने से व्यक्ति विषय, मन और बुद्धि के राग द्वेष से मुक्त होकर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को प्राप्त हो पाता है, उसके कर्म कर्मयोग के रास्ते हो पाते हैं।
           इस शिक्षा को द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त कर चुके हैं। बेहतर समझ के लिए उस अंश को हम यँहा पुनः दुहराना चाहेंगे।
श्लोक 60 की व्याख्या

इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक  से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।


    लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।


      हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी  इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे।  श्रीकृष्ण  समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है। 

श्लोक 61 की व्याख्या

उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।


        हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द  हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।


      अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी ।  इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।


      उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।

श्लोक 67 की व्याख्या

आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ  मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और  इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि  लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।

श्लोक 68 की व्याख्या

इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
।।28।।
अब श्रीकृष्ण कर्म करने के अन्य तरीकों को बताते हुए अलग अलग यज्ञ कर्मों को करने का मार्ग बताते हैं।
द्रव्य कर्म
इस तरह के कर्म में व्यक्ति भौतिक संसाधनों से अन्य की सेवा करता है। जो कुछ आपके पास है उसे आप दूसरों के साथ करते हैं और उसकी यथा सम्भव मदद करते हैं, सेवा करते हैं।
तप यज्ञ
      इस तरह के कर्म में व्यक्त्ति  इस तरह के कर्म में व्यक्ति अपने इन्द्रियों को तपाता है ताकि उसे उच्च लक्ष्यों की प्राप्ति हो सके। ये तप यज्ञ शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और स्तर पर किये जाते हैं। शारीरिक स्तर पर व्यक्ति खुद की शारीरिक चेष्टाओं पर तो नियंत्रण रखता ही हैं, उन्हें इन्द्रियों के लालच के अनुरूप भागने से रोकता तो है ही साथ ही शरीर से दूसरों की सेवा भी करता है।  दूसरे स्तर पर व्यक्ति सत्य बोलने का अभ्यास करता है। असत्य वाचन पर विजय प्राप्त की जाती है। सत्य से उद्वेग का नाश होता है।  मन के स्तर पर व्यक्ति स्वयं को प्रसन्न रखता है। व्यक्ति दूसरों की प्रतिक्रिया से सूखी या दुखी नहीं होता है, बल्कि वह स्वयं को प्रसन्न रखने का प्रयत्न करता है। बाहरी सुखों और दुखों से खुद को सुखी या दुखी नहीं होने देता।
योग यज्ञ
तब व्यक्ति अपनी आत्मा को परमात्मा से जुड़े होने का अनुभव करता है जो योग यज्ञ है। योग यज्ञ करने की विधि को श्रीकृष्ण ने आगे भी स्पष्ट किया है, लेकिन वे सारी क्रियाएँ जिनमें व्यक्ति खुद के सेल्फ को पहचानने का प्रयास करता है , खुद को सम्पूर्ण से जुड़ा हुआ होने का प्रयास करता है तो वह योग यज्ञ कर्म करता है।

स्वध्याय यज्ञ
इस यज्ञ में व्यक्ति स्वाध्याय पर बल देता है। स्वध्याय से मनन , चिन्तन करने की प्रवृत्ति आती है जिसे व्यक्ति अपने व्यवहार में लाने का अभ्यास करता है।

