श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 3

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 :एक व्यवहारिक प्रशिक्षण: पृष्ठभूमि


                      पृष्ठभूमि
महाभारत के युद्ध के पूर्व पांडवों ने अपना साम्राज्य कौरवों के हाथों गँवा दिया था। यूँ कहें कि करवों ने दुर्योधन के नेतृत्व में धृतराष्ट्र की मौन स्वीकृति से छल से पांडवों का साम्राज्य, उनका उस समय के अनुसार से प्रचलित कानूनी हक छीन लिया था, पांडवों की पत्नी का भरी सभा में घोर अपमान किया था, तथा पांडवों की छल से हत्या की कोशिश भी की थी। श्रीकृष्ण के सभी शांति प्रस्ताव विफल हो गए थे। तब पांडवों के समक्ष युद्ध का विकल्प ही बच गया  था। लेकिन युद्ध क्षेत्र में पहुँच कर पांडवों का सबसे प्रमुख योद्धा अर्जुन विषादग्रस्त हो गया। कारण? युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन ने देखा कि उसके पितामह, उसके गुरु, उसके कुलगुरु, उसके भाई एवम अन्य बंधु बाँधवगण, उसके मित्र खड़े हैं तो वो विचलित हो गया। ऐसा नहीं कि अर्जुन को प्रथम बार पता चला हो कि कौन कौन उसके कष्ट के कारण रहें हैं, कौन कौन उसके विरुद्ध युद्ध में उतरेंगे। लेकिन युद्धक्षेत्र में सभी विरोधियों को समवेत देख कर वो घबड़ा गया। उसकी घबड़ाहट पराजय के भय से नहीं थी। अर्जुन अपने युग के महानतम योद्धाओं में शुमार था, साथ ही बहुत विद्वान भी था। इसीलिए उसे युद्ध की सम्भावित विभीषिका और सम्भावित परिणामों की चिंता सताने लगी। और उसकी यही चिंताएँ उसके मानसिक अवस्था पर भारी पड़ीं जिससे वो व्यथित हो गया , और युद्ध नहीं करने का फैसला कर लिया । लेकिन ये भी सच है कि अर्जुन पूरी तरह से अपने निर्णय से आश्वस्त भी नही था, सो वह अपने सबसे प्रिय मित्र श्रीकृष्ण को अपनी मनःस्थिति बताकर उनसे मागदर्शन मांगा।
इस पूरी कहानी में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं है, कुछ भी अतिरेक नहीं है। हम सभी इसी दौर से जीवन में गुजरते हैं। हम सभी अपने परिस्थितियों के सम्बंध में ऐसे ही दिग्भ्रमित होते हैं। अपने तात्कालिक ज्ञान के आधार पर हम अपनी परिस्थितियों की समीक्षा करते हैं, एक ही समय में अपनी समीक्षा को सर्वश्रेष्ठ भी मानते हैं और उसपर अविश्वास भी करते हैं, चाहते हैं कि हमारे मित्रादि हमारे निर्णय को समर्थन दें, सो उनसे अपनी समीक्षा और निर्णय साझा भी करते हैं। मजे की बात की सैद्धान्तिक तौर पर हम जानते हैं कि क्या सही और क्या गलत हो सकता है, लेकिन जैसे खुद व्यवहार के धरातल पर उतरते हैं हमारी सैद्धान्तिक बुद्धि मार खा जाती है और हम विषम परिस्थिति से बचने के लिए कुतर्क कर कोई आसान रास्ता ढूंढते है, अपने तर्कों को वजनी बनाने के लिए धर्म, परम्परा, आदर्श, लोक-परलोक, त्याग, ज्ञान, बलिदान आदि की दुहाई भी देते हैं और चाहते हैं कि हमारे इष्ट और मित्र हमारे तर्क का समर्थन करें। हम सभी हु ब हु यही करते हैं और अर्जुन भी यही करता है।
      लेकिन अर्जुन के परम मित्र श्रीकृष्ण अर्जुन के मत को समर्थन नहीं देते और उसे वो मार्ग बताते हैं जो सभी अवस्थावों में अनुकरणीय है। श्रीकृष्ण भी यदि अर्जुन की ही तरह होते तो दो में से एक विकल्प चुनते। या तो अर्जुन को समर्थन दे कर युद्ध की विभीषिका और सम्भावित परिणाम के कारण युद्ध छोड़ कर धुनि रमाने को कहते या फिर उसे उसके कुल खानदान, उसकी माँ और पत्नी पर कौरवों के द्वारा किये गए अत्याचार की याद दिलाकर उसे उकसाते, युद्ध के लिए प्रेरित करते। लेकिन श्रीकृष्ण ऐसा कुछ नहीं कर रहें हैं, उल्टे उसे युद्ध क्षेत्र में आत्मा की प्राप्ति और मोक्ष का मार्ग समझाने लगते हैं। सामान्य बुद्धि व्यक्ति के लिए श्रीकृष्ण का यह व्यवहार एकदम समयानुकूल नहीं है। कुछ को तो ये भी लग सकता है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध से निकलने का कोई सुगम और आदर्शवादी मार्ग बता रहें हैं ताकि अर्जुन युद्ध के मारकाट को छोड़कर भजन करने निकल भी जाये और उसपर युद्ध से भागने का कलंक भी न लगे। खुद अर्जुन को भी यही भ्रम हो जाता है। हम सभी जिनको ये पता नहीं कि हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है यही लगता है। जब भी हम किसी परेशानी में पड़ते हैं हम या तो उस परेशानी का सामना बदले की भावना से करते हैं या फिर रामनाम की दुहाई देकर निकल लेते हैं। हम जो सुनते हैं उसे अपने तात्कालिक ज्ञान के अनुसार ही समझ पाते हैं सो हमारी पहली प्रतिक्रिया भी प्राप्त हो रहे सुझाव के अनुरूप नहीं हो पाती। यदि हमें कोई मार्ग सूझता है तो हमारी पहली प्रतिक्रिया उस सुझाव पर अपने तत्कासलिक ज्ञान के अनुसार होती है ।।श्रीकृष्ण जब अर्जुन को जीवन के लक्ष्य को बताते हुए उसे आत्मसाक्षत्कार यानी सेल्फ की प्राप्ति और उस प्राप्ति का मार्ग बताते हैं तो अर्जुन उनकी बातों में उसी बात को पकड़ता है जो उसके मनोकुल है यानी वो खुश होता है कि ज्ञान अर्जित कर लो हो गया काम। हम सुधि पाठक और श्रोतागणों को भी यही लग सकता है कि भगवान भी तो युद्ध का समर्थन नहीं करते हैं वो तो ज्ञान अर्जित कर मोक्ष को ही परम बताते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि न तो अर्जुन और न हम सभी श्रीकृष्ण की बातों पर समग्र रूप से ध्यान दे पाते हैं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण श्रीकृष्ण की शिक्षा को अपने तात्कालिक ज्ञान(आज्ञान) के अनुसार ही समझ पाते हैं। यही कारण है कि जब व्यथित, विषादयुक्त, दिग्भ्रमित अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे ज्ञान की शिक्षा देते हैं, उसे सही मार्ग समझाते हैं तो अर्जुन सुनता तो सब है किंतु अपने पूर्वाग्रहों के कारण उन बातों को समग्र रूप से नहीं समझ कर उन शिक्षाओं को अपने पसन्द के अनुसार लेता है। श्रीकृष्ण की शिक्षा से स्पष्ट है कि हमें वो नहीं करना है जो हमारा LIKE (पसन्द) है बल्कि वो करना है जो RIGHT(सही/सत्य) है। किंतु अर्जुन अभी भी LIKE पर अटका हुआ है , हम सभी सारी बात को , सारे सत्य को जानते हुए भी अपने अपने LIKE पर ही अटके रहते हैं सो अर्जुन भी और हमसभी भी अपने आसक्ति को ही सत्य मानकर उसे सही ठहराने की कुचेष्टा करते हैं।
         इसी पृष्ठभूमि में अर्जुन अपनी शंका को व्यक्त करता है। अर्जुन की शंका के साथ ही तृतीय अध्याय की शुरुआत होती है । अर्जुन की मनःस्थिति युद्ध विरोधी नहीं है बल्कि युद्ध यानी स्वधर्म से पलायनवादी है। विरोध और पलायन अलग अलग होते हैं। लेकिन पलायन को सही साबित करने के लिए हम सब और अर्जुन भी पलायन के साथ तर्क और धर्म जोड़कर उसे सही साबित करने की कोशिश करते हैं। द्वितीय अध्याय के पठन पाठन और श्रवण के अंत में हमें लग सकता है कि कर्म से बन्धन बढ़ता है। एक कर्म अगली वसना, एक कामना यानी इक्षा को जन्म देती है जिसे पूरा करते करते अगली वासना जन्म ले चुकी होती है और फिर कर्म। अगर ऐसा है तो फिर बन्धन से मुक्ति, वैराग,सन्यास और मोक्ष कैसे मिल सकता है और यदि अंतिम लक्ष्य मुक्ति, वैराग्य, सन्यास और मोक्ष ही हैं तो फिर कर्म करने से क्या लाभ। हालांकि श्रीकृष्ण बता चुके हैं कि यह स्थिति कर्म करके ही प्राप्त हो सकती है लेकिन हम सब तो पलायन की मानसिकता में जी रहें हैं सो अपने इस पूर्वाग्रह के कारण छोर पकड़ कर कुतर्क करते रहते हैं कि हमारा काम तो कर्म करना नहीं भजन करना भर है। कुछ और विज्ञ जन एक कदम आगे बढ़कर श्रीकृष्ण के माथे ही दोष मढ देते हैं कि उन्होंने ही तो सन्यास की प्राथमिकता साबित कर हमें कर्म से विमुख कर दिया है।
    अर्जुन भी इसी श्रेणी में है। सो वो प्रश्न दागता है। तब श्रीकृष्ण को लगता है कि इसके पल्ले कुछ पड़ा नहीं और तब वे अपनी पूर्व की शिक्षा को विस्तार से समझाते हैं, नतीजा कि अर्जुन 18वे अध्याय के अंत में जाकर समझ पाता है कि उसे करना क्या है। 
     तो हम सभी इसी पृष्ठभूमि में श्रीमद्भागवद्गीता के अध्ययन में तृतीय अध्याय  में प्रवेश करते हैं। इस अध्याय में कुल 43 श्लोक हैं जिनका अध्ययन हम यथासम्भव श्लोकवार करेंगे।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 1 

ज्ञानयोग और कर्मयोग के अनुसार अनासक्त भाव से नियत कर्म करने की श्रेष्ठता का निरूपण) अर्जुन उवाच ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
 तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥

अर्जुन बोले- हे जनार्दन! यदि आपको कर्म की अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो फिर हे केशव! मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
 ॥1॥
 उक्त पृष्टभूमि से स्पष्ट है कि जब हम कुछ सीखते जानते हैं तो उसे सहजता से उसी रूप में नहीं स्वीकारते जिस रूप में वो चीज, कला या ज्ञान हमें प्राप्त होता है। बल्कि हम उसे भी अपने पूर्वग्रहों के अनुसार ही लेते हैं, समझ पाते हैं। हमारे मन मस्तिष्क में पूर्व से कुछ विचार होते हैं और हम प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने उसी विचार के अनुरूप ढाल कर लेते हैं। नतीजा होता है कि जितना हमें सीखने को मिल पाता है वो सब हम सीख नहीं पाते और सीखे हुए ज्ञान को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार ही ग्रहण करते हैं। अर्जुन युद्धक्षेत्र में आते ही अवसाद का शिकार हो जाता है और युद्ध नहीं करने का निर्णय ले लेता है। यह निर्णय वह अपने पूर्वसंचित ज्ञान के अनुसार लेता है और जब उसी के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे सन्मार्ग की शिक्षा देते हैं तो उसके पुरसंचित ज्ञान ही उसका पूर्वाग्रह बन उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा को हु ब हु प्राप्त करने से रोकते हैं। इसीलिए तृतीय अध्याय के शुरुआत में ही अर्जुन प्रश्न कर देता है कि जब श्रीकृष्ण की शिक्षा के अनुसार ही ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो फिर श्रीकृष्ण उसे युद्ध जैसे भयंकर कर्म करने के लिए भला क्यों कहा रहें हैं। स्मरण रहे कि अर्जुन पूर्व में ही युद्ध नहीं करने की ठान चुका है सो जब श्रीकृष्ण उसे शिक्षा दे रहे होते हैं तो वह सुनता तो सब है लेकिन याद रखता है अंश मात्र ही। उसे ये तो याद है कि ज्ञान श्रेष्ठ है लेकिन ये स्मरण नहीं कि इसकी प्राप्ति का मार्ग निष्काम कर्मयोग है। ऐसा नहीं कि अर्जुन ने श्रीकृष्ण की बात सुनी नहीं बल्कि ऐसा है कि उसे श्रीकृष्ण की शिक्षा में वही बात अच्छी तरह से याद रही जो उसके तर्कों का साथ दे सकती थी। उसे बल मिला कि जब श्रीकृष्ण के अनुसार ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है तो उसका कर्म यानी युद्ध नहीं करने का निर्णय सही साबित हो सकता है। अब देखिए मजे की बात कि द्वितीय अध्याय में श्री कृष्ण ने कँही ये नहीं कहा कि ज्ञान मार्ग श्रेष्ठ है या निष्काम कर्मयोग योग का मार्ग श्रेष्ठ है, बल्कि उन्होंने ये समझाया कि परम् सिद्धि जो परम् ज्ञान प्राप्ति की अवस्था है वो तो निष्काम कर्मयोग के  मार्ग पर चलकर ही प्राप्त हो सकता है लेकिन चुँकि अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहता था सो वो पूरे वार्तालाप और प्राप्त शिक्षा को अपने पूर्वाग्रह  कि युद्ध नहीं करना है, कर्म नहीं करना है , के अनुसार ही लेता है।
       हम सभी हर क्षण यही करते हैं जो अर्जुन युद्ध भूमि में कर रहा है। एक ही वर्ग में पढ़ने वाले छात्र एक ही शिक्षक की एक ही बात को अपने अपने अनुसार लेते सीखते हैं। जीवन में जब भी कोई बात होती है हमारा मन अपने पसन्द(LIKE) और अपने अच्छाई के बीच में से पसन्द को सिर्फ इसलिए चुनता है क्योंकि वह उसके पूर्वाग्रह को समर्थन देता है और तार्किक बातों को जी उसका हित कर सकने में सक्षम होते हैं उनको इसलिए नहीं अपना पाता क्योंकि वह अपने पूर्वाग्रह से बाहर ही नही आना चाहता।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 2

व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
 तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्‌॥

आप मिले हुए-से वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित कर रहे हैं। इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिए जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊँ
 ॥2॥॥

श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार प्राप्त करने के कारण अर्जुन की बुद्धि एक बार फिर से दिग्भ्रमित हुई है लेकिन अच्छी बात ये है कि अर्जुन अपने भ्रम को स्वीकारता है और यह स्विकारिक्ति प्रारम्भ में ही हो जाती है , अन्यथा उसका भला नहीं हो पाता। वैसे भी जागरूक विद्यार्थी वही है जो ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में होने वाले भ्रमों का तत्काल निराकरण कर लेता है या करा लेता है अन्यथा भ्रमित ज्ञान के साथ आगे बढ़ने वाले छात्र को कभी भी सही ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता। अपितु उसे घोर अज्ञान ज्ञान के नाम पर मिलता है। हम सभी को भी यही करना चाहिए जो अर्जुन कर रहा है। यदि अपने पूर्वाग्रहों के कारण या किसी अन्य कारण से हम कोई बात नहीं समझ पा रहें हों तो निश्चित ही हमें शंका का समाधान कर लेना चाहिए। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि मोक्ष परम् लक्ष्य है, बन्धन से मुक्ति परम् लक्ष्य है, आत्मा अजर, अमर और अपरिवर्तनशील है किंतु इसे प्राप्त करने का मार्ग है निष्काम कर्म करना, जिसे करते हुए हम कर्म बन्धन से मुक्त होकर आत्म साक्षात्कार को प्राप्त होते हैं। युद्ध नहीं लड़ने के अपने पूर्वाग्रहों के कारण अर्जुन निष्काम कर्म मार्ग की यात्रा को भूलकर अंतिम लक्ष्य यानि ज्ञान प्राप्ति को याद रखता है। लेकिन उसकी चेतना अभी भी सजग है सो उसे पता है कि वह भ्रमित है। यही बात अर्जुन को सत्य के अन्वेषण में लगे अन्य छात्रों से अलग करती है। सत्य के प्रति उसकी उत्कण्ठा इतनी तीव्र है कि अपने पूर्वाग्रहों के पश्चात भी वह सत्य की प्राप्ति के लिए प्रश्न करता है कि सांख्य और कर्म में कौन श्रेष्ठ है जो उसे श्रेय देगा अर्थात अर्जुन कल्याण का आकांक्षी है। यँहा यह स्पष्ट संकेत है कि अर्जुन उस मार्ग को अपनाना चाहता है जो उसे श्रेय दें अर्थात उसका कल्याण करें न कि अर्जुन अपने पसंद के मार्ग पर टिका हुआ रहना चाहता है।
 अर्जुन के प्रश्नों से कुछ बातें हमारे जीवन में साफ हो जाती हैं--
1.हमें समझना चाहिए कि हमें जो सिखाया जाता है उसे हम तब तक हु ब हु नहीं समझ सकते जब तक हमारे अंदर हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं।
2. पुराग्रह प्राप्त होने वाले ज्ञान को अपने अनुसार सरलीकृत कर देते हैं या उलझा देते हैं।
3.यदि हमें याद है कि हमारे पूर्वाग्रह बने हुए हैं और ये ज्ञान को भ्रमित कर रहें हैं तो हमें पता होता है कि ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग में हमें भ्रम और शंका हो रहा है।
4. अगर इतनी जागरूकता है तो हमें तत्काल अपना शंका समाधान करना चाहिए क्योंकि भ्रमित ज्ञान अज्ञान से भी अधिक खतरनाक होता है।
5. हमें प्रिये से अधिक श्रेष्ठकर पर ध्यान चाहिए। हमें कल्याण और सत्य के मार्ग को पकड़ने के लिए इक्षुक और प्रस्तुत रहना चाहिए भले इसके लिए लिए अपने पसंद यानी LIKE का त्याग करना पड़े।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 3
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श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
 ज्ञानयोगेन साङ्‍ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्‌॥

श्रीभगवान बोले- हे निष्पाप! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा (साधन की परिपक्व अवस्था अर्थात पराकाष्ठा का नाम 'निष्ठा' है।) मेरे द्वारा पहले कही गई है। उनमें से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग से (माया से उत्पन्न हुए सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरतते हैं, ऐसे समझकर तथा मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाली सम्पूर्ण क्रियाओं में कर्तापन के अभिमान से रहित होकर सर्वव्यापी सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहने का नाम 'ज्ञान योग' है, इसी को 'संन्यास', 'सांख्ययोग' आदि नामों से कहा गया है।) और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से (फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदाज्ञानुसार केवल भगवदर्थ समत्व बुद्धि से कर्म करने का नाम 'निष्काम कर्मयोग' है, इसी को 'समत्वयोग', 'बुद्धियोग', 'कर्मयोग', 'तदर्थकर्म', 'मदर्थकर्म', 'मत्कर्म' आदि नामों से कहा गया है।) होती है
 ॥3॥

अर्जुन की शंका का समाधान करने के लिए श्रीकृष्ण उसे पुनः समझना प्रारम्भ करते हैं लेकिन इस बार श्रीकृष्ण विस्तार से समझाते हैं।
      श्रीकृष्ण अर्जुन को निष्पाप कह कर सम्बोधित करते हैं अर्थात श्रीकृष्ण की नजरों में अर्जुन की शंका स्वाभाविक है न कि बनावटी। अर्जुन वह छात्र है जो अपने पूर्वाग्रहों के कारण श्रीकृष्ण की शिक्षा को प्रथम बार समझने में असमर्थ है किंतु उसे अपने पूर्वाग्रहों को K रहने का मोह भी नहीं है, तभी तो वह श्रीकृष्ण से कहता है कि जो मार्ग उसके लिए श्रेय देने वाला हो उसे बताएं। इससे स्पष्ट है कि अर्जुन के मन में शिक्षा को लेकर कोई मोह नहीं है, मात्र भ्रम भर है, सो श्रीकृष्ण उसे निष्पाप कह कर पुकारते हैं। ज्ञान प्राप्ति की यही अवस्था, यही भावना हमें ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित भी करती है।
    तत्पश्चात श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं कि जिस शिक्षा को वे उसे दे रहें हैं वह नई नहीं है बल्कि पूर्व में ही उनके द्वारा कही जा चुकी है। अर्थात यह शिक्षा पहले से ही प्रचलित है । श्रीकृष्ण के अनुसार वस्तुतः ज्ञानयोगमार्ग और निष्काम कर्मयोग एक दूसरे से विपरीत नहीं हैं बल्कि ये व्यक्ति की साधना के स्तर पर निर्भर करता है कि उसे अपनी साधना के स्तर से आगे कर्मयोग पर चलना है या ज्ञानयोग के मार्ग पर। साधना की प्रारंभिक अवस्था में कर्मयोग ही मार्ग है जिसपर चलकर साधना की उच्च अवस्था को प्राप्त कर ज्ञानयोग के मार्ग पर पर चलना होता है। प्रारम्भ में हम सभी में वे सभी दुर्बलताएँ होती हैं जो हमें कर्म फल में आसक्ति के कारण मिलती हैं। इन लिप्साओं से हठात पिंड नहीं छुड़ाया जा सकता और न ही इन लिप्साओं के साथ ज्ञान मार्ग पर चला ही जा सकता है। प्रारम्भ में हमें इन लिप्साओं से मुक्त होना होता है और यह कर्मयोग के मार्ग पर चलकर ही सम्भव होता है। निरन्तर अभ्यास से कर्मफल की आसक्ति का नाश सम्भव होता है। जब व्यक्ति निरन्तर कर्मयोग के सिद्धान्त का पालन करते हुए कर्म में प्रवृत्त होता है तो शनैः शनैः उसके साधना की अवस्था उन्नत होती है और उच्चतर स्तर पर पहुँच कर ही वह कर्मबन्धन से मुक्त होकर ज्ञान के मार्ग पर चल पाता है। बिना कर्मयोग के जो ज्ञानमार्ग पर चलने की कोशिश करता है उसका क्षय होना तय है क्योंकि कर्मयोग के अभाव में कर्म से और उसके परिणाम की आसक्ति से जुड़ी हर बीमारी उसके साथ ही होती है। तब न उसे शांति रहती है न वह मोह से और मोह जनित दुर्गुणों से मुक्त ही रहता है। सो ऐसा नहीं है कि एक के बिना दूसरा प्राप्त हो जाये। सांख्ययोग यानी स्व की प्राप्ति अंतिम लक्ष्य है लेकिन वहाँ तक पहुंचने का मार्ग निष्काम कर्मयोग है। हम आप कँहा से शुरू करें यह हमारी तात्कालिक अवस्था पर निर्भर है जो हमारे गुणों के अनुपात से तय होती है। श्रीकृष्ण का मत है कि अर्जुन की अवस्था अभी कर्मयोग में प्रवृत्त होने की है, अभी उसके मन में काम, क्रोध, ईर्ष्या, लालसा आदि बचे हुए हैं जिनसे मुक्त होना जरूरी है क्योंकि इनको छोड़े बिना ज्ञान की प्राप्ति , आत्मसाक्षत्कार की प्राप्ति सम्भव नहीं है। हम सभी पाठक, हम सभी प्रत्याशी भी तो इसी अवस्था में हैं, कामनाओं के वश में सो हम सभी को अभी निष्काम कर्मयोग के मार्ग का अभ्यास करना है ताकि हम परम् ज्ञान की अवस्था को प्राप्त करने के योग्य हो सकें।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 4

न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
 न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता (जिस अवस्था को प्राप्त हुए पुरुष के कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात फल उत्पन्न नहीं कर सकते, उस अवस्था का नाम 'निष्कर्मता' है।) को यानी योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि यानी सांख्यनिष्ठा को ही प्राप्त होता है
 ॥4

बिना कर्मयोग के ज्ञान क्यों नहीं प्राप्त हो सकता है इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि बलात कर्म प्रारम्भ नहीं करने अथवा बलात कर्म का त्याग कर देने मात्र से कोई नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त नहीं हो सकता। नैष्कर्म्य ही वह अवस्था है जब कर्म का बन्धन छूट जाता है। कर्म तो हर हालत में होता है चाहे हम आप जिस अवस्था में हों, योग की जिस सीढ़ी पर हों लेकिन जब कर्म करते वक्त खुद के कर्ता होने का भान नहीं होता तब कर्म कोई फल भी उस व्यक्ति के लिए नहीं दे पाते अर्थात अकर्म की श्रेणी में हो जाते हैं। लेकिन नैष्कर्म्य व्यक्ति भी कर्म करते  तो रहता है, हाँ उसके कर्म उसके शरीर से होते हैं , उनमें उसकी कोई भूमिका नहीं होती है क्योंकि इनके फलों से उसका सेल्फ मुक्त होता है और उस व्यक्ति के अंदर कर्तापन का बोध खत्म हो चुका होता है। बलात कर्म नहीं करने से अथवा किये जा रहे कर्म को त्याग देने मात्र से ये बोध नहीं आता। स्मरण करें कि द्वितीय अध्याय में भी श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया समझाया है कि बलात कर्म रोकने से कामनाओं की कितनी तीव्र वासना समय पाकर बलवती हो उठती हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 5
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न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌।
 कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥

निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है
 ॥5॥
कर्म करने की अनिवार्यता पर  जोर देते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बिना कर्म किये कोई भी एक क्षण नहीं रह सकता, सो कर्म का त्याग करने का विचार ही निरर्थक है। हम कर्म क्यों करते हैं। यह प्रकृति है जो हमें निरन्तर कर्म करने के लिए बाध्य करती है और कोई भी इस बाध्यता से बाहर नहीं है। हम सोए हों या कोई कोमा में ही क्यों न हो उसका शरीर कर्म करते रहता है। यदि शरीर निश्चेष्ट हो तो भी उसके अंदर कर्म होते रहते हैं, मन के स्तर पर भी निरन्तर कर्म होते ही रहते हैं। यदि कोई  दावा करता है कि वह तो सब कर्म त्याग कर मात्र ध्यान कर रहा है तो उसे गौर से परखें, कि क्या वास्तव में उसने अपने सभी शारीरिक और मानसिक कर्मों का त्याग कर दिया है। आप पाते हैं कि ऐसा नहीं है और समस्त कर्मों का त्याग का दावा धोखा मात्र है। यह कर्म प्रकृति के अधीन हमेशा ही क्रियाशील हैं। 
    प्रकृति से उत्पन्न गुणों को श्रीकृष्ण तीन भागों में बांटते हैं, जिन्हें हम आगे देखेंगे। अभी के लिए इतना ही कि ये तीन गुण हैं तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण जिनको हम तत्काल ये समझ सकते हैं कि
1.तमोगुण जड़ता(INERTIA) का प्रतीक है,
2. रजोगुण गति(ACTIVITY) का प्रतीक है
और 3. सत्वगुण बुद्धि( INTELLECT) का प्रतीक है।
   इन्हीं तीन गुणों के द्वारा मनुष्य बराबर क्रियाशील रहता है ओर क्रियाशीलता ही विकास का कारण बनती है। यदि हम कर्म न करें तो हमारी अवस्था न बदले और हम उत्थान न कर पाएं। कर्मों के अभाव में हम शारीरिक और मानसिक रूप से जैसे थे वैसे ही बने रह जाएँ सो कर्म तो अनिवार्यतः होने ही हैं, बलात रोकने का प्रयास समय, ऊर्जा , लक्ष्य तीनों का अपव्यय ही है। ये कर्म ही हैं जो हमें  हम जँहा हैं वँहा से सन्मार्ग पर ले जाते हैं। जब कर्मों का त्याग बलात नहीं होता बल्कि आत्मसाक्षत्कार के उपरांत कर्म कर्म में बरतने लगते हैं यानी बिना हमें प्रभावित किये अपनी स्वभाविक क्रिया में संचालित होते हैं तब हम नैष्कर्म्य की स्थिति को पाते हैं। लेकिन कर्म तब भी रहते हैं , अकर्म के स्वरूप में। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 6

