श्रीमद्भागवद्गीता -एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 2
Srimad Bhagavad Gita -A Practical Training -Chapter
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The practice of seeing one's own doubts through the guise of Arjuna's doubts in Shrimad Bhagwat Geeta
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Interpretation----Rahul Ramya
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After blowing the conch shell, before the actual battle, Arjuna wants to personally inspect the armies of both sides to assess himself for the war. Actually, when any sensible person wants to solve a problem, or whenever he wants to face a situation, what will he do first? First of all, he will examine every aspect of the problem, he will want to assess the strengths and weaknesses of each aspect. Only after that he will decide his strategy. Going headlong into the problem without understanding it is nothing but sheer stupidity. Even the biggest problem, the most powerful person has a weak side, by dealing with which a person can defeat that biggest problem or the most powerful person, and he also defeats them. Arjuna is ready for the war, but he wants to weigh the overall strength of the side he has to fight so that he can fight easily. It is also important to identify the companions of your opponent so that you know who and what kind of people your enemies are. Similarly, when you set out to solve a big problem, you should know what kind of other problems may come your way. So Arjun is keen to understand every side of the opponent. The truth is that if you really want to try, then your strategy must include these things. And this applies to every aspect of life.
And it is also true that when your own evil, your own bad qualities, start surrounding you, then you have to carefully identify which are those bad qualities that are surrounding you. Only then will you find a way to get rid of them, to overcome them. It is important to examine every disease of the patient before giving medicine. One should keep in mind that bad qualities always surround you in groups, they never come alone.
Now see, here the word Kapidhwaj has been used for Arjun. According to the story of the war, Hanuman ji lives on Arjun's chariot. Hanuman is considered to be the most intelligent and powerful character in the entire story world. Also the most virtuous. The meaning is clear that when you go to deal with big problems, your body should be healthy, your intellect should be of excellent level and your character should be clean. In the absence of these three important factors, your efforts will fail. These three give you unbeatable power.
इसीप्रकार हम देखते हैं कि कृष्ण के लिए अच्युत सम्बोधन का प्रयोग हुआ है और ये प्रयोग अर्जुन के द्वारा किया गया है। रथी अपने सारथी को अच्युत कह रहा है अर्थात जिसका पतन नहीं हो सकता हो। श्रीकृष्ण अर्जुन के फ्रेंड, फिलॉस्फर और गाइड की भूमिका में हैं और अर्जुन को उनपर इतना भरोसा है कि वो मानता है कि श्रीकृष्ण का पतन नहीं हो सकता अर्थात श्रीकृष्ण उसे कभी गलत सलाह नही। दे सकते। जीवन में। हम सभी को ऐसे ही मित्र होने चाहिए जो हर परिस्थिति में हमें सही सलाह दे सकें और जिनपर हमें भरोसा भी हो और जिनके प्रति हमारे मन में सम्मान भी हो। कठिन समय में इस तरह के मित्र की जरूरत ज्यादा होती है। बुरे व्यक्ति के मित्र भी बुरे ही होते हैं जबकि अच्छे व्यक्ति के मित्र अच्छे होते हैं।
श्रीकृष्ण अर्जुन के कहे अनुसार रथ को दोनों सेनाओं के मध्य ले आकर खड़ा करते हैं। अर्जुन को गीताकार ने गुडाकेश नाम से सम्बोधित किया है। गुडाकेश का अर्थ है जिसने निंद्रा पर विजय प्राप्त कर लिया हो। यह वर्णन युद्ध क्षेत्र का है सो युद्ध के अनुरूप अर्जुन के जो गुण हैं उनका वर्णन गीताकार के द्वारा यथा स्थान किया गया है। निंद्रा को कठोर परिश्रम से ही जीता जा सकता है। निंद्रा अंधकार का प्रतीक है, मन मस्तिष्क के सुप्तास्था का परिचायक है । निंद्रा के समय हमें बोध नहीं होता, हम सचेत नहीं होते। लेकिन युद्ध क्षेत्र में निरन्तर सजग और सावधान रहने की जरूरत होती है। यह तभी सम्भव है जब हम निंद्रा पर जीत हासिल कर पाएं हों। कभी भी , कँही भी जब हम बड़ी चुनौती से आपने सामने होते हैं तब हमारी सजगता अति उच्च स्तर की होनी ही चाहिए। थोड़ी भी शिथिलता मंहगी पड़ सकती है, समस्या किसी भी कोने से अचानक आकर हमें घेर ले सकती है, सो हम निशिन्त होकर आरामतलबी होने का जोखिम नहीं ले सकते। सो इन तरह की स्थितियों में हमें गुडाकेश ही होना होगा। बड़ी चुनौती से हम तभी निपट सकते हैं जब हमारा परिश्रम, हमारी सजगता अति उच्च स्तर की हो।
निंद्रा यानी चेतना का अभाव तब भी होता है जब हमारी बुराइयाँ हमारी अच्छाइयों को ढँक लेती हैं और हम अपने दुर्गुणों के व्यसन में डूब अच्छे बुरे के भान से अनजान बन जाते हैं। इसके उलट यदि हम अपनी अच्छाइयों के बल पर हैं तो फिर हमारे सद्गुण हमें हमेशा सजग रखते हैं कि हम कँही भी , कभी भी अपनी अच्छाई से गिर कर दुर्गुणों के अंधकार में न चलें जाएँ। यहॉ सजगता हमें हमारे महान उद्देश्य में सफल बनाती है।
अर्जुन वीर होने के साथ साथ विवेकी और सच्चरित्र भी है, उसे अपने दुर्गुणों को काट कर अपने सदगुणों को बढाने आता है। इस दृष्टि से भी अर्जुन गुडाकेश है। हमें भी इस प्रकार निंद्रा विजयी यानी दुर्गुणों का विजेता होना चाहिए।
अब देखिए श्रीकृष्ण अर्जुन के रथ को कँहा ले आकर खड़ा करते हैं। दोनों पक्षों के बीच ठीक भीष्म और द्रोण के समक्ष। यदि कृष्ण चाहते तो रथ दुर्योधन के सम्मुख भी खड़ा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे सीधे भीष्म और द्रोण के सामने अर्जुन को ले आये। यदि सामने दुर्योधन रहता तो कदाचित गीता वाचन का अवसर भी नहीं आता और सीधे युद्ध प्रारम्भ हो जाता। दुर्योधन और अर्जुन दोनों के मन में एक दूसरे के प्रति घोर वैर था। दुर्योधन ही वह प्रमुख कारक था जिसके कारण पांडवों को इतने कष्ट उठाने पड़े थे। लेकिन तब जो युद्ध होता उसमें धर्म का कोई स्थान नहीं होता। वह युद्ध दुर्योधन के लालच रूपी अधर्म और अर्जुन के बदले की भावना रूपी अधर्म के बीच होता जिसमें मूल्यों का कोई स्थान नहीं होता। तब बुराई से अच्छाई नहीं लड़ रही होती बल्कि एक बुराई दूसरे बुराई से लड़ रही होती। इसके परिणाम स्वरूप बुराई ही अंत परिणाम के रूप में सामने आती। हम एक कि बुराई को दूसरे की बुराई से नहीं हरा सकते, क्योंकि कोई भी बुराई का परिणाम अच्छाई नहीं होती। तब एक कि बुराई दूसरे की बुराई से बस स्थान्तरित हो जाती है। एक अधर्म का स्थान दूसरा अधर्म ले लेता है। लालच और बदले की भावना में क्या हो जाता यदि एक का लालच हार ही जाता तो। बस यही होता कि बदले की भावना जीत कर प्रतिशोध का साम्राज्य कायम कर देती। तब वैमस्य का कँहा अंत होता। तब ये युद्ध धर्म युद्ध होता ही नहीं। हमें कभी भी एक बुराई को हराने के लिए दूसरे बुराई का सहारा नहीं लेना चाहिए।