ज्ञान यज्ञ
उक्त यज्ञों को करते हुए व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। सेवा भाव, दैवी सम्पद की वृद्धि, इन्द्रियों पर विजय, स्वभाव में देवी सम्पद का प्रयोग और इन्द्रियों की कुचेष्टाओं को नियंत्रण कर व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है।
।।29।। एवम ।।30।।
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग के उन यज्ञों के बारे में समझाते हैं जो सीधे सीधे हमारे व्यवहार में झलकते हैं।
श्रीकृष्ण समझाते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को अपने से वाह्य संकल्पों से प्रभावित नहीं होना चाहिए अर्थात उनको नहीं ग्रहण करना चाहिए और न ही अपने अंदर उठने वाले अच्छे बुरे चिंतन को बाहर देना चाहिए। प्रथमद्रष्टया तो उक्त श्लोक से यही ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण प्राण और अपान यानी अंदर लिए जाने वाले श्वास और बाहर की तरफ छोड़े जाने वाले श्वास को नियंत्रण में लाकर प्राणायाम की शिक्षा दे रहें हैं। निश्चित ही यह वह शारीरिक प्रक्रिया है जिसको करने से हमारा ध्यान श्वास पर टिकता है और भटकता नहीं। इसी क्रम में हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि जब व्यक्ति कर्मयोग में प्रवृत्त रहता है तो उसे वाह्य और आंतरिक संकल्पों , और प्रतिक्रियायों से खुद को छुटकारा दिला कर अपना ध्यान अपने श्वास पर लगाना चाहिए यानी अपने परम लक्ष्य पर खुद को लक्षित कर के ही रखना चाहिए। जब व्यक्ति की चेष्टाएँ उसके इष्ट यानी परम् लक्ष्य पर टिकी होती हैं तो फिर वह वाह्य और आंतरिक जगत की क्रिया प्रतिक्रिया से मुक्त होकर, उनको त्याग कर, उनका उन्हीं में हवन कर मात्र और मात्र अपने इष्ट यानी अपने लक्ष्य में रमा हुआ होता है। इस अवस्था में पहुँचने के लिए प्राण और अपान के नियंत्रण की प्राणायाम की क्रिया अति लाभदायक होती है।
   इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के आहार पर भी बल दिया है। आहार के विषय में तो श्रीकृष्ण ने 17वें अध्याय में विस्तार से चर्चा किया ही है लेकिन इस जगह भी जब वे कर्मयोग को करने के दौरान किये जाने वाले विभिन्न यज्ञ कर्मों को समझा रहें हैं वँहा भी उन्होंने ये बात साफ कर दी है कि व्यक्ति के आहार के प्रकार से उसकी क्रियाएँ की गुणवत्ता प्रभावित होती है। 
      अस्तुतः जब श्रीकृष्ण ने तीसरे अध्याय में यज्ञ को समझाया है तो इतनी बात तो स्पष्ट हो ही जाती है कि यज्ञ एक प्रकार से कर्मयोग में कर्म करने के विविध तरीके हैं जिनको अपना कर व्यक्ति सात्विकता की तरफ अग्रसर होता है, उसके अंदर की आसुरी प्रवृत्तियाँ धीरे धीरे समाप्त होने लगती हैं और वह दैवी प्रवृत्तियों की तरफ बढ़ने लगता है। इस क्रम में उसे अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण करने भी आ जाता और वह बिना भटकाव के अपने उच्चतर लक्ष्य की तरफ अग्रसर हो पाता है। तब व्यक्ति ज्ञान की उस चरम अवस्था की तरफ चल देता है जँहा पहुँच कर उसे ये ज्ञात हो पाता है कि उसके अपने सेल्फ का महत्व ये है कि वह वृहत्तर अस्तित्व का ही एक अंश है। इन सारी यज्ञ चेष्टाओं के फलस्वरूप व्यक्ति निष्काम कर्म के कर्मयोग का राही बन जाता है।
।।31।। ।।32।।
इस प्रकार व्यक्ति को कर्म करने के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञकर्म बताकर श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि जब व्यक्ति यज्ञकर्म के परिणाम को अमृत समझकर बिना किसी खुशी या दुख के स्वीकार करता है वही व्यक्ति प्रसन्नता का अनुभव करता है। यज्ञकर्म शब्द से बार बार किसी कर्मकांड का भ्रम हो सकता है लेकिन यदि हम तृतीय अध्याय में दिए गए यज्ञ की व्यख्या को स्मरण में रखते हैं तो हमें इस तथ्य का भान रहता है कि यज्ञकर्म कर्म करने की एक विशिष्ट भावना होती है।
यदि व्यक्ति में यज्ञकर्म की भावना नहीं होती है व्यक्ति इस सन्सार में सब कर्म करते हुए भी अशांत और दुखी रहता है , जबकि यज्ञकर्म की भावना से कर्म करने वाला व्यक्ति यज्ञकर्म के परिणाम को प्रसाद मानकर ग्रहण कर प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस प्रकार का व्यक्ति जीवन में सुख के लिए किसी अन्य बाहरी कारक पर निर्भर नहीं करता है बल्कि उसे तो अपने कर्म में ही आनंद प्राप्त हो जाता है।