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्‌।
 इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है
 ॥6॥
श्रीकृष्ण कर्म करने की महत्ता आगे बढ़ाते हुए कुछ ज्यादा मुखर होकर कहते हैं कि बिना ज्ञान के कर्मेन्द्रियों को बलात रोककर मन ही मन उन इन्द्रीयो के विषयों के चिंतन में लगे रहना ढोंग है। हम इन्द्रीयों द्वारा संचालित शारीरिक चेष्टाओं को तो बल पूर्वक रोक सकते हैं लेकिन इन्द्रीयिओं के विषय से सम्बंधित  मन मस्तिष्क में चल रहे विचारों को नहीं रोक सकते बलपूर्वक। इस प्रकार ऊपर से शांत दिखने वाला व्यक्ति मन ही मन बहुत ही उद्वेलित हुआ रहता है, उसका ध्यान हमेशा बाहरी चीजों पर ही टिका हुआ रहता है। इस प्रकार का आचरण ढोंग ही है। हम सभी जब भी पूजा पाठ ध्यान आदि में लगते हैं बार बार अपने इष्ट और अनिष्ट् के बारे में सोचते रहते हैं। हम ध्यान नहीं करते बल्कि ध्यान का ढोंग करते रहते हैं। श्रीकृष्ण ने यँहा इशारा कर दिया है कि बिना कर्म के ध्यान की अवस्था पाने की ख्वाहिश महज मिथ्या आचरण है, और कुछ नहीं। इस जगह पर श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्मयोग के बिना कोई भी ध्यान सम्भव ही नहीं है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 7
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यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
 कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥

किन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है
 ॥7॥॥
अब तक श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि कर्म के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं है। पहला कदम कर्म का उठता है,तब दूसरा कदम ज्ञान का है। कर्म नीव है, ज्ञान उसका अंतिम छोर है। बिना नीव के छत भला कैसे तैयार होगा। कर्म हमेशा हैं लेकिन कर्म करना कैसे है कि ज्ञान प्राप्त हो सके? क्या किसी भी तरह से कर्म करने से ज्ञान प्राप्त हो जाता है। नहीं। कर्म करने का नियत तरीका है, और वह तरीका है कर्मयोग का है। बलात इंद्रोयों को दाब कर, बलात अपने सेंसेज को शांत कर यदि कोई कर्म करता है तो वह कर्मयोग का आचरण नहीं है। द्वितीय अध्याय को यदि हम फिर से देखें तो हमें स्मरण होगा कि कर्म करने में यदि हम जबरन इन्द्रियों को नियंत्रित करना चाहते हैं तो ऊपर से शांत दिखने वाली हमारी इन्द्रियों के विषय समाप्त नहीं होते, बल्कि वे सुप्त रहते हैं जो अनुकूल अवसर पाते ही हमारे कर्मों को अपने विषयों में खींच लेते हैं। अतएव कर्मयोग में कर्म करने में जबरन अपने सेसेस को नियंत्रित करने का कदापि प्रयास न करें।
            इन्द्रियों के द्वारा हमारी इक्षाएँ, हमारी कामनाएं अपनी अभिव्यक्ति पाती हैं । जब इन्द्रियाँ अनियंत्रित होती हैं तो उनकी अभिव्यक्ति अनियंत्रित हो जाती हैं और हम अपनी पसंद से कर्म करने लगते हैं जो जरूरी नहीं कि सही भी हों। नतीजा ये निकलता है कि सब कुछ अव्यवस्थित हो जाता है। यदि सड़क पर सभी अपनी ही इक्षा से गाड़ी चलाने लग जाएं तो सड़क पर भीषण जाम की समस्या उत्पन्न हो जाती है। लेकिन इसका निदान क्या है? क्या सभी को चलने से रोक दिया जाए? यह तो कोई निदान नहीं हुआ। तो इसका निदान है कि लोगों के चलने के नियम बना दिये जायें और उनका पालन किया जाए। कर्मों के करने में सिर्फ इन्द्रियों पर निर्भर नहीं हुआ जा सकता है, बुद्धि से उनपर नियंत्रण जरूरी है ताकि हम इन्द्रियों को वश में रखकर सही मार्ग से चलें न कि पसंदीदा मार्ग के लोभ से चलें। अब ये कैसे हो सकता है? इसका सरलतम उपाय है कि हम अपनी बुद्धि को उत्तोरोत्तर ऊँचा लक्ष्य दें। एक छात्र है। उसका काम अच्छी तरह से पढ़ाई करना है। यदि वह इस तथ्य से अवगत है कि समय का सदुपयोग कर, यदि वह संयमित होकर  पढ़ाई करेगा तो उसे किसी बाहरी व्यक्ति के डर से पढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वो खुद ब खुद मेहनत करेगा। लेकिन यदि उस छात्र की बुद्धि में उच्च लक्ष्य नहीं हैं, उसके अभिभावक चाहते हैं लेकिन वो नहीं चाहता तो अभिभावक के दबाव और डर से वह पढ़ने तो बैठता है लेकिन उसकी आँखें पुस्तक पर रहते हुए भी मस्तिष्क कँही और होता है, अपने प्रिय काम में लगा होता है। नतीजा होता है कि पढ़ने का उपक्रम कर के भी नही पढ़ पाता। उसके कर्म उसके सही के दृष्टिकोण से नहीं बल्कि उसके पसन्द से नियंत्रित होते हैं। वह उन्द्रियों के प्रभाव में इधर उधर भटकता रह जाता है।
   इस प्रकार श्रीकृष्ण इस मत का साफ साफ खंडन करते हैं कि ज्ञान प्राप्ति के लिए हमें या तो कर्म करने ही नहीं चाहिए या फिर इन्द्रियों को जबरन दाबकर कर्म करना चाहिए। उनका मत है कि कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करें, जिसमें कर्मफल से कोई आसक्ति नहीं होती। इस अवस्था में कामनाओं के वश में किये जाने वाले कर्मों से भी वासनाएँ समाप्त हो जाती हैं, मन धीरे धीरे शांत हो चलता है और हम शनैः शनैः ज्ञान के मार्ग पर बढ़ जाते हैं। कर्मयोग से किये कर्म से ही ज्ञान मिलता है, कर्म के छोड़ने से नहीं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 8

नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
 शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः॥

तू शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तेरा शरीर-निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा
 ॥8॥

कर्म का महत्व बताते हुए श्रीकृष्ण इस बात पर जोर देते हैं कि कर्म नहीं करने से कर्म करना ही उचित है। अर्थात जो कर्मों से भागते हैं वे गलत हैं। यँहा श्रीकृष्ण दो बातें बताते हैं
1.पहला कि हमें शास्त्रों में निश्चित किये हुए कर्मों को करना चाहिए
2.दूसरा कि कर्म करने से ही शरीर निर्वाह भी सिद्ध होता है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण स्पष्ट कर देते हैं कि इस शरीर का प्रयोजन कर्म करने से ही पूरा होता है। साथ ही उन्होंने नियत कर्म करने का निदेश भी दिया है अर्थात वे कर्म जिनको करना हमारी प्रतिबद्धता है, यदि हम उनको नहीं करते हैं तो हम कुछ गलत कर रहें होते हैं।  ये नियत कर्म हैं क्या? श्रीकृष्ण यँहा , इस जगह पर तो इसकी व्याख्या नहीं करते , आगे स्पष्ट करते हैं लेकिन अब तक श्रीकृष्ण ने जो शिक्षा दी है उससे हम समझ सकते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के कुछ तो स्थाई कर्म हैं जो उसे करने हैं जो उसके स्वयम के शरीर, मन-मस्तिष्क, बुद्धि, परिवार, समाज, देश और संसार के प्रति करने ही हैं। इनकी विस्तृत व्याख्या आगे मिलेगी। अभी के लिए इतना ही कि हमें स्वम के शरीर को साफ सुथरा और स्वस्थ रखना चाहिए, मन बुद्धि को सुविचारों से परिपूर्ण रखना चाहिए, बुद्धि के स्तर पर हमें उच्च ज्ञान के प्रति समर्पित रखना चाहिए, अपने परिवार और समाज को जिनसे हम बहुत कुछ प्राप्त करते हैं उनके लिए समर्पित होकर रहना चाहिए, अपने राष्ट्र, संसार, इसकी भौतिक और प्राकृतिक सम्पदा की , इसके पर्यावरण की रक्षा करनी चाहिए। ये सब  बातें अभी तो श्रीकृष्ण बहुत स्पष्ट रूप से नहीं कह रहे हैं लेकिन अभी तक उन्होंने अर्जुन को जो भी शिक्षा दी है उससे हम यही समझ पा रहें हैं। आगे इस नियत कर्म की विस्तृत व्याख्या हम सब देखेंगे।

श्रीमद्भभागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 9

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः।
 तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर॥

यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मुनष्य समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्तव्य कर्म कर  ॥9॥
अर्जुन को समझते हए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि बिना कर्म किये  कल्याण नहीं हो सकता, फिर बता चुके हैं कि हमें नियत कर्म करने होते हैं। अब श्रीकृष्ण बताते हैं कि नियत कर्म क्या है जिसको नहीं कर अन्य कर्म करने से कर्मों के बंधन में हम उलझ जाते हैं।
      जब कर्मों को करने के पीछे कामनाएँ होती हैं और कर्मफल के साथ आसक्ति होती है तो हम जो कर्म करते हैं उनसे बन्धें होते हैं क्योंकि तब हम कर्म के परिणामों के अनुसार ही आगे का आचरण करते हैं। कामनाओं के आधार पर किये गए कर्मों के कारण  निम्न में से कोई परिणाम प्राप्त होते हैं
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
 इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर  घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
     वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी  हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
          इस प्रकार कामनाओं के वश में होकर किये गए कर्म कर्मबन्धन में बाँधते हैं।  इसके विपरीत यदि हम परिणाम से असंगत होकर कर्म करते हैं तो कर्मबन्धन में नहीं पड़ते।  यँहा श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यज्ञकर्म करें। यह यज्ञकर्म क्या है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में नहीं पड़ते। वस्तुतः कर्मयोग के बुद्धि के अनुसार जब हम कर्म करते हैं तो वही यज्ञ है जिसे द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण ने विस्तार से बताया है। इस बुद्धि के अनुसार कर्म करने का दृष्टिकोण निम्नवत है जिसे हमने द्वितीय अध्याय में भी देखा है, लेकिन समग्र समझ के लिए इसे पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है
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अगर हमें कुछ प्राप्त करना होता है तो उसके निम्न चार  चरण हैं
1.उद्देश्य का निर्धारण और उसकी समझ
2.उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग की जानकारी
3.उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग पर चलना
4.मार्ग पर अंत तक चलकर उस उद्देश्य को प्राप्त करना।
ये चारों चरण क्रमिक हैं, किसी को लाँघ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध करने की तैयारी के साथ पहुँच कर दिग्भ्रमित और विषादयुक हो जाता है। उसे उद्देश्य का ज्ञान नहीं रहता है सो भटक जाता है। ऐसे में उसके अनुरोध पर श्रीकृष्ण उसकी रक्षा में आगे आते हैं, उसके भ्रम को समाप्त करने हेतु। अर्जुन की नजर में उसका उद्देश्य युद्ध है सो युद्ध की सम्भावित विभीषिका और परिणाम से वह व्यथित हो जाता है। तब श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं , ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान उक्त चार चरणों में है। क्रमिक है।
    सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके उद्देश्य से परिचित कराते हैं। उद्देश्य वही है जो सबका है, अर्थात आत्मसाक्षात्कार करना यानी अपनी आत्मा का बोध करना यानी सेल्फ को खोजना और उसे प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाना। युद्ध तो मात्र इस मार्ग के क्रम में घटित होने वाली घटना है जिसका निर्वहन अनिवार्य है ताकि क्रमिक रूप से आगे बढ़ा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नित्य नए नए अवसर आते रहते हैं जिनका उसे निर्वहन करना होता है, उनको छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आपको पढ़ना है, परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, कमाना है, आदि आदि। लेकिन ये सब आपके उद्देश्य नहीं हैं। आपका हमारा उद्देश्य है अपने स्व को पाना और उसे पाकर परमात्मा से मिल जाना। सर्वप्रथम इसी उद्देश्य को श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक परिभाषित करते हैं। यही साँख्य योग है। योग यानी खुद से जुड़ना। जब हम जन्म लेते हैं और धीरे धीरे बड़े होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर और बौद्धिकता का तो ज्ञान होता है लेकिन हम अपनी आत्मा से ,अपने स्व/सेल्फ से अनजान बने रहते हैं। जब हमें इसका भान होता है , जब हमें लगता है कि हमें ये पता नहीं कि हम वास्तव में कौन हैं तब हम अपने सेल्फ की खोज का उद्देश्य पाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यह पहली सीढ़ी है जिसपर हमें चढ़ना होता है। जीवन का लक्ष्य बड़ा पद, पैसा आदि ही होते तो हम उन्हें पाकर हमेशा सन्तुष्ट , प्रसन्न और सुखी होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है अर्थात ये सब जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, बीच की अवस्थाएँ हैं। अंतिम लक्ष्य तो स्व की प्राप्ति और उस प्राप्ति के साथ परमात्मा से मिलन है। अर्थात सत् की प्राप्ति हमारा उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के साथ जीवन के प्रति  हमारा भय समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण की यही शिक्षा सांख्ययोग है।
   द्वितीय चरण में श्रीकृष्ण उस मार्ग का ज्ञान देते हैं जिससे इस सत् की प्राप्ति होती है। ये मार्ग योग और कर्म का है। इसे श्रीकृष्ण कर्मयोग कहते है । लेकिन उसके पूर्व द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए। 
     तब हम तृतीय चरण में प्रवेश करते हैं यानी अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं जो कर्मयोग के मार्ग से चलती है।
  अंत में हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं । उद्देश्य की प्राप्ति के साथ ही मार्ग से मुक्त हो जाते हैं। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!
कर्मयोग का प्रारंभिक परिचय देने के पश्चात श्रीकृष्ण कर्मयोग के महत्व और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। हम आप देखते हैं कि जब हम सामान्य सांसारिक कार्यों को सामान्य सांसारिक दृष्टिकोण से करते हैं तो दो बातें होती हैं
1.ये कोई भी कार्य स्थाई नही  होता है। 
2.चूँकि कार्य करने का हमारा दृष्टिकोण भी सामान्य सांसारिक होता है हम कार्य के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं, जो निम्न प्रकार के हो सकते हैं
1. हो सकता है कि हम अपने कार्य में सफल हो तब हमें  प्रसन्नता होती है, हम सुख का अनुभव करते हैं।
2.हो सकता है कि हम असफल हो, तब दुखी होते हैं, विरह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं
3.हो सकता है कि हमें जो परिणाम मिले वो अपेक्षित ही न हो, सोचते कुछ हों और हो कुछ जाए जो हमारे मनोकुल भी हो सकता है या नहीं भी और उसी के अनुसार हम खुशी या दुख का भी अनुभव करते हैं
     इस प्रकार हम बराबर अपने कार्यों के परिणाम से प्रभावित होते रहते  हैं और उन परिणामों के अनुसार ही दुख सुख पाते रहते हैं। इस प्रकार हममें स्थायित्व नहीं रहता और दिन भर में कई बार हमारे मनोभाव बदलते रहते हैं। इतने अस्थिर चित्त से हम सत्य की खोज नहीं कर सकते और नहीं कर पाते। परिणाम के प्रति हमारा लगाव के कारण हम परिणाम के प्रभाव से हमेशा डरे रहते हैं। सफलता असफलता, लाभ हानि, जय पराजय के डर से हमारा जीवन इतना हलचल भरा होता है कि हमें हमेशा अपने तात्कालिक स्थान से गिरने का भय लगा रहता है। अब आप खुद के जीवन को देखें। हम आप बराबर इसी डर में रहते हैं और नतीजा में एकदम बेचैन हुए रहते हैं।
    अब समझने की कोशिश करें कि श्रीकृष्ण इस विषय में क्या कह रहे हैं। जब हम कर्तव्य के परिणाम के प्रति समत्व भाव यानी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम भाव से रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिणाम के प्रति हम निरपेक्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें तो पाते हैं यदि हम अपने कर्मों के परिणाम से अप्रभावित/निरपेक्ष होते हैं तो फिर हमपर इस बात का कोई असर नही। पड़ता कि हमारे कर्तव्य पालन का क्या परिणाम निकलता है। 
यँहा एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। परिणाम के प्रति समत्व का भाव यदि समझ में नहीं आता तो इस शिक्षा से आपको नकरारात्मता भी आ सकती है, हम निश्चिंत हो सकते है कि हमारा काम तो कर देना है बाकी भगवान जाने कि क्या फल देंगे। समत्व भाव का अर्थ ये कदापि नहीं है कि परिणाम के लिए हम ईश्वर पर निर्भर करें। श्रीमद्भागवत गीता में ही श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि भगवान न कुछ करते है न कुछ कराते हैं।  बल्कि ये हमारा प्रयास है और प्रयास के पीछे हमारी श्रद्धा है जो निर्धारित करती है कि परिणाम कैसा होगा।
समत्व भाव की शिक्षा का तात्पर्य ये है कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में परिणाम के प्रभाव में बह नही जाना चाहिए । अगर हम इन प्रभावों से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो असफलता की स्थिति में भी हतोत्साहित नहीं होते बल्कि इस बात पर ध्यान देते हैं कि कर्तव्य पालन में हम पूरी सावधानी बरतें ताकि कोई चूक न हो जाये। ऐसी स्थिति में हम पूरे सावधानी से कर्तव्य पालन करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इसमें बीज का नाश नही होता अर्थात  एक बार धुनि लग गई तो मन की भावनाएँ, इन्द्रियों के प्रयास संयमित हो जाते हैं , हम अस्थिर होकर भटकते नहीं बल्कि अपने लक्ष्य जो स्व की प्राप्ति है और जो कर्म करने से ही पाप्त होता है उसी में शांत चित्त लगे रहते हैं।
  सनद रहे कि श्रीकृष्ण ने कर्म को अभी तक परिभाषित नहीं किया है। कर्म को आगे के अध्याय में स्पष्ट करेंगे। अभी तो मात्र निष्काम कर्म करने में बरतने जाने वाली सावधानियों और कर्म की विशेषता पर ही वे चर्चा कर रहें हैं।
कर्मयोग की विशेषताओं को  बताते हुए श्रीकृष्ण आगे मनुष्य जीवन के लक्ष्य प्राप्ति के सम्बंध में समझाते हैं। हमारे जीवन के लक्ष्य क्या होने चाहिए , इसका निर्णय कैसे होता है। इसका निर्णय मनुष्य की बुद्धि से होता है। किंतु मनुष्य की बुद्धि हो तो कैसी हो जो उसके लक्ष्यों को निर्धारित  करें।
बुद्धि दो तरह की हो सकती है
1.एक ऐसी बुद्धि जो  एक लक्ष्य को सामने रखे, उसमें कोई विवाद न हो। जिसे साँख्य का ज्ञान है उसका लक्ष्य तो निर्धारित है। उसका लक्ष्य उसकी बुद्धि के अनुसार अपने आत्मबोध का परिचय प्राप्त करना होता है। 
2.दूसरी तरफ बुद्धि अस्थिर भी हो सकती है जिसमें लक्ष्यों की भरमार तो हो लेकिन जो आत्मपरिचय के लक्ष्य से दूर हो। यह बुद्धि उन्ही चीजों को लक्ष्य बनाती है जिसे हमारी इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं और चूँकि इन्द्रियों का अनुभव भिन्न भिन्न प्रकार का होता है लक्ष्य भी भिन्न भिन्न तरह के हो जाते हैं । नतीजा ये निकलता है कि इस तरह का मनुष्य बार बार भ्रमित होते रहता है, एक छोर से दूसरे छोर तक जीवन भर भागते रह जाता है। 
        अगर हमें स्थिर बुद्धि आत्मबोध के लक्ष्य के साथ चाहिए तो दृढ़ता से उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। इस तरह के ज्ञान प्राप्ति के लिए निम्न तरीके हैं---
1प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा, जो हमें इन्द्रियों के अनुभव से प्राप्त होते हैं,
2.किसी एक जानकारी से दूसरी जानकारी का निष्कर्ष निकाल कर,
3. अज्ञात की  तुलना ज्ञात से कर के,
4. परिणाम और उसके कारक को समझ कर
5. प्रमाणिक पुस्तक/शास्त्र एवम उसके शिक्षक से, तथा
6.किसी की अनुपस्थिति को जानकर।
     मनुष्य की बौद्धिकता प्रतिरोधात्मक होती है यानी वह नए ज्ञान को सहजता से नहीं स्वीकारती। इसी कारण जब लक्ष्यों की पोषक बुद्धि को एक निश्चयात्मक होने का निर्देश दिया जाता है तो वह प्रतिरोध के रूप में विवाद करती है, इन्द्रिय जनित सुख देने वाले लक्ष्यों से हटना नहीं चाहती।वह चाहता तो है सुख, शांति, अमरत्व, स्वतंत्रता लेकिन इसके लिए साधनों का उपयोग करना चाहता है उससे उसे ये सब मिल नहीं सकते।  इन साध्यों को प्राप्त करने के लिए हमारी बुद्धि का उधेश्य उस ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए जिसे पाकर हम परम् सत्य यानी आत्मबोध को प्राप्त कर सकें। 
आदमी का क्या लक्ष्य होना चहिये ये समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझते हैं कि जब इंसान के जीवन में परम् लक्ष्य न होकर कई भोग विलास से सम्बंधित लक्ष्यों को पालता है तो उसका क्या व्यवहार होता है। जब हमारी नजर सिर्फ सुख, सुविधा , धन संपत्ति, पर होती है तो फिर ऐसी स्थिति में हम सिर्फ इसी उपाय में लगे रहते हैं कि किस प्रकार हमारे भौतिक सुखों में हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहे।
    इस प्रकार के लक्ष्यों को रखने वाले लोग भी दो तरह के होते हैं।
एक वैसे लोग होते हैं जो हमेशा हर कीमत पर सिर्फ अपने भौतिक उपलब्धियों को पूरा करने में लगे रहते हैं। इस हेतु यदि उनको लगता है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ गलत भी करना हो तो ये लोग नहीं हिचकते हैं। ऐसे मनुष्य इस बात में यकीन करते हैं कि यदि कोई वस्तु या सामग्री या कोई भी चीज यदि उनके सामर्थ्य में है तो हर हालत में वो उनको मिलनी चाहिए चाहे इसके लिए अनैतिक कार्य करना हो तो वो भी कर लेंगे।
       दूसरे उस तरह के लोग होते हैं जो अनैतिक कामों से तो बचना चाहते हैं लेकिन उनकी नजर भी उन्हीं सुख सुविधाओं पर टिकी रहती है और इसके लिए वे शास्त्रों में वर्णित तरह तरह के कर्मकांड में लिप्त रहते हैं। ये लोग स्वर्ग की कल्पना और उसकी इक्षा में लगे रहते हैं। ऐसे लोग जीवन की सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं। सुख, सुविधा, भौतिक ऐशो आराम, बाल बच्चों का उज्ज्वल भविष्य बस यही सब उनका लक्ष्य होते हैं। सुविधाओं में बढ़ोत्तरी ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
       हमारा प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ भौतिक सुख सुविधाओं में बढ़ोत्तरी, धन संपत्ति में बढ़ोत्तरी, बच्चों के भविष्य, उच्च पद प्रतिष्ठा जैसी चीजें ही होती हैं तो फिर इनको सही ठहराने के लिए आलंकारिक भाषा में कई तर्क भी देते रहते हैं जिनमें वे आध्यात्मिकता का पुट भी डालते रहते हैं ताकि उनके तर्क आकर्षक बन सके।
    जब हमारे पास इतने काम हों, जब हमारे पास इतने लक्ष्य हों तो फिर स्थिर मन से भला कब हम आत्मसाक्षात्कार का प्रयास कर पाएंगे। सुख सुविधा को पूरा करने के चक्कर में चंचल मन भला कब समय निकाल पाए कि उसे आत्मशोध करने का समय मिले।
        जब हम सिर्फ भौतिक सुख सुविधा के भँवर में फँसे होते है तब हम क्या करते हैं जरा इसका अवलोकन करें।  सुबह से शाम तक हम इसी प्रयास में लगे होते हैं कि हम कौन उपाय करें कि हमारी संपत्ति बढ़ जाये, कैसे हमारा ऐश्वर्य और सुख सुविधा बढ़ जाये , कैसे हमारा पद बढ़ जाये, आदि। इस स्थिति में हम अनैतिक साधन अपनाने से भी परहेज नहीं करते। या फिर कुछ लोग परलोक की चिंता में पूण्य बटोरने के चक्कर में , अपने जीवन में सुख सुविधा बढाने के लिए तरह तरह के कर्म कांड भी करते हैं। 
        अंतिम लक्ष्य तो सुख की प्राप्ति ही होता है लेकिन ये सुख भौतिक और शारीरिक होता है और इसको पूरा करने का मार्ग ऐसा होता है जिसमें हमें फुर्सत ही नहीं मिलता। एक सुख मिला नहीं कि दूसरे के फेरा में पर गए! पूरा जीवन इसी में बीत गया। ऐसे इंसान के जीवन में सुख मृगमरीचिका है।
      इसी प्रकार सुख की इक्षा पूर्ति के लिए तरह तरह के कर्मकांडी भी सुख तो कभी नहीं पाते लेकिन सुख की चाह में हमेशा दर दर भटकते दुखी ही रह जाते हैं। कभी  अपने लिए, कभी पत्नी के लिए , कभी सन्तान के लिए, कभी पूण्य बटोरने के लिए, कभी पापकर्म के प्रभाव को काटने के लिए। अंतहीन सिलसिला है। तब सुख कँहा है? 
सुख तो उसी दृढ़ बुद्धि में है जो ये सिखाती है कि हम अपने अंदर सुख खोजे, इस हेतु निर्धारित तरीके से जिये यानी निष्काम भाव से।
        एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या जीवन को बेहतर बनाने के जो भौतिक प्रयास किये जाते हैं वे अर्थहीन हैं? कदापि नहीं। निष्काम कर्मयोग की शिक्षा कदापि कर्महीनता नहीं है। कर्म तो करना ही है। कर्म कर के ही हम उस सुखद स्थिति को पाते हैं जिसमें सुख के उपरांत दुख नहीं है। लेकिन कर्मयोग कर्म करने की विधि को बताता है जिसे  श्लोक 39-40 में हम देखे हैं और जिसके बारे में आगे विस्तार से श्रीकृष्ण व्यक्त भी करेंगे। अभी के लिए इतना ही कि निष्काम कर्मयोग का तातपर्य कर्महीनता नहीं है बल्कि कर्म करने की वो विधि है जिसमें कर्म के परिणाम के प्रति आसक्ति और मोह नहीं होता है। ये कैसे सम्भव है आगे देखेंगे।
   श्रीकृष्ण ऊपर समझायें हैं कि भौतिक भोगो की अभिलाषा में रत मनुष्य भौतिक सुख सविधाओं की प्राप्ति का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए शास्त्रों (वेद) का तर्क देते हैं। सभी व्यक्ति जो ये प्रयास करते हैं कि भौतिकता में उनकी अनुरक्तता को आध्यात्मिक मान्यता मिल जाये वे यह दिखाने की कोशिश करते रहते हैं कि उनके आचरण को अध्यात्म अथवा धर्म का समर्थन हासिल है , सो वे अपने पक्ष में वेदों यानी धर्म शास्त्रों का उदाहरण देते हैं। हम देखते हैं कि समाज की हर रीति कुरीति को सही ठहराने के लिए उसके समर्थक धार्मिकता का आवरण चढ़ाने से बाज नहीं आते और तरह तरह की क्रियाओं से अपने आचरण को आडम्बरयुक्त कर उसे महिमामंडित करने की कोशिश करते रहते हैं। प्रतिदिन हमारे समक्ष ऐसे अगिनत उदाहरण आते रहते हैं। तकनीक के इस युग में संचार के अतिसुलभ साधन उपलब्ध हैं,यथा टेलीविजन और इंटरनेट आधारित उपकरण। सोशल मीडिया के माध्यम से एक जगह बैठा एक व्यक्ति एक ही समय में अत्यंत तीव्र गति से असंख्य लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसका परिणाम होता है कि हर भौतिक भोग विलास के पक्ष में एक धार्मिक उद्धरण सहजता से प्रचलित कर देते हैं जबकि उनका वास्तविक  प्रसंग कुछ अन्य ही होता है।
   श्रीकृष्ण बताते हैं कि शास्त्र के वे पक्ष जो भौतिक भोगों की पूर्ति से जुड़े हैं वे मनुष्य के तीनों गुणों यथा सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न आवश्यकताओं की ही पूर्ति करते हैं। ये जरूरी भले सकते हों अनिवार्य और अंतिम सत्य तो नहीं हैं क्योंकि जब तक हम इन गुणों में उलझे रहते हैं हमारे सामने नित्य नई नई आवश्यकताएँ और क्रियाएँ और भावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं जिनकी पूर्ति में लगा मनुष्य  सारा समय उसी पूर्ति के प्रयास में गँवा देता है। इस स्थिति में आपको फुर्सत कँहा कि हम आप आत्मसाक्षात्कार का प्रयास भी कर पाएं। सो हम अपने सेल्फ से, अपनी आत्मा से दूर चले जाते हैं। हमारा सारा समय जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की कोशिश यानी योग और जो है उसको बचाने में यानी क्षेम में निकल जाता है।
   इसी स्थिति को ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से सभी मनुष्यों को ये संदेश दिया है कि हम इंसान अपने गुणों के प्रभाव से बाहर निकलें, गुणों से परे हों। अगर हम थोड़ा सा ध्यान दें तो तो पाते हैं कि पशु पक्षी आदि जो भी करते हैं वे सभी उनके गुणों के अनुसार ही होते हैं। प्रशिक्षण देने पर कुछेक पशुओं  के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन तो होता है लेकिन वो भी स्थाई नहीं है। मनुष्य ही एकमात्र जीव है जिसमें अपने गुणों को काटने की क्षमता होती है। जो जितना त्रिगुणों से परे होता है वो उतना ही निश्चिंत और शांत होता है। तब वह व्यक्ति सारी आवश्यकताओं के रहते और उनकी पूर्ति करते भी उन आवश्यकताओं से बंधता नही है।
वे आवश्यकताएँ उसके लिए मोह का कारण नहीं बंध पाते। सो इस तरह का मनुष्य सत्य के प्रति विशेष आग्रह रखता है, उसका सत्य होता है  उसका अपना सेल्फ/अपनी आत्मा। इन्द्रियों और इन्द्रीयजनित बुद्धि से आगे जाकर वह व्यक्ति सत को खोजता है। उसे न तो किसी वस्तु विशेष को पाने की बेचैनी होती है , न ही जो सुख सुविधा  है खोने का डर होता है। वह इन बेचैनियों से मुक्त आत्म में निष्ठ होता है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण मनुष्य को जब तीनों गुणों से बाहर निकलने की बात कहते हैं तो उसके लिए चार तरीकों को बताया भी है
1.न तो किसी वस्तु को जो उसके पास नहीं है को पाने का प्रयास, न ही जो है उसे सुरक्षित रखने का प्रयास।
2.इस प्रकार का निर्विकार मनुष्य लाभ- हानि, जय-पराजय, हर्ष-विषाद के विरोधाभासी द्वंद्व से मुक्ति।
3.उक्त विशेषता से युक्त मनुष्य के अंदर के तमोंगुण ,रजोगुण और सत्वगुण नष्ट हो जाते हैं और मात्र सत्य का आग्रह होता है। मन और बुद्धि से परे व्यक्ति अहंकार, मोह आदि से अलग हो चुका होता है,शुद्ध रूप में आतंदर्शन की तरफ अग्रसर होता है।
4.इस स्थिति में व्यक्ति आत्मावान यानी आत्मिक अवस्था में ही होता है।
     इस तरह हम देखते हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलता व्यक्ति किस तरह से कर्म करते  आत्मसाक्षात्कार के तरफ अग्रसर होता है। उपरोक्त चारों को यदि हम उल्टे क्रम से देखेंगे तो पाएंगे कि आत्मनिष्ठ व्यक्ति की प्रकृति किस तरह की होती है जिसे श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के अंत में थोड़ा विस्तार से बताएंगे। उपरोक्त क्रमों के अभ्यास से हम भी, आप भी, सभी  भ्रम और मोह और उनसे जनित व्याधियों से मुक्त हो सकते हैं। ये अवस्था अभ्यास से मिलती है। यदि दैनिक जीवन के प्रत्येक प्रसंग में हम इनका अभ्यास करें तो स्वाभाविक रुप से हम भी वही पहुँचते हैं जँहा श्रीकृष्ण जाने के लिए कहते हैं।
निष्काम भाव से कर्म करते करते आत्मवान बनने की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन और अर्जुन के माध्यम से हम सबको  समझाते हैं कि जब हम आत्मवान होते हैं अर्थात जब हम नियत तरीके से जीवन को जीते हैं , जैसा कि ऊपर बतलाया गया है तब हम मन बुद्धि और कर्म यानी तीनों गुणों से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जैसा कि पूर्व में श्रीकृष्ण बता आये हैं कि आत्मशोधन की इस यात्रा में हम अपनी इन्द्रियों और उनसे जनित सुखों से अलग होते जाते हैं, समत्व के भाव में आते जाते हैं, ऐसी स्थिति में वो धार्मिक विधि  विशेष भी बहुत महत्व नहीं रखती जिससे हम इस लोक या परलोक में सुख की अपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में सांसारिक सुखों की कामनाओं से युक्त वेदों का भी उस व्यक्ति के लिए विशेष महत्व नहीं होता। परम् सुख की अवस्था में ये सब अब निष्प्रभावी लगने लगते हैं।
  जब मनुष्य इस परम् लक्ष्य के मार्ग पर चलता है तो मार्ग के छोटे छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति से उसे कोई बहुत मतलब नहीं होता है।  इस प्रकार से जब हम कार्य करने हेतु प्रवृत्त होते हैं तो चूंकि इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण और उनसे उत्पन्न प्रभाव भी अत्यल्प से अत्यल्प होते जाते हैं  हमारे अंदर सत्वगुण की मात्रा बढ़ती जाती है जिसके कारण हम परम् की यात्रा के दौरान जो कुछ अन्य कार्य भी करते हैं उनका सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है भले इनसे हमें कोई विशेष मतलब हो नहीं हो। 
   इसीप्रकार चूँकि आतंबोध की यात्रा में द्वंद्व को छोड़ते जाते हैं हमारी बुद्धि भी साथ साथ अपनी बेचैनी को भी छोड़ते जाते हैं। इस तरह से हमें जीवन की विषमता प्रभावित नहीं कर पाते।
      इस अवस्था में जब व्यक्ति अपनी यात्रा को पूरी करता है उसे परम् सुख और शांति प्राप्त होती है। ध्यान रहे जब तक व्यक्ति इस अवस्था को नहीं पाता तब तक वह उन चीजों में सुख खोजता है जो उसके बाहर इस संसार में है।  एक ही वस्तु कभी उसे अच्छी लगती है तो कभी किसी अन्य अवस्था में वही चीज उसके लिए सूखकर नही रह जाता। जो आज प्रिय है कल अप्रिय। इस प्रकार वस्तु तो वही रहता है परंतु व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था में परिवर्तन के कारण उसे कभी पसन्द कर सुख प्राप्त करता है तो कभी नापसन्द कर दुखी भी होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सुख हमारे बाहर नहीं होता है। मन की शांत अवस्था में जब हम द्वंद्व से मुक्त होते हैं हमें उस सुख-शांति की प्राप्ति होती है जो किसी वस्तु या मानसिक अवस्था में परिवर्तन पर नहीं निर्भर करते हैं। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में मिलती है। इस कारण से इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख देने वाले भोग विलास सुख सुविधा का कोई महत्व नहीं होता है। जिसे अपनी परम्  अवस्था प्राप्त हो जाती है उसे तो सुख ही सुख है तो जो भी सुख उसे अन्यत्र भौतिक रूप से मिल सकता था वो भो उसके परम् अवस्था में स्वतः सम्मिलित होते हैं।
  ध्यान रहे गुणातीत यानी गुणों से मुक्त होने की ये अवस्था अचानक ही नहीं प्राप्त होती है, बल्कि ये अवस्था क्रमिक रूप से ही मिल सकती है, क्रम क्रम से ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होता है, समत्व में आता है, विपरीत प्रभावों के द्वंद्वात्मक जोड़े के प्रभाव को खत्म करता है। सो उस अवस्था में पहुँच जाने के बाद भी इस क्रम का महत्व बना रहता है। दूसरे व्यक्तियों को भी अगर उस अवस्था में पहुंचना है तो इसी क्रम को अपनाना है।
कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके। 
      श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।
      ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं-----
1.जब हम कर्म करते हैं तो हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में होता है उसके परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता है। श्रीकृष्ण पहले समझा आये हैं कि जब हम कर्म करें तो हमारी बुद्धि एकनिष्ठ होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हम तरह तरह की उम्मीद पाल बैठते हैं, तरह तरह के लक्ष्य बना लेते हैं जिसका नतीजा होता है कि हम सदा उनको पूरा करने की दौड़ धूप में लगे रहते हैं, हमारा मन हमारी इन्द्रियों  से मिलने वाले तरह तरह के अनुभवों से बेचैन हुआ रहता है। जब मन विभिन्न   लक्ष्य की पूर्ति हेतु भटकता रहता है तो फिर मन में शांति नहीं होती और बिना शांति के हम परम् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वस्तुनिष्ठ ढंग से ध्यानमग्न नहीं हो पाते। थोड़ा ये भी मिल जाये, थोड़ा वो भी मिल जाये, थोड़ा उसे भी प्राप्त कर लिया जाए, अच्छा जब ये पूरा कर लेते हैं तब उस परम लक्ष्य के बारे में सोचेंगे, फिर वह मिला नहीं कि दूसरा काम आ गया है पहले उसे कर लें, थोड़ा और भोग की वस्तु को इकठ्ठा कर लें तो थोड़ा वो भी कर लें। ऐसी स्थिति में शांति कँहा!
   इस स्थिति में हम अपने गुणों-तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की अवस्था के अधीन होकर उनके अनुसार अपनी क्रियाएँ करते रहते हैं और मानसिक रूप से उद्वेलित हुए रहते हैं। यदि परम् लक्ष्य की चाह है तो इस गुणों से मुक्त होना ही होगा और तभी साँख्य की प्राप्ति होगी। इस हेतु जरूरी है कि हम ध्यान करें ।लेकिन क्या जबरन ध्यान सम्भव है?  कदापि नहीं। होता ये है कि हम अपने स्व की तलाश में  सुख चाहते हैं। लेकिन जब तक अपने तीनों गुणों के प्रभाव में होते हैं हम अपने वास्तविक सेल्फ यानी आत्मबोध को नहीं पहचान पाते। तब हम सुख की चाहत में अपने बाहर देखते हैं, अपने बाहर भटकते हैं, जो हमारे बाहर है उसमें हम सुख खोजते हैं जँहा हमारी खुशी , हमारा सुख होता ही नहीं। वो तो हमारे अंदर है जिसे हम उपासना और ध्यान कर ही प्राप्त कर सकते हैं। और ये अवस्था जबरन नहीं हासिल होती है। ये अवस्था सही कर्म कर के ही मिलती है, सही ढंग से कर्मपथ पर चलकर ही हम सब उस अवस्था में पहुंचते हैं जँहा ध्यान करने के अधिकारी बन पाते हैं। बिना गुणों से पार पाए ध्यान सम्भव नहीं । यदि हम करते हैं तो जितनी देर ध्यान करते हैं हमारे मन में कुछ न कुछ चलते रहता है, हमारे अंदर की इक्षाएँ जोर मरती रहती हैं। जिनसे निकलने का एक मात्र तरीका गुणों के प्रभाव से मुक्त होना ही है। लेकिन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो तो कैसे हों? ये प्रश्न तो है। इसका इकलौता तरीका है कि हम सही तरह से कर्म करें , निर्धारित तरीके से कर्म करें। तब जाकर हमको  वह अवस्था मिलती है जब हम कर्मों से मुक्त हो पाते हैं। तभी हमें आत्मसाक्षात्कार हो पाता है। यदि हम बीच में चाहें कि आत्मसाक्षात्कार हो जाये और इसके लिए हम कर्म का मार्ग छोड़ दें तो मुँह के बल गिर जाएंगे अर्थात हमारा पतन हो जाएगा, हम पथभ्रष्ट हो जाएंगे। अतएव कर्म कर के ही हम उस ऊंचाई को प्राप्त कर सकते हैं जँहा पहुँच कर हम कर्म को छोड़ भी देते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तब हम आत्मसाक्षात्केकार की स्थिति में होते हैं। 
     उपरोक्त से स्पष्ट है कि यदि हम अपना वास्तविक स्वरूप जानना चाहते हैं , आत्मबोध करना चाहते हैं , ब्रह्म को पाना चाहते हैं, वो सुख चाहते हैं जिसे प्राप्त कर कभी दुखी न हों , ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, मोक्ष चाहते हैं तो हमको सबसे पहले कर्म ही करना होगा क्योंकि कर्म करके ही हम अपने अंदर के तीनों गुणों को समाप्त कर सकते है और जब ये गुण खत्म हो जाते हैं तब हम साफ नजर से अपनी आत्मा यानी अपने स्व को देख समझ पाते है और तभी हम आतंबोध भी कर पाते हैं। 
   सो आतंबोध की यात्रा में पहली अनिवार्य शर्त है कर्म करना।
2. ये स्पष्ट है कि हमारा अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम क्या होगा ये हमारे अधिकार से बाहर है। हम मात्र कर्म कर भर  सकते हैं परिणाम तो प्रकृति देती है। 
   जब हमारा अधिकार  कर्म करने भर पर है तो फिर तीन परिस्थिति में से कोई एक हो सकती है
  (क) हम कर्म कर सकते हैं,
  (ख) हम कर्म नहीं कर सकते हैं
  (ग) हम कर्म किसी अन्य तरीके से भी कर       सकते हैं। 
        हमारे मन में तरह तरह के विचार आते रहते हैं। ये विचार हमारे  समय , काल और परिस्थिति के अनुसार तो होते हैं और बराबर बदलते भी रहते हैं। इन विचारों की गुणवत्ता हमारे अपने गुणों की अवस्था पर भी निर्भर करती है और प्रतिक्रिया स्वरूप हम क्या करते हैं उन विचारों के साथ ये भी हमारे समय, काल, परिस्थिति और हमारे गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। एक ही विचार के प्रति एक ही व्यक्ति की अलग अलग परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया हो सकती है और अलग अलग व्यक्तियों की भी प्रतिक्रिया अलग अलग हो सकती है। ये व्यक्ति के अपने समय, काल और परिस्थिति और उसके तीनों गुणों के अनुपातिक  प्रभाव के अनुसार ही होती है। इस प्रकार अपनी इक्षाओं के प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है ये इन्हीं चार चीजो से तय होती है , हम इक्षा के प्रति समर्पित हो सकते हैं, उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं और खुद को किसी अन्य चीज में भी व्यस्त कर सकते हैं।इस प्रकार कर्म पर हमारा अधिकार होता है जो हम अपने समय , काल, परिस्थिति और गुणों की  परिस्थिति पर निर्भर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्मों को करने पर हमारा अधिकार है और जो हम करते हैं उसके लिए हम ही उत्तरदायी भी हैं। यदि हम अपने गुणों के सम्बंध में सचेत रहते हैं, तमोगुण और रजोगुण को नियंत्रित कर सत्वगुण की मात्रा को बढ़ाते है तो फिर हमारे कर्मों की कोटि भी उत्तम होगी। 
3.परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। हम जो करते हैं उसपर तो हमारा नियंत्रण है लेकिन परिणाम कई ऐसी चीजों पर निर्भर करता है जिसके बारे में हमें कुछ भी जानकारी नहीं होती। ध्यान रहे  we perform action, we don't perform results; results come. जब परिणाम पर हमारा अपना कोई अधिकार ही नहीं तो फिर परिणाम पर क्यों माथापच्ची करना। हमारा अधिकार कर्म पर है तो हमारी सारी सावधानी कर्म करने में ही होनी चाहिए।
4. इसके आलोक में परिणाम , जिसपर हमारा वश नहीं उसके प्रति कोई मोह रखना भी तो गलत ही है। सो हमें चाहिए कि हम अपने कर्मों को कर उनसे सुख को प्राप्त करें क्योंकि ये कर्म ही हैं जिनको हम अपने अनुसार कर सकते हैं, परिणाम के सम्बंध में तो कोई निश्चितता नहीं है, सिर्फ अनुमान भर ही लगा सकते हैं। सो हमें चाहिए कि हम आने कर्मों को कर उनसे सुख प्राप्त करें। यदि हमारी स्पृहा परिणाम में लगी रहेगी तो देखिए कितनी बड़ी मूर्खता हम करते हैं। जिस चीज पर हमारा वश है उसको तो कर हम सुख नहीं प्राप्त कर रहें और जिस परिणाम पर हमारा कोई वश नहीं उसकी चिंता में हम गले जा रहें हैं , उससे भी सुख नहीं मिल रहा है। 
5.इसे अन्य प्रकार से भी देखें। कर्म हम वर्तमान में करते हैं और परिणाम भविष्य में आता है। अब देखिए, वर्तमान में किये जा रहे कर्म से हमें सुख नहीं मिल रहा है और हम सुख के लिए परिणाम पर निर्भर हो कर अपने ही कर्मों से मिल सकने वाले सुख को भविष्य में मिलने वाले अनिश्चित परिणाम पर टाल रहें हैं। इस प्रकार हम खुद ही अपने से अपने सुख को विलग कर रहें हैं। भला ये कौन सी समझदारी है!! अब सोचिए कोई एक काम करता है और सोचता है कि इस काम का जब उसके मनोकुल परिणाम आएगा तब वो खुशी मनाएगा। इस प्रकार उस काम को करने से मिल सकने वाली खुशी को वो खुद ही बर्बाद कर देता है इस उम्मीद में कि जब उसे भविष्य में मनोकुल  परिणाम  मिलेगा तो वो खुश होगा। अब सोचिए यदि उसे मनोकुल परिणाम मिल जाये तो क्या हो सकता है। सुख के एक निष्चित अवसर को उसने गँवा कर इसे वो प्राप्त करता है। ये भी सम्भव है कि जब उसे वो इक्षित परिणाम मिले तब तक उसकी परिस्थिति, उसकी आवश्यकता, उसके मनोभाव ही बदल चुके हों और इक्षित परिणाम मिलने पर भी वो सुख न प्राप्त कर सके। ये भी सम्भव है कि उसे मनवांछित परिणाम मील ही न पाए। तब तो वो व्यक्ति दोगुने दुख को ही न अनुभव करेगा! अगर हमारा सुख हमारे कर्म में नहीं अनिश्चित परिणाम में है तब तो हम जीवन भर  निश्चित कर्म वाले सुख को छोड़कर उसी अनिश्चित परिणाम वाली अनिश्चित खुशी के लिए इधर से उधर भागते रह जाएंगे।
6.एक और बात अति महत्वपूर्ण है। यदि हम कर्म को छोड़कर उसके परिणाम पर ही केंद्रित रहते हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हम वर्तमान से अधिक भविष्य की चिंता में जी रहें हैं । कर्म तो हम आज करते हैं , लेकिन भविष्य में मिलने वाले परिणाम से लगाव के कारण हम चाहते हैं कि हम भविष्य में भी रहे  और भविष्य में भी कर्म करते रहे और इस प्रकार हम खुद को कर्मों के बंधन में बाँध लेते हैं, उनसे मुक्त नही हो पाते। कर्मों के इसी बन्धन से तो पुनर्जन्म का सिद्धांत निकल कर आता है । तब भला आत्मसाक्षात्कार का कँहा अवसर मिलता है। तब तो हम कर्मों से मिलने वाली शांति भी गँवा देते है।  और हमेशा एक उत्तेजित मानसिक अवस्था में रहते हैं। इस प्रकार हम खुद को गुणों  में बाँध कर रखते हैं। इस बन्धन के कारण हम आत्मसाक्षात्कार से वंचित हुए रहते हैं।
7. तो क्या कर्मों को त्यागने से परिणाम की चिंता खत्म हो जाएगी? चूँकि लगाव परिणाम से है सो उस मोह के कारण चिंता तो खत्म नहीं होगी, उल्टे कर्मों को नहीं करने से कर्म कर अपने गुणों से मुक्त होने, सुख को प्राप्त करने और अंततः आत्मसाक्षात्कार करने के अवसर को भी हम गँवा देते हैं। 
          कर्मयोग को समझने के लिए ये एक अतिमहत्वपूर्ण पड़ाव है जँहा यदि हम इसे नही समझ सके तो फिर कभी नहीं समझ पाएंगे, सो जरूरी है कि इसे आत्मसात करने के लिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण की शिक्षा को बारंबार पढ़ें, अपने जीवन चरित्र में अभ्यास में लाये।
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म करने के सम्बंध में चार बाते समझाई हैं
1.आपका अधिकार मात्र कर्म करने में है।
2.फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है।
3.फल से लगाव मत रखें। फल भविष्य में मिलता है, सो फल के लगाव से मुक्त होकर आप भविष्य के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
4.कर्म नहीं करने में आपकी कोई श्रद्धा नहीं हो।
    ये चारों बातें जिस चीज को समझाती हैं उनको श्रीकृष्ण एक बार फिर से कहते हैं कि आपको कर्म तो करना  लेकिन उसे योग भाव से करना है। इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि ये योग है द्वंद्वात्मक विलोम के युग्मों से मुक्त होकर कर्म करना अर्थात जय-पराजय, लाभ-हानि, हर्ष-विषाद, सफलता-असफलता, रिद्धियों-सिद्धियों से मुक्त होकर कर्म करना,। यानी परिणाम जो हो सभी में समान भाव रखकर कर्म करना। हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है, फल के निर्धारण में नहीं। सो फल के चरित्र से मुक्त होना चाहिए कर्म करते वक्त। मतलब समान भाव अर्थात समत्व योग! हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को सही ढंग से करना न कि किये गए या किये जा रहे या किये जाने वाले कर्मों का परिणाम सोचकर करना। जो उचित है, सत्य है, अर्थात जो rigjteous है उसे करना, भले परिणाम जो हो। 
 ध्यान रहे WE SHOULD DO WHAT IS RIGHT AND NOT WHAT IS OUR LIKE. जरूरी नहीं कि हम जो पसन्द करते हों वो सही भी हो। जो सही नहीं नहीं है , जो धर्मानुकूल नहीं है वो भले हमें प्रिये हो हमें नही। करना चाहिए। सनद रहे कि हमें अपने कर्मों पर ही अधिकार है, परिणाम पर नहीं। चूँकि हमें ये अधिकार है कि हम सही या गलत जो कर्म चाहें कर सकते हैं तो फिर हमें फिर सही , (righeous) कर्म ही करना चाहिए भले ही हो सकता है कि उस कर्म का वो परिणाम हमें नहीं मिल पाए जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। वस्तुतः हमको तो इसी उम्मीद को त्यागने की शिक्षा श्रीकृष्ण दे रहें हैं क्योंकि उम्मीद तो एक अनुमान भर है जो हमारे अधिकार से बाहर है, जिसके पूरा होने या न होने पर हमारा कोई वश नहीं है।
        इस प्रकार कर्म करने में कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार निम्न पाँच तरह की सावधानियों  को बरतने की जरूरत होती है:-
1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 
      इन सभी के संयोग से किया गया कर्म ही कर्मयोग है जिसे कर के साँख्य यानी परम् ज्ञान की प्राप्ति होती है जो अपनी आत्मा का साक्षात्कार कराता है। 
श्रीकृष्ण ने गत समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी  हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इसी स्थिति में हम अपने अंदर से प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। ये प्रसन्नता हमारे अंदर से निकलती है जो चिरस्थाई होती है क्योंकि उस समय हम अपनी आत्मा में ही अवस्थित होते हैं जो हमारा परम् लक्ष्य रहा है। लेकिन जो व्यक्ति इस बुद्धि से कर्म नहीं करते वे तो परिणाम से ही सुखी और दुखी होते रहते हैं, कर्म की गुणवत्ता से उनको प्रसन्नता नहीं मिलती। वे तो भविष्य में मिलने वाले परिणाम से सूखी या दुखी होते रहते हैं। ऐसे लोग परिणाम से बंधे होते हैं। वे अपने कर्म से नही। आनंदित होते हैं। वे इंतजार करते हैं अच्छे परिणामों की ताकि वे प्रसन्नता को पा सकें। उनके लिए अनेक लक्ष्य होते हैं और हर लक्ष्य के परिणाम से सुखी दुखी होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था भी विचलित होते रहती है। ध्यान रहे , परिणाम तो भविष्य में मिलता है। हम जो कर्म पहले किये थे उसका परिणाम आज मिलता है। अब यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिला तो आज का भी कर्म हम अच्छे से नही कर पाते सो आज के कर्म का भी परिणाम हमारे मनोकुल नहीं आने वाला। इस प्रकार भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणाम से बंधकर हम खुद को भविष्य से बाँध लेते हैं। चूँकि ऐसे लोग प्रसन्नता और स्थायित्व अपने बाहर खोजते हैं तो नित परिवर्तनशील संसार के परिवर्तनों से हम सुखी दुखी होकर अस्थिर होते रहते हैं। ऐसे में सत्य यानी आत्मा यानी सेल्फ यानी चिरस्थाई प्रसन्नता कँहा मिलने वाली।