सो कृष्ण अर्जुन को भीष्म और द्रोण के समक्ष ले जाते हैं। यँहा दोनों के बीच कोई वैमस्य नहीं है। यँहा एक सम्भावना है कि अर्जुन को अपने आदरणीय अंग्रजो को देख कर अपनी करुण भावनाओं , अपने मोह से संघर्ष करना पड़े। जब हमारे स्वजन, हमारे आदरणीय गलती करते हैं तो हम मोह वश उनकी गलतियों से आँख मोड़ना चाहते हैं। लेकिन ऐसा कर हम बुराइयों को प्रश्रय ही देते हैं। एक प्रकार से अधर्म के बढ़ोतरी में सहायक ही होते हैं। सो जब हमारे अंदर अच्छाई और बुराई का संघर्ष हो तो हमारी समझ इतनी होनी चाहिए कि हम बुराई का साथ न दें। यही बात हमारे कार्यक्षेत्र में भी लागू होती है। जो गलत के रास्ते पर है या जो अधर्म के रास्ते पर है, भले ऐसा करने वाला हमारा कितना भी प्यारा क्यों न हो, भले हमारा अपना ही अंग क्यों न हो, हमें अपनी मानसिक अवस्था इतनी मजबूत रखनी चाहिए की हम उसके बुराइयों का प्रतिवाद और प्रतिकार कर सकें।
भीष्म भ्रम और द्रोण गुरु होने के नाते द्वैत के प्रतीक हैं। अच्छे और बुरे के संघर्ष में अच्छाई का पहला सामना भ्रम से होता है। यह भ्रम अच्छाई को अपने मोह पाश में लेकर उसकी मति मारना चाहता है। तरह तरह के तर्क देता है, भय, लालच, अहंकार, असत्य , हिंसा इत्यादि को जन्म देता है। दूसरी तरफ गुरु हमें इस बात का भान दिलाता है कि यदि हमें जीत हासिल करनी है तो हमें सन्मार्ग पर बढ़ने का रास्ता चुनना होगा। जब भी हम बड़ी चुनौतियों से दो चार होते हैं तो सबसे पहले हमें अपने भ्रम को मारना होता है। हमारा लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। अच्छाई के प्रति, सही के प्रति हमारी परतबढता अटूट होनी चाहिए। श्रीकृष्ण अर्जुन को एक मौका देते है कि भीष्म यानी भ्रम के बहाने अर्जुन मोह से दूर होकर सत्य के प्रति परिबद्ध हो सके। अर्जुन का रथ भीष , द्रोण और पृत्वी के समस्त राजाओं के मध्य खड़ा है। हमारे सामने अभी अच्छी और बुरी प्रवृत्तियाँ खड़ी हैं । जरूरी है कि हम अपनी प्रतिबद्धता अच्छाई के प्रति साबित कर सकें। हर बड़ी चुनौती सामबे आने पर हम सभी के सामने ऐसी हो परिस्थिति रहती है। यदि हम सत्य के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमारी मानसिक स्थिति भ्रम को काटने वाली होंनी ही चाहिए। किंकर्तव्यविमूढ़ता को हराये बिना हमारी नजर साफ ही नही हो पाती। श्रीकृष्ण अर्जुन को अच्छाई और बुराई के इस महाभारत में बुराई से लड़ने के लिए उज़के गुणों से तैयार करना चाहते हैं। हमें बुराई को हराने के लिए, अनीति को हराने के लिए सिर्फ शरीर से ही नहीं विवेक से भी मजबूत होना होता है और ये तभी होता है जब हम बुराई के बतरंजाल से उससे सीधे सीधे उलझ कर बाहर आते हैं।
अर्जुन के लिए पार्थ सम्बोधन श्रीकृष्ण प्रयोग में लाते हैं। कुंती का एक नाम पृथा भी है, अर्जुन को उसके माँ के नाम से जोड़कर श्रीकृष्ण सम्बोधित करते हैं। यानी माँ कुंती के सारे गुण अर्जुन में भी हैं ये इस तथ्य का प्रतीक है। पृथा पार्थिव का भी द्योतक है यानी जो मिट्टी का बना है अर्थात जो नाशवान है। मतलब जब जब हम अपने इस मिट्टी के नाशवान शरीर को ही बुराई से लड़ने का साधन बना लेते हैं तब हम पार्थ हैं। हमारा शरीर ही वो रथ है जिसपर सवार होकर हम सन्मार्ग पर चलते हैं।
अब देखें, अर्जुन को ये प्रेरणा कौन दे रहा है। ये प्रेरणा हृषिकेश दे रहे हैं यानी जो इन्द्रियों के स्वामी दे रहें हैं। मतलब की हमारी प्रेरणा का मूल स्रोत हमारा विवेक ही है। यही बतलताता है कि हमे क्या करना है, कैसे करना है, कब करना है।
फिर श्री कृष्ण कहते हैं, युद्ध के लिए जूट हुए इन कौरवों को देख पार्थ। यानी अर्जुन को देखने का निर्देश श्रीकृष्ण दे रहें हैं। हमने पूर्व में देखा है कि कौरव पक्ष में ये निर्देश दुर्योधन देता है। वह अहंकार और बेचैनी में गुरु द्रोण को पांडवों वीरों को देखने के लिए कहता है। लेकिन इसके विपरीत यँहा हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण जो इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश हैं, विवेकी हैं वो अर्जुन को कह रहे है समस्त कुरुओं यानी कौरव और पांडव दोनो। को देखने के लिए कहते हैं। कौरव और पांडव दोनों ही कुरुवंशी ही हैं। श्री कृष्ण दुर्योधन की तरह योद्धा विशेष का नाम नहीं गिनाते। विवेक स्वाभाविक रुक से इंसान को यही समझाता है कि कोई भी कार्य करने के पूर्व उससे जुड़ी अच्छाई और बुराई, उससे जुड़े सद्गुण और दुर्गुण, उससे जुड़े सही और गलत दोनों को देखे। यदि हम कुछ करने जा रहें हैं तो हमें ठहर कर हर पक्ष का ठीक से अवलोकन कर लेना चाहिए। अन्यथा हम सही और गलत का निर्णय नहीं कर सकते और ऐसी स्थिति में सफलता के लिए कुछ भी गलत सही करने के लिए तैयार तैयार हो जाएंगे जिसके कारण बहुत ही विनाशकारी परिणाम भी हो सकते हैं। श्रीकृष्ण का निर्देश विवेक का निर्देश ही तो है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन के रथ को अर्जुन के कहे अनुसार लेजाकर दोनों पक्षों की सेनाओं के मध्य खड़ा कर दिया ताकि अर्जुन दोनों पक्ष की सेनाओं का निरीक्षण कर सके और अपने ही कहे अनुसार यह देख सके कि दुर्बुद्धि दुर्योधन का साथ देने के लिए कौन कौन लोग आए हैं। उद्देश्य स्पष्ट है कि अर्जुन वास्तविक युद्ध शुरू होने के पहले मित्र और शत्रु के बल का वस्तुनिष्ठ आकलन कर लेना चाहता है । श्रीकृष्ण रथ खड़ा कर उसे निदेश भी देते हैं कि देखो यानी आकलन करो। और अर्जुन क्या आकलन कर लेता है ? अर्जुन को शत्रु सेना में अपने परिजन और मित्र दिखते हैं।
यह एक वास्तविक मानसिक स्थिति होती है जिससे हम सभी गुजरते हैं, प्रतिदिन गुजरते हैं। हम सिद्धान्त तौर पर गलत को गलत कहते ही हैं लेकिन जब उस गलत को खत्म करने की हमारी बारी आती है तो हम कन्नी काटने लगते हैं कि फलाना गलत कार्य, फलाना अपराध तो मेरे अपने व्यक्ति ने किया है तो अब मैं क्या करूँ। अपनों की आड़ लेकर हम न्याय से , सत्य से भागते हैं। तरह तरह के तर्क गढ़ते हैं जैसा कि अर्जुन आगे के श्लोकों में गढ़ता है। अपराध या गलत अपराध या गलत ही होता है, कौन किया अपने किये कि पराये ये मायने नहीं रखता। लेकिन हमारा मन मोह में फंसा अपने और पराये के भेद में उलझ जाता है। न्याय की हमारी सैद्धान्तिक समझ वास्तविकता के धरातल पर आकर अपने और पराये कर्ता के आधार पर भेद करने लगती है। और तब हम न्याय का , सत्य का, धर्म का पक्ष नहीं ले कर पलायन करने लगते हैं। नतीजा कि अन्याय तो बढ़ता ही है हमारी अपनी नैतिक स्थिति , हमारा न्याय का पक्षधर होने की अपना नैतिक बल कमजोर होने लगता है।
जब हम मोहवश अनिर्णय की स्थिति में होते हैं तो कार्य प्रारम्भ करने से डरते हैं , सो अर्जुन की तरह हम भी भयभीत और विषादग्रस्त हो जाते हैं। हमें पता होता है कि सामने वाले ने गलत किया है, लेकिन ये भी सोचते हैं कि गलत करने वाला तो मेरा अपना ही है तो फिर उसे दण्डित कैसे करें। हम अधर्म , अन्याय, गलत, दुर्गुण, बुराई के और उसके दुष्परिणाम के बारे में भूल जाते हैं और उसे करने वाले के यानी उस अधर्मी, अन्यायी, गलत, दुर्गुणी,और बुरे व्यक्ति के जिसे हम अपना ही समझते हैं उसके कल्याण के बारे में सोचने लगते हैं। परिणाम ये होता है कि अधर्म, दुर्गुण, बुराई, गलत ये सब और मजबूत होते जाते हैं। और हम अनिर्णय के कारण अपने सद्गुणों को अपने ही मोह से मारकर हताश , निराश , व्यथित, दुखी हो कर बैठ जाते हैं, अक्रियाशील हो जाते हैं। व्यवहार का सिद्धांत से विलगाव निराशा का जन्मदाता होता है।