      इस प्रकार के यज्ञकर्मों को करने से  व्यक्ति कर्मबन्धन से मुक्त हो जाता है। कर्मबन्धन क्या होता है? कर्मबन्धन से तात्पर्य है कि व्यक्ति सुख की तलाश में कर्म करता है और इस प्रकार कर्म के मोह में पड़ा रहा जाता है। लेकिन जब व्यक्ति मन , इन्द्रिय, शरीर से कर्म करता है और उस कर्म को करता है जो उसके स्वभाव के अनुसार होता है अर्थात स्वधर्म के अनुसार कर्म करता है और यह कर्म यज्ञकर्म की भावना से करता है तो उसे उस कर्म में ही आनंद की प्राप्ति हो जाती है, उसे कर्म के परिणाम पर प्रसन्नता के लिए निर्भर नहीं होना होता है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि व्यक्ति के उत्थान का एकमात्र मार्ग है यज्ञभावना से कर्म करना है। सभी साधना कर्म से पूर्ण होते हैं। इस तरह से कर्म करने से कर्म के प्रति कर्तापन का भाव नहीं आता और व्यक्ति ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।
।।33।।
कर्मयोग के विभिन्न यज्ञकर्मों कोंसमझाने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन सभी यज्ञों में ज्ञान यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है, हमें अंततः उसी के शरण में जाना चाहिए। वस्तुतः कर्म योग एक यात्रा के समान होता है जो व्यक्ति के गुणों के अनुसार प्रारम्भ होता है और धीरे धीरे व्यक्ति निर्धारित कर्म के द्वारा उस स्थिति में पहुँचता है जब उसे अपने कर्मों से उस ज्ञान की प्राप्ति होती है कि वह स्वयं कौन है, वह समझ पाता है कि उसके द्वारा कर्म किये जाने के बावजूद भी कर्ता वो नहीं है बल्कि उसका वास्तविक स्वरूप तो उसकी आत्मा है जो मात्र शरीर और मन मस्तिष्क को उनके गुणों की  अवस्था के अनुसार कर्मों को करते देखती भर है। ये कर्म उस व्यक्ति के अंतिम लक्ष्य नहीं हैं बल्कि ये कर्म तो मात्र साधन भर हैं जिनके द्वारा व्यक्ति आने स्व को खोज पाता है।
     सही तो यही है कि हम इस संसार में जो भी करते हैं वो सब इतना ही महत्व रखते हैं कि वे हमें ज्ञान की तरफ ले जाते हैं। श्रवण, मनन, चिंतन के द्वारा व्यक्ति अपने कर्मों के महत्व को समझ कर उनसे वो ज्ञान हासिल कर पाता है जिससे उसका उद्धार हो पाता है। सभी यज्ञ कर्मों का अंतिम लक्ष्य यही है सो ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। लेकिन ये ज्ञान योग व्यक्ति की प्राम्भिक अवस्था  नहीं होती है। श्रेष्ठ जनों की सेवा,  यानी अपने लक्ष्य के प्रति सेवा भाव से समर्पित होकर, अपने हृदय में दैवी सम्पद को संग्रहित कर, अपने इंद्रियों के बहिर्मुखी प्रवाह को संयमित कर जब व्यक्ति शरीर, मन-मस्तिष्क और विवेक से जो सही (जो पसन्द है वो नहीं) है उसके अनुसार कर्म में प्रवृत्त होता है , जब वह कर्मों के परिणाम से खुद को मुक्त कर कर्म का आचरण यज्ञ भावना यानी one for all और all for one की भावना से करता है तो उसे निश्चित ही वांछित ज्ञान की प्राप्ति होती है। ज्ञान कर्म की अंतिम परिणति है।
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ज्ञान का महत्व रेखांकित करने के पश्चात श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्ति के उपाय को भी बताते हैं। 
       ज्ञान की प्राप्ति गुरु के शरण में जाने पर ही होती है। सो हमें चाहिए कि हम ज्ञान प्राप्ति हेतु गुरु की शरण में जाएं। गुरु वो होता है जिसे सत्य का ज्ञान तो है हीं साथ ही साथ यह हमारी क्षमताओं का आकलन करने और तदनुसार आवश्यक ज्ञान हमें बता सीखा पाने के संवाद की विधा भी जानता हो।
       गुरु से ज्ञान प्राप्त करने हेतु व्यक्ति को भी कुछ अनिवार्य अहर्ताएँ पूरी करनी होती हैं। व्यक्ति के अंदर ज्ञान के प्रति जिज्ञासा का भाव होना अनिवार्य है। जिज्ञासु को चाहिए कि जब वह गुरु के सानिध्य में जाता है तो गुरु के प्रति उसके मन में पर्याप्त सम्मान का भाव हो, उनके प्रति समर्पण हो और उनसे संवाद करने में उससे कोई कोताही न हो। जब आपके अंदर जिज्ञासा है जानने की, और आपके पास गुरु का सानिध्य भी है लेकिन यदि उनके प्रति आपके मन में सम्मान की भावना नहीं है, उनके प्रति समर्पण के भाव नहीं हैं तो फिर आप निरन्तर ही गुरु की सत्यनिष्ठा और क्षमता के प्रति संशकित ही रहेंगे, जिससे जो ज्ञान आपको गुरु के द्वारा दिया जाता है उस ज्ञान के प्रति भी आपको श्रद्धा नहीं होगी, और न ही विश्वास ही होगा। नतीजा ये निकलेगा कि गुरु तो आपको ज्ञान दिए लेकिन वह ज्ञान आपको नहीं मिला।