     इस प्रकार कर्मयोग से युक्त कर्म और सामान्य कर्म में कर्म में प्रयुक्त बुद्धि या दृष्टिकोण का महत्व होता है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। लेकिन जिस कर्म में कर्मयोग की बुद्धि सन्निहित होती है अर्थात जो कर्म कर्मयोग की उपरोक्त बुद्धि से युक्त होकर किया जाता है अर्थात जिसे करने में स्वधर्म, समत्व, असंगत, समर्पण और प्रसाद बुद्धि होती है वो कर्म तो कर्मयोग का कर्म है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाता है, शेष जो इन बुद्धियों या दृष्टिकोण से युक्त नही होते वे सामान्य कर्म हैं जो पीड़ादायक होते हैं। इसलिए ये सामान्य कर्म निम्नकोटि के होते हैं।

      जब भी हम कोई कर्म करते हैं दो तरह के परिणाम मिलते हैं, एक हमारे बाहर और दूसरा हमारे अपने अंदर। यदि हम बाहरी परिणाम से प्रभावित होते हैं तो परिणाम के स्वरूप के अनुसार कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी क्योंकि दोनों तरह के परिणाम मिलते रहते हैं। बाहरी संसार तो हमेशा परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के कारण हम भी परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि हम इनके प्रभाव में होते हैं। लेकिन यदि हम आंतरिक परिणाम के वश में हों, बाहरी परिणाम में समत्व हो, उनसे असंगत हों तो फिर हम अपने कर्म से ही आनंदित होते रहते हैं, स्थायित्व रहता है हममे जो हमें चिर आनंद की तरफ ले जाता है। 

   यदि बाहरी परिणाम हमपर हावी हैं और परिणाम बुरा आ गया तो हममे अपने कर्म के प्रति , अपने मानसिक अवस्था के प्रति नकरात्मकता आ जाती है। ये नकस्रात्मकता आगे के कर्मों को भी दूषित कर देती है। नतीजा होता है कि इस नकस्रात्मकता से बाहर आना सहज नहीं रह जाता। ये तभी सम्भव हो पाता है जब हम कर्मयोग की बुद्धि का अभ्यास शुरू करते हैं। आइये देखते हैं कि कर्मयोग से हीन बुद्धि के अनुसार कर्म करने से किस तरह से हम नकारात्मकता को प्राप्त होते हैं, किस तरह से हमारा पतन हो जाता है।

1.जब हम अपने स्वधर्म  के अनुसार ही  करटे हैं तो सही कर्म करते हैं । इस तरह के कर्म में हम ध्यान रखते की हम धर्म के अनुसार ही कोई कार्य करें। इसके विपरीत जब हम स्वधर्म का ख्याल रखे बिना कोई कर्म करते हैं तो हम अपनी पसंद नापसन्द के अनुसार कोई कर्म करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें धर्म का ध्यान नहीं रहता बल्कि हमें जो अच्छा लगता है वही करते हैं। इस स्थिति में हम अपने मोह, माया ,आवेश, गर्व, अहंकार, भ्रम, मित्रता, शत्रुता , भय आदि के भाव के वश में होकर कर्म करते हैं। इस तरह के कर्म से उद्धार की बात सोचना भी बेमानी ही है।
2.जब हमारे कर्मों में समत्व का भाव होता है तो परिणाम से लगाव के बिना बड़ी निश्चिंतता से हम कर्म भी करते हैं और करने वक़्त आनंदित भी रहते हैं। ये आनंद परिणाम में नहीं कर्म में निहित होती है। लेकिन जब हम समत्व के भाव के बिना कर्म करते हैं तो परिणाम के लिए ही कर्म करते हैं। तब हम कर्म करने वक़्त उत्तेजित और बेचैन हुए रहते हैं। हम नसम की अवस्था में होते हैं , परिणामतः अपने कर्मों से हम भी हम असन्तुलन ही पैदा करते हैं.
3.जब हमारे कर्म में ईश के प्रति समर्पण का भाव होता है तो हम बड़े कैनवास पर काम करते हैं। हमारे कर्मों का उद्देश्य जीव का कल्याण होता है। लेकिन जब ये समर्पण ईश के प्रति न होकर खुद के प्रति ही होता है तब हम जो भी करते हैं उसमें अपनी भलाई का भाव रहता है। तब हम ये नहीं सोचते कि जो हम कर रहें हैं उससे समाज का कितना भला होगा, जीव मात्र का कितना भला होगा। ये संकुचित दृष्टिकोण स्वार्थ को जन्म देता है जिससे जन कल्याण की बात हम नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में हमारे कर्मों से समाज को नुकसान नुकसान पहुंच सकता है।
4. जब हम परिणाम से असंगत होते हैं अर्थात उससे जुड़े नहीं होते तो परिणामों का हमपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लेकिन जब हमारे कर्मों में असंगत का भाव नहीं होता तब हम अपने कर्मों के परिणाम के अनुसार ही प्रतिक्रिया भी देते हैं और आगे का अपना कर्म भी निर्धारित करते हैं। यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिले तो हम दुखी हो जाते हैं, गुस्सा से भर जाते हैं, और अपने अगले बगल के लोगों को भी  अपने  व्यवहार से विचलित कर देते हैं। इस तरह जब हम परिणाम से बन्ध जाते हैं तो लगता है कि जो करते हैं हम ही करते हैं, और परिणाम स्वरूप सभी को कोसने लगते हैं। हमारे अगल बगल का भी माहौल खराब हो जाता है। खुद हम भी आगे के अपने कर्म पूर्व के परुणामों के अनुसाय तय कर किसी का भी बुरा करने पर उद्धत हो जाते हैं।
5. प्रसाद बुद्धि से युक्त कर्म में जो भी परिणाम प्राप्त होता है उसे स्थिर भाव से हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत प्रसाद बुद्धि से हीन कर्म में कर्म के परिणामस्वरुप जो भी हमें मिलता है उससे हमें असन्तोष ही बना रहता है, जिसके कारण हमारी मनः स्थिति हमेशा दुख की बनी रहती है। हम चिरसन्तोषी और चिर दुखी हुए रहते हैं। प्रसन्ता के साथ स्वीकार नहीं करने के कारण हम हमेशा हमेशा दुःखी ही बने रहते हैं।
  इन कारणों से कर्मयोग के बुद्धि से विहीन कर्म हीन ही है। सो इसे त्यागने में ही भलाई है। अतः हमें सामान्य  कर्मों को छोड़कर इस कर्मयोग की बुद्धि ही अपनानी चाहिए। तभी हमारा कल्याण सम्भव है। तभी हम कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त हो सकते हैं । अन्यथा सामान्य कर्मों को करते हम हमेशा कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं। ध्यान रहे कर्म करना कर्मयोग नही है। कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करना ही कर्मयोग है। जो ऐसा नहीं कर पाते वे कृपण हैं अर्थात कंजूस हैं। उनमें क्षमता तो होती है लेकिन वे इस क्षमता का उपयोग नहीं करते और स्व यानी अपनी आत्मा को नहीं पहचान कर बन्धन में बंधे रह जाते हैं।
श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि को स्पष्ट कर देने के बाद इस बुद्धि की अन्य विशेषता पर प्रकाश डालते हुए आगे कहते हैं कि मनुष्य को लगता है कि इस जीवन में उसके द्वारा अर्जित पूण्य और पाप की उसकी उपलब्धि हैं। लेकिन हमारे पूण्य और पाप भी इसी जन्म कर्म के बंधन हैं जो हमें हमारा सेल्फ यानी आत्मा का बोध नहीं करा पाते। परिणामों के बंधन ने बन्धा मन आत्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है। लेकिन यदि हममे कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार कर्म करने की कुशलता आ जाती है तो हम इस पाप पुण्य के द्वंद्वात्मक युग्म से बाहर निकल आते हैं क्योंकि तब हमारे पास परिणाम के प्रभाव से मुक्त रह पाने की दक्षता होती है।
   जब हम परिणाम से बढ़ी नहीं होते तो भविष्य की चिंता से न तो खुश होते हैं न दुखी। इसी प्रकार अतीत के प्रभाव से भी हम मुक्त रहते हैं क्योंकि अतीत के कर्मों का ही परिणाम भविष्य में मिलता है। सो हमारी दृष्टि मात्र वर्तमान के कर्म पर टिक जाती है और हमारा सारा प्रयास उस कर्म को उच्च कोटि का बनाने में होता है। पाप और पुण्य तो अतीत के कर्म और भविष्य के फल हैं लेकिन जब इनसे हम पार चले जाते हैं तो हमारी दृष्टि वर्तमान पर ही होती है, जब हम कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म पर ध्यान देते हैं और इसे कर हम बन्धन से मुक्त होते हैं। 
कर्मयोग बुद्धि के परिणामों को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जब इस तरह की समत्व की बुद्धि  प्राप्त व्यक्ति ही ज्ञानी कहलाता है। परिणाम से निर्विकार व्यक्ति के लिए परिणाम बन्धनकारी नही हो पाते। जब हम फल से बँधे रहेंगे तब न हमें परिणामों के कारण सुख या दुख की अनुभूति होगी। जब परिणाम का बंधन ही नहीं तो फिर उनके कारण सुख या दुख कैसा! इस स्थिति में तो हमें सिर्फ कर्म करने से प्राप्त अवश्यम्भावी प्रसन्नताआ ही मिलती है। समर्पण के साथ एवम स्वधर्म के अनुरूप किये गए कर्म में तो कर्म करने में प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। सो हम चिर प्रसन्न रहते हैं। दुख या क्षणिक सुख देने वाला परिणाम तो बेअसर है समत्व बुद्धि वाले ज्ञानी व्यक्ति पर। इस तरह की चिरस्थाई प्रसन्नता मन को स्थिर करती है। स्थिर मन व्यक्ति ही अपने स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ को देख समझ पाता है। सुख दुख के बीच झूलते व्यक्ति की बुद्धि, मन, दृष्टि आदि सभी चायमान होते हैं। सारी इन्द्रियाँ एक साथ ही सक्रिय हुई होती हैं। आप खुद अपनी ही अवस्था पर दृष्टि डाल लें। क्षण में इधर, क्षण में उधर। मन के अंदर भारी उथल पुथल और कोलाहल रहता है परिणामों या परिणामों की उम्मीद अथवा आशंका से। लेकिन परिणाम से निर्विकार समत्व बुद्धि युक्त व्यक्ति शांतचित्त, प्रन्नचित्त, रहते हुए स्वम् की अनुभूति में लीन रहता है। अपने स्व के माध्यम से वह खुद को परमात्मा के समीप पाता है। जब व्यक्ति परमात्मा के समीप ही है तो फिर उसे जन मृत्य के बंधन कैसे बाँध सकते, वह तो इनसे मुक्त रहता है। आप याद करें प्रारम्भ में अर्जुन युद्ध करने से क्यों मना कर रहा था? उसकी दृष्टि युद्ध यानी कर्म पर नहीं थी, उसकी दृष्टि युद्ध के परिणाम पर थी जिसमें उसे जय और पराजय दोनों से मिलने वाले परिणामों से असन्तुष्टि थी। वह सम्भावित परिणामों से निर्विकार नहीं होता बल्कि उनसे बन्धनकारी ही मानता है तभी तो दुखी हो रहा था, तभी तो त्रिलोक का साम्राज्य मिल जाने वाला परिणाम भी उसे स्वीकार नहीं था। लेकिन ये उसके परिणामों के साथ गहरे बन्धन के कारण था। लेकिन श्रीकृष्ण तो यँहा उसे कर्मबुद्धि के द्वारा जन्म मृत्यु के चक्र से ही छूट जाने का ज्ञान दे रहे हैं जो उन परिणामों से बहुत आगे है। 
  सो हमारा उद्देश्य समत्व की प्राप्ति होनी चाहिए न कि क्षुद्र परिणामों पर हमारी नजर होनी चाहिए।
जब व्यक्ति परिणामों से विच्छेदित होना सिख लेता है तब उसमें मोह नहीं रह जाता। जब आपका मोह समाप्त हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि तब आपको परिणाम से लगाव नही। रह जाता।  परिणामों के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति को किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। तो क्या ये सम्भव है? सुनने में तो ये सम्भव नहीं लगता कि परिणाम के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होकर भूत , वर्तमान और भविष्य की सारी आसक्तियों से मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि परिणाम के प्रति आकर्षण बना हुआ है। लेकिन जैसे जैसे अभ्यास करते जाते हैं धीरे धीरे परिणाम की चिंता कम से कमतर होती जाती है। कर्मयोग की बुद्धि का निरन्तर अभ्यास परिणामों के प्रभाव को कम करता है। इस बुद्धि को , यानी इस ज्ञान को सतत स्मरण में रखिये। कर्म की महत्ता को समझने से परिणाम की चिंता कम होती है। जब व्यक्ति की कर्मयोग की बुद्धि व्यक्ति के अंदर के परिणाम से लगाव की आसक्ति को पार कर जाती है तो भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त आसक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति इस अवस्था में  पहुँचता है तब माना जाता है कि वह वैराग की अवस्था में आ गया है।
यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण ने अभी जिस वैराग्य की चर्चा की है वह किस चीज से है?  भोगो से वैराग्य की बात कही गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। भोग परिणाम ही हैं कर्म के। परिणाम के प्रति समत्व में स्थित व्यक्ति को जब परिणाम प्रभावित करने में असमर्थ हो जाते हैं तो वह वैराग्य की अवस्था है। सनद रहे इस वैराग्य में कँही भी कर्म से वैराग्य की बात नहीं की गई है, अतएव हमें इस भ्रम में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण कर्म से विरत होने को कह रहे हैं, वे मात्र कर्म के परिणाम में समत्व की ही शिक्षा दे रहें हैं। इस अवस्था में मन शांत हो चलता है और तब हम इस अवस्था में आ जाते हैं कि हम सेल्फ को यानी अपने वास्तविक रूप को समझ पाए कि दरअसल हम कौन हैं। स्वयम को जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि स्वयं का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान होना है।  व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य भोगों ( धनात्मक और ऋणात्मक दोनों,) को ही भोगना नहीं है। जब हम कर्म करते हुए परिणाम के प्रति समत्व की भावना रखते हूं अर्थात अच्छे परिणाम से प्रसन्न नही। होते और बुरे परिणाम से दुखी नहीं होते बल्कि दोनों को समान भाव रखते हैं तो मन शांत होता है। इस अवस्था में जीवन में मिल चुके, मिल रहे और मिल सकने वाले भोगों से भी नही। प्रभावित नहीं होते। ये वैराग्य की अवस्था है, जिसमें मन, चित्त शांत होता है, आनंदित रहता है और यही सत्य की अवस्था है अर्थात हमारा सच्चिदानंद स्वरूप इसी अवस्था में हमें मिलता है।
       ये बातें थोड़ी रहस्यमयी लग सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे जब तक हम मोह में लगे हैं , परिणाम में हमारी आसक्ति बनी हुई है तभी तक ये बातें रहस्यमयी प्रतीति होती हैं । जैसे ही कर्मयोग के अभ्यास से हम परिणाम जनित प्रभाव से हम खुद को अलग करते हैं प्रसन्नता अनुभव करते हैं , मन शांत और हल्का हो जाता है। दैनिक जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप छोटे बच्चों के साथ खेल रहें हैं और बच्चे आपको हरा देते हैं। आप हार कर भी दुखी नही होते। उसी प्रकार यदि आप बच्चों को हरा देते हैं तो भी आप फरव  नहीं करते। बल्कि आप तो दोनों परिणामों को समान रूप से लेते हैं और परिणाम के प्रभाव में नहीं होते। इसे विस्तारित करने पर हम अपने कर्म में इसे देख समझ सकते हैं। मनुष्य का जीवन ही अपने स्व की प्राप्ति के लिए हुआ है। यदि हम आप कर्म में स्वधर्म और समर्पण से रत हैं और परिणाम के प्रभाव से मुक्त हैं तो इसी वैराग्य की अवस्था में हैं। वैराग्य के लिए न तो कोई उम्र निर्धारित है, न ही विशेष भेषभूषा या कोई विधि विशेष हीं। वैराग्य को श्रीकृष्ण ने जिस तरह यँहा प्रस्तुत किया है वह एकदम अनुकरणीय है बशर्ते कि कर्मयोग का अभ्यास करते करते हम अपनी बुद्धि पर पड़े माया और मोह के आवरण को हटा सकें। कर्मयोग का आचरण करने पर ऐसा होगा ही ये भी निश्चित ही है।
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जिज्ञासा होती है, जानने की इक्षा होती है। यही जिज्ञासा व्यक्ति को अन्वेषण के मार्ग पर ले जाती है। इस संसार में कर्म करने के सम्बंध में भी तरह तरह के सिद्धान्त, ज्ञान मौजूद हैं। व्यक्ति अपने जिज्ञासा वश इनके सम्पर्क में आता है और भाँती भाँति के तर्कों को सुनकर, जानकर दिग्भ्रमित भी हो जाता है। किंतु यदि वह अपनी बुद्धि कर्मयोग में स्थिर करता है और अब तक बताए गये मार्ग पर चलता है तो उसकी बुद्धि का भ्रम दूर होता है जैसा कि पूर्व की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। जब बुद्धि का भ्रम छँट जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सेल्फ/स्व/उसकी आत्मा क्या है, उसे ज्ञात होता है कि वह वास्तव में कौन है। उसे समझ में आ जाता है कि वह देह नहीं है, दिमाग भी नहीं है, किसी कुल का प्रतिनिधि भी नहीं है , किसी जाति और धर्म का सदस्य नहीं है, कोई पेशेवर नहीं है बल्कि वह तो विशुद्ध आत्मा यानी परमात्मा स्वरूप ही है। ये बात पढ़कर, रट कर समझने की बात नहीं है बल्कि कर्मयोग के रास्ते चलकर अनुभूत करने वाला ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद इस व्यक्ति की बुद्धि संसार से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है यानी व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा का संयोग हो जाता है। यही अवस्था योग की है। उसी अवस्था में व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म भी करता है जिसका एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण ही होता है क्योंकि ईश्वर जन जन में होता है। यह बात वह व्यक्ति पढ़कर , रट कर नहीं बल्कि अनुभूति कर समझता है। 
       इसकी प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है। इसे निम्न चरणों में सरलता से समझा जा सकता है।
(1) व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है। जिज्ञासा की हद तो देखिए, दूध पीता शिशु भी चाँद और तारों की जिद्द करता है। आप खुद देख लें कि व्यक्ति अपने शैशव अवस्था से ही कितना कुछ जानने के लिए विकल रहता है।
(2) अब समझने वाली बात है कि सत्य तो एक ही होता है, बाकी सब असत्य ही होते हैं। हर व्यक्ति इस सत्य को पकड़ने और जानने के लिए प्रश्नवाचक मानसिकता/बौद्धिकता लिए अपनी समझ के अनुसार सत्य खोजते रहता है। 
(3) व्यक्ति की जिज्ञासा उसे तरह तरह के ज्ञान और अनुभव से रु ब रु कराती है। लेकिन होता ये है कि सत्य पाने की जगह वह इन भाँति भाँति के ज्ञान और अनुभव के चक्कर में पड़कर भ्रम और आज्ञान का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में उसकी भ्रमित बुद्धि उसे एकलौते सत्य से दूर लेकर चली जाती है। आज भी आप सामाजिक विज्ञान पढिये या दर्शन या भौतिकी, रसायन या जीवशास्त्र, आप हम सब अंतिम सत्य की खोज में लगे होते हैं लेकिन ज्ञान के नाम पर अज्ञानता के कचड़े में फंस जाने की वजग से सत्य तक नहीं पहुँच पाते। 
(4) अज्ञानता के मकड़जाल में फड़फड़ाते हम सब तो अर्जुन हीं है न! श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इतने अज्ञानता से पार पाना है तो हमें कर्मयोग की बुद्धि पर भरोसा करना होगा जो अपने तकनीक से हमारी बुद्धि के भ्रम और भ्रम की जननी माया को समाप्त कर देता है। तब हम सत्य को देख पाते हैं। तब हमारी जिज्ञासाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि तब हमें अपने प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर मिलने लगते हैं।
(5) जिज्ञासा के शांत होने से बुद्धि भी शान्त होती है, प्रश्न करने की ललक कम होती है क्योंकि तब एक एक कर हमारे प्रश्न खत्म होते जाते हैं , उनके उत्तर मिल जाते हैं।
(6) इस प्रकार से शांत चित्त की अवस्था में हमें वैराग्य का ज्ञान होता है और हम अपने स्व को समझने की योग्यता पाते हैं।
(7) अब स्व को समझ कर हम जीवन का समाधान कर सकते हैं यानी समाधिस्थ हो जाते हैं।
(8) समाधि की इस अवस्था में हम जान पा लेते हैं कि हम किस तरह से परमात्मा के ही अंश हैं, हमारी आत्मा परमात्मा के साथ संयोग कर लेती है। 
(9) ये वो अवस्था है जब हमारे सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हो जाते हैं । इस अवस्था में हम न केवल अपने अंदर को खोज पाते हैं बल्कि बाहरी संसार के रहस्यों को भी सहजता से समझ सकते हैं।
(10)  ये अवस्था कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा है।
       आगे श्रीकृष्ण इसी  तरह से कर्मयोग के सैद्धान्तिक पहलुओं और इसके क्रियात्मकता को और भी स्पष्ट करते हैं, जिसके लिए हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा।""
इस उद्धरण को देने के पीछे उद्देश्य यह है कि हम श्रीकृष्ण की उस शिक्षा का पुनः स्मरण कर सकें जिससे यज्ञ का अर्थ स्पष्ट होता है। वस्तुतः जब हम पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों को समर्पित हो कर बिना परिणाम से जुड़े स्वधर्म के अनुसार कर्म करते हैं तो यही यज्ञ है जिसे करने से हम कर्मबन्धन में बंधते नहीं हैं और कर्म भी करते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 10

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्टा पुरोवाचप्रजापतिः।
 अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्‌॥

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो।।10।।

अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि के पृष्ठभूमि में समझाते हैं कि ये यज्ञ भावना सृष्टि के प्रारम्भ से व्यक्तियों के साथ है और यदि मनुष्य इस यज्ञ भावना से काम करता है तो उसे हर इक्षित वस्तु प्राप्त होती है।  ये यज्ञ भावना वही है जो हम कर्मयोग की बुद्धि में सीखे हैं जो द्वितीय अध्याय में वर्णित है और जिसका एक अंश ऊपर भी दिया गया है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस सृष्टि में सब कुछ आपस में जुड़ा हुआ है और सब एक दूसरे पर निर्भर हैं। जब हम निःस्वार्थ भाव से अपने हिस्से के दायित्वों को पूर्ण समर्पण के साथ करते हैं तो इससे पूरी व्यवस्था को लाभ होता है और वही व्यवस्था हमारी आवश्यकताओं का भी ख्याल रखती है। यदि इस व्यवस्था में कोई एक यूनिट स्वार्थवश होकर कार्य करने लगता है तो संतुलन गड़बड़ा जाता है। हम इसे सबसे बेहतर ढंग से खुद के शरीर के कार्यप्रणाली से समझ सकते हैं। हम जो खाना खाते हैं वह मुँह होते हुए पांचन तंत्र से होता हुआ सभी कोशिकाओं को उनके आवश्यकता के अनुसार पोषण देता है। यदि किसी अंग को ज्यादा या किसी विशेष पोषण की आवश्यकता होती है तो उसे वह प्रदान किया जाता है। सभी कोशिकाएँ  पूरे शारीरिक तंत्र के लिए कार्य करती हैं। यदि शरीर के किसी एक भाग की कार्यप्रणाली गड़बड़ाती है तो पूरा शरीर अस्वस्थ हो जाता है लेकिन यदि सभी कोशिकाएँ अपने निर्धारित कार्य को करती है तो शरीर भी स्वस्थ रहता है और बदले में कोशिकाएँ और सभी अंग भी स्वस्थ रहते हैं। आधुनिक ज्ञान में इसे ही TEAM WORK,  COOPERATIVE, SYNERGY आदि नामों से पुकारा जाता है। यज्ञ की भावना का सार है कि
ONE FOR ALL & ALL FOR ONE. जब हम इस भावना से कार्य करते हैं तो स्वस्थ समाज की रचना होती है, जिस समाज की समृद्धि से हम सभी लाभान्वित होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 11

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
 परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को उन्नत करो और वे देवता तुम लोगों को उन्नत करें। इस प्रकार निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे को उन्नत करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे
 ॥11॥
अब श्रीकृष्ण मनुष्य और उन गुणों जो मनुष्य का उत्थान करते हैं उनके बीच के परस्पर सम्बन्धों को स्पष्ट करते हुए उनके महत्व पर प्रकाश डालते हैं। देव् क्या है? क्या देवता परम् ईश्वर से भिन्न कोई सत्ता होता है? नहीं । परमब्रह्म एक ही है लेकिन उसकी अभिव्यक्ति भिन्न भिन्न तरह से होती है। यही अभिव्यक्ति देव  या देवता है जो भिन्न भिन्न गुणों यानी दैवी गुणों से प्रकट होकर व्यक्ति को प्रखर करती है, प्रकाशित करती है। दैवी गुण ही देवता हैं। जब व्यक्ति इन गुणों यानी इन देवताओं की शरण में जाकर उनके प्रति समर्पित होता है तो ये गुण बढ़ते हैं, समृद्ध होते हैं और साथ ही साथ ये व्यक्तियों का भी उत्थान करते हैं। ये परस्पर होता है। यदि हम खुद की बौद्धिकता को तराशते हैं , उनको माँजते हैं तो उनकी चमक, उनकी धार हमें प्रकाशित करती है, हमें धार प्रदान करती है। एक की वृद्धि दुसरे की भी वृद्धि सुनिशित करती है। बिना इसके व्यक्ति के उत्थान की कल्पना भी नहीं है। यही तो यज्ञभावना है।
  यज्ञ की भावना क्या है? हम पीछे देखते हैं कि परस्पर उन्नति की भवना ही यज्ञभावना है, यानी निःस्वार्थ भाव से दूसरे की सेवा करना ही यज्ञ भावना है। जब सहयोग और अनुशासन में रहकर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म में प्रवृत्त होते हैं तो पूरे मनोयोग से उसे करते हैं और यही तो उस कर्म की उत्पादन क्षमता भी होती है जो प्रकट होकर हमारी समृद्धि को बढ़ाती है। इसके विपरीत यदि हम तुक्ष आसक्ति भाव से खुद के लिए जब कार्य करते हैं जिसमें समष्टि के प्रति कोई समर्पण नहीं होता है तो हमारे कर्म से उन महान उद्देश्यों का भला नहीं हो पाता, उसकी उत्पादन क्षमता गिर जाती है, उन सद्गुणों का जो उन कर्मों की धार होते हैं उनमें वृद्धि नहीं हो पाती और नतीजा में कर्म निष्फल होकर रह जाते हैं, उनसे दैवी सद्गुणों का विकास नहीं होता जिसके परिणाम स्वरूप न तो व्यक्ति का न ही समष्टि का ही कल्याण हो पाता है।  व्यक्ति जिस हद तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर कर्म करता है उस हद तक व्यक्ति और समाज का पतन होता है। सो ये जरूरी है कि हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर कर्म करें। जब हम उच्च आदर्श को अपना लक्ष्य मानकर , उस आदर्श की सेवा करते हैं , उसके प्रति ही समर्पित होते हैं तो वही आदर्श हमारा कल्याण करता है। यह व्यक्ति के लिए सही है, तो साथ साथ व्यक्तियों के समूहों, संगठनों , समाज के लिए भी सही है। सम्पूर्ण हार्मोनी ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त करती है। व्यक्ति मैं नहीं हम की भावना से चलती है। यदि किसी संगीत समारोह में सभी वादक अपना अपना साज अपनी अपनी इक्षा से बजाने लगे तो सिर्फ और सिर्फ शोर पैदा होता है लेकिन यदि एक राग विशेष के लिए सभी उस राग को जन्म देने  के उद्देश्य से साजों को बजाते हैं तो मधुर संगीत निकलता है। साजों की हार्मोनी से राग बनते हैं न कि जबरन साजों का महत्व साबित करने के लिए उनको लगातार बजाने से। प्रत्येक व्यक्ति यदि खुद से अधिक दूसरे के महत्व को तवज्जो देता है तो इस हार्मोनी की पैदाइश होती है। इस प्रकार यज्ञ भावना एक सामूहिक प्रयास है उच्च आदर्शों के प्रति और यही उच्च आदर्श पूर्ण होकर व्यक्ति का कल्याण करता है। सो व्यक्ति को चाहिए कि वह इन दैवी सद्गुणों का विकास करे जो अंततः उस व्यक्ति को उसके परमलक्ष्य की प्राप्ति को सम्भव करता है। सो हमें चाहिए कि हम इस संसार के साथ हार्मोनी यानी सजातीय प्रवृत्तियों , उन प्रवृत्तियों जिनसे यज्ञ भावना बलवती होती है उनके साथ हार्मोनी में रहें। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 12 , 13