हमारे अंदर अच्छी और बुरी दोनों प्रवृत्तियाँ होती हैं। जब हम चुनौती स्वीकारते हैं तो दोनों हमें प्रभावित करना चाहती हैं। जैसे ही हमपर भ्रम और भ्रम जनित मोह हावी होता है हम सत्य, अच्छाई के मार्ग से हट जाते हैं। अगर वस्तुतः हम अच्छी सोच के व्यक्ति हैं और मोहवश गलत के फेरे में पड़ जाते हैं तो मानसिक रूप से यानी आत्मिक तौर पर तार तार हो जाते हैं। ये हमपर ही निर्भर करता है कि हम गलत करने का साथ देंगे सिर्फ इस आधार पर कि वो मेरा अपना है , उसे दंडित करने से मेरा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा या गलत का विरोध कर उससे संघर्ष करेंगे।
हर चुनौती के समय ये प्रश्न विकराल रूप में हमारे सामने आता है । भ्रम वश मोह में उलझ कर अवगुणी व्यक्ति भी अपने अवगुण के कारण हमारा शत्रु न लग कर हमसे अपने सम्बन्ध के कारण हमारा मित्र अथवा अपना स्वजन लगने लगता है।
तो क्या हम आप किसी अपराधी को सिर्फ इसलिए माफ कर दें कि अपराध की प्रकृति चाहे जो हो चूँकि अवराधि मेरा अपना है सो उसका विरोध नहीं किया जाए। तब तो खत्म हो गए सारे अधर्म, अपराध, अवगुण, असत्य, और दुर्गुण।
अब हम पुनः इस मूल श्लोक पर लौटते हैं थोड़े फ्लैशबैक के साथ। अर्जुन हाथ में धनुष उठाये हुए है और श्रीकृष्ण से अपने रथ को दोनों सेनाओं के मध्य लेकर चलने को कहता है ताकि वो दुर्योधन और उसके मूर्ख मित्रों को देख सके। श्रीकृष्ण ऐसा करते भी हैं। स्पष्ट है कि अर्जुन युद्ध के लिए तैयार है, उसके मन में कोई संशय नहीं है, कोई असमंजस नहीं है। लेकिन जैसे ही वह शत्रु पक्ष को देखता है उसे शत्रु पक्ष सेना की तरह नहीं स्वजनों के समूह की तरह लगता है। जब भी हम भ्रम में पड़ते हैं मोह का जन्म होता है, मोह से माया उतपन्न होती ही है जिसके परिणाम में अपने और पराये का बोध होता है।
तो फिर दुर्योधन को ऐसा क्यों नहीं हुआ? वह भी तो पांडव पक्ष को देख रहा था लेकिन उसे तो पांडवों में अपने शत्रु ही दिखे, परिजन नहीं। वस्तुतः ये हमारे गुणों के स्तर और उससे प्राप्त ज्ञान में फर्क के कारण है।
दुर्योधन के अंदर हमेशा ही आसुरी गुण यानी क्रोध, अहंकार, लालच, असत्य, हिंसा के भाव रहते हैं। इस तरह के व्यक्ति के अंदर सत्य के अन्वेषण की प्रवृत्ति नहीं होती। तभी तो युद्ध के मैदान भी वही अपने गुरु को निर्देश दे रहा है। जिसे सत्य की कामना ही नहीं वो भला सत्य के मार्ग में आने वाली कठिनाई की चिंता क्यों करें। यदि अज्ञानी को अपने अज्ञान पर ही अहंकार हो तो फिर उसे मार्गदर्शक, या सलाहकार की क्या जरूरत। उसके विपरीत अर्जुन वीर होने के साथ ज्ञानी भी है। उसे लगता है कि स्वजनों से अपने हित पूर्ति के लिए लड़ना स्वार्थ परक हिंसा है। सो वो भ्रमित होता है और सेना में उसे स्वजन और मित्र दिखते हैं। ये और बात है कि उसका ज्ञान अधूरा है। जब हम सत्य के मार्ग पर बढ़ते हैं तभी हमारे दुर्गुण हमपर हमला कर हमें भ्रमित करने की कोशिश करते हैं। जो हमेशा भ्रमित और अवगुणों के सहारे है वो फिर भला कभी सोच भी सकता है क्या?
यही वो मनःस्थिति होती है जब गीता के ज्ञान की आवश्यकता शिद्दत से महसूस होनी शुरू होती है। लेकिन ज्ञान उसी को मिलता है जिसे इसकी चाह होती है। आगे देखेंगे अर्जुन को चाह थी सो गीता का सानिध्य मिला। हमें होगी तो हमें भी मिलेगा, अन्यथा हम भी दुर्योधन ही बने बने समाप्त हो जाएंगे।
आप कोई कार्य प्रारम्भ करने वाले हों , उसी समय उस उस कार्य के प्रति आपको भ्रम हो जाये, तो आपकी मानसिक स्थिति कैसी हो सकती है? यदि आप उत्साह से भरकर अपराधी को दण्डित करने वाले हों उसी समय आपको ज्ञात हो/आभास हो कि ये अपराधी तो आपके ही परिवार के सदस्य हैं तो आपकी मानसिक स्थिति क्या होगी?
युद्धक्षेत्र के बीच खड़ा अर्जुन इसी तरह की स्थिति में फँस गया पाता है अपने आपको। विपक्ष उसे शत्रु के रूप में नहीं दिख रहा है। कँहा तो वो युद्ध में शत्रुओं को हराकर अपना राज्य वापस पाने चला था गांडीव थामे और कँहा उसे विरोधी के रूप में स्वजन और मित्रगण ही दिख रहे हैं। जब अपराधी में स्वजन और मित्र दिखने लगे, जब गलत और दुर्गुणी व्यक्ति के दुर्गुण नहीं दिखे, उनका अधर्म और अपराध नहीं दिखे बल्कि इसके बदले सम्बन्ध दिखने लगे तो क्या हम में से कोई वस्तुनिष्ठ हो सकता है, क्या हमसे आपसे न्याय की उम्मीद की जा सकती है? चेहरा देख कर, अपना पराया के आधार पर , मित्रता शत्रुता के अनुसार धर्म, सद्गुण,न्याय का पक्ष नहीं लिया जा सकता है। किसी का अवगुण, किसी का अपराध, किसी का अधर्म, किसी का अन्याय सिर्फ इसलिए क्षम्य कैसे हो जा सकता है कि वो व्यक्ति हमारा मित्र या परिवार का है? तब तो न कुछ धर्म होगा न अधर्म।
लेकिन अर्जुन इसी का शिकार हो जाता है युद्ध के मैदान में।उसे अधर्मी ,अन्यायी, अपराधी में अपने स्वजन और मित्र दिखते हैं। जब हमें सत्य की समझ पूरी तरह से नहीं हो, जब हमारा ज्ञान अधूरा हो, जब विवेक का जोर नहीं चल रहा हो तब ऐसा वयक्ति भ्रम में पड़ता ही है।
सत्य धारण करने का दम्भ भरते भरते जब हम अधर्म के मार्ग पर बढ़ जाते हैं तो हमारा बल, हमारी शक्ति क्षीण होने लगती है, पहले मन मस्तिष्क साथ छोड़ता है, फिर शरीर भी शिथिल होने लगता है। अभी तो अर्जुन कौरवों से युद्ध करने के लिए उत्साहित हो कर सैन्य निरीक्षण पर निकला था कि उसके अंदर अपना पराया का भ्रम आ गया। इस भ्रम बे उसकी बुद्धि को भ्रष्ट किया। हर जगह यही होता है। जैसे ही सत्य के प्रति भ्रम होता है, सबसे पहले बुद्धि और विवेक का पतन होता है। इससे मन के अंदर डर जन्म लेता है। ये डर खुद के अंदर होता है न कि बाहर। अर्जुन अपने युग का महानतम योद्धाओं में शामिल था लेकिन सत्य के प्रति जैसे ही उसे भ्रम होता है उसकी शक्ति क्षण भर में क्षीण हो जाती है। शक्ति सत्य में होता है, शरीर में नहीं। निडरता तभी तक साथ देती है जब तक हम सत्य के साथ खड़े होते हैं। दैनिक जीवन के किसी भी उदाहरण को उठा कर देख लीजिए, जब कभी आप झूठ का सहारा लेते हैं, जब कभी आप अन्याय का साथ देते हैं , जब कभी आप गलत काम का समर्थन करते हैं आप खुद को अपने ही अंदर कमजोर पाते हैं, मन ही मन डरे हुए होते हैं, आपका आत्मविश्वास डिगा रहता है।
सच जानने वाला यदि सच से मुँह मोड़ता है तो उसका पतन उस आदमी से भी अधिक होता है जो शुरू से ही असत्य के साथ है। जो शुरू से असत्य, अन्याय, अधर्म, और अवगुण यानी आसुरी शक्तियों के साथ है उसका भला क्या पतन होगा, गिरा हुआ कँहा गिरेगा, सो दुर्योधन को भला क्या अज्ञान का डर होता। लेकिन जिसने हमेशा असत्य, अन्याय, अधर्म, अवगुण का विरोध किया हो वो अगर भ्रमवश सत्य से विचलित होता है तो वो तो गिरेगा हीं, निश्चित गिरेगा, उसके भी हाथ पैर काँपने लगेंगे, मुँह सूखने लगेगा, दिमाग सुन्न पड़ने लगेगा। यही तो अर्जुन को हो रहा है। उसकी माया, उसके मोह उसकी शक्ति को खाय जा रहें हैं। इसी स्थिति में इंसान मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगता है। और अज्ञान को ही ज्ञान बताकर विरोधाभाषी तर्क करना प्रारम्भ कर देता है यानी कुतर्क पर उतर आता है। वह भोग और सन्यास को एकसाथ भोगना चाहता है। इस स्थिति में गिरा आदमी चाहता है कि उसे कोई कार्य होने का जिम्मेदार भी न माने और उसे उस कार्य का फल भी भोगने को मिल जाये। उसका अपना कोई अधर्म, अन्याय करे तो उसे वो दंडित न करे लेकिन उसे ही धर्म और सत्य का मीठा फल भी मिल जाये। वाह! ऐसा सोचने वाला पतनशील नही तो क्या कहलायेगा भला!