    एक बात और है। जब आप गुरु के सानिध्य में ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से जाते हैं और उनके प्रति सम्मान और समर्पण के भाव रखते हैं तो इसके साथ ही आपके अंदर गुरु के प्रति सेवा भाव भी होना अनिवार्य है। गुरु के प्रति सेवा की भावना आपको गुरु से बेहतर ढंग से समव्यव्यहार के लिए प्रेरित करती है , वह माहौल बन पाता है जिसमें गुरु जयूर शिष्य दोनों एक दूसरे से खुल पाते हैं। श्रद्धा और समर्पण को सेवा के द्वारा ही तो क्रियात्मक रूप दिया जा पाता है। ऐसे में गुरु शिष्य के मध्य एक बेहतर समझ उत्पन्न हो पाती है जो ज्ञान के निर्बाध प्रवाह के लिए अनिवार्य होती है।।           जो जिज्ञासु है उसके मन के अंदर अथाह प्रश्न होने चाहिए और साथ ही साथ उन प्रश्नों को सम्मान के साथ बेझिझक पूछने की आदत भी होनी चाहिए। बिना प्रश्न के ज्ञान मिलता भी नहीं है। यदि गुरु का प्रवचन एक पक्षीय हो जाये, शिष्य के मन में गुरु के द्वारा मिल रही शिक्षा के प्रति कोई प्रश्न ही न उठे तो इसका एक ही अर्थ निकलता है कि शिष्य के अंदर कोई जिज्ञासा नहीं है, वह गुरु की बातों को समझ कर नहीं बल्कि यांत्रिक ढंग से सुनकर ही ले पा रहा है। वह सुनता जरूर है लेकिन उस सुने हुए ज्ञान पर उसका मनन और चिंतन शून्य है, जिस कारण वह समझ भी नहीं पा रहा है। प्रश्न का अभाव ज्ञान के प्रति अरुचि को भी दर्शाता है। आधुनिक भाषा में कहें तो सिलेबस खत्म करने की हड़बड़ी में होता है शिष्य।  शिष्य के प्रश्न गुरु को मदद करते हैं ये समझने में कि शिष्य का बौद्धिक स्तर क्या है, उसे कँहा से क्या क्या समझना सिखाना है और तब गुरु बेहतर ढंग से शिष्य की बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर पाता है।  
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 गुरु से प्राप्त इस ज्ञान से होता क्या है? इस पर श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब व्यक्ति सत्य के ज्ञानी गुरु से सत्य का ज्ञान प्राप्त कर लेता है,जब उसे तत्व का भान हो जाता है तब उसका मोह मिट जाता है। मोह भला कैसे जा सकता है? सामान्यतः व्यक्ति को तो यही लगता है कि जब तक देह है तब तक नेह लगा ही रहता है। ऐसा होता जरूर है लेकिन ये तब होता है जब व्यक्ति को सत्य का ज्ञान नहीं हो पाता। उसे लगता है कि उसने तो इतनी पुस्तकें पढ़ ली हैं , उसने तो इतनी डिग्रीयाँ हासिल कर ली हैं, उसने तो फलाना कॉलेज यूनिवर्सिटी से शिक्षा प्राप्त कर ली है तो वह तो बहुत बड़ा ज्ञानी हो चुका है। यही तो भरम है। इस अवस्था में व्यक्ति जो कुछ सीखता है वो सब इस बाहरी संसार के सम्बंध में सीखता है, उसे खुद के तत्वों का ज्ञान कँहा मिलता है। ये सारे ज्ञान संसार में जीविकोपार्जन के लिए चाहे जितने कारगर हों उसे उसके सेल्फ से नहीं परिचित करा पाते हैं। लेकिन तत्वदर्शी सत्य ज्ञानी गुरु से प्राप्त ज्ञान उसे उसके सेल्फ से परिचित कराता है, वह जान पाता है कि उसका अपना अस्तित्व क्या है, उसका अपना स्व क्या है , वह खुद क्या है अपनी समस्त व्यवसायिक ज्ञान से परे।
     जब व्यक्ति को गुरु से आत्मसाक्षात्कार का ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे अपनी आत्मा का दर्शन होता है और वह जान पाता है कि वही तो समस्त संसार भी है और समस्त संसार उसी के सेल्फ के अंदर भी है। उसका उसके सेल्फ के प्रति ज्ञान उसे मोह से मुक्त करता है। वह जान पाता है कि उसका भौतिक नश्वर स्वरूप उसके सेल्फ से भिन्न है जो अस्थाई है। स्थाई तो उसका अपना सेल्फ है, उसकी आत्मा है। उसका खुद के प्रति, अपने दायित्वों के प्रति, अपने कर्मों के प्रति मोह समाप्त होता है । उसे ज्ञात हो पाता है कि जिस तरह पानी की लहर और पानी दोनों एक ही है उसी तरह उसका भी वास्तविक अस्तित्व सम्पूर्णता से भिन्न नहीं है ।
       जैसे जैसे व्यक्ति का मोह नष्ट होता है उसे वह दृष्टि प्राप्त होती जाती है जिससे वह सत्य की नजर से इस संसार को देख सके। किसी भी चीज को देखने भर से हमें उसकी जानकारी नहीं होती है, बल्कि जब हम किसी भी चीज को देखते हैं तो उसे हम उतना ही समझ पाते हैं जितना हमारे ज्ञान का स्तर होता है। जैसे यदि हमें अक्षर ज्ञान न हो तो कागज पर जो भी लिखा होता है उसका कोई अर्थ हमारे लिए नहीं होता वैसे ही सत्य का ज्ञान नहीं होने पर हम जो भी देखते हैं उसे अपने असत्य की दृष्टि से ही देख समझ पाते हैं। किसी भी चीज को देखने का हजार नजरिया हो सकता है लेकिन हर नजरिये से देखने पर हमें वी चीज आंशिक ही समझ में आ पाती है। लेकिन जब सत्य का ज्ञान होता है तो हम उस चीज को सत्य के नजरिये से देख पाते हैं और समझ पाते हैं कि उसके अस्तित्व का क्या अर्थ है, उसका अस्तित्व किस प्रकार एक व्यापक का एक प्रदर्शन मात्र है। तब व्यक्ति उस सम्पूर्ण व्यापक में स्वयम की अभिव्यक्ति को देख पाता है। ।।36।।