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
 तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥

यज्ञ द्वारा बढ़ाए हुए देवता तुम लोगों को बिना माँगे ही इच्छित भोग निश्चय ही देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको बिना दिए स्वयं भोगता है, वह चोर ही है
 ॥12॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
 भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्‌॥

यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं और जो पापी लोग अपना शरीर-पोषण करने के लिए ही अन्न पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं
 ॥13॥
       श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि यज्ञ भावना से व्यक्ति किस तरह लाभान्वित होता है। जब हम सम्पूर्ण समर्पण से, बिना परिणाम की अपेक्षा किये, अपने दायित्वों का निर्वहन करते हैं तो दैवी सम्पदाओं में तो उन्नति होती ही है साथ ही कर्म के मार्ग में कर्म की उतपादक क्षमता भी बढ़ती है जिससे वो व्यक्ति भी जो कर्म में क्रियाशील है वो भी लाभान्वित होता है। व्यक्ति जब सामूहिक हित की वृद्धि में अपना योगदान देता है तो वही सामूहिक हित व्यक्ति के हित का ख्याल कर उसकी पूर्ति भी करता है। लेकिन समाज में ऐसे लोग भी होते हैं जो बिना सामूहिक हित, बिना दैवी सम्पदाओं की उन्नति में अपना योगदान दिए सामूहिक हित के लाभों का उपभोग भी करना चाहते हैं। ऐसे लोग चोर हैं। बिना अपने हिस्से का दायित्व निभाये, बिना कर्म किये जो चाहता है कि उसकी उन्नति हो , उसका भला हो, उसका प्रयोजन सिद्ध हो वो व्यक्ति दूसरे के हिस्से को मारता है सो वह निश्चित ही चोर है। इस प्रकार दैवी सम्पद यानी उत्पादन क्षमता का त्याग और समर्पण की भावना पर आधारित कर्म द्वारा पोषण होता है जिससे उनमें वृद्धि होती है  और बदले में उस उत्पादन क्षमता यानी दैवी सम्पदाओं में हुई वृद्धि से समाज की इकाई के रूप में उस व्यक्ति की भी वृद्धि होती है।  यदि कोई व्यक्ति सामूहिकता के इस सिद्धान्त को तोड़कर ये चाहे कि इस कॉमन गुड में वो अपना योगदान भी न दे यानी उस कॉमन गुड़ के प्रति अपना निर्धारित कर्म भी न करे और कॉमन गुड़ से होने वाले लाभ का फायदा भी उठाए तो फिर वह व्यक्ति तो चोर ही  कहलायेगा न!  समाज का वह व्यक्ति जो बिना उत्पादन किये समाज की सपंत्ति का उपभोग करे वो व्यक्ति निश्चित रूप से समाज का अपराधी भी है और समाज पर बोझ भी है। इस तरह के व्यक्ति के अंदर नाकारात्मक प्रवृत्तियाँ, अंधकार , आदि की ही वृद्धि होती है। ऐसा व्यक्ति समाज के हित को दरकिनार कर सिर्फ अपने बारे में सोचता है। जो सिर्फ अपने हित की वृद्धि की बात सोचता है वह व्यक्ति निरन्तर समाज की उपेक्षा करता है, वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के अधिकारों का दमन करता है और इस प्रकार वह सिर्फ अपने पाप को ही बढ़ाता है।
   लेकिन इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने हिस्से का कर्म कर उस कर्मफल को प्रसाद की तरह लेता है वही श्रेष्ठ होता है क्योंकि वह सम्पूर्ण सामाजिक हित में अपना योगदान देकर उनसे प्राप्त फल को प्रसाद की तरह पाता है। हम जो अर्पित करते हैं बदले में भी वही पाते हैं। जो हम हम अर्पित करते हैं वही  कर्म अर्पण के पश्चात प्रसाद कहलाते हैं और वही हमें बदले में मिलते भी हैं।  जो व्यक्ति अपने हिस्से के कर्म को पूर्ण समर्पण की भावना से उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर करता है उसे जो फल प्राप्त होता उसे वह प्रसाद की तरह लेता है और उस स्थिति में उसे पूर्ण मानसिक शांति की प्राप्ति होती है जिसके कारण उसकी यात्रा अपने पूर्णता की तरफ होती है। वह पूर्ण संतोष को, पूर्ण प्रसन्नता को प्राप्त होता है।  लेकिन इसके विपरीत जो सिर्फ अपने लाभ के विषय में सोचता है, भले इससे लोगों का अनिष्ट होता रहे तो वह व्यक्ति पाप यानी अशुद्धि यानी गन्दगी ही पकाता और खाता है अर्थात उसके अंदर सिर्फ और सिर्फ अशुद्धि यानी गंदगी का ही विकास होता है, आसुरी सम्पदाओं की ही वृद्धि होती है।
    इस प्रकार श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को हम सारांश में इन सोपानों में समझ सकते हैं--
1.व्यक्ति को निश्चित ही अपना कर्म करना चाहिए।
2. उसे अपने हिस्से का कर्म करना चाहिये।
3.उसे उच्च आदर्शों के प्रति समर्पण की भावना से कर्म करने चाहिए।
4. उसे कर्म करते समय सिर्फ अपने लाभ के विषय में न सोचकर समस्त व्यवस्था के वृद्धि के विषय में सोचना चाहिए, यानी स्वार्थ नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से कर्म करने चाहिए।
5.जब व्यक्ति इस तरह से कर्म करता है तो उसे जो मिलता है वह वही होता है जिससे सामूहिक हित का पोषण होता है। इसी पोषण से उसका भी पोषण होता है।
6.इस तरह व्यक्ति को पूर्ण संतुष्टि की प्राप्ति होती है। इस प्रकार का सन्तुष्ट व्यक्ति परम् शांति और सुख को प्राप्त करता है।
7. जो ऐसा नही कर सिर्फ अपनी भलाई की सोचता है वह व्यक्ति समाज के सामूहिक हित का अहित कर अपना लाभ बढाना चाहता है।  इस प्रकार के व्यक्ति के अंदर नकारात्मक प्रवृत्तियों यथा दूसरों को दुख देने, उनका हक मारने, दूसरों से धोखाधड़ी करने, दूसरों से दुर्व्यवहार करने, उनसे झूठ बोलने,की वृद्धि होती है।
8. जो हम उच्च आदर्शों को समर्पित करते हैं वही हमें प्रसाद के रूप में प्राप्त होता है। सो हमें चाहिए कि हम अपना सर्वश्रेष्ठ अर्पित करें ताकि हमें जो मीले वो भी सर्वश्रेष्ठ हो। 
9. इस प्रकार जब हम ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम उच्च आदर्शों के प्रति  समर्पित होकर कर्म करते हैं, जब हम निस्वार्थ भाव से सामूहिक कल्याण और सामूहिक वृद्धि की भावना से कर्म करते हैं तो प्रसाद में भी उन्नति ही हमें मिलती है। लेकिन यदि हम स्वार्थवश होकर कर्म करते हैं , सिर्फ अपने हित को साधने के लिए दूसरों को कष्ट देने के उद्देश्य से कर्म करते हैं तो हमें बदले में वही अहितकारी, नाकारात्मक , चीजें प्राप्त होती हैं जिससे हम निरन्तर असन्तुष्ट ही रह जाते हैं, बेचैन ही रह जाते हैं।
10. जो व्यक्ति बिना समाज के व्यापक हित में योगदान दिए सिर्फ अपना ही हित साधने के चक्कर में रहता है वह सिर्फ अशुद्धि को यानी नाकारात्मकता यानी आसुरी सम्पदाओं जैसे लोभ, मोह, क्रोध, छल, हिंसा, आदि को बढ़ाता है।
     हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म नही अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 14 एवम 15
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
 यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
 कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌।
 तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌॥

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है
 ॥14-15॥

हम देख चुके हैं कि व्यक्ति बिना कर्म किये एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति व्यक्ति के गुणों के अनुसार उससे कर्म करा ही लेती है। जिस प्रकार जीने के श्वास अनिवार्य शर्त है उसी प्रकार कर्म भी अनिवार्य शर्त है। लेकिन हम सब जो कर्म करते हैं वे दो भावना से किये जाते हैं। कुछ लोग निःस्वार्थ भाव से कर्म करते हैं तो कुछ सिर्फ स्वार्थ के अधीन ही कर्म करते हैं।
    निस्स्वार्थ कर्म क्या है? आप वृक्ष को देखें। इसमें विभिन्न अवयव होते हैं यथा तना, शाखाएँ, पत्ते, जड़, फल, फूल। लेकिन जब हम वृक्ष को देखते हैं तो हम ये नहीं कहते कि यह एक तना है, शाखा है, पत्ता है, जड़ है, फूल है या फल है। हम उसे वृक्ष कहते हैं।  उसी प्रकार निःस्वार्थ भाव के लोग संसार को , भौतिक और अभौतिक संसार को उसके अवयवों से नहीं देखते, बल्कि समग्र रूप से देखते हैं, वे UNIVERSE की तरह देखते हैं, MULTIVERSE की तरह नहीं। उनकी दृष्टि में भेद नहीं होता। जब आप इस प्रकार किसी चीज को एक यूनिट यानी इकाई के रूप में देखते हैं तो उसकी समग्र अच्छाई और उसके समग्र कल्याण को सोच समझ पाते हैं। अब देखें कि पत्ते खाना बनाते हैं , शाखाएँ उन्हें तना से होते हुए जड़ तक पहुँचाती हैं, तना वृक्ष को खड़ा रहने का अवलम्ब भी देते हैं, जड़ जमीन से पोषण लेकर ऊपर तना और शाखाओं से होते हुए पत्तों तक पहुँचाती हैं ताकि वृक्ष का भोजन बन सके, फूल फल को जन्म देने में सहायक होते हैं और फल उस बीज को धारण करते हैं जिनसे पुनः एक नया वृक्ष जन्म लेता है। अब जरा सोचिए कि क्या किसी एक अंग का कार्य अपने आप में पूरा है? क्या कोई एक अंग का अलग से कोई अस्तित्व है? और क्या एक अंग के नहीं रहने से उस वृक्ष का कोई अस्तित्व है? दोनों के उत्तर नकारात्मक हैं।  दोनों अपने अपने अस्तित्व के लिए एक दूसरे पर निर्भर हैं। जो इंसान ये सच जान समझ कर बिना अपने स्वार्थ के पूरी व्यवस्था के लिए कार्य करता है वह  निःस्वार्थ भाव से कार्य करते रहता है और व्यवस्था उसका भरण पोषण करते रहती है। लेकिन यदि वृक्ष का कोई अंग बेईमानी करे और अपना काम सिर्फ अपने लिए करे , अन्य को अपने कर्म का परिणाम आगे नहीं बढ़ाये तो क्या होगा, मसलन जड़ पोषण तो इकठ्ठा करे लेकिन आगे शाखा और पत्तों तक नहीं जाने दे तो क्या होगा? प्रारम्भ में जड़ मोटा तगड़ा होगा , लेकिन पत्ते उस पोषण को अप्राप्त रहने की स्थिति में वृक्ष का भोजन नहीं बना पाएंगे और धीरे धीरे सारा वृक्ष कमजोड़ होकर गिर जाएगा। यही स्वार्थवश किया गया कर्म है।  यही दृष्टांत समाज में हर जगह लागू होता है। सो हमें निःस्वार्थ भाव से उच्च आदर्श के प्रति समर्पित होकर कर्म करना होगा, अन्यथा हम और हमारी व्यवस्था क्षीण होकर गिर जाएगी। यही हमारा पाप है। यही लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, आदि पाप हैं हमारे जो हमारी व्यवस्था को ध्वस्त कर देते हैं। यही निःस्वार्थ भाव से किया गया कर्म यज्ञ है।
  इस यज्ञभावना को स्मरण रखते हुए  श्रीकृष्ण की शिक्षा को समझने के लिए हम आगे बढ़ते हैं तो समझते हैं कि परमपिता परमेश्वर ही सर्वज्ञानी होता है, और उसी से ज्ञान की सरिता बहती है। ये हमेशा ध्यान रखने की बात है कि ज्ञान से ही कर्म की उत्पत्ति होती है। जब हमारे अंदर ज्ञान की भावना होती है तो हमारे कर्म यज्ञ भावना से संचालित होते हैं। यज्ञभावना से किये गए कर्म अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं जिनसे इक्षित व्यस्तुओं जिनसे हमारा भरण पोषण हो सकता है उत्पन्न होते हैं। यदि कर्म ज्ञान आधारित न हों, स्वेक्षाचार से संचालित हों तो फिर उनमें यज्ञ भावना नहीं हो सकती और बिना यज्ञ भावना के हमारा भरण पोषण करने वाले इक्षित फल भी अप्राप्त रहेंगे। इससे स्पष्ट होता है कि कर्म की यज्ञभावना में ईश्वर का वास है।
प्रत्येक कार्य क्षेत्र में उपभोग्य लाभ होता है जो उस कार्य क्षेत्र का अन्न है जिसमें भरण पोषण करने की क्षमता होती है। यह उपभोग्य लाभ तभी प्राप्त होता है जब उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ हों यह अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि होती है जो निःस्वार्थ त्याग और सेवाभाव से किये गए स्वदाव्यित्व निर्वहन वाले कर्मों से सम्भव हो पाता है। यही कर्म यज्ञ हैं। जब परिस्थिति अनुकूल होती है तो उस कार्यक्षेत्र के उपभोग्य लाभ प्राप्त होते हैं जो उस कार्य क्षेत्र में लगे व्यक्तियों को उनके इक्षित फल प्रदान करते हैं यानी उनका भरण पोषण करते हैं।
     अब आइये इसे थोड़ा और विस्तार से समझें। जब हम किसी तंत्र को पूरी तरह से जानते समझते हैं तभी हम तय कर सकते हैं कि उस तंत्र के लिए क्या सही है क्या गलत है। इसी प्रकार संसार की पूरी समझ जब होती है तभी ज्ञात हो पाता है कि संसार के लिए क्या उचित है, क्या अनुचित है।  चेतना (consciousness) ही ज्ञान है। कोई वस्तु या पदार्थ उपलब्ध है, कोई जानकारी उपलब्ध है ये तबतक हमारे लिए अर्थहीन है जब तक उसकी चेतना यानी उसके सम्बन्ध में हमें consciousness नहीं है। यही चेतना ब्रह्म है, वेद है। हमें नित्य होने वाले परिवर्तनों की चेतना होती है। सूक्ष्म परिवर्तनों की भी चेतना हमें होती है। परिवर्तनों को वही चेतना समझ सकती है जो स्वयम अपरिवर्तनशील हो। यदि वह चेतना भी खुद परिवर्तनशील है तो फिर होने वाले परिवर्तनों को वह चेतना समझ पाने में सक्षम नहीं हो सकती। इसी कारण यह ब्रह्म अपरिवर्तनशील, और क्षरनरहित यानी अक्षर है। और यही अक्षर हमारा अपना सेल्फ है, अपनी आत्मा है। इसी चेतना से कर्म करने की क्षमता उत्पन्न होती है। कर्म करने की क्षमता सभी में होती है। लेकिन सभी कर्मों से सकारात्मकता नहीं उत्पन्न होती। जब कर्म निःस्वार्थ भाव से किये जाते हैं , जब उनमें अन्य के कल्याण की भावना होती है, जब अन्य के लिए समर्पण और त्याग की भावना होती है तो उस कर्म को यज्ञ की संज्ञा दी जाती है। इस यज्ञ भावना के कारण ही हमारे बन्धन खत्म हो पाते हैं। जब हम अन्य के प्रति समर्पित होकर, उसके लिए त्याग की भावना से कर्म करते हैं तो हम खुद की परिधि से बाहर निकल कर जीने लगते हैं। हमारे समर्पण और त्याग की सीमा जितनी बड़ी होती है हम खुद से बाहर निकल कर उतनी दूरी तक विस्तारित होते हैं। स्वार्थ के कारण हम I , ME,  & MY से बाहर नहीं निकल पाते। हम खुद के शरीर से बन्धें रहते हैं। लेकिन जब हम सेवा, त्याग और समर्पण की भावना से कर्म करते हैं तो हमारे सेल्फ का विस्तार हमारे अपने अस्तित्व से बाहर जाकर होता है, हम खुद से बाहर निकल कर परिवार, समाज, देश और पूरे संसार तक फैल सकते हैं। हम अपने बन्धनों से बाहर निकल जाते हैं। यही भवना यज्ञ की भावना है। इसी भावना से वृष्टि होती है यानी अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। अनुकूल परिस्थिति ही वृष्टि है जो अन्न उत्पादन को सम्भव करती है। अन्न वो वस्तु है जिसका हम उपभोग करते हैं। जब समाज से सदस्य इस यज्ञ भावना से कार्य करते हैं अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं, जिनके कारण समाज इक्षित व्यस्तुओं और परिणामों को जन्म दे पाता है जो उसके सदस्यों के लिए इक्षित होते हैं। अतएव व्यक्ति और समग्र तंत्र के विकास के लिए ये जरूरी है कि सभी व्यक्ति इस यज्ञ भावना से कर्म करें, इसी TEAM SPIRIT से कार्य करें। इससे उत्पादन होता है। जितनी अधिक यज्ञ भावना होगी उतनी ही अनुकूल स्थिति होगी और उत्पादन क्षमता भी उतनी ही अधिक होगी और परिणाम में तंत्र के सदस्यों का भरण पोषण भी उतने  ही अच्छे तरह से होगा। इस प्रकार ही कर्मों से तंत्र का विकास होता है और तंत्र बदले में हमारा विकास करता है। ये भरण पोषण भौतिक और आध्यात्मिक सभी तथ्यों पर लागू होता है। इससे स्पष्ट है कि ब्रह्म यानी SUPREME REALITY इस यज्ञ भावना में ही वास करता है। जब हम कर्म, कर्म के परिणाम और अंततः स्वयम को SUPREME REALITY के प्रति समर्पित कर देते हैं तो बदले में हम उस ब्रह्म यानी SUPREME REALITY को प्राप्त करते हैं। ये ठीक उसी प्रकार होता है जैसे वर्षा की बूंद अगर सागर में गिरती है तो सागर बन जाती है, गंगा में गिरती है तो गंगा बन जाती है। इसी प्रकार यदि हम खुद को जिस त्याग और समर्पण की भावना से समर्पित करते हैं उसी रूप में खुद को पाते हैं। यदि हम सम्पूर्णता से अपने को, अपने ईगो को परम के प्रति यानी TOTAL REALITY के प्रति समर्पित करते हैं तो बदले में हम परमब्रह्म यानी TOTAL REALITY ही पाते हैं। हमारा समर्पण, हमारा त्याग ही तय करता है कि हमारी उपलब्धि क्या होगी। इस भावना से कर्म करने पर हम स्वयम को, स्वयम के सेल्फ को समझ पाते हैं और ब्रह्म में अधिष्ठापित हो पाते हैं। इस स्थिति में हम बन्धनों से मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार कर्म ही यज्ञ बनकर हमें कर्मबन्धनों से मुक्त करता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 16

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
 अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

हे पार्थ! जो पुरुष इस लोक में इस प्रकार परम्परा से प्रचलित सृष्टिचक्र के अनुकूल नहीं बरतता अर्थात अपने कर्तव्य का पालन नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है
 ॥16॥
       तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि यही एक तरीका है (जिसका वर्णन ऊपर किया गया है) जीवन जीने का। जो व्यक्ति कर्मपथ में यज्ञ की भावना से नहीं बढ़ता, कर्म नहीं करता, वैसा व्यक्ति हमेशा अपने इन्द्रियों के सुखों की पूर्ति में लगा रहता है, और सो माया, मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, जैसी भावनाओं में डूबा रहता है। इस तरह के व्यक्ति का जीवन जिसमें समर्पण , परमार्थ, त्याग नहीं होता, जिसमें  नियत सृष्टि चक्र के साथ सामंजन नहीं होता नाकारात्मकता से यानी पाप से यानी काम, लोभ, मोह, क्रोध, ईर्ष्या आदि से अभिशप्त हुआ व्यर्थ होता है क्योंकि इससे न तो उस व्यक्ति का कल्याण होता है न ही समाज का।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 17 एवम 18

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
 आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है
 ॥17॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
 न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियों में भी इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता
 ॥18॥

श्रीकृष्ण बता चुके हैं कि कर्मनकरने का एकमात्र दृष्टिकोण यज्ञभावना है और यज्ञ भावना क्या है ये भी समझा चुके हैं। वे यह भी समझा चुके हैं कि इसी यज्ञ भावना से कर्म करने पर व्यक्ति कर्म के बंधनों से मुक्त होता है यानी परम् नैष्कर्म्य की स्थिति को प्राप्त कर पाता है।  अब श्रीकृष्ण समझते हैं कि जब कोई व्यक्ति इस यज्ञ भवना से संचालित होकर कर्म करने लगता है तो वह व्यक्ति आत्मनिष्ठ हो जाता है। यह वह अवस्था होती है जब व्यक्ति अपना अहंकार यानी अपना ईगो त्याग कर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा से एकात्मक हो जाता है। । त्याग, परमार्थ, सेवा और समर्पण की भावना से ओतप्रोत ये व्यक्ति अपने ईगो से मुक्त होता है और वह सब जीवों में अपनी आत्मा का प्रसार पाता है। हम जो अपने बारे में सोचते हैं और उस सोच के अनुसार अपना जो इमेज गढ़ते हैं वो हमारा ईगो होता है लेकिन हम जब खुद के इमेज से बाहर निकल कर यज्ञ की भावना से परिपूर्ण होते हैं तो हमारा ईगो नष्ट हो जाता है और हम सब तरफ अपनी ही आत्मा का प्रसार पाते हैं, सभी में अपना ही स्वरूप पाते हैं और अपने में सबको पाते हैं। इस अवस्था में हम आत्मनिष्ठ होते हैं और इस अवस्था में कोई कर्म करने को शेष नहीं रह जाता यानी कोई निर्धारित कर्म नहीं होता जिसे हमें करना ही हो।
इस अवस्था में जब व्यक्ति आ जाता है तो उसे किसी कर्म को करने की कोई आवश्यकता नहीं होती क्योंकि उसे न तो किसी चीज की आवश्यकता रह जाती है , न ही उसका किसी में कोई स्वार्थ शेष रह जाता है। फिर भी ऐसा व्यक्ति कर्म करता है । उसका कर्म किसी स्वार्थ या आवश्यकता पर नहीं आधारित होता, बल्कि वह तो मात्र प्रेम और अनुकम्पा के कारण कर्म करता है, उसके कर्म उन लोगों के लिए पथप्रदर्शन के लिए होते हैं जो अभी यज्ञ मार्ग पर चलना सीख रहे होते हैं।
    कर्मयोग यानी यज्ञ मार्ग पर चलकर व्यक्ति  को संतोष और तृप्ति की प्राप्ति होती है। विदित हो कि सारे व्यक्ति तृप्ति और संतोष के लिए ही सब कर्म करते हैं , लेकिन जब तृप्ति और संतोष मिल ही जाए तो फिर कोई इक्षा कँहा बची रह जाती है और इक्षा से मुक्त हुए व्यक्ति के लिए कर्म करने का क्या उद्देश्य रह जाता है। सो कर्म करना आवश्यक नही रह जाता। द्वितीय अध्याय में हमने स्थितप्रज्ञ व्यक्ति यानी ENLIGHTENED MASTER के लक्षणों को देखा था, सो इस प्रसंग को समझने के लिए एकबार पुनः हम उस प्रसंग पर दृष्टिपात कर सकते हैं।