अर्जुन की हालत मनोरोगी की हो रही है। जब भी धर्म, न्याय, देवी गुणों, (सद्गुण) और सत्य के रास्ते चलने वाला किसी परिस्थिति विशेष में ज्ञान के अभाव में सत्य , धर्म , न्याय के प्रति भ्रम में पड़ता है किसी कारण वश तो विवेक और बुद्धि और उन्ही से नियंत्रित शरीर भी भय से व्याकुल हो उठते हैं।
मोह से पीड़ित व्यक्ति की मानसिक स्थिति बिगड़ती जाती है, वो अधीर, चंचल, अस्थिर, व्याकुल होकर शक्तिहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसमें शारीरिक बल भी नहीं रह जाता। मन से कमजोर इंसान शरीर से भी प्रतिकार करने लायक नहीं रह जाता। यही कारण है कि हर प्रतिद्वंद्विता और प्रतिस्पर्द्धा में पहले विरोधी के मानसिक बल को तोड़ने की रणनीति बनाई जाती है और माना जाता है कि यदि आप प्रतिद्वंद्वी को मानसिक स्तर पर हरा देते हैं तो फिर शारीरिक स्तर पर हराना मात्र औपचारिकता भर होता है। दुर्गुण यानी आसुरी शक्तियाँ भी दैवी गुणों(सद्गुणों) के साथ की लड़ाई में यही करती हैं। आसुरी गुण यानी दुर्गुण झुण्ड में व्यक्ति के बुद्धि विवेक पर आक्रमण करती हैं। भ्रम, मोह, माया, क्रोध, निराशा, अहंकार ये सभी एक साथ हमारे विवेक को घेरती हैं, नतीजा ये निकलता है कि यदि हमारे सद्गुण कमजोर पड़े तो हम हतोत्साहित होकर मानसिक रोगी की तरह आचरण करने लगते हैं। तब हम अपनी स्थिति को सही ठहराने के लिए अपने ही विवेक से कुतर्क करना शुरू कर देते हैं। सत्य से भागा हुआ मन सामाजिक रूप से ये तो नहीं स्वीकारता कि वो असत्य और अन्याय का साथ दे रहा है किंतु उसके तर्क घुमा फिरा कर यही कहते हैं।
मोह से विचलित अर्जुन की भी यही स्थिति है। अपराध , असत्य, अन्याय को सिर्फ इस आधार पर माफी देने का मोह कि दोषी उसके परिवार के और मित्रगण हैं को अर्जुन सीधे सीधे नहीं स्वीकारता बल्कि कई तरह के कुतर्क देता है। उसे ज्ञान नहीं है लेकिन वह दिखाना चाहता है कि वह बड़ा ज्ञानी है।
अर्जुन के तर्कों का सारांश यही है कि जिनसे युद्ध करना है वो सभी उसके स्वजन हैं , मित्र हैं जिन्हें मारना उचित नहीं है। वह यह तर्क भी देता है कि यदि स्वजनों को गँवा कर राज्य मिल भी जाय तो ऐसे राज्य के भोग का वह क्या आनंद उठा पायेगा। उसे लगता है कि सुख और आनंद बाँटने के लिए उसके स्वजन और मित्र ही न हो तो फिर राज्य जीतने का क्या लोभ। इससे अच्छा तो उन्हें नहीं मारना है भले वे अर्जुन को मार डालें। अर्जुन यँहा तक कह जाता है कि उसके ये स्वजन भले ही आतताई हों लेकिन उन्हें मारने से तो अपने ही कुल का नाश होगा जिससे सुख नही मिलेगा। सो अर्जुन युद्ध से इनकार करता है।
इस प्रकार अर्जुन तर्क पर तर्क दिए जा रहा है और कृष्ण कुछ बोल ही नहीं रहें हैं। अर्जुन के इन तर्कों का यदि परीक्षण करें तो कई तथ्य खुलकर सामने आते हैं।
अर्जुन की नजर में अपराध से ज्यादा महत्व अपराधी का है। यदि अपराधी अपने कुल परिवार का है तो उसके सारे खून माफ कर दिए जाने चाहिए। यँहा तक कि यदि अपने कुटुम्ब के लोग आतताई भी हों अर्थात ऐसे लोग जो अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के साथ अन्याय पूर्वक हिंसा करते हों तब भी उन्हें सिर्फ इसलिए छोड़ देना चाहिए कि वे अपने परिवार के हैं, अपने मित्र, दोस्त, सम्बन्धी हैं। इस प्रकार अर्जुन एक ऐसी व्यस्था का समर्थन करने में लगा है जँहा न्याय पीड़ित को नहीं पीड़ा देने वाले को दिए जाने का सिद्धांत होता है। यदि कोई अपराधी आपके पिता की हत्या कर देता है और वो हत्यारा किसी मजबूत का कोई सम्बन्धी है तो उसे सजा नहीं दी जाय। ईद प्रकार लगातार अपराध की श्रृंखला तैयार होती जाएगी। लेकिन सम्बन्धों के मोह में पड़ा व्यक्ति निर्लज्जता से इस तर्क के पक्ष में खड़ा मिलता है। अर्जुन शासक वर्ग से आता है जिसे दण्ड देने का अधिकार है। यदि शासक ही ऐसा मानेगा तो प्रजा का क्या हाल होगा आप खुद अनुमान कर लें। लेकिन मोह से घिरा मन इस अनीति इस अन्याय को नहीं समझ कर इसे ही नीति का नाम दे देता है। राजनीति की ये धारा आज भी है क्योंकि मोह तो आज भी जिंदा है। जँहा मोह होगा वंही अन्याय का वास भी होगा। ऐसी स्थिति से समाज में अनाचार का प्रभुत्व बढ़ेगा, अपराध और अन्याय बढ़ेगा। हम सभी अपने अपने मोह में यही करते रहते हैं। अपनी अपनी स्थिति, अपने अपने हैसियत के अनुसार अपने परिजनों और मित्रों के कुकर्मों को नजरअंदाज करते रहते हैं। नतीजा में एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था का निर्माण होता है जिसमें बेखौफ अपराधियों का भाई भतीजेवाद के बल पर प्रभुत्व कायम रहता है और सामान्य जन इन चंद लोगों के रहमो करम पर रहने के लिए विवश होते हैं। इस सोच से घोर अस्मांतावादी समाज बनता है जिसमें ताकतवर के सभी दोष सिर्फ इसलिए माफ कर दिए जाते हैं क्योंकि उसका सम्बन्ध सत्ता में बैठे लोगों से होता है। परिणामतः समाज में हर तरह के अपराध, अन्याय, असत्य अवगुण का राज स्थापित हो जाता है। अनीति को, अन्याय को , अत्याचार को बर्दाश्त करने की सीख अर्जुन दे रहे होते हैं। जब हम अन्याय, अनाचार , अत्याचार को बर्दाश्त करते हैं तो हम उनको बढ़ावा दे रहें होते हैं। अन्याय के प्रति सहनशीलता समाज में अराजकता को जन्म देती है। सो ये जरूरी होता है कि अन्याय, अत्याचार , अधर्म और अनीति को बर्दाश्त नही कर उनका सक्रिय प्रतिकार किया जाए ताकि समाज में नीति का राज और शांति की व्यवस्था कायम की जा सके।