ध्यान देने वाली बात है कि ज्ञान से मुक्ति पाने का अधिकार किसी व्यक्ति विशेष या समूह विशेष के लिए सुरक्षित नहीं है। ऐसा नहीं है कि कोई खास तरह के लोग ही ज्ञान प्राप्ति के अधिकारी हैं। इतिहास बतलाता है कि मजबूत वर्ग के द्वारा कमजोड वर्ग के लोगों को ज्ञान से इस तर्क के आधार पर वंचित रखा गया था कि वे नीच हैं, पापी हैं । लेकिन श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण ने इस धारणा का पुरजोर खंडन किया है और बतलाया है कि नीच या पापी को भी ज्ञान प्राप्ति का सम्पूर्ण अधिकार है। वस्तुतः जो कोई भी कर्मयोग के क्रमिक मार्ग को अपनाता है अर्थात अपने स्वभाव को समझ कर कर्म के मार्ग में प्रवृत्त होता है , सेवा, दैवी सम्पद के संग्रहण , और इन्द्रियों का शमन करता है वह अगले कदम में ज्ञान का अधिकारी हो जाता है। वह इन प्रयासों से अपने मोह, क्रोध, अहंकार, ईर्ष्या आदि को समाप्त कर ज्ञान के मार्ग पर प्रशस्त होता है। चुँकि ज्ञान का अधिकार सभी को है सो ज्ञानप्राप्त कर चुके ज्ञानी जनों का  ये विशेष दायित्व बनता है कि जो इससे वंचित हैं उन्हें ज्ञान का कर्मयोग वाला मार्ग बताएँ, उसमें प्रशिक्षित करें
 इस एक शिक्षा से श्रीकृष्ण ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को समाप्त करने का सार्वजनिक मार्ग खोल दिया है और उस प्रथा पर कड़ी चोट भी की है जिसके अनुसार ज्ञान प्राप्ति कुछ वर्ग का विशेषाधिकार बना दिया जाता है। इसका ये भी अर्थ है कि जब भी समझ आये , आँख खुले, व्यक्ति अपनी मुक्ति का प्रयास यानी कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ज्ञान प्राप्ति का प्रयास शुरू कर सकता है।
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ज्ञान प्राप्ति से होता क्या है? वस्तुतः कर्मयोग के रास्ते चलकर ज्ञान को प्राप्त करने से जो प्राप्त होता है वह है अपनी आत्मा, अपने सेल्फ , अपने स्व को पहचानना। इस ज्ञान की वजह से मोह, लोभ, अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या जैसी आसुरी वृत्तियों का नाश होता है और व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों पर हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त व्यक्ति समझ पाता है कि सब कुछ करते हुए भी वह कर्ता नहीं है, उसे तो बस अपना स्वधर्म निभाना है। इस अवस्था में व्यक्ति अपने कर्मों के परिणाम से विच्छेदित हो जाता है, उसे न कर्म से मोह होता है न उसे परिणाम से लगाव होता है, सो वह कर्म बन्धन में बँधता नहीं है। वह कर्म सिर्फ इसलिए करता है क्योंकि (1) जीवित रहते हुए स्वधर्म के अनुसार उसके कुछ दायित्व हैं और (2) जो कर्मयोग के पथ में अभी पीछे हैं उनका मार्गदर्शन करना है। इस प्रकार कर्म और कर्मफल से मुक्त व्यक्ति के कर्म उस व्यक्ति को उसके जीवित अवस्था में भी उसे उन कर्मों से बांध नहीं पाते हैं।
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इसप्रकार कर्मयोग के रास्ते चलकर जो ज्ञान व्यक्ति को प्राप्त होता है उस ज्ञान के द्वारा व्यक्ति के अंदर से मोह, लगाव,, क्रोध, ईर्ष्या, निराशा और अहंकार सदृश्य आसुरी वृत्तियों का सर्वथा नाश हो जाता है और तब व्यक्ति अपनी आत्मा का साक्षतात्कार कर पाता है और समझ पाता है कि वह परमात्मा यानी समग्रता से भिन्न नहीं है। इस प्रकार इस ज्ञान के रास्ते जो कर्मयोग के माध्यम से प्राप्त होता है व्यक्ति के अंदर की सारी दुष्प्रवृत्तियों का नाश हो जाता है और वह पूर्णरूपेण पवित्र हो पाता है।
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इस ज्ञान को प्राप्त करने के तीन अनिवार्य शर्त हैं-
1.श्रद्धा
       हमारी जैसी श्रद्धा होती है बदले में हमें फल भी वैसा ही मिलता है। श्रद्धा का मतलब हम विश्वास से समझ सकते हैं। जब हम ज्ञान प्राप्त करने का उद्यम करना प्रारम्भ करते हैं तो ये आवश्यक है कि हम खुद पर, अपने शिक्षक पर और प्राप्त किये जाने वाले ज्ञान पर भरोसा रखें अन्यथा जो भी ज्ञान  हमें मिलता है उसे हम श्रद्धा के अभाव में पूर्णरूपेण नहीं ले पाते। यदि हमें खुद पर या शिक्षक पर या स्वयं ज्ञान पर ही अश्रद्धा होगी तो फिर ज्ञान प्राप्ति में हम एकाग्रचित्त होकर नहीं लग पाएंगे।