      
##श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं---
1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं?
2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।
          स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वो है जिसका ज्ञान स्थिर है अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अंतिम सत्य प्राप्त हो चुका है।  हम सब जानते हैं कि हमारा ज्ञान निरन्तर परिष्कृत होता है। इस संसार के विषय में हम जितना पहले जानते थे उससे अधिक आज जानते हैं , और भविष्य में आज से भी अधिक जानेंगे। संसार नित्य परिवर्तनशील है सो इससे सम्बन्धित हमारा ज्ञान भी परिवर्तनशील होता है। वैज्ञानिक ज्ञान भी जिसके माध्यम से हम संसार की गतिविधि को समझते हैं वो निरन्तर परिष्कृत होते रहता है।  इस ज्ञान का कोई और छोर नहीं है, इसका कोई अंत नहीं। हम जितना जानते हैं उससे कई गुणा नहीं जानते हैं जिसे जानने के लिए हम नियमित अग्रसर रहते हैं। न तो प्रकृति में होने वाले परिवर्तन रुकेंगे, न ही हमारा प्रकृति का ज्ञान। सो भौतिक संसार का ज्ञान प्राप्त कर कोई भी अंतिम रूप से ज्ञानी नहीं हो सकता, सो ऐसे व्यक्ति का कोई अंतिम ज्ञानी हो ही नहीं सकता । अतएव इस तरह के व्यक्ति के सम्बंध में अर्जुन  का  कोई प्रश्न नहीं हो सकता है। 
      तो फिर कौन व्यक्ति स्तित्प्रज्ञ कौन है? स्तित्प्रज्ञ वो है जिसे अपरिवर्तनीय का ज्ञान प्राप्त है। अपरिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील, अक्षय, अविकारी हमारा सेल्फ है, हमारा स्व है, हमारी आत्मा है और जो अपने सेल्फ को जनता है वही स्थितप्रज्ञ है। यदि हम खुद को परिभाषित करते हैं तो हम खुद की वर्तमान स्थिति बताते हैं। ये स्थिति बदलती रहती है। लेकिन जो व्यक्ति नियत रास्ते पर चलकर , जो कर्मयोग का रास्ता है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा के अस्तित्व को पहचान लेता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्जुन इसी व्यक्ति की रहनी को समझना चाहता है।
     जो व्यक्ति उपरोक्त ढंग से स्थितप्रज्ञ है वो निश्चित ही समाधिस्थ है। समाधि में अवस्थिति का क्या अर्थ है? जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग समझा रहे होते हैं तो बताताते हैं कि कर्मयोगी विरागरत होता है। यही विराग समाधि की अवस्था होती है। समाधि की अवस्था ध्यान केंद्रित करने की अवस्था से भिन्न है। ध्यान केंद्रित करना एक मानसिक अवस्था होती है जिसमें हमारा ध्यान किसी एक चीज पर केंद्रित होता है, उसके अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर नहीं। लेकिन इस अवस्था में व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से भी विरागरत होता हो कोई आवश्यक नहीं, सो ध्यान की यह क्रिया जिसमें वैराग्य का भाव ही नहीं हो एक तन्द्रा मात्र है जिसके टूटते व्यक्ति फिर से उसी परिवर्तनशील संसार के मोहजाल, उसी परिणाम की दुनिया में लौट जाता है। लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से कर्म करते करते परिणाम के प्रभाव से मुक्त होकर वैराग्य की अवस्था में आता है तब उसको ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ता बल्कि वो तो सोते जागते अपने ही आत्मा में , अपने ही सेल्फ में रहता है। यही समाधि की स्थिति है। समाधि की स्थिति भभूत लगागकर, दाढ़ी मूँछ बढाकर, जटा लटकाकर, विचित्र भेष भूषा धारण कर नहीं मिलता  है।
      इस प्रकार जो स्थितप्रज्ञ है वो समाधिस्थ भी है हीं। यदि हम भी अपने सेल्फ को समझना जानना चाहते हैं तो ये आवश्यक है कि हम इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षणों को जाने समझें और आत्मसात करें। सो अर्जुन इस तरह के व्यक्ति के लक्षणों को जानने की इक्षा व्यक्त करता है।
    अर्जुन जानना चाहता है कि इस प्रकार का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता, बैठता और चलता है अर्थात वह जानना चाहता है कि इस प्रकार के व्यक्ति की रहनी कैसी होती है, उसका सामाजिक समव्यव्हार कैसा होता है। अर्थात यह व्यक्ति अपना सामाजिक जीवन कैसे व्यतीत करता है, अपने वातावरण से उसका सामाजिक लेन देन किस तरह से होता है।  
        यदि कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य तक पहुँचना चाहे तो दो बातें अनिवार्य हैं
1. पहला तो उसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, उसे स्पष्ट होना चाहिए कि दरअसल वो चाहता क्या है।
2.दूसरे की उसका लक्ष्य ही उसकी प्रेरणा हो। जब लक्ष्य प्रेरणा में बदल जाता है तो लक्ष्य स्वपोषित हो जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति को किसी अन्य उत्प्रेरक या प्रेरणाश्रोत की आवश्यकता नही रह जाती है। वह स्वतः हो उस लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जाता है। गीताकार ने अर्जुन के माध्यम से हमें समझाया है कि हम किस तरह से अपने को अपने सेल्फ को खोजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी चीज को देखने का दो नजरिया होता है। एक कि हम खुद उसे कैसे देखते हैं। और दूसरा की अन्य लोग उस चीज को कैसे देखते हैं। जब हम स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों  को जानना चाहते हैं तो एक नजरिया तो यह है कि वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति खुद को कैसे और किस रूप में देख पाता है और दूसरे कि हम उसे किस तरह से समझ पाते हैं। 
     सवाल उठता है कि अर्जुन इस प्रकार का प्रश्न ही क्यों करता है। जब हम गहरे विषाद की अवस्था में होते हैं और यदि उस समय हमें कर्मयोग सदृश्य समझ दी जाती है तो सहज ही कई प्रश्न मन में उठने लगते हैं, यथा हमें कर्म न कर मात्र बुद्धि के ही शरण में क्यों नही रहना चाहिए, क्यों हम वैराग्य और सन्यास की बात करें, क्यों न हम भी सारे जंजाल को छोड़कर वैराग्य और समाधि का मार्ग पकड़ लें, आदि आदि। हम सब वैराग्य और समाधि के उन प्रचलित अर्थों से ही वाकिफ होते हैं जो समाज में बोल चाल की भाषा में प्रचलित हैं। हम श्रीकृष्ण की शब्दावली में इनका अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं। दृष्टि को साफ कर देने के लिए, समझ से भ्रांति को दूर करने के लिए ये जरूरी है कि हम जाने कि श्रीकृष्ण जिस अवस्था को प्राप्त करने की शिक्षा दे रहें हैं उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति क्या और कैसे कुछ भी करता धरता है।
    अर्जुन का प्रश्न हमारी समझ को झझकोरता है, उद्वेलित करता है, हमें प्रेरित करता है कि कर्मयोग का व्यवहारिक  ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात हम समझ सकें कि हमे किस तरह के व्यक्ति के रुप में विकसित होना चाहिए।

     
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की बुद्धि को समझा देते हैं तो अर्जुन उस व्यक्ति की विशिष्टताओं को जानने की इक्षा व्यक्त करता है कि जो  कर्मयोग की बुद्धि से युक्त होता है। तब श्रीकृष्ण इस तरह के व्यक्ति के विशेषताओं को भी बताते हैं जो निम्न हैं-
   स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण


1.कामना का सर्वथा अभाव

2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि

3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,

4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित

5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण

6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति

इनको समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि



         अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।

          पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--


1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।

2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।

3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।

4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।

5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए। 


उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--

1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।

      हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं

   क. अस्तित्व की रक्षा

   ख. सुरक्षा

   ग. ज्ञान की प्राप्ति

   घ. सुख और आनंद की प्राप्ति

जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।

    लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है। 



2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।

     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।

 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।

    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।


3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 

   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 

    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।

    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।


2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।

     वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।

 जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।

    इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।


3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है। 

   और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा। 

    और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।

    लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न  ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।



4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।

यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से  हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।

     तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।

    स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।



5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है।

और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चलाये बल्कि व्यक्ति के अनुसार इन्द्रियाँ व्यवहार करें। हमारी इन्द्रियाँ हमें वाह्य संसार की अनुभूति कराती हैं। यदि हमारी  इन्द्रियों का हमपर नियंत्रण होगा तो हमारी समस्त चेष्टाएँ भी वाह्य संसार की प्रतिक्रिया में ही रह जाएंगी। हम हमेशा अस्थिर बने रहेंगे। तब भला स्व की खोज क्या कर पाएँगे।




6. .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।

     इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है वो भी इन्द्रियों के प्रभाव से तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसे अपने सेल्फ की समझ नहीं हो जाती और उस काल में वह व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के साथ पूर्ण आसक्ति मुक्त हुआ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर सिर्फ नियंत्रण ही नहीं होता है बल्कि उससे आगे जाकर इन्द्रियों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।

    इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक  से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।

    लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।

      हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी  इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे।  श्रीकृष्ण  समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।



अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि

स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण


1.कामना का सर्वथा अभाव

2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि

3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,

4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित

5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण

6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति

7.अहंकार का अभाव

      उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।

        हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द  हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।

      अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी ।  इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।

      उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 19


तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
 असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पुरुषः॥

इसलिए तू निरन्तर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्यकर्म को भलीभाँति करता रह क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है
 ॥19॥

अब तक श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की अनिवार्यता को बहुत तरीकों से समझा चुके हैं। हम सभी को ये ज्ञात हो चुका है कि कर्म करके ही हम कँही पहुंच सकते हैं। बिना कर्म किये कोई उपाय नहीं है। मनुष्य की प्रकृति ही ऐसी है कि बिना कर्म किये वो रह ही नहीं सकता है।
         इसे समझने के बाद ये समझना आवश्यक है कि हमें कौन सा कर्म किस प्रकार करना चाहिए। द्वितीय अध्याय में कर्मयोग की विस्तृत चर्चा करते हुए श्रीकृष्ण इसे समझा चुके हैं, पुनः उसी को दुहराते हुए समझाते हैं कि
1.हमें वो कर्म करना है जो अनिवार्य है। इसका निर्णय हम कैसे लें कि वो कौन से कर्म हैं जिनको करना ही है। इसके लिए आवश्यक है कि तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की स्वयम में उपलब्धता के अनुसार अपना कर्म निर्धारित करें जो अनिवार्य है हमारे लिए। इसे ही श्रीकृष्ण पूर्व में स्वधर्म कह चुके हैं। जरूरी नहीं कि जो कर्म हमारे लिए अनिवार्य है वही दूसरे के लिए भी अनिवार्य हो। ये तो हमारे गुणों पर निर्भर करता है । 
2.दूसरी बात है कि हम कर्म को आसक्ति रहित होकर करें अर्थात कर्म करने में आनन्द देखें न कि उसके परिणाम में। यदि कर्म करना हमारे स्वभाव में ढल जाता है, यदि हम कर्म करने को ही स्वाभाविक गति समझ लेते हैं तो फिर हमें उस कर्म को करने में आनन्द आता है। परिणाम वाह्य है जो हमपर निर्भर नहीं करता। लेकिन कर्म तो हमारा है जिसे करना हमारे वश में है। जब हम ऐसा समझते हैं तो फिर हम कर्म करने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं । ऐसी स्थिति में कर्म करने में हमें श्रद्धा होती है और हम पूरे मनोयोग और समर्पण से कर्म करते हैं।
3.निर्धारित अनिवार्य कर्म करने के इस दृष्टिकोण को अपनाने से ही हमें परमगति की प्राप्ति होती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 20

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
 लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि॥

जनकादि ज्ञानीजन भी आसक्ति रहित कर्मद्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए तथा लोकसंग्रह को देखते हुए भी तू कर्म करने के ही योग्य है अर्थात तुझे कर्म करना ही उचित है
 ॥20॥
हम अभी तक देख चुके हैं कि युद्धक्षेत्र में युद्ध से विमुख हुए अर्जुन को श्रीकृष्ण के तरह से कर्म करने की महत्ता को समझा चुके हैं। जीवन के धरातल पर कोई व्यक्ति कर्म किये बिना नहीं रह सकता और जो कर्म किये बिना जीना चाहता है श्रीकृष्ण उसे ढोंगी और चोर तक कह चुके हैं। कर्म ही वह मार्ग है जिसपर चलकर कोई भी व्यक्ति अपने अंतिम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। दूसरा कोई विकल्प है ही नहीं। कौन सा कर्म करें, किस तरह करें इसपर भी पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को दो बातें समझाते हैं-
1.कर्म करके ही लोग अपने परमसिद्धि को प्राप्त करते हैं इसके अनेकों उदाहरण हैं। गीता के रचनाकाल के अनुसार श्रीकृष्ण उससे भी पहले के लोगों के उदाहरण देते हैं जो कर्म करते हुए अपने महान लक्ष्य को प्राप्त किये थे, जैसे राजा जनक।
     राजा जनक एक क्षत्रिय थे, वे राजा भी थे और आजीवन राजा रहे, किन्तु बिना राजा का दायित्व त्यागे राजा जनक निरन्तर अपने कर्मपथ पर अग्रसर रहे और उसी रास्ते चलकर परमसिद्धि को प्राप्त भी हुए और उसके पश्चात भी राजा बने रहे, अपने दायित्वों को छोड़ छाड़कर जंगल में जाकर हरिभजन नहीं करने लगे थे।
2. उपरोक्त उदाहरण से श्रीकृष्ण दो बातें स्पष्ट करते हैं
     एक कि बिना अपने दायित्व से विमुख हुए, कर्म करते रहने से ही व्यक्ति अपने परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।
     और दूसरा कि अपने लक्ष्य प्राप्ति यानी परमसिद्धि को प्राप्त कर भी इस प्रकार का व्यक्ति कर्म से विमुख होकर कर्महीन नहीं बन जाता है, बल्कि अन्य लोगों के लिये उदाहरण बनकर कर्म करते रहता है और अन्य लोग जो उस लक्ष्य तक अभी नहीं पहुँचे हैं उनके लिए प्रेरणास्रोत बन जाता है। उसे देखकर अन्य व्यक्ति भी समझ पाते हैं कि वे भी उस तरह का लक्ष्य पा सकते हैं और वे  उस परमसिद्ध व्यक्ति के उदाहरण से ये भी जान पाते हैं कि उनको क्या और कैसे कर्म करने हैं कि वे भी लक्ष्य को हासिल कर पाएं।
          इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को और अर्जुन के माध्यम से समस्त व्यक्तियों को ये समझाते हैं कि हमें कर्म दो कारणों से करना ही है
     1.स्वयम के लिए परमसिद्धि की अवस्था प्राप्त करने के लिए, अर्थात अपना परम् लक्ष्य प्राप्त करने के लिए, और,
     2.अन्य लोगों के लिए जो अभी कर्मपथ पर अग्रसर नहीं हुए हैं या अभी अग्रसर हो रहें हैं उनके लिए उदाहरण बनकर प्रस्तुत होने के लिए।
      इस प्रकार श्रीकृष्ण समाज को सुप्तावस्था से बचाने, उसे सतत गतिशील और प्रगतिशील रख सकने की शिक्षा देते हैं। यँहा तक कि नैष्कर्म की अवस्था में भी कर्म ही है जो व्यक्ति को नैष्कर्म्य रखकर भी उसे खोजी, अन्वेषी बनाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लिक 21


यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
 स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है ।
 ॥21॥
समाज में  व्यक्ति दूसरों को देख कर बहुत कुछ सीखता करता है। विशेषकर हम जिसे श्रेष्ठ मानते हैं  वे हमारे आदर्श होते हैं । ऐसी स्थिति में उस श्रेष्ठ/आदर्श व्यक्ति को उदाहरण मानकर हम भी उसी ककानुसरण करते हैं। इस समाज में प्रत्येक व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति का आदर्श होता ही है। एक बात और महत्वपूर्ण है। हम क्या बोलते लिखते हैं इससे हमारी श्रेष्ठता नहीं निर्धारित होती है, बल्कि हम उस रूप में देखे जाते हैं जिस रूप में हमारा आचरण होता है अर्थात हमारा मूल्यांकन हमारे आचरण पर निर्भर करता है। यदि हम भाषण देते फिरे कि भ्रष्टाचार मत करो, चोरी मत करो, और खुद चोरी करते रहे तो हमें लोग चोर के रूप में ही याद रखते हैं। बच्चों को यदि आप सिखाते हैं कि झूठ मत बोलो और खुद हम हीं झूठ बोकते रहें तो बच्चे हमारे झूठ नहीं बोलने को आत्मसात न कर हमारे झूठ बोलने के आचरण का ही अनुसरण करते हैं। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा सिखाती है कि हमें अपने कर्मों के आचरण को उच्च कोटि का रखना चाहिए ताकि जो हमारा अनुसरण कर रहें हैं वे भ्रष्ट न हो जाएं। ऐसा करना हमारी जबाबदेही है अन्यथा समाज या समाज के वे अंश जो हमारा अनुसरण करते हैं वे भी भ्रष्ट हो जाएंगे। सो समाज के व्यावक उत्थान के लिए हमारा कर्म में प्रवृत्त होते रहना अति आवश्यक है। ध्यान रहे यही आज की तारीख में रोल मॉडल का कांसेप्ट है। हम अपने रोल मॉडल के हर आचरण को बहुत ही ध्यान से अवलोकन करते हैं, उसके आचरण को ही प्रमाण मानते हैं और खुद को उसी के अनुसार ढालने की कोशिश करते हैं। इसलिए व्यक्ति का ये कर्तव्य बनता है कि समाज के लिए वो उच्च कोटि का आचरण करे ताकि लोग उसका अनुसरण कर समाज  को पतन से बचाएँ।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 22 से 26

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
 नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

हे अर्जुन! मुझे इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ
 ॥22॥

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
 मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

क्योंकि हे पार्थ! यदि कदाचित्‌ मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूँ तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं
 ॥23॥

यदि उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्‌।
 संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥

इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ
 ॥24॥

 कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
 कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्‌॥

हे भारत! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे
 ॥25॥

न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङि्गनाम्‌।
 जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्‌॥

परमात्मा के स्वरूप में अटल स्थित हुए ज्ञानी पुरुष को चाहिए कि वह शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम अर्थात कर्मों में अश्रद्धा उत्पन्न न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भलीभाँति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए
 ॥26॥
अभी तक श्रीकृष्ण कर्म करने की अनिवार्यता पर पर्याप्त प्रकाश डाल चुके हैं और ये भी समझा चुके हैं कि हर व्यक्ति को अपने आचरण से खुद को एक प्रतिमान के रूप में स्थापित करना चाहिए ताकि लोग उस व्यक्ति के आचरण का अनुकरण करे। इससे समाज में उच्च कोटि के आचरण का प्रचलन बढ़ता है जिससे पूरा समाज लाभ प्राप्त करता है। 
     खुद को यदि आप इतना ऊपर उठा पाते हैं कि आप खुद ही उदाहरण बन जाएं तो लोग कही सुनी पढ़ी बातों के मुकाबले आपसे ज्यादा प्रभावित होते हैं।
इसीलिए कर्म करने की अनिवार्यता को पुख्ता करने हेतु अर्जुन के समक्ष स्वयं अपना उदाहरण देते हैं। अपने युग में श्रीकृष्ण ने वो सारी उपलब्धियाँ हासिल की थीं जो कोई एक मनुष्य की इक्षा हो सकती थी। वो विद्वान थे, उन्होंने राज्य बनाये, राज्य दूसरों को दिया, ज्ञान की अपरिमित उपलब्धि हासिल की, युद्ध कला में निपुण थे, और परमसिद्धि को प्राप्त थे। उनके लिए कोई कर्म न बड़ा था, न छोटा।  वे राजा भी बने, अतिथियों और ज्ञानीजनों के पैर भी धोए, उनको समाज में सर्वक्षेष्ठ मानकर पूजा भी गया(राजसूये यज्ञ) और जूठन भी बटोरा(उसी राजसूये यज्ञ में) । महान योद्धा होकर भी अर्जुन के सारथी बने। इतना होने पर भी उन्होंने कभी कर्म से मुँह नहीं मोड़ा, हमेशा कर्म में प्रवृत्त रहे, जन्म से लेकर इस ज्ञान को देते वक्त के समय के बीच श्रीकृष्ण के जीवन में ऐसा एक भी अवसर नहीं आया जब उन्होने कर्म से विमुखता दिखाई हो, तब भी पूर्ण पारिवारिक होते हए भी योगी कहे जाते थे। उनके मित्र और शत्रु दोनों उनका आदर करते थे। 
खुद अपना उदाहरण देकर श्रीकृष्ण ये समझाते हैं कि यदि उन्होंने कर्म करना छोड़ दिया तो वे लोग भी जो उनसे प्रभावित होकर कर्म में प्रवृत्त होते आये हैं वे भी निष्क्रिय हो जाएंगे और कहेंगे कि जब कृष्ण जैसा महान व्यक्ति कर्म नहीं करता, तो भला वे क्यों करें। इससे समाज में भारी अराजकता आएगी। हमसब खुद अपने घर परिवार से लेकर समाज में ऐसे ढेरों उदाहरण पाते हैं। कहा भी जाता है कि इंसान जो देखता है वही सीखता है, वही करता है, वही उसका स्वभाव बनते जाता है। ऐसा इंसान ही वर्णसंकर है जो अपने स्वधर्म से विचलित हुआ कर्म नहीं करता है। और इस तरह के वर्णसंकरों के पैदाइश के लिए महान व्यक्ति ही जबाबदेह होते हैं जो क्षमता होते हुए भी पथप्रदर्शक नहीं बन पाते।
इस स्थिति से बचने का एक ही तरीका होता है कि व्यक्ति मनोयोग से निरन्तर कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करता रहे ताकि उसे आदर्श मानने वाले भी उसी मार्ग पर चल सकें और समाज का उत्थान हो सके। यँहा एक बात और महत्वपूर्ण है समझना। समाज में ऐसे भी लोग होते हैं जो गलत मार्ग से हटने के लिए तैयार नहीं होते। तो क्या ऐसे व्यक्ति के साथ क्या किया जाना चाहिए? उस व्यक्ति के समक्ष निरन्तर अच्छे आचरण का उदाहरण प्रस्तुत किया जाए। अच्छे आचरण का उपयोगी प्रभाव देखकर अंततः वह हठी व्यक्ति भी धीरे धीरे रास्ते पर आ ही जाता है। ज्ञात अज्ञात इतिहास में और वर्तमान में ऐसे ढेरों उदाहरण भरे पड़े हैं। महान नायक के अनुकरण के लिए बहुत लोग प्रस्तुत हो उठते हैं जिससे उस महान नायक का समाज भी महानता के मार्ग पर अग्रसर होता है। महान नायक कौन होता है? जब सामान्य व्यक्ति को सगी मार्ग दिखाना होता है तो उस व्यक्ति को मार्ग दिखाने का तीन तरीका होता है। एक तरीका होता है उकसाने का, दूसरा तरीका है उत्साहित करने का और तीसरा तरीका है प्रेरित करने का। यानी नायकत्व के तीन रूप होते हैं
Leadership through Instigation
Leadership through Motivation
Leadership through Inspiration
  जब पीछे वाले को महान व्यक्ति अपने कर्मों के माध्यम से रास्ता दिखाता है तो वो पीछे वालों को आगे बढ़ने का व्यवहारिक मार्ग बता रहा होता है, वो व्यवहार में लाये जा चुके आचरण से लोगों को भरोसा दिला रहा होता है कि वे भी उस मार्ग पर चलकर ऊपर उठ सकते हैं। सो परम् ज्ञान प्राप्त किये व्यक्ति के लिए कर्म करना उतना ही जरूरी है जितना उस मार्ग पर चलना शुरू करने वाले व्यक्ति के लिए। सो ऐसी कोई अवस्था नहीं है जब व्यक्ति कर्म से विमुख होकर रह सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 27

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
 अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥

- वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, तो भी जिसका अन्तःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है, ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है
 ॥27॥
अब तक श्रीकृष्ण ने कर्म करते रहने की अनिवार्यता और अपरिहार्यता को स्पष्ट कर दिया है । इतना तो तय है कि आपको कर्म तो करना ही है। अब आप कर्मयोग के अनुसार कर्म करें या उसके विपरीत। 
अब श्रीकृष्ण समझाते हैं कि कर्म क्यों अनिवार्य है। जब तक मनुष्य प्रकृति के अधीन है उसे कर्म करना ही होता है। समस्त चर-अचर के दो भाग हैं, प्रकृति और पुरुष। प्रकृति मैटर की अभिव्यक्ति है तो पुरुष उस मैटर का कॉन्सियसनेस है। प्रकृति का संचालन गुणों से होता है जो तीन हैं, जिनकी व्यख्या हम आगे देखेंगे। प्रकृति में ही ईगो का निवास होता है जो तीन गुणों की मात्रा के अनुसार कम अधिक होता है। इस ईगो को ये लगता है कि व्यक्ति जो कर रहा है वो तो वही कर रहा है उसमें किसी अन्य तत्व का कोई योगदान ही नहीं है। ईगो यानी खुद के विषय में एक धारणा बन जाती है जिसमें उस व्यक्ति का स्व यानी कॉन्सियसनेस नहीं होता है। वह उस अवस्था में खुद के ऊपर गुणों के प्रभाव को समझने में असमर्थ होता है। उसे लगता है कि जो कर्म वो करता है उसका कर्ता वही है। गुणों का अहसास का अभाव उसके अंदर ये भाव मजबूत करता है। व्यक्ति मन की अवस्था के अनुसार कर्म करता है, जैसी मन की भावना होती है, मन में इक्षाएँ होती हैं उनका प्रदर्शन वाह्य संसार में हमारे कर्मों के माध्यम से होता है और हमें लगता है कि ये सब तो हमी कर रहें हैं, जबकि सच्चाई तो ये होती है कि हमारी कामनाएँ हमसे कर्म करा रहीं होती हैं। और ये कामनाएँ प्रकृति जनित तीन गुणों, तमोगुण(INERTIA) रजोगुण(ACTIVITITY) और सत्वगुण(INTELLECT) पर निर्भर करती हैं, जिनका विस्तृत विवरण हम आगे देखेंगे और तब जान पाएंगे कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार असंगत ढंग से कैसे कर्म करना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 28

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
 गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