दूसरी बात कि मोह से घिरा मन चालाकी से अपने अज्ञान को ही ज्ञान बताकर प्रचारित करता है। अर्जुन राज्य त्याग की बात कर ये दिखाता है कि वह तो महान त्याग परम्परा का सन्त है जिसे राज पाट से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि उसके अंदर तो सन्यास भाव है। हम में से कई लोग , विशेषकर समाज के ताकतवर लोग इस तरह का ढोंग खूब करते हैं और खुद को साधु, सन्त, फकीर कहते नही अघाते और गीताज्ञान से वंचित जनता उनके बहकावे में आकर उनपर भरोसा कर उनको पूजने भी लगती है। दरअसल ध्यान देने की बात है कि अर्जुन क्या तर्क दे रहा है। उसका कहना है कि बन्धु, बाँधवों, मित्रों को गंवाकर प्राप्त राज्य का वह क्या करेगा जब उसका सुख भोगने के लिए ये बंधु बाँधव मित्र ही न हो उसके साथ। मतलब साफ है कि अर्जुन को राज पाट तो चाहिए लेकिन दुर्गुणों से भरे दोस्त मित्र और सम्बन्धी भी चाहिए। या यूं समझें कि अर्जुन को राज पाट सब चाहिए बस उसके माथे इन इष्ट मित्रों परिजनों की हत्या का दोष न लगे। मतलब साफ है। गुड़ खाये, गुलगुले से परहेज करें! यह भला कौन सा सन्यास है जो सुविधा की शर्त पर टिका हुआ है। आज भी ऐसे ढोंगी सन्यासी खूब मिलते हैं जो इसी तर्क के बल पर समाज के औराधियो को संरक्षण देकर उसकी कीमत में भौतिक सुख सुविधा और सत्ता का सुख उनसे लेते हैं।
अर्जुन के इन तर्कों से समाज में अपराध और सत्ता के गठबंधन की नींव पड़ती है।
महाभारत का युद्ध आंतरिक युद्ध पहले है, बाहरी युद्ध बाद में है। हमारे अंदर की बुरी प्रवृत्तियाँ जब अच्छी प्रवृत्तियों पर हावी होती हैं तो भ्रम उनका अगुआ होता है जो मोह को हमारे विवेक के ऊपर छोड़ता है। अगर मोह हावी हुआ तो बुद्धि और विवेक अपना प्रभाव खो देते हैं। ऐसी स्थिति में इंसान का व्यवहार ठीक शब्दसः वही होता है जो अबतक हम अर्जुन का देख रहें हैं। उसकी मानसिक हालत और उसके कुतर्क भी वही होते हैं। ऐसा नहीं कि इसका प्रभाव सिर्फ युद्ध जैसी स्थिति में ही होता है। जीवन के हर मोर्चे पर हमारे अंदर हमारी ही बुराई हमारी ही अच्छाई से लड़ रही होती है और जब जब बुराई हावी होती है हम भी इसी मानसिक शारीरिक बौद्धिक स्थिति में गिर जाते हैं और कुतर्कों का जाल बुनने लगते हैं खुद को सही ठहराने के लिए।
श्रीकृष्ण अभी तक चुप हैं। उनका चुप रहना एक मनोवैज्ञानिक योजना का अंग है। जब एक अच्छा भला इंसान किसी वजह से विवेक खो दे तो उसे पहले जी भर कुतर्क कर लेने दें ताकि वो अपनी बात कह कर खुद को मानसिक रूप से हल्का कर सके। तब ही उसे समझाना उचित होता है, अन्यथा वह आदमी अनावश्यक वाद विवाद में पड़ा रहेगा और आपको भी खींचता रहेगा।
अर्जुन कृष्ण के मौन से परेशान सा हुआ लगता है। जब हम तर्क देते हैं तो चाहते हैं कि सामने वाला हमारे तर्क को समर्थन दे, बोलकर नहीं तो अपने हाव भाव से ही सही। लेकिन जब सामने वाला एकदम से कोई प्रतिक्रिया ही न दे तो हम क्या करते हैं? यदि हम थोड़े पढ़े लिखे हैं , थोड़ा बहुत अनुभव भी है तो खुद को बड़ा ज्ञानी साबित करने में लग जाते हैं और लगते हैं तर्क पर तर्क करने भले ही हमारा तर्क कुतर्क ही क्यों न हो।कम ज्ञान की भरपाई हम अधिक बोलकर, कुछ ऊँची आवाज में बोलकर, कुछ आलंकारिक भाषा में बोलकर पूरा करने की कोशिश करते हैं। कुरुक्षेत्र में हू ब बहू यही हो रहा है। अर्जुन लागातार तर्क पर तर्क दिए जा रहा है। अब वो क्या तर्क कर सकता है, इसे भी समझें। मन में भ्रम है, अत्याचारी, अधर्मी, अनाचारी, अन्यायी सम्बन्धियों के लिए मोह है, उनके प्राणों का मोह है, खुद अपने मन में सम्बन्धियों सहित राज पाट भोगने की लालसा है तब सोचिये कि अर्जुन क्या तर्क कर रहा होगा।
वह वही कह रहा है जो इस अवस्था में पड़ा इंसान करेगा। वो अपने तर्कों की शृंखला को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि सम्बन्धियों की मृत्यु से उसके कुल का विनाश हो जाएगा, और कुल नाश का पाप उसे लगेगा। मित्रों से युद्ध मित्रों से घात करना होगा। कुल का नाश होने से कुलधर्म खत्म हो जाएगा और सम्पूर्ण कुल में पाप का प्रभुत्व हो जाएगा। अर्जुन का मानना है कि सम्बन्धी चाहे आतताई ही क्यों न हों उनकी रक्षा होनी ही चाहिए ताकि कुल/परिवार चलता रहे। अर्जुन का धर्म सिखाता है कि अधर्म करने वाला अगर सम्बन्धी है तो उसी अधर्मी के बल पर कुल धर्म की रक्षा की जा सकती है। आप देख रहें हैं कि मोहग्रस्त अर्जुन जिसके पास अपने पक्ष में कोई तर्क नही है किस प्रकार निर्भीक हो कर कुतर्क कर रहा है। अर्जुन के अनुसार कुलधर्म ही सनातन धर्म होता है। सनातन धर्म की उसकी समझ उसे बताता है कि हमारा कुलधर्म ही सनातन है अर्थात ऐसा धर्म जिसका न कोई प्रारम्भ है न ही अंत। उसके अनुसार पारिवारिक परम्पराएँ ही धर्म कहलाती हैं, सनातन धर्म। अर्थात सनातन धर्म वही कुछ है जो हमारा परिवार हमें सिखाता है।
अर्जुन ये मानता है कि कुलधर्म के नाश और परिणामस्वरुप सनातन धर्म के नाश से पाप का प्रसार होता है। वह अधर्मी, अनाचारी , अत्याचारी, आतताई को दंडित करने को अधर्म मानता है और उनके नाश से सनातन धर्म के नाश का डर है उसे। उसे डर है कि आतताई के दाण्डित होने से पाप का प्रसार होगा!