2. तत्परता
    दूसरी अनिवार्य शर्त है कि जिस ज्ञान को हम पाते हैं उसका तत्परता से अनुकरण करें। प्राप्त ज्ञान को समझना, उसका मनन चिंतन कर उसे आत्मसात कर उसका अनुकरण करने पर ही हम उस ज्ञान को खुद में समाहित कर पाते हैं।

3.जितेंद्रिय
     तीसरी शर्त है कि जब हम ज्ञान प्राप्ति के रास्ते चलें तो हमारे अपने इन्द्रियों पर और उनके बहिर्मुखी प्रवाह पर नियंत्रण होना चाहिए। शरीर, मन, मस्तिष्क और विवेक पूरी तरह से हमारे वश में होकर उन सभी का सामूहिक प्रयास ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए ताकि हम बिना भटके एकाग्रचित्त होकर ज्ञान प्राप्ति के मार्ग पर चल सके। यदि इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं होता है तो मन इधर उधर भागेगा और ज्ञान की प्राप्ति में एकाग्रचित्त होकर हम नहीं लग पाएंगे।
         उपरोक्त तरीको को आपना कर जब हम ज्ञान को प्राप्त करते हैं तो ज्ञान हमें परम् शांति की अनुभूति कराता है। ज्ञान ही वह निधि है जिसे पाकर हम किसी अन्य सुख की कामना भी नहीं करते और मन में शांति आती है। हमारे अंदर इक्षाओं और कामनाओं का , अहंकार का, माया और मोह का, सुख और दुख का जो कोलाहल मचा होता है उसका रहस्य ज्ञान प्राप्त कर जब पता चल जाता है तो फिर अंदर की उथल पुथल भी समाप्त हो जाती है और इसी अवस्था में मन शांत हो पाता है। यही अंतिम शांति भी है जो हमें जीते जी अपने ज्ञान से प्राप्त होती है जिसके कारण हम अपने अभीष्ट से जुड़ पाते हैं।
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कर्मयोग और कर्मयोग के माध्यम से ज्ञान योग की प्राप्ति का तरीका बताने के पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जिस व्यक्ति में निम्न लक्षण होते हैं उसे कभी भी सुख की प्राप्ति नहीं पाती है-
1.विवेकहीन व्यक्ति
2.आश्रधायुक्त व्यक्ति
3.संशय युक्त व्यक्ति