परन्तु हे महाबाहो! गुण विभाग और कर्म विभाग (त्रिगुणात्मक माया के कार्यरूप पाँच महाभूत और मन, बुद्धि, अहंकार तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और शब्दादि पाँच विषय- इन सबके समुदाय का नाम 'गुण विभाग' है और इनकी परस्पर की चेष्टाओं का नाम 'कर्म विभाग' है।) के तत्व (उपर्युक्त 'गुण विभाग' और 'कर्म विभाग' से आत्मा को पृथक अर्थात्‌ निर्लेप जानना ही इनका तत्व जानना है।) को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे हैं, ऐसा समझकर उनमें आसक्त नहीं होता।
 ॥28॥
हमने देखा है कि श्रीकृष्ण परिणाम से असंग(detached) होकर कर्म करने की शिक्षा देते हैं लेकिन सवाल ये उठता है कि कर्म के  परिणाम से खुद को विच्छेदित कर कर्म किया कैसे जाए। जब हम परिणाम से जुड़कर कर्म करते हैं तो ये प्रतीत होता है कि हम कर्म कर रहें हैं यानी कर्ता हम ही हैं। क्या ये सोच सही है? इसे समझने के लिए हमें अपनी आँखें थोड़ी और खोलनी होगी, अपने बौद्धिकता पर थोड़ा और बल देना होगा। हमें पुरुष और प्रकृति की अवधारणा को समझना होगा। प्रकृति मैटर को कहते हैं जबकि पुरुष उस प्रकृति का कॉन्सियसनेस है। यँहा पुरुष का अर्थ स्त्री और पुरुष से नहीं है, बल्कि पुरुष यानी कॉन्सियसनेस से है। प्रकृति में तीन गुण विद्यमान रहते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। ये गुण प्रकृति में हमेशा ही विद्यमान होते हैं और यही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी करते हैं। इनकी परस्पर मात्रा के अनुसार ही हमारा व्यक्तित्व बनता है लेकिन यह व्यक्तित्व हमारे ईगो की दर्शाता है न कि हमारे स्व को।
तमोगुण यानी inertia यानी जिस अवस्था में हैं उसी अवस्था में बने रहने का गुण है। रजोगुण activity को व्यक्त करता है । मैटर अपने तमोगुण के कारण अपनी स्थिति में बना रहता है लेकिन रजोगुण उसे गति देता है। मैटर भले ही एक ही अवस्था में पड़ा रहे अपने तमोगुण के कारण, उसका रजोगुण उसे अंदर से चलायमान रखता है, परिवर्तनशील रखता है। अब आता है सत्वगुण यानी intellect जो मैटर को बुद्धि यानी intelligence यानी एक क्रमबद्धता प्रदान करता है। इन तीन गुणों की परस्पर जितनी मात्रा हमारे अंदर होती है हमारी प्रकृति भी उसी के अनुसार होती है।
इस प्रकृति में 24 तत्व होते  हैं।
प्रथम पाँच तत्व हैं-
आकाश, 
वायु, 
अग्नि, 
जल और 
पृथ्वी। 
 इन पाँच तत्वों की अपनी विशेषताएँ हैं, यथा
आकाश-ध्वनि sound
वायु- स्पर्श  touch
अग्नि-दृश्य/आकार/रंग sight
जल-स्वाद taste
पृथ्वी-गन्ध smell
ये पाँच इन्द्रियों के विषय हैं। ये पाँच हमारी पाँच ऑर्गन्स ऑफ परसेप्शन को व्यक्त करते हैं
1.सुनने की क्षमता
2.स्पर्श की क्षमता
3.देखने की क्षमता
4.स्वाद की क्षमता
5.गन्ध (सूंघने) की क्षमता
ये  पाँच हमारी पाँच कर्मेन्द्रियों के कारक हैं, जो इस प्रकार हैं
1. जिह्वा speech
2.हाथ,
3.पैर , 
4.जननेन्द्रियां, 
5.उत्सर्जन के अंग,
ये पाँच व्हिकरण हैं। जिनके अतिरिक्त चार अंतःकरण के भी तत्व हैं जो निम्न हैं
1.मन mind
2.बुद्धि intellect
3.चित्त memory
4.अहंकार ego
ये कुल 24 तत्व प्रकृति के द्वारा जन्म लेते हैं और इन 24 तत्वों को के प्रति जागरूक है वह है कॉन्सियसनेस।
उपरोक्त 24 तत्वों को प्रकृति के तीनों गुण प्रभावित करते हैं और उनसे प्रभावित भी होते हैं। इस प्रकार प्रकृति स्वयम के साथ ही बरतती रहती है और इस प्रकार कार्य और करण एक दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं।सभी कर्म इन 24 तत्वों के समव्यव्हार के परिणाम होते हैं। इस प्रकार ये गुण और ये तत्व हमारे व्यक्तिव का निर्माण करते हैं। इससे "मैं" का जन्म होता है और ये आभास होता है कि मैं ही कर्ता हूँ। इससे अहंकार का जन्म होता है। इस अहंकार से ओतप्रोत ईगो को लगता है कि मैं ही कर्ता हूँ, मैं ही सब कुछ करने और भोगने वाला हूँ। इस स्थिति में व्यक्ति आत्मा और ईगो में फर्क नहीं कर पाता है, उसे लगता है कि उसकी प्रकृति ही पुरुष है, उसका ईगो ही उसका सेल्फ है। एक उदाहरण लें। एक कंप्यूटर कई तरह के कार्य करता है लेकिन वह तभी कार्य करता है जब विद्दयुत की आपूर्ति होती है। तो क्या विद्युत कुछ करता है? नहीं । विद्युत कंप्यूटर को ऊर्जा प्रदान करता है जिसका उपयोग कर कंप्यूटर अपना कार्य कर पाता है। इसी प्रकार कर्म तो प्रकृति के द्वारा किया जाता है किंतु आत्मा के द्वारा उसकी प्रकृति को ऊर्जा प्रदान की जाती है, आत्मा कुछ नहीं कर रहा होता है, हम जो कुछ कर रहें होते हैं वह हमारी प्रकृति कर रही होती है। इस प्रकार प्रकृति को पुरुष से अलग कर देखने पर ज्ञात होता है कि हम जो कुछ कर रहें हैं वे सब हमारी प्रकृति के अनुसार कर रहें हैं, हमारा पुरुष यानी आत्मा तो मात्र करने की ऊर्जा भर है। वो हमारा न तो कर्म है न ही कर्म करने का परिणाम ही है।  इससे स्पष्ट है कि हमारे कर्म हमारी प्रकृति की देन है। सो अगर हम अपना अहंकार त्याग भी दें तो भी हम कर्म करते रहेंगे। यह प्रकृति का नियम है। इसी नियम में बंध कर सभी कर्म करते हैं। लेकिन अहंकार से ढँके मन और बुद्धि को लगता है कि ये कर्म हमारे सेल्फ के कर्मों के परिणाम हैं। जब इस अहंकार का नाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि हम जो कर रहें हैं , हमारे कर्म हमारे प्रकृति की देन हैं। 
जो तत्वज्ञानी है उसे तत्वो और आत्मा के भेद का ज्ञान होता है। तत्वज्ञानी को पता है कि सोचना, समझना, निर्णय लेना कर्म करना आदि सभी प्रकृति की देन हैं।  ये सब प्रकृति के नियमों की देन हैं। कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सब कुछ का कोई न कोई कारण है, भले व्यक्तिगत रूप से हम उस कारण को जानते हों या नहीं। इस आज्ञान का अर्थ ये नहीं है कि प्रकृति के नियमों का कोई कारण नहीं है। ये तो हमारी अज्ञानता के कारण होता है। जब हम उस नियम और उसकी व्यख्या को समझ जाते हैं तो हमें लगता है कि हमने कोई रहस्य पा लिया है या खोज लिया है। जो व्यक्ति गुणों और कर्म के इस सम्बंध को समझता है वही तत्वज्ञानी है। इस अवस्था में वह व्यक्ति आत्मा और प्रकृति के अंतर को समझ पाता है।  तब उसे समझ में आता है कि गुण गुण में ही बरतते हैं। ऐसा व्यक्ति कर्म और उसके परिणामो के बंधन में नहीं पड़ता, उसे ज्ञात होता है कि जो कुछ वह कर रहा है वे सब उसकी प्रकृति के कारण हैं, उसका सेल्फ उसके कर्मों से अलग है। इसका ज्ञान और अभ्यास आसक्ति से अलग करता है। यँहा भावना नहीं बुद्धि की प्रधानता होती है।
इसे यूँ समझें कि व्यक्ति के कर्म होते कैसे हैं। हमने अब तक देखा समझा है कि प्रकृति, उसके गुण और तत्व कर्मों के कारण हैं। तीनों में से जिस गुण की अधिकता हमारी प्रकृति में होती है हमारे कर्म भी उसी के अनुरूप होते हैं क्योंकि तब तत्वों का व्यवहार भी प्रमुखता के साथ उन उस गुण के अनुसार हो जाता है। हमारे मन के अंदर जो इक्षाएँ होती हैं वो हमारी प्रकृति के गुणों के अनुसार हीं होती हैं और उन इक्षाओं की अभिव्यक्ति कर्म के रूप में हमारे कर्मेन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होते हैं।  जब हम स्वप्न में होते हैं तो उस स्वप्न के साथ हमारा एक तादाम्य होता है और उसी के अनुसार हमें सुख और दुख का स्वप्न में बोध होता है, लेकिन उस  स्वप्न की और उससे जनित सुख और दुख की अनुभूति मात्र हमारी होती है। जैसे ही स्वप्न से ये तादाम्य टूटता है इस सुख और दुख से मुक्ति भी मिल जाती है। उसी प्रकार जब हम अपनी इक्षाओं से विच्छेदित हो जाते हैं तो उन इक्षाओं के अनुरूप मिल सकने वाले सुख और दुख भी समाप्त हो जाते हैं। तब हमसे जो कर्म होते हैं उनसे सुख या दुख नहीं मिलते। आसक्ति से तादाम्य का अभाव ही कर्म को कर्तव्य में परिवर्तित कर देता है । यही विवेक है। तत्वज्ञानी को ये विवेक सदा ही होता है। उसे कोई आसक्ति नहीं होती है, सो उसे पता होता है कि राग-द्वेष, सफलता-असफलता, प्रवृत्ति-निवृत्ति ये सब मन के भाव हैं जिनसे कोई आसक्ति नहीं रखना है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता ही नहीं।
    अर्जुन महाबाहो है, अर्थात महावीर है । श्रीकृष्ण उसे ये सम्बोधन दे कर याद दिलाते हैं कि सच्ची वीरता युद्ध की ही वीरता नहीं होती है बल्कि आसक्ति पर विजय ही सच्ची वीरता है जिसे अर्जुन को वरण करना है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 29

प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
 तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌॥

प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करे
 ॥29॥

उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि जिनको कर्म के मार्ग का ज्ञान नहीं होता है वे तो मन की इक्षाओं की पूर्ति के लिए ही कर्म करते हैं। इक्षाओं कि पूर्ति की आवश्यकता से प्रेरित कर्म करने वाले सदा ही कर्मफल से बन्धें होते हैं। कर्मफल से बंधे होने के कारण उनको इक्षाओं से आगे कोई मार्ग नहीं सूझता। ऐसे लोग ही अज्ञानी कहे जाते हैं। ऐसा नहीं कि जो शिक्षित नहीं हैं वे ही अज्ञानी होंगे। जो कोई भी मात्र इक्षा पूर्ति के लिए जीवन जीता है , उसकी उपलब्धि चाहे जो हो वह अज्ञानी ही होता है। इसके विपरीत ज्ञानी वो है जिसे कर्मफल में कोई आसक्ति नहीं होती। 
    समाज में दोनों तरह के लोग होते हैं। ज्यादातर लोग तो कर्मफल में ही बंधे होते हैं। तो प्रश्न उठता है कि फल में आसक्त लोगों के साथ अनासक्त व्यक्ति का व्यवहार कैसा होना चाहिए, क्या ऐसे ज्ञानी व्यक्ति को अज्ञानियों के साथ कोई जोर जबरदस्ती करनी चाहिए या उनको उनके हाल पर छोड़ देना चाहिए? वस्तुतः यँहा श्रीकृष्ण ART OF PERSUATION की बात करते हैं जो समाज में बिना संघर्ष उतपन्न किये समाधान की ओर ले जाता है। वस्तुतः ऐसे ज्ञानी लोगों को चाहिए कि वे फल में आसक्त लोगों को धीरे धीरे यकीन दिलावें कि कौन सा मार्ग जीवन के बृहत्त लक्ष्य के अनुरुप है। हमें स्मरण रहे कि इसके पूर्व भी श्रीकृष्ण कह चुके हैं कि श्रेष्ठ जनों को चाहिए कि वे अपने आचरण के उदाहरण से लोगों को प्रेरित करें कि लोगों को किस प्रकार से कर्म करने हैं। ये विधि सामान्य लोगों में कर्म करने के अनासक्ति के तरीके में विश्वास दिलाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 30

मयि सर्वाणि कर्माणि सन्नयस्याध्यात्मचेतसा।
 निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए चित्त द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध कर
 ॥30॥
अब श्रीकृष्ण एक बार फिर से कर्म करने की विधि को समझाते हैं। हमने देखा समझा है कि व्यक्ति की  प्रकृति और पुरुष यानी आत्मा से होती है। हम जो भी कर्म करते हैं वो कर्म हमारी प्रकृति के द्वारा किये जाते हैं। हमारे कर्म हमारी प्रकृति के तीन गुणों के ही परिणाम होते हैं जिनके सम्बन्ध में हमें भ्रांति होती है कि उन कर्मों को तो हम कर रहें हैं, कि हम कर्ता हैं। लेकिन हो ज्ञानी हैं, जो समझदार हैं, वे जानते हैं कि हम जो कर्म कर हैं वे हमारी प्रकृति के तीन गुणों के अनुपात के द्वारा हो रहा है और हमारे सेल्फ की उन कर्मों को करने में कोई भूमिका नही है, बल्कि सेल्फ यानी आत्मा यानी पुरुष तो मात्र साक्षी होता है, उसी के समक्ष प्रकृति के गुण कर्म करे होते हैं।
       हमने ये भी समझा है कि जिन्हें इस सत्य का बोध नहीं होता उनको लगता है कि जो कुछ किया जा रहा है वह सब उन्ही  के द्वारा किया जा रहा है और इस कारण कर्मफल की चिंता , उसका बन्धन हमेशा हमारे इर्द गिर्द घिरा रहता है। इसका कारण ये है कि हम अपने ईगो को ही अपना सेल्फ समझने की भूल करते हैं। ईगो का निर्माण  हमारे मोह, अहंकार, भय, इक्षा, कामना, राग, द्वेष आदि से होता है और जब हम ईगो के परवश होकर कर्म करते हैं तो इन भावों यानी अपने मोह, अहंकार, लोभ, क्रोध आदि के वश में होकर कर्म कर रहें होते हैं। ऐसी स्थिति में हमारे कर्म हमारे सेल्फ के प्रति समर्पित नहीं हो सकते, क्योंकि वे तो हमारे ईगो के किसी एक या अदाधिक भावों, यथा राग, द्वेष, प्रेम, मोह, क्रोध, अहंकार आदि के प्रति समर्पित होते हैं। इस स्थिति में व्यक्ति को कर्मों के फलों की चिंता लगे रहना अति स्वाभाविक ही है।
   इसके विपरीत  की स्थिति क्या हो सकती है, इसे समझने के पूर्व हम एक बार पुनः उस शिक्षा का स्मरण करें जिसके अनुसार परमात्मा परम् है और हमारी आत्मा उसी का स्वरूप है, हमारा सेल्फ उसी का स्वरूप है जो साक्षी भाव से हमारी प्रकृति के द्वारा किये जा रहे कर्मों को देख रहा मात्र होता है। जब व्यक्ति अपने कर्म को ईगो के परवश होकर न करे, बल्कि ईगो के सभी भावों से मुक्त होकर करे और उन कर्मों को मात्र अपने सेल्फ यानी आत्मा के लिए करे तो उसके कर्मों से उसके ईगो के भाव निकल जाते हैं और उसकी आत्मा के प्रति समर्पित कर्म उसे अथाह प्रसन्नता का अनुभव देते हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति राग-द्वेष, माया-मोह, सफलता-असफलता के द्वंद्व से मुक्त होकर मात्र अपनी आत्मा के प्रति उत्तरदायी होकर कर्म करता है। इस तरह से कर्म  को व्यक्ति हर स्थिति में कर सकता है, चाहे वह घरेलू कार्य कर रहा हो, या फिर पढ़ाई, लिखाई, रिसर्च कर रहा हो, या फिर व्यापर या कार्यालय का काम कर रहा हो। जब व्यक्ति अपनी आत्मा के प्रति समर्पित होकर कर्म करता है तो उसे हर हालत में अपने ही कर्मों से प्रसन्नताआ की अनुभूति होती है क्योंकि तब वह अपने या किसी अन्य के ईगो को यानी लोभ, मोह, माया, प्रेम, क्रोध, अहंकार, भय आदि को सन्तुष्ट करने के लिए कर्म नहीं कर रहा होता है और इस कारण से कर्मफल की चिंता से भी मुक्त हुआ रहता है। यह एक प्रकार से डायनामिक मेडिटेशन  है। इसमें व्यक्ति अपने समस्त ईगो को त्याग कर अपने कर्मो को परमात्मा के प्रति समर्पित कर देता है। इसमें न तो आशा है, न ही ममता है और न ही दुख ही है। बल्कि इसमें मात्र और मात्र प्रन्नता ही होती है और वो भी बिना माँगे प्राप्त है। यही स्वार्थरहित कर्म भाव भी है। इसी मार्ग से लक्ष्य की प्राप्ति भी सम्भव है। इस अवस्था में व्यक्ति निरन्तर ईश्वर के सम्पर्क में रहता है क्योंकि वह निरन्तर अपनी ही आत्मा में बना रहता है। इस अवस्था में किये जाने वाले कर्म भी उच्च कोटि के होते हैं। इस अवस्था में व्यक्ति आशा से मुक्त होता है। आशा भविष्य के प्रति उम्मीद है। जब हम आशा  करते हैं  तो हम भविष्य में रहते हैं लेकिन ऐसा कर के हम वर्तमान की उपेक्षा कर रहें होते हैं। सो हमें आशा का त्याग कर वर्तमान में कर्मों के प्रति समर्पित होना चाहिए, ईश्वर के प्रति समर्पित होना चाहिए। इसी प्रकार अहंकार मूलक ममभाव जो "मैं" और "मेरा" से जुड़ा होता है से भी मुक्ति होनी चाहिए क्योंकि इसका सम्बन्ध अतीत से होता है।  हमें अतीत से सीख तो लेनी चाहिए और भविष्य के लिए योजना तो बनानी चाहिए लेकिन उनमें रहना नहीं चाहिए क्योंकि उससे एक प्रकार की उत्तेजना यानी ज्वर उत्पन्न होता है जो वर्तमान की क्षमता को नष्ट करता है। सो व्यक्ति को अपने वर्तमान में रहकर ही कर्म करने चाहिए।  इससे हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा  देता है क्योंकि तब व्यक्ति अतीत के दुख की पीड़ा और सुख के मोह से मुक्त होता है , साथ ही साथ वह भविष्य की कामना से  और चिंता से मुक्त होता है, और इस प्रकार व्यक्ति वर्तमान में दुख, चिंता आदि से मुक्त होता है जिससे उसके वर्तमान का क्षरण नही। होता है। इस अवस्था में व्यक्ति समत्व भाव में आ जाता है जिसके कारण वह ईगो जनित भावों से मुक्त होकर वर्तमान में कर्म करता हुआ अपनी आत्मा और परमात्मा से जुड़ जाता है। यही तो डायनामिक मेडिटेशन है जिससे हमें पतमात्मा की प्राप्ति होती है। इस स्थिति में आध्यात्मिक स्तर पर हम हमेशा ही सफल होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 31 एवम 32


ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः।

 श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽति कर्मभिः॥


जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते हैं, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते हैं

 ॥31॥

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्‌।

 सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥


परन्तु जो मनुष्य मुझमें दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते हैं, उन मूर्खों को तू सम्पूर्ण ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझ

 ॥32॥

किसी भी चीज से लाभान्वित होने के लिए  आवश्यक होता है कि हम उस पर भर भरोसा करें ।।जब हम उसपर विश्वास कर उसके सत्य को पहचानते है तो उसे अपनाते हैं।  किसी का ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं होता, उस ज्ञान के प्रति विश्वास और श्रद्धा होना, और उसको अपने व्यवहार में ढालना भी उतना ही जरूरी होता है। यदि हम अपने ज्ञान को अपने व्यहार में नहीं अपनाते तो फिर वह ज्ञान हमें सत्य का दर्शन नहीं करा पाता। ज्ञान का होने मात्र से कोई ज्ञानी नहीं हो जाता जब तक वो ज्ञान आचरण में नहीं ढल जाता, और आचरण में ज्ञान के ढलने की शर्त ये होती है कि उस ज्ञान के प्रति हमारे मन में श्रद्धा हो, विश्वास हो, उस ज्ञान के आलोचना में ही हम उलझे न हो। 

अब तक कर्मयोग के जो ज्ञान हमें प्राप्त हुए हैं वे तब तक हमारे लिए कल्याणकारी नहीं हैं जब तक वे हमारे आचरण में नहीं आ जातेऔर आचरण में ज्ञान को लाने के लिए आवश्यक है कि हम उस ज्ञान में विश्वास और श्रद्धा रखकर उसका अनुसरण करें। यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो फिर जैसा कि हमें कर्मयोग का मार्ग समझते हुए श्रीकृष्ण ने बताया है , हम कर्म करते हुए कर्मबन्धन से मुक्त हो जाते हैं अन्यथा श्रद्धा और विश्वास के अभाव में सत्य से दूर होकर हम अपनी कामनाओं के जाल में उलझ कर नष्ट हो जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 33

सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
 प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥

सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात अपने स्वभाव के परवश हुए कर्म करते हैं। ज्ञानवान्‌ भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा
 ॥33॥
जब हम कुछ करने के मार्ग पर चलते हैं तो मार्ग की कठिनाइयों और बाधाओं की जानकारी होनी भी आवश्यक है। यँहा हमें इसी बाधा की जानकारी दी गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। कर्मयोग के मार्ग की सैद्धान्तिक जानकारी भर हो जाने से ये सिद्ध नहीं होता है कि हम उस मार्ग का अनुसरण कर ही लेंगे, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति यानी अपने स्वभाव के वश में होता है और उसी के अनुसार कर्मों को करने हेतु उद्द्यत होता है। सो इस बात की पर्याप्त सम्भाना होती है कि कर्मयोग के ज्ञान प्राप्ति के बावजूद भी वह उस मार्ग पर न चलकर अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करे। हमने समझा है कि हमारे कर्म हमारे मन के अंदर उठने वाली कामनाओं की कर्मेन्द्रियों के द्वारा कार्यरूप में अभिव्यक्त होने वाली क्रियाएं ही हैं। सो हम जैसा सोचते हैं वैसा करते हैं। हमारे विचारों की एक श्रृंखला होती है जो हमारे व्यवहार को निर्धारित करती है।  यही श्रृंखला हमारे स्वभाव यानी हमारी प्रकृति को निर्धारित करती है। तब प्रश्न उठता है कि हमारे विचाओं की श्रंखला निर्धारित कैसे होती है? इसे तय करते हैं हमारे तीन गुणों यानी तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात। उनके परस्पर अनुपात ही तय करते हैं कि हमारे के मन में किस तरह के विचार उत्पन्न होंगे और वे विचार ही हमारी कर्मेन्द्रियों को अपने अनुसार कर्म में प्रवृत्त होने के लिए प्रेरित करते हैं। अज्ञानी हो या ज्ञानी, सभी इसी प्रकृति के अधीन होते हैं और अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्मयोग के आचरण को करने अथवा नहीं करने में समर्थ हो पाते हैं।
  इस प्रकार हम समझ पाते हैं कि कर्मयोग के आचरण को अपनाने में हमारी खुद की प्रकृति सह्यायक होती है या बाधा उत्पन्न करती है। इस जानकारी के होने से ही हम आगे की बाधा को पार पाने में समर्थ हो पाते हैं। अन्यथा हमें तो लगेगा कि कर्मयोग के सिद्धांत को हमने जान लिया तो हम कर्मयोगी हो गए।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 34

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
 तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

इन्द्रिय-इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान्‌ शत्रु हैं
 ॥34॥
अभी हमने देखा है कि प्रत्येक मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्म करने के लिए उद्द्यत होता है, फिर चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी। तो क्या व्यक्ति व्यक्ति अपनी प्रकृति का दास बनकर जीवन जीने के लिये अभिशप्त है? सनद रहे कि श्रीमद्भगवादगीता के सम्बंध में एक घोर दुष्प्रचार किया जाता रहा है कि गीता हमें इस संसार से विमुख करती है। सत्य यह है कि गीता का अध्ययन हमें  "यँहा और अभी" जीवन की उपलब्ध परिस्थितियों में मन , शरीर और बुद्धि के माध्यम से सब अनुभवों को प्राप्त करते हुए जीवन जीने का मार्ग बतलाता है। गीता की शिक्षा तो हमें जीवन के लक्ष्य से परिचित कराती है और इस संसार में जीवन जीने का मार्ग सुझाती है। हमें परिस्थितोयों और रूढ़ियों का दास बनने से रोकती है।
अभी हमने देखा कि प्रत्येक मनुष्य की एक विशेष प्रकृति होती है जो उससे उसी के अनुरूप कर्म कराती है। तो फिर इसमें आगे बढ़ने का वो कौन सा मार्ग हो सकता है जिसपर चलकर हम अपना उत्थान कर पाएं? इस प्रश्न का उत्तर भी इसी गीता में है। व्यक्ति का उसके प्रकृति के अनुरूप जो स्वभाव होता है वह उसके कर्म और विचारों से बनता है। प्रत्येक व्यक्ति के कुछ पसन्द होते हैं, कुछ नापसन्द होते हैं । हमारी इन्द्रियाँ अर्थात हमारे सेंसेज के अपने पसन्द(राग/लाइक्स) और नापसन्दगी(द्वेष/dislikes)होते हैं । यदि हम इन्द्रियों के likes और dislikes में उलझते हैं अर्थात उन्हीं के अनुसार कर्म करने लगते हैं तो फिर हम उनके चपेट में आ जाते हैं और सही और गलत को नहीं समझ पाते हैं। हमें अपने लाइक्स(राग) ही राइट(सही) और dislikes (द्वेष) ही wrong (गलत) लगने लगते हैं और हम उसी likes और dislikes के अनुसार कर्म करते हैं न कि right और wrong के अनुसार। ऐसी स्थिति में व्यक्ति इन्द्रियों के वश में आकर भटक जाता है। इसी कारण इन राग और द्वेष को श्रीकृष्ण लुटेरे कहते हैं जो कर्म के मार्ग पर राहजनी करते फिरते हैं। 
   यँहा यह समझना जरूरी है कि ये likes और dislikes का जन्म हमारे खुद के अहंकार के कारण होता है जो हमें हमारे likes और dislikes से बाँधते हैं। जिनसे बचने का तरीका है कि हम अपने अहंकार यानी ईगो से बाहर निकलकर चलें, यानी जो कर्मपथ पर बढ़ें तो इन्द्रियों के likes और dislikes के अनुसार न चलकर right और wrong का निर्णय कर के चलें। यदि हमें कँही जाना है, और आगे का रास्ता बहुत खराब है तो क्या  आगे जाना छोड़ देंगे? तो फिर गन्तव्य पर पहुंचेगे कैसे? हो सकता है कि आपको मीठा बहुत पसंद है तो क्या मधुमेह की बीमारी होते हुए भी मीठा खाएँगे?
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 35

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
 स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दूसरे के धर्म से गुण रहित भी अपना धर्म अति उत्तम है। अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय को देने वाला है
 ॥35॥

हमें स्मरण होगा कि श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता के द्वितीय अध्याय के 31वें श्लोक में स्वधर्म के अनुसार कर्म करने की शिक्षा दे चुके हैं। एक बार पुनः हम उस शिक्षा पर बल दिया गया है। ये तो स्पष्ट हो चुका है कि प्रत्येक व्यक्ति की एक खास प्रकृति होती है और उसके कुछ खास गुण होते हैं और व्यक्ति की प्रकृति ही उसे उसकी कामनाएँ देती हैं जिनकी पूर्ति के लिए कर्म करता है। सो यदि व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार कर्म नहीं करता तो उसमें विकृति आ जाती है।  यँहा पर आवश्यक है कि हम द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 को पुनः समझें।

""गीता अध्याय 2 श्लोक 31
-----------------------------------
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात्‌ तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
 ॥31॥
ऊपरी तौर पर तो यह श्लोक युद्ध के लिए प्रेरित करता प्रतीत होता है जो इस श्लोक के वास्तविक अर्थ का अधूरा स्वरूप ही है। श्रीकृष्ण ने अभी तक आत्मा को ही धर्म का प्रतीक बताए हैं किंतु इस श्लोक में उन्होंने स्वधर्म की बात की है। वस्तुतः आत्मा के सत्य तक पहुँचने के लिए जो मार्ग है उसी का नाम स्वधर्म है। स्वधर्म का अर्थ है खुद के स्वभाव के अनुसार धर्म यानी कर्तव्य। 
     सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक मुनष्य में तीन तरह के गुण होते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। इन गुणों के अनुपात विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न स्तर के होते हैं। 
गीता के 16वें अध्याय के अनुसार करने लायक अच्छे गुण यानी दैवी गुण और 
 न करने लायक बुरे गुण यानी आसुरी गुण निम्न हैं--

दैवी गुण
-------------
अभयता
अन्तःकरण की शुद्धता
ध्यान में लग्न
सर्वस्व का समर्पण
इन्द्रियों पर नियंत्रण
अहिंसा
सत्य
क्रोध का न होना
कर्मफल का त्याग
चित्त की चंचलता का अभाव
सभी के प्रति दयाभाव
अनासक्ति
कोमलता
लक्ष्य के प्रति समर्पण
व्यर्थ की चेष्टा का अभाव
क्षमा
तेज
शत्रुभाव का अभाव
लालच का अभाव
पूजे जाने की भावना का अभाव
मान अपमान के भाव का अभाव

आसुरी गुण
-----------------
पाखण्ड
घमण्ड
अभिमान
क्रोध
कठोर वाणी
अज्ञानता
दम्भ
मान अपमान की चिंता
मद
कर्मफल में आसक्ति
इन्द्रियों में आसक्ति
निंदा
अहंकार
कामना
लोभ
मोह

तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात से व्यक्ति का स्वभाव निर्धारित होता है। इन गुणों के अनुपात के अनुसार श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के मनुष्य बताए हैं, 
1.जिस व्यक्ति में तमोगुण की अधिकता होती है उसे शुद्र का नाम दिया गया है। ऐसा व्यक्ति प्रकृति के मायाजाल में फँसा रहता है और सद्कर्मों में उसकी रुचि न्यूनतम होती है।
2. जब शुद्र श्रेणी का व्यक्ति उच्चकोटि की व्यक्ति की सेवा करता है, उनके सानिध्य में रहता है तो उसके तमोगुण कम होते जाते हैं, सद्गुण आने लगते हैं। दैवी सम्पद की वृद्धि के साथ ही वही व्यक्ति शुद्र से वैश्य श्रेणी का साधक हो जाता है।
3. जैसे जैसे सद्गुणों का विकास इंसान के अंदर होते जाता है आसुरी गुण भी उस व्यक्ति पर हावी होने का प्रयास करते हैं। आप जब जब अच्छा इंसान बनने की कोशिश में लगते हैं हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हमें उकसाते हैं, काम क्रोध की अधिकता होने लगती है। दैवी और आसुरी  गुणों के संघर्ष की ये अवस्था आंतरिक युद्ध को जन्म देती है। जब इंसान इस अवस्था में पहुँचता है तो उसमें प्रकृति से उत्पन्न गुणों को काटने की क्षमता विकसित हो जाती है। यही उसके क्षत्रिय श्रेणी का साधक बनाता है। इसी अवस्था में ही सद्गुणों का आसुरी गुणों से युद्ध होता है। यही तो क्षत्रिय धर्म है यानी क्षत्रिय का कर्तव्य है कि वह दुर्गुणों, आसुरी गुणों और इन गुणों से उपजे अव्ववस्था और इन गुणों के वाहकों का अंत करे अर्थात उनके विरुद्ध युद्ध करे।
4.आसुरी गुणों के विरुद्ध दैवी गुणों के संघर्ष के परिणाम में जब दैवी गुण दुर्गुणों को समाप्त कर देते हैं तो मन का शमन, इन्द्रियों का दमन हो जाता है । इस अवस्था में सरलता, सहजता, ज्ञान, दया, प्रेम, जैसे सद्गुण ही बच जाते हैं जो ब्राह्मण का प्रतीक है। ब्राह्मणत्व के विकास के साथ ही वह व्यक्ति परमब्रह्म में प्रवेश पाता है।
            ब्राह्मणत्व की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कर है। इस अवस्था में व्यक्ति को अपने वास्तविक बोध यानी सेल्फ यानी अपनी आत्मा अर्थात आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है।
      प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा तो समान है लेकिन उसका व्यक्तित्व उसके मन-मस्तिष्क और बौद्धिकता से बनता है जो हमें दिखता है। इस व्यक्तित्व का निर्धारण व्यक्ति के अंदर के तीनों गुणों की अनुपातिक मात्रा पर निर्भर करता है। इन गुणों की मात्रा स्थिर नहीं होती बल्कि बढ़ती घटती रहती है और इस प्रकार एक ही शुद्र से लेकर ब्राह्मण तक कि यात्रा करता है।
      अब पुनः हम श्रीकृष्ण की इस शिक्षा पर ध्यान दें कि हमारा आचरण हमारे स्वधर्म के अनुसार होना चाहिए। अर्थात हमें अपना कर्तव्य अपने गुणों के अनुसार ही निर्धारित कर आगे की यात्रा करनी चाहिए। तभी हम कर्मिक विकास कर आत्मा को पहचान पाते हैं। किसी दूसरे की नकल करने से हम उसके गुणों को नहीं पा सकते। कोई अन्य अगर अन्य श्रेणी का है और अगर हम बिना उन गुणों को प्राप्त किये मात्र उस व्यक्ति की नकल करेंगे तो उस व्यक्ति के अनुसार तो आचरण नहीं ही कर पाएंगे, अपने अंदर जो करने की क्षमता है वह भी नहीं कर पाएंगे। इसी को कहते हैं कि न माया मिली न राम!
    प्रत्येक व्यक्ति का अपना कुछ कर्तव्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति, अन्य जीव जंतुओं और परिवेश के प्रति और ईश्वर के प्रति कुछ कर्तव्य होते हीं हैं जिनका निर्वाहन करना ही धर्माचरण होता है। यदि हम इन कर्तव्यों को नहीं करते तो हम अपने धर्म का पालन नहीं करते। हम लाख ज्ञान बघारें, जो भेष धारण कर लें उससे कुछ नहीं होने वाला । यदि आप धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना ही होगा। हो सकता है कि हमारे कुछ कर्तव्य हमें अच्छे नहीं लगें लेकिन उनको करना ही अगर हमारा कर्तव्य है तो करना ही एकमात्र सही रास्ता है।
      अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है तो उसका दायित्व है कि वह अनाचार अत्याचार, अधर्म के विरुद्ध खड़ा हो, उनसे युद्ध करे। साथ ही उसका दायित्व है कि खुद के अंदर के आसुरी गुणों। जैसे माया , मोह , भ्रम आदि को काटे।
     अर्जुन का युद्ध हम सब का युद्ध है। हम सभी गुणों की विकासयात्रा के अलग अलग पड़ाव पर होते हैं और अपने गुणों। के अनुसार हमारे निम्न दायित्व हैं---
1.हमारा आचरण हमारे गुण के अनुसार हो।
2.हम जिस गुण की अवस्था में हैं उससे विकसित अवस्था में पहुँचने हेतु अपने गुणों को परिमार्जित करें।
3. गुण की जो अवस्था है, उसके अनुसार हमारे जो कर्तव्य हैं उनका भली प्रकार पालन करें
       इसी मार्ग से हम आत्मसाक्षात्कार के उपरांत ब्रह्म को प्राप्त होंगे।""
           सांसारिक जीवन के धरातल पर इसका अर्थ यही है कि यदि हम अपनी प्रकृति, अपने गुणों, अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करते हैं तो ठीक है अन्यथा हमारा पतन निश्चित है। यदि विद्यार्थी वकील का कर्म करने लगे, वकील चिकित्सक सा बरतने लगे, सिपाही साधु बन जाए, तो समाज में अफरा तफरी मच जाय। धर्म को रूढ़ि नहीं है कि हम किसी मार्ग विशेष पर ही टिके रहें, बल्कि धर्म तो अपनी प्रकृति विशेष से निर्धारित कर्म का मार्ग है जो हर व्यक्ति के लिए विशेष रूप से उसका अपना होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 36

अर्जुन उवाचः अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पुरुषः।
 अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात्‌ लगाए हुए की भाँति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
 ॥36॥॥
             ज्ञान के अर्जन का कार्य तब पूरा होता है जब हम प्राप्त ज्ञान को आचरण में अपनाने लगते हैं, उसे अपने व्यवहार में ढाल लेते हैं। कर्मयोग पर श्रीकृष्ण के दिये व्याख्यान को सुनने के पश्चात उसका नियमित पालन करने पर ही उस ज्ञान का महत्व है, लेकिन यदि हम इस ज्ञान की जानकारी के बावजूद इससे कुछ इतर करते हैं तो मिश्चित रूप से कुछ ऐसा कर रहें होते हैं जो बुरे आचरण की श्रेणी में आता है। ज्ञान के एक जागरूक छात्र के मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जब वह सब कुछ जान ही रहा है तो फिर उस ज्ञान के अनुसार आचरण न कर गलत ढंग से क्यों आचरण कर रहा है। अर्थात ज्ञान प्राप्ति के बाद ये स्थिति आत्मावलोकन की होती है जिससे ये ज्ञात होता है कि हमारी वे कौन सी कमजोरियाँ हैं जो हमें उस आचरण को अपनाने में बाधक बन रहीं हैं। यदि हम ये आत्मावलोकन नहीं करते तो अपनी कमजोरियों से दूर नहीं होते और तमाम ज्ञान के रहते हुए गलत आचरण करते ही जाते हैं। यही स्थिति अर्जुन की भी है सो उसका प्रश्न एक जिज्ञासु छात्र की तरह है जो ज्ञान प्राप्त कर उसे अपने आचरण में ढालना चाहता है लेकिन अपनी कमजोरियों को नहीं जानता है, सो मार्ग ढूंढ रहा है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 37

श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
 महाशनो महापाप्मा विद्धयेनमिह वैरिणम्‌॥

श्री भगवान बोले- रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खाने वाला अर्थात भोगों से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है। इसको ही तू इस विषय में वैरी जान
 ॥37॥

पाप क्या है, बिना इसे समझे हम खुद के कर्मों को परिष्कृत नहीं कर सकते। वस्तुतः जब हम खुद को अपनी स्थिति के अनुसार आवंटित कर्म नही कर अन्य कर्म करते हैं तो वह पाप कर्म है, अर्थात स्वधर्म के अनुसार कर्म न कर  अन्य कोई कार्य करते हैं तो उस अवस्था में वही हमारा पाप कर्म होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपनी ही प्रकृति से उपजे गुणों के बंधन में बंध जाते हैं और उन गुणों को अपने इन्द्रियों के भरोसे छोड़ कर जीने लगते हैं। हमने देखा है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रकृति और उनसे उपजे गुणों के अनुसार ही कर्म करता है लेकिन जब उसके कर्म उसके स्वधर्म से न निर्धारित होकर उसके इन्द्रियों (सेंस ऑर्गन) के सुख के लिए ही होते हैं तो वही उस व्यक्ति का पाप कर्म होता है। पांडवों  का अधिकार दुर्योधन और अन्य कौरवों ने छल से छीन लिया था। वैसी स्थिति में पांडव क्या करते? उन्होंने कौरवों से वार्ता का प्रयास किया, शांति प्रस्ताव भी रखा लेकिन कौरव नहीं माने। तब उन्होंने बलप्रयोग का मार्ग चुना क्योंकि यदि वे ऐसा नहीं करते तो कौरव उनके जीवन जीने का भी अधिकार छीन लेते। अर्जुन पांडवों में सबसे सामर्थवान योद्धा था। तो इस परिस्थिति में उसे क्या करना चाहिए था? युद्ध या पलायन? उसकी प्रकृति और उसकी स्थिति के अनुसार युद्ध उसका स्वधर्म था और पलायन पाप। हम सभी अपने जीवन के प्रति क्षण को गौर से देखें। हर घड़ी हमारा कुछ नियत दायित्व होता है, जिनको करना हमारा स्वधर्म है, जिनसे मुँह फेरना पापकर्म है।
श्रीकृष्ण ने द्वितीय अध्याय के श्लोक संख्या 62-63 में इस सत्य को बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है जिसके पुनराध्ययन से इस श्लोक का अर्थ बखूबी स्पष्ट होता है। तो आइए पुनः हम उसे देखें--
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।

 संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥


विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है

 ॥62॥


क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।

 स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥


क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है

 ॥63॥


अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनुभूति इन्द्रियों यानी सेंसेज के माध्यम से ही होती है । खुद से बाहर की विषयों वस्तुओं और व्यक्तियों में जब हम आनंद और सुख की खोज करते हैं तो हम निरन्तर उनकी ही सोच में लगे रहते हैं, व यदि हम उन अनुभूतियों में डूबते हैं तो उनके प्रति एक लगाव भी उत्पन्न होता है। हम उस विषय, वस्तु, व्यक्ति के बारे में जिनसे हम सुख और आनंद की अपेक्षा करते हैं खुश और प्रसन्न होते रहते हैं। जैसे यदि हमको लगता है कि फलाना पद मिल जाने से अथवा फलाना वस्तु मिल जाने से अथवा फलाना व्यक्ति के मिल जाने से अथवा इतना धन हो जाने से हमें बहुत आनंद मिलेगा तो हम निरन्तर उसी के बारे में चिंतन करते रहते हैं। यँहा तक कि उसके वास्तविक प्राप्ति के पूर्व ही हम मात्र उसके मिलने की कल्पना कर के ही खुश होते रहते हैं और उसी में डूबे रहते हैं, उसी के चिंतन और ध्यान में लगे रहते हैं। 

        जिन विषयों पर बहुत चिंतन करते हैं उनसे लगाव हो जाता है। इस लगाव से उन विषयों के प्रति कामना का जन्म होता है हमारे मब में । हम अपनी खुशी, अपने आनंद, और सुख के लिए उन इक्षित वस्तुओं , विषयों आदि पर निर्भर हो जाते हैं और उनके बिना हम अपने सुख की कल्पना भी नहीं कर पाते। हमें लगता है कि यदि वो हमें नहीं मिला तो हस्रा अस्तित्व ही मिट जाएगा। हम इस हद तक उसमें दुबे रहते हैं कि जागृत से लेकर सुप्त अवस्था तक बिना सचेष्ट प्रयास के ही उनका ध्यान करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम उसकी सोच में , उसके ध्यान में डूब गए और दुब जाते हैं। हमारा ध्यान यानी MEDITATION उसी में लग जाता है क्योंकि हमारा उसी में लगाव होता है। हम उसी वस्तु, विषय, व्यक्ति में समाधिस्थ हो जाते हैं क्योकि उसी में हमें सुख मिलता है।

    जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें

1.मोह

हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।

2.लोभ

यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।

3.क्रोध

यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।

4.ईष्या

 इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।

यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।

5.घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर  घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।

     वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी  हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।

   इस तरह हमारे सेल्फ की यात्रा के छह प्रमुख शत्रु हैं

1.काम

2.मोह

3.क्रोध

4.लोभ

5.ईर्ष्या

6.घमंड

और ये पाँच यानी मोह, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पहले यानी काम की ही सन्तति होते हैं अर्थात प्रथम शत्रु काम है यानी संगत है , परिणाम का बन्धन है।

      अब हम देखते हैं कि इनका परिणाम क्या निकलता है।

1.क्रोध की  कई अभिव्यक्ति होती है, जैसे व्यक्ति दूसरे को हानि करने या खुद को हानि पहुँचाने की कोशिश कर सकता है , निराशा में जा सकता है, आदि। मतलब ये है कि क्रोध के समय व्यक्ति ये नहीं समझ पाता कि क्या करना सही है क्या करना गलत है और न दूसरे ही अनुमान कर पाते हैं कि क्रोधित व्यक्ति कौन सा कदम उठाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसकी बुद्धि मूढ़ हो जाती है, क्रोध की वजह से वह विवेक से काम नहीं कर पाता। विवेक से सोचने की क्षमता जाती रहती है।

2. क्रोध से दिग्भर्मित विवेक से स्मृति भी साथ छोड़ देती है। हम जीवन में बहुत कुछ सीखते रहते हैं, समाजिक और व्यवसायिक जीवन में हमें बहुत सारा ज्ञान मिलते रहता है जो हमारी स्मृति में सुरक्षित रहता है और उस तरह की परिस्थिति आने पर वही स्मृति हमारे सुरक्षित ज्ञान को क्रियाशील कराकर हमसे सही कार्य करा लेती है। हमने अगर सीखा है कि हमें अपने से बड़ों को प्रणाम करना चाहिए तो अगर कोई बड़ा सामने आता है तो वही स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम तुरत उन्हें प्रणाम करें। यदि किसी चिकित्सक ने सीखा है कि शल्यचिकित्सा कैसे की जाती है तो रोगी के बीमारी के दूर करने के लिए वह चिकित्सक अपनी उसी स्मृति के कारण उसका इलाज कर पाता है। लेकिन क्रोध की अवस्था में यह स्मृति साथ छोड़ देती है। क्रोधित मन  के जेहन में सीखा हुआ ज्ञान रहता तो है लेकिन वो क्रोध से अस्थिर हुए दिमाग से बाहर आकर हमारे कार्य में नहीं बदल पाता और क्रोध की अवस्था बीतने पर याद आता है कि अरे हम तो ये जानते ही थे, हमें याद ही नहीं आया। इस प्रकार क्रोध की अवस्था  में  विवेक और  स्मृति दोनों साथ छोड़ देते हैं जिसके कारण हम सही काम नहीं कर पाते।

3.क्रोध से नष्ट स्मृति व्यक्ति के बुद्धि को समाप्त कर देता है। बुद्धि और विवेक स्मृति के आधार पर ही काम करते हैं। स्मृति में संचित ज्ञान यदि समय पर कार्यरूप में नहीं बदल पाता है तो फिर बुद्धि विवेक बेकार के हथियार हो जाते हैं। हमारे पास बहुत ज्ञान का भंडार हो सकता है लेकिन क्रोध की अवस्था में नष्ट हुए स्मृति के कारण यदि यह ज्ञान स्मृति में नहीं रह जाता है तो बुद्धि उसे  कार्यरूप में नहीं बदल पाती। इस प्रकार क्रोध से मूढ़ हुए विवेक के कारण नष्ट हुई स्मृति बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाती और सारा का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।

4. अब जब क्रोध के कारण इस अवस्था में व्यक्ति पहुँच जाता हैं तो  कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है और उसका पतन निश्चित हो जाता है।

    इस प्रकार हम देखते कि कामना से वशीभूत व्यक्ति की क्या हालत होती है। इस तरह काम के जाल में फँसा व्यक्ति पतनशील होकर आत्मपथ से विलग हो जाता है। यही व्यक्ति अयोग्य, नीच प्रकृति का कहा जाता है। यह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं होता है। 

 जीवन के प्रत्येक स्थिति में हम इसे अनुभव करते है। ऐसी स्थिति खुद से बाहर खुशी तलाशने से होती है। जब भी हम अपने सुख शांति और आनंद के लिए बाह्य वस्तुओं पर निर्भर करते रहेंगे हमारा पतन अवश्यम्भावी होगा, तरह तरह के लोभ , हिंसा, निराशा आदि बने रहेंगे। तमाम भौतिक उपलब्धि भी हमें उस स्थिति में सुख चैन नहीं दे सकेंगे। हर काल में कामनाओं से बन्धने का यही  फलाफल होता है कि इंसान हमेशा नीच से नीच हरकत पर उतरते रहता है। यह बन्धन हमें जीवन में जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं होने देता है, हम आत्मपथ से विमुख तमाम भौतिक सुख सुविधा के बावजूद दुखी और असन्तुष्ट ही रहते हैं, हमारी खुशी, और हमारे सुख क्षणिक ही रह जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 38-39

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च।
 यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्‌॥

जिस प्रकार धुएँ से अग्नि और मैल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार जेर से गर्भ ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है
 ॥38॥
आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
 कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥

और हे अर्जुन! इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम रूप ज्ञानियों के नित्य वैरी द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है
 ॥39॥

 श्रीकृष्ण की दी गई शिक्षा से स्पष्ट होता है कि कामनाओं के कारण ही ज्ञान पर आवरण चढ़ जाता है जिससे व्यक्ति पाप की तरफ उन्मुख होता है। ये कामनाएँ व्यक्ति की प्रकृति से उतपन्न गुणों के कारण होती हैं। जब व्यक्ति के सत्वगुण के कारण कामनाएँ हावी होती हैं तो ऐसी कामनाएँ आत्मविकास और आत्मसाक्षात्कार से जुड़ी होती हैं। ये इक्षाएँ ज्ञान को वैसे ही ढँक कर रखती हैं जैसे धूआँ से अग्नि ढँका होता है। इन कामनाओं से पार पाना सबसे आसान होता है। दूसरी तरफ रजोगुण से जुड़ी कामनाओं से व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं का जन्म होता है जैसे सत्ता की प्राप्ति,नाम, धन की इक्षाएँ आदि। इनसे पार पाना थोड़ा अधिक मुश्किल है क्योंकि ये कामनाएँ ज्ञान को उसी प्रकार ढँक लेती हैं जैसे धूल दर्पण को। तब थोड़ा अधिक प्रयत्न  कर कामनाओं से मुक्ति मिल पाती है। तमोगुण से उतपन्न कामनाओं का सम्बंध शारीरिक सुख से जुड़ा होता है जो सर्वाधिक प्रभावी ढँग से ज्ञान को ढँकती हैं। जिनसे  मुक्त होने में अधिक श्रम और समय लगता है। ये इक्षाएँ ज्ञान को ऐसे ढंकती हैं जैसे भ्रूण को गर्भ में ढँका होता है।  इन कामनाओं से मुक्ति एक प्रकार से एक नए जीवन की प्राप्ति के समान ही है सो ऐसे शारीरिक सुख की कामनाओं से मुक्ति थोड़ी ज्यादा ही कठिन है।
  इस तरह से हम देखते हैं कि हमारी ही कामनाएँ हमारे ज्ञान को कैसे ढँकती हैं। जिस तरह की व्यक्ति की प्रवृत्ति होती है उसी तरह की उसकी कामना होती है और उसी के अनुरूप उसका ज्ञान भी प्रभावित होता है तदनुसार उसके कर्म भी।
 कामनाओं का कभी अंत नहीं होता है। एक इक्षा की पूर्ति में ही दूसरी इक्षाओं का जन्म बसा रहता है। इस कारण से व्यक्ति का ज्ञान हमेशा ही कामनाओं के वश में हुआ रहता है। एक कामना दूसरे कामना के जन्म के लिये इंगन होती है और इस प्रकार कामनाएँ सदैव क्रियाशील रहकर व्यक्ति के ज्ञान को अपने प्रभाव में रखती हैं और इस कारण कामनाओं के वश में रहकर व्यक्ति के कर्म उन कामनाओं की पूर्ति में ही लगे रह जाते हैं। 
अब हम देखें कि ऐसा होता कैसे है, क्योकि इसके मेकानिज्म को समझे बिना इसके प्रभाव से मुक्त होना सम्भव भी नहीं है।

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
 एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्‌॥

इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सब इसके वासस्थान कहे जाते हैं। यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है।
 ॥40॥
कामनाओं को नियंत्रित कर उनसे मुक्त होने के लिए ये जानना आवश्यक है कि कामनाएं होती कँहा है ताकि व्यक्ति उनकी पहचान कर, उनको चिन्हित कर उनसे निजात पा सके। इसे समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि कामनाओं की शरणस्थली तीन हैं। पहली शरणस्थली व्यक्ति की इन्द्रियाँ हैं। प्रत्येक इन्द्रिय के अपने विषय होते हैं जिनकी पूर्ति व्यक्ति करना चाहता है । इस पूर्ति की अपेक्षा से कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। जब उनके प्रति विशेष राग(LIKE) और द्वेष(DISLIKE) उत्पन्न होता  तो कामनाओं को मन का साथ मिल जाता है।  पुनः जब व्यक्ति अपने पसन्द और नापसन्द में ज्यादा डूबता है तो उनके समर्थन और विरोध में अपनी बुद्धि का उपयोग करने लगता है, अपनी बुद्धि से अपने पसन्द-नापसन्द को सही-गलत ठहराने लगता है। उसके राग(like) और द्वेष(dislike) प्रेम(love) और घृणा(hate) में बदल जाते हैं और उसकी बुद्धि अपने तर्क से उनका समर्थन और विरोध करने लगती है। व्यक्ति सही और गलत नहीं पसन्द और नापसन्द की भावना से ग्रसित होकर कर्म करता है और उसे सही या गलत  ठहराने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग करता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 41, 42, 43

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
 पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्‌॥

इसलिए हे अर्जुन! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल
 ॥41॥
इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
 मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

इन्द्रियों को स्थूल शरीर से पर यानी श्रेष्ठ, बलवान और सूक्ष्म कहते हैं। इन इन्द्रियों से पर मन है, मन से भी पर बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यन्त पर है वह आत्मा है
 ॥42॥
एवं बुद्धेः परं बुद्धवा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
 जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्‌॥

इस प्रकार बुद्धि से पर अर्थात सूक्ष्म, बलवान और अत्यन्त श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डाल
 ॥43॥ 
 
अभी तक कि विवेचना से स्पष्ट हो चुका है कि कर्म से पथ भ्रष्ट करने वाला मूल कारण है व्यक्तो का इन्द्रियों के विषयों से विशेष अनुराग का होना। अतएव श्रीकृष्ण तार्किक ढंग से समझाते हुए बताते हैं कि किस तरह से व्यक्ति अपने पापकर्म से मुक्त हो सकता है। इसके निम्न चरण होते हैं
1.सर्वप्रथम हमें ये समझना है कि व्यक्ति की कामनाएँ उसके इन्द्रियों से व्यक्त होती हैं। वाह्य जगत से हमारा सम्पर्क हमारी इन्द्रियाँ ही कराती हैं। इन इन्द्रियों के कारण ही कामनाएँ अपनी अभिव्यक्ति कर्मरूप में अभिव्यक्ति पाती हैं।  हम अपने राग द्वेष यानी like-dislike के प्रभाव मरीन होते हैं और उसी के अनुसार कर्म करते हैं। हम नहीं समझ पाते हैं कि क्या सही क्या गलत है बल्कि हम तो अपने राग और द्वेष के वशीभूत होकर कर्म किये जाते हैं।
2.इन्द्रियाँ मन से नियंत्रित होती हैं। जब किसी विषय में डूब जाते हैं, जब हम इन्द्रियों के विषय को पूर्णतः राग-द्वेष से ही निर्धारित करते रहते हैं तो इन विषयों के प्रति हमारा राग और द्वेष(like & dislike) उस विषय के प्रति प्रेम और घृणा (love & hate) में बदल जाते हैं और हम उन विषयों से अपने लगाव या विलगाव के प्रति घोर आसक्ति से भर जाते हैं।
3.तब हमारे कर्मों को तार्किक शक्ति प्रदान करने के लिए हम बुद्धि के स्तर पर अपने विषयों के प्रति अनुराग या विराग को तर्क का जामा पहनाते हैं, चाहते हैं कि हम अपनी बुद्धि से अपने अनुराग या विराग को सही ठहरा सकें।
      अतएव यदि हम कर्म के पथ से भ्रष्ट होना बचना चाहते हैं तो
1.सर्वप्रथम इन्द्रियों के विषयों से अनुरक्ति और विरक्ति दोनों से बचना होगा, कर्म लाइक और डिसलाइक से नहीं सही और गलत के दृष्टिकोण से करना चाहिए।
2.राग और विराग से अप्रभावित न होकर मन के स्तर पर इनके प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहिए ताकि मन में किसी के प्रति प्रेम या घृणा के भाव न होकर, समदर्शी हों।
3. इन्द्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण के लिए बुद्धि के स्तर पर कुतर्क गढ़ने से बचें।
   इन तीन चरणों को क्रमिक रूप से अपनाने से व्यक्ति विषय, मन और बुद्धि के राग द्वेष से मुक्त होकर अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा को प्राप्त हो पाता है, उसके कर्म कर्मयोग के रास्ते हो पाते हैं।
           इस शिक्षा को द्वितीय अध्याय में श्रीकृष्ण बहुत अच्छे ढंग से व्यक्त कर चुके हैं। बेहतर समझ के लिए उस अंश को हम यँहा पुनः दुहराना चाहेंगे।
श्लोक 60 की व्याख्या

इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक  से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।


    लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।


      हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी  इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे।  श्रीकृष्ण  समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है। 

श्लोक 61 की व्याख्या

उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।


        हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द  हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।


      अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी ।  इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।


      उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।

श्लोक 67 की व्याख्या

आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ  मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और  इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि  लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।

श्लोक 68 की व्याख्या

इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
                ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्यायः
 ॥3॥





     





     









                      






     


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