आखिर अर्जुन जैसा शिक्षित, दीक्षित, सदाचारी, वीर इस तरह का कुतर्क क्यों करने पर उतारू हो चला है। दरअसल युद्ध तो हम सबके अंदर है,अर्जुन के भी अंदर है। वह स्वाभावतः वीर है सो शत्रु दल की सम्मलित शक्ति भी उसके वीरोचित शौर्य को नहीं हिला सकी थी। हम देखते हैं कि अर्जुन विरोधियों के बल से तनिक भी नहीं डरा है। लेकिन मन के अंदर चलने वाले अच्छे बुरे के संघर्ष में वह हारता हुआ दिखता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। वह कमजोर पड़ रहा है तो मन के कारण। उसके अंदर की बुराई उसकी अच्छाई पर भारी पड़ रही है। हम सभी के अंदर दैवी गुण(सद्गुण) और आसुरी गुण ( अवगुण) होते हैं। इन गुणों की विस्तृत व्याख्या श्रीकृष्ण सोलहवें अध्याय में करते हैं लेकिन इनकी चर्चा दूसरे अध्याय से ही शुरू कर देते हैं। भ्रम, माया, मोह, क्रोध, असत्य, लोभ, वासना, हिंसा, कामना, भोग , भय इत्यादि आसुरी गुण हैं जबकि सत्य, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, अभयता, दया, क्षमा, कामना का त्याग आदि दैवी गुण हैं। जब दुर्गुण सद्गुण पर भारी पड़ते हैं तो सही निर्णय ले पाने की , सत्य को देख समझ पाने की हमारी क्षमता खत्म हो जाती है और हम भयभीत होकर आत्म रक्षा के लिए अनाचार, अत्याचार , का रास्ता पकड़ लेते हैं और इसी अवगुण से उपजे तर्क को ज्ञान समझने की भूल कर बैठते हैं। ठीक यही अर्जुन के साथ हो रहा है। तभी तो वह धर्म को पारिवारिक परम्परा भर समझता है और इसी पारिवारिक परम्परा को अनंत काल से चलने वाला सनातन धर्म समझकर इसकी रक्षा में पल्याणवादी हो जाता है। जिस वीर अर्जुन को समस्त कौरव सेना मिलकर नहीं डरा सकी उसी वीर अर्जुन की वीरता उसीके भ्रम, मोह, अज्ञान से धाराशायी होकर तार तार जाती है। इतनी कि उसका मुख्य शस्त्र तक उससे नहीं उठ पा रहा है, जिससे उसने समस्त भारत भूमि के वीरों को धूल चटाया था। अर्जुन भ्रम में पड़कर इस तरह लाचार हो चला है। यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जिसे हो सकता है कि ज्ञान बहुत हो लेकिन उसे मुठ्ठी भर भ्रम और मोह मिल जाये तो सारा ज्ञान मटियामेट होकर रह जाता है। मन के युद्ध में आसुरी शक्तियों के विजय में ही जीवन की हार बसती है।
ध्यान देने की बात है कि अर्जुन का चरित्र दुर्योधन से भिन्न है। दुर्योधन को ज्ञान है ही नहीं , उसे अहंकार ही है। उसे सही गलत का भान तक नहीं सो वह तर्क नहीं कर पाता सीधे युद्ध पर उतरता है। दूसरी तरफ अर्जुन को ये तो ज्ञात है ही कि उसे क्या करना चाहिए क्या नहीं सो जब उसपर भ्रम हावी होता है तो वह युद्ध नही करने के नतीजे पर पहुँचने के लिए तर्क का सहारा लेता है। हाँ, उसके तर्क बेतुके और खतरनाक हैं क्योंकि ये तर्क कि वअधर्म , अनाचार, अत्याचार, अन्याय, असत्य को खत्म करने के स्थान पर उनकी रक्षा की दलील दिया जाय अत्यंत ही खतरनाक और समाज विरोधी है क्योंकि परिणाम में तो अधर्म और अन्याय ही जीतेगा न।
अभी अर्जुन थका नहीं है। आगे अभी वो और तर्क देगा।
अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से कोई समर्थन न पाकर विचलित होता दिखाई दे रहा है। लेकिन उसके पास श्रीकृष्ण को समझाने का कोई और उपाय नही रह गया है। सो वो अपने पिछले तर्क को ही नए तरह से धर्म की आड़ लेकर फिर से कहता है। जब दो जनों में वाद विवाद होता है और जब एक के पास समझ और तर्क खत्म होने लगते हैं लेकिन वो हार मानने के लिए तैयार नही होता तो फिर से अपने पुराने तर्कों को ही नए ढंग से कहने का प्रयास करता है। सत्य को स्वीकारने के लिए जिसमें न तो साहस हो न ही ज्ञान वो असत्य के समर्थन में कोई न कोई नया तर्क खोजेगा ही। इसी कारण अब अर्जुन अपने तर्क को नई भाषा देता है कि युद्ध में अगिनत लोगों के मारे जाने से समाज में स्त्रियों का चरित्र गिरेगा, जिससे वर्णसंकर पैदा होंगे। इससे पारिवारिक परम्परा का लोप होगा, पिंडोत्तक क्रिया समाप्त होगी, पितर रुष्ट होंगे, और परिणाम में सनातन धर्म और जाति धर्म नष्ट होंगे। अर्जुन के तर्क प्रथम दृष्टया बहुत सही लगते भी हैं। लगता है अर्जुन हिंसा का घोर विरोधी है।आगे चलकर श्रीकृष्ण अर्जुन के इन तर्कों पर गहरा प्रहार करते हैं। अर्जुन का तर्क है कि जो पारिवारिक परम्परा है, उसमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन धर्म भ्रष्ट करता है। कुल ही धर्म का रक्षक है, वाहक है। उसके तर्कों के अनुसार यदि कुल में दुष्ट, अत्याचारी हों तो कुल की परम्परा, यानी कुलधर्म यानी सनातन धर्म को हानि नहीं होती बल्कि हानि तब होती है जब ऐसे दुष्ट, अनाचारी लोगों का अंत होगा क्योंकि इससे कुल की स्त्रियाँ भ्रष्ट हो जाती हैं और एक जाति की स्त्रियों का दूसरी जाति के पुरुष से सन्तान जन्म लेते हैं जो वर्ण संकर कहलाते हैं जिनमें किसी कुल की परंपरा नहीं होती। है न विचित्र तर्क ये!
इसी प्रकार अर्जुन जन्म आधारित वर्णव्यस्था का समर्थन भी करता है और स्पष्ट रूप से जन्म आधारित जाति व्यस्था, स्त्रियों की शुद्धता जैसी चीजों के समर्थन में खुलकर आता है। उसकी समझ है कि यदि कुल भ्रष्ट होता तो सन्तानें भी भ्रष्ट होंगी जिससे पूर्वजों द्वारा संचित की गई कीर्ति भ्रष्ट हो जाएगी। अर्जुन की नजर में स्त्रियों के शारीरिक रूप से भ्रष्ट होने से जाति और वर्ण की व्यवस्था समाप्त होती है जबकि पुरुषों के आतताई, अनाचारी, अन्यायी होने से कुल भ्रष्ट नहीं होता। साफ साफ दिखाई दे रहा है कि अर्जुन कुतर्क करने पर अमादा है। उसकी अहिंसा में अत्याचारी और अधर्मी की तो चिंता है लेकिन धर्म और आचार विचार की रक्षा की चिंता नहीं है। वह बार बार धर्म के भ्रष्ट होने की दुहाई तो दे रहा है लेकिन उसका धर्म विचित्र है जिसमें अधर्मी के नष्ट होने से धर्म खतरे में पड़ता दिखता है, कुल की परंपरा नष्ट होते दिखती है लेकिन अधर्म अनाचार के खात्मे के लिए क्या किया जाना उचित होगा, ऐसा क्या किया जाना जरूरी है जिससे समाज से आसुरी शक्तियो का प्रभुत्व खत्म हो इसके बारे में कोई तर्क नहीं है। बार बार स्त्री की शुद्धता और जाति की शुद्धता का ही तर्क है उसके पास। इस प्रकार उसकी अहिंसा में अनाचारी के हिंसा के प्रतिकार का कोई रास्ता नहीं है, बल्कि उसके सामने समर्पण की वकालत ही उसका तर्क है।
इसी प्रकार अर्जुन की नजर बृहत्तर समाज के बृहत कल्याण पर नहीं है बल्कि उसे कुल की रक्षा समाज की रक्षा से ज्यादा जरूरी लग रहा है।
यही हाल हर उस व्यक्ति का होता है जो स्वार्थ के अधीन होकर सिर्फ और सिर्फ अपना, अपने परिवार के कल्याण के बारे में सोचता है भले कुल की कीमत पर समाज को हानि ही क्यों न उठानी पड़े
सब तर्क देकर दुख के साथ अपना विचार प्रकट करता है कि--
एक कि वो बुद्धिमान है, दूसरे कि बुद्धिमान होकर भी राज पाट के लोभ और सुख के लोभ में वे लोग अपने ही कुटुम्बियों और मित्रों को मारने पर उतारू हो गए हैं, और अंत में तीसरा और अंतिम की बुद्धिमान होकर भी इन लोभों के कारण बहुत भारी पाप करने जा रहें हैं।