विवेकहीनता 
विवेकहीन व्यक्ति का अपने कर्मों पर कोई नियंत्रण नहीं होता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ उच्छऋंखल होती हैं। ऐसा व्यक्ति अपने सेल्फ को देखने , समझने और पहचानने में असमर्थ होता है सो ऐसा व्यक्ति अपने कर्मों और उनके परिणाम के मोह में फंसा रह जाता है जिसके कारण उसकी इक्षाएँ और कामनाएँ कभी खत्म ही नहीं होती हैं। इस कारण से ऐसा व्यक्ति हमेशा ही दुखी रहता है और उसे इस संसार में रहकर भी, सभी साधनों के उपलब्ध रहते हुए भी सुख शांति की प्राप्ति नहीं होती है।

अश्रद्धा
    श्रद्धा  विश्वास  से ऑती है। यदि अपने कर्म पर, खुद पर, ज्ञान पर, ज्ञान देने वाले पर भरोसा ही नहीं होगा तो फिर उनके प्रति श्रद्धा कैसे होगी और जब श्रद्धा नहीं होगी तो फिर एकाग्रता और समर्पण भी नहीं सम्भव है। तब मन हमेशा चंचल रहेगा और इस कारण दुख कभी खत्म ही नहीं होगा। हमारी जैसी श्रद्धा होती है प्राप्ति भी उसी के अनुरूप होती है। यह तथ्य जीवन के हर भौतिक और आध्यात्मिक अंग पर लागू होता है।