निश्चित रूप से बुद्धिमान को इस प्रकार के लोभ नहीं ही करने चाहिए और यदि इसप्रकार के लोभ के फेरे में कोई पड़ता है तो वह पाप ही करता है जो उसे नहीं करना चाहिए। अब सवाल उठता है कि अर्जुन किस तरह से तय कर लेता है कि वो बुद्धिमान है ही। अब तक तो श्रीकृष्ण जिनको वो अपना ज्ञान दे रहा है एकदम चुप हैं, सिर्फ उसकी सुन रहें हैं। तो क्या यदि हमारे तर्क को कोई सुन भर ले तो हम बुद्धिमान हो जाएंगे? तय है कि नहीं। फिर भी अर्जुन को अपनी बुद्धि के बारे में ये गलतफहमी हो गई है। जब हम कुछ जानते ही नहीं तो बड़ा ज्ञानी होने का दम्भ भरने से बाज नहीं आते। जब तर्क खत्म हो जाता है तो सिर्फ गाल बजाना ही बाकी रह जाता है कि हम तो बुद्ध हो गए हैं, हमसे कोई क्या बात करेगा हम तो ज्ञान के भंडार है।
अब देखते हैं कि अर्जुन को क्या गलत लगता है। उसे लगता है कि युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्ष सिर्फ राज पाट हथियाने के लिए लड़ने कटने आ गए हैं। उसे युद्ध का लक्ष्य सम्पत्ति और सुख प्राप्ति ही लगता है, उसे कौरव पक्ष और पांडव पक्ष के उद्देश्य एक से लगते हैं। निश्चित रूप से ये एक भ्रम की स्थिति है। जब हम खुद के अंदर की अच्छाई और बुराई में फर्क नहीं कर पाएं तो तय है कि हम दिग्भ्रमित हो गए हैं और भ्रम के असर से सही और गलत, न्याय और अन्याय के फर्क को समझना भूल जाते हैं। इस अवस्था में कोई भी आदमी जब होता है, चाहे वो अर्जुन ही क्यों न हो उसे यही नहीं पता चलता कि उसका दायित्व क्या है, उसकी अपनी भूमिका क्या है, उसे क्या करना और क्या नहीं करना है। तब ऐसा इंसान मूर्खता पर उतर आता है। लेकिन कोई भला अपने को मूर्ख क्यों मान ले, सो खुद को बुद्धिमान ही कहता फिरता है। आये दिन हम अपने समाज में देखते हैं कि लोग ऐसी बेवकूफियाँ करते ही हैं। जब हम आप खुद के अंदर के गुण अवगुण को नहीं समझ पाएंगे तो निश्चित है कि इसी तरह से व्यवहार करेंगे।
पाप और पुण्य को समझने के पूर्व कर्म के पीछे की मंशा को ध्यान में रखा जाना जरूरी है। एक स्त्री हरण रावण ने किया, एक स्त्रिहरण खुद अर्जुन ने भी किया, और एक स्त्रिहरण श्रीकृष्ण ने भी किया। अब यदि मात्र स्त्री हरण की बात की जाए तो तीनों का दोष एक समान लगेगा। लेकिन तीनों के इन क्रियाओं के पीछे की परिस्थिति पर विचार करेंगे तो भिन्न भिन्न स्थिति पाएंगे। इस बात को समझने के लिए अच्छे बुरे की समझ की आवश्यकता होती है। युद्ध या कोई भी अन्य कार्य जरूरी भी हो सकता है और गैर जरूरी भी। लेकिन देखने समझने की बात है कि वास्तव में हम किस गुण या अवगुण से प्रेरित होकर उस क्रिया विशेष को करते हैं। अर्जुन ने अपने युद्ध को जिन कारणों से गलत और पापयुक्त कहा है, उन कारणों को स्वीकारने में किसी को भी दिक्कत है। जैसे अर्जुन के मुख्य तर्क हैं
1.कुल की रक्षा अनिवार्य है।
2.कुल की रक्षा के लिए कुल के आतताई सदस्यों को भी हानि नहीं पहुंचाना चाहिए।
3. कुल के नाश से स्त्री शारीरिक रूप से दूषित होती है जिससे वर्णसंकर पैदा होते हैं।
4. वर्णसंकर कुल के नाश के कारण होते हैं
5. इससे जाति व्यवस्था टूटती है।
6. कुल के नाश से कुलधर्म का नाश हो जाता है।
7.कुलधर्म ही सनातन धर्म है, और इस कारण युद्ध से सनातन धर्म नष्ट हो जाएगा।
अब युद्ध के विरुद्ध इतने बेसिर पैर के तर्क को देकर अर्जुन खुद को बुद्धिमान भी घोषित कर देता है।
हर जगह, लोग मूर्खता को ज्ञान और अनाचार को धर्म का नाम देकर ही ढकने की कोशिश करते हैं और एक अति अज्ञानी और दम्भी इंसान का आचरण का उदाहरण है अर्जुन का व्यवहार।
भ्रमित और अज्ञानी के सारे तर्कों से जब काम नहीं चलता तो अंत में तीन तर्क बचते हैं, एक धर्म की आड़ में अधर्म की राह चुनना, आदर्श की आड़ में अनाचार की रक्षा करना और अंत में अहिंसा के नाम पर आत्महन्ता बन जाना। पहले दो तर्क तो अर्जुन आजमा चुका है लेकिन श्रीकृष्ण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। तब उस बच्चे की तरह जो अपना मनमाफिक खिलौना नहीं मिलने पर फर्श पर ही अपना सिर पीटने लगता है, अब अर्जुन उसी हरकत पर उतर आता है। अभी तक तो वह धर्म की दुहाई कर दुर्योधन से लड़ने से इनकार कर रहा था। अब एक कदम आगे बढ़कर अहिंसा की प्रतिमूर्ति बनने का स्वांग करता हुआ कहता है कि यदि कौरव पक्ष के लोग उस निहत्थे अर्जुन को मार भी देंगे तो भी अर्जुन यही मानेगा कि युद्ध के मुकाबले ये ज्यादा कल्याणकारी है।
हम सब के मन में जीतने की ईक्षा होती है। यह प्रसंग युद्ध का है लेकिन हर प्रसंग में हम जीतना चाहते हैं। लेकिन जीत के लिए जब हम वास्तविक कर्म के मैदान में उतरते हैं तब हमें पता चलता है कि इस अपेक्षित और इक्षित जीत के लिए तकनीकी जानकारी के अतिरिक्त भी कुछ अन्य कौशल की जरूरत होती है। अगर वो कौशल नहीं है तो आप तमाम तकनीकी जानकारियों के भी सफलता नहीं प्राप्त कर पाते। हो सकता है कि किसी लक्ष्य को पाने की तमाम तकनीकी जानकारी तो है आपके पास लेकिन जो मानसिक और आत्मिक कौशल चाहिए , जो साहस और सूझ बुझ चाहिए वह नहीं है तो जीतने और लक्ष्य को पाने की बात तो दूर ,आप वह कार्य शुरू ही नहीं कर पाएँ।
जब आप ऐसा नहीं कर पाते तब आपको अपनी झेंप मिटानी होती है। आपको दिखाना होता है कि आपके तकनीकी गुण पूर्ण हैं , आपमें किसी भी मानसिक कौशल का अभाव भी नहीं है लेकिन आप मानवता की सेवा के लिए ये सब त्याग देना चाहते हैं, कर्म छोड़कर मृत्यु की वरण करना उचित समझते हैं। युद्ध की स्थिति या युद्ध जैसी स्थिति में आप इसे अहिंसा का नाम देते हैं। आप दिखाना चाहते हैं कि आप किसी का रक्त नहीं बहाना चाहते क्योंकि यह आपके धर्म के विपरीत है , मानवता के विरुद्ध है सो आप अपनी जान देकर चाहते हैं कि आप युद्ध रोकने का प्रयास कर अमर बन जाएं।
ये सोच भले ही समाज और व्यक्ति दोनों के लिए खतरनाक होती है किंतु भ्रम से भ्रष्ट बुद्धि समस्या का निराकरण करने में जब असमर्थ होती है तो व्यक्तिअपनी असमर्थता छुपाने वास्ते आत्मबलिदान की मिसाल देने का ढोंग करता है। अपनी असफलता, अपने भ्रम से ऐसा इंसान जो क्षति समाज को पहुँचाता है वो इतना बड़ा होता है कि उसका आकलन करना भी मुश्किल होता है। अर्जुन के पास अब कुछ भी ऐसा सार्थक नहीं है जो वह कह सके सो आत्म बलिदान की या सही कहें हो आत्महत्या की बात करता है ताकि श्रीकृष्ण अब भी पिघल जाएं और उसे मानव इतिहास का सबसे बड़ा अपराधी होने से बचा लें।
ध्यान दें अब तक के पूरे प्रसंग में अर्जुन शत्रु पक्ष की शक्ति से कँही भी डरा हुआ नहीं दिखता। वो डरता है तो धर्म की अपनी गलत समझ से। जब हम सही और गलत को नहीं समझ पाते, जब हमारी बुराई हमारी अच्छाई पर भारी पड़ने लगती है तो विवेक नष्ट होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम ये नहीं समझ पाते कि न्याय, धर्म, सत्य और अहिंसा अन्याय, अधर्म, असत्य और हिंसा से किस प्रकार भिन्न है। सो दिग्भ्रमित मन कमजोर पड़ जाता है, आत्मविश्वास डीग जाता है, और मन व्यथित और व्याकुल होकर अनर्गल निर्णय लेने लगता है। महाभारत का युद्ध बाहरी तो बहुत बाद का है, मानसिक और आत्मिक बहुत पहले से है। मन और आत्मा के स्तर पर जो इस युद्ध को जीतेगा बाहरी मैदान भी वही जीतेगा। किसी भी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उस लक्ष्य के अनुरूप तकनीकी ज्ञान तो अनिवार्य है लेकिन वह तकनीकी ज्ञान तभी परिणाम देगा जब आत्मिक बल मजबूत है और आत्मिक बल तभी मजबूत होगा जब आपके अंदर आपके दैवी गुण उत्कृष्ट अवस्था में हैं।
प्रथम अध्याय का अंत आते आते अर्जुन बिना मैदान में लड़े थक कर शस्त्र रखकर शोक से बैठ जाता है। आपने अपना कर्तव्य अभी शुरू ही नहीं किया और हारे हारे से हो गए। ऐसा होता ही है। जीवन में कई अवसर ऐसे आते हैं जब आपको कुछ करना होता है, लेकिन जब आप उस काम पर निकलने वाले हैं तभी आपके मन में उस कार्य को लेकर संशय हो जाता है, आप समझ नहीं पाते कि उस कार्य को करें या न करें। आप तय नहीं कर पाते कि आपका कर्तव्य क्या है। आप अपनी भूमिका समझने से चूकने लगते हैं। मन उद्विग्न हो जाता, खिन्न हो जाता है। आप तो सभी को बता कर निकले थे कि मैं फलाना कार्य पर जा रहा हूँ और आप फँस गए अपने ही मानसिक और आत्मिक द्वंद्व में। अब आप निर्णय नहीं ले पा रहें हैं कि क्या करें। फिर आपको लगता है कि आपसे ये कार्य नहीं होगा। लेकिन इस स्थिति का सामना कैसे कीजियेगा क्योंकि आप तो चले थे कि इस कार्य को कर ही देंगे। तब आप सहारा लेते हैं झूठ का, झूठ से ओतप्रोत तर्को का। नतीजा होता है कि आप टूटकर बिखरने लगते हैं।
आखिर ऐसा क्यों होता है। स्पष्ट है कि या तो आपको सामर्थ्य नहीं है , बस आपका जोश बिना कौशल का है। या फिर सामर्थ्य तो है, कार्य निष्पादन की विद्या भी है लेकिन उस कार्य को करने के लिए जिन आत्मिक कौशल या गुणों को होना चाहिए वो नहीं है। हर इंसान के अंदर दो तरह की प्रवृत्तियाँ हमेशा रहती हैं, अच्छी(दैवी) और बुरी(आसुरी)। और ये कभी विश्राम की अवस्था में नहीं रहतीं। हमेशा आपस में लड़ती रहती हैं। एक महाभारत हमेशा आपके हृदय में चलते रहता है इनके बीच। जब जब बुरी प्रवृत्तियाँ मजबूत पड़ती हैं भ्रम तेज हो उठता है, उससे मोह का प्रताप बढ़ता है। नतीजा में बुद्धि और विवेक का ह्रास होने लगता है और धर्म, न्याय, सदाचार, और सत्य के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता खत्म हो जाती है। तब आसुरी निर्णय ही होते हैं। परिणाम में आदमी मन से थकने लग जाता है। आखिर अर्जुन अपने समय का सर्वक्षेष्ठ योद्धा है। उसके रणकौशल के बराबर कोई दूसरा नहीं है। एक बार तो उसने अकेले ही विराट के युद्ध में समस्त कौरव सेना को पराजित भी कर दिया था। अब जबकि वह अपनी विशाल सेना और श्रीकृष्ण के साथ कौरवों के विरुद्ध युद्ध के मैदान में खड़ा होकर शँख बजाकर युद्ध लड़ने की ईक्षा को जाहिर कर चुका है अचानक परिवार मोह में पड़ जाता है और फिर तो शुरू कर देता है युद्ध के विरुद्ध कुतर्क करना। लेकिन उसे अपने कुतर्को के प्रति श्रीकृष्ण का समर्थन नहीं मिल पाता। सो अपनी आसुरी प्रवृत्तियों के बोझ से वो थक जाता है। वह जो भी तर्क देता है खुद उन्हीं से संतुष्ट भी नहीं होता है। नतीजा शोक में डूब जाता है और शस्त्र छोड़कर बैठ जाता है। जब भी इंसान की आसुरी शक्तियाँ मजबूत होती हैं इंसान खुद की अच्छाई को गंवा कर खुद से हार कर शोकाकुल हो मूर्क्षित सा हो जाता है। आप ही देखिए जिस अर्जुन को कभी भी युद्ध में कोई नहीं हरा सका था आज अपनी बुराई के सामबे बिना लड़े लड़ाई के कल्पित परिणामों से डर कर युद्ध छोड़कर भाग रहा है। जब भी आपको अपने कर्तव्य के उद्देश्य के बारे में भ्रम होगा आप कर्तव्य पूरा कर ही नहीं सकते। ये अकाट्य सत्य है जो सार्वभौमिक है। जँहा आप अपने कर्तव्य के परिणामों के चक्कर में पड़े, सम्बावित परिणामों के भय से आप जी हीं नहीं पाएंगे। अर्जुन को युद्ध का उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो पा रहा है और परिणाम की चिंता खाये जा रही है। नतीजा है बिना लड़े पराजय। "मन के हारे हार है मन के जीते जीत, करता चल पुरुषार्थ तू काहे है भयभीत।"
इस प्रकार श्रीमद्भागवद गीता का प्रथम अध्याय अर्जुन की निराशा पर आकर खत्म होता है। और यंही से प्रारंभ होती है गीता की यात्रा, योगेश्वर श्रीकृष्ण की वो शिक्षा जो आपको अद्भुत शक्ति प्रदान करती है, आप खोज पाते हैं कि आप कौन हैं, आपका क्या कर्तव्य है, उस कर्तव्य को कैसे पूरा करना है, स्वयं और समाज के प्रति आपकी क्या भूमिका है , उसे कैसे निभाना है और आपका अंतिम लक्ष्य क्या है। आप समझ पाते हैं कि बिना परिणाम की चिंता किये अपना कर्तव्य कैसे पूरा करेंगे।
श्रीमद्भगवद गीता आपको धर्म के मार्ग पर चलकर कर्तव्य निर्वाहन का क्रियात्मक प्रशिक्षण देती है।
किसी विषय का बड़ा से बड़ा जानकार, बहुत बड़ा विद्वान, व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत सफल आदमी भी जीवन में लड़खड़ा जाता है। आप अपने पारिवारिक, छात्र या व्यवसायिक जीवन में अचानक पाते हैं कि आप किसी बड़ी परेशानी में आ गए। ऐसा होता क्यों है कि बहुत ही जानकार आदमी भी समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या है? और दूसरे आपके टूटे हुए मनोभाव को समझ जाते हैं? युद्ध कला में अर्जुन की कोई सानी नहीं। बड़े बड़े योद्धाओं को उसने पूर्व में पराजित भी किया है। उसकी धनुर्विद्या का लोहा सब मानते हैं। जीवन में उसने कई बुरे अनुभव भी पाए हैं और अपनी विद्या के बल पर, अपने सामर्थ्य के बल पर नाम भी खूब कमाया है लेकिन चिर प्रतीक्षित युद्ध जिसमें उसे बहुत कुछ करना है में आते लड़खड़ा जाता है। और लड़खड़ाता भी ऐसा है कि संजय भी समझ जाता है कि अर्जुन बुरी तरह व्यथित, दुखी और अनिर्णय की स्थिति में है, यानी उसकी दयनीय हालत जगजाहिर है, ठीक वैसे ही जैसे हम मुँह लटका कर बैठे हों और हर कोई समझ लेता है कि हम तो हैरान परेशान हैं , समझ ही नहीं पा रहें हैं कि आखिर करना क्या है। अर्जुन की युद्ध में ये हालत विरोधियों और अपने पक्ष में लड़ने आये उन लोगों को देख कर होती है जिनको वो शत्रु या मित्र की तरह नहीं देखता, जिनको वो धर्म और अधर्म के रक्षकों की तरह नहीं देखता बल्कि उनको परिजनों, गुरुजनों और मित्रजनों की तरह देखता है। अर्जुन की कमी व्यवसायिक ज्ञान यानी उज़के मामले में युद्ध कौशल में कमी नहीं है, उस कार्य में वह पूर्ण दक्ष है लेकिन सही गलत , अच्छा बुरा, धर्म अधर्म, न्याय अन्याय की समझ समाप्त होना उसकी कमी है। उसकी कमी है उसकी अच्छाई पर उसकी बुराई यानी भ्रम, मोह, असत्य आदि