संशय
    संशय मन को कभी एक जगह टिकने ही नहीं देता है। यह भ्रम उत्पन्न करते रहता है। विवेकहीन और आश्रधायुक्त व्यक्ति हमेशा संशय में ही जीता है जिसका परिणाम होता है उसे हमेशा अपने पर, और अपने बाहर और अपनी ही आत्मा पर कभी भरोसा नहीं हो पाता है, जिसका नतीजा होता है कि वह व्यक्ति नियमित ही भ्रम, मोह, माया में भटकते रह जाता है। तो फिर उसे शांति कँहा, सुख कँहा।
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इस प्रकार कर्मयोग की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सब को समझाते हैं कि कर्मयोग के माध्यम से कर्मयोग की शिक्षा का पालन करते हुए ज्ञानयोग की अवस्था पर पहुँचते हैं तो इस अवस्था में आत्मज्ञान होता है यानी हमें अपनी आत्मा का, अपने सेल्फ का अपने कौंसस्नेन्स का ज्ञान होता है, हमें ज्ञात होता है कि हम भी समग्र के प्रतिनिधि हैं। ऐसे आत्मवान व्यक्ति के कर्म कर्मों में विलय हो जाते हैं क्योंकि इस तरह से प्राप्त ज्ञान से इस बात का बोध हो चुका होता है कि हम कुछ नहीं करते, कर्म तो गुणों की अवस्था के अनुसार होते हैं और होते हुए अभीष्ट को समर्पित हो जाते हैं। व्यक्ति के रूप में हम करते हुए भी कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा हैं। ऐसे आत्मवान व्यक्ति के मन से सारे संशय, सारे भ्रम खत्म हो चुके होते हैं क्योंकि वह तो अपनी वास्तविक स्थिति जान चुका होता है। उसकी समस्त इन्द्रियाँ उसके सम्पूर्ण वश में होती हैं सो उसे कर्मफल से कोई मतलब नहीं होता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्मों के बन्धन से मुक्त होता है।
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इस अध्याय के अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी का आहवान करते हुए समझाते हुए कहते हैं कि कर्मयोग के मार्ग पर चलकर इस परम् ज्ञान को प्राप्त कर विवेक से अपने मोह और संशय से अपने अज्ञान का नाश कर कर्म करें। अर्जुन तू युद्ध कर यानी तुम कर्मयोग के माध्यम से अपने  नियत कर्म को करो।
      




     





     









                      


 
    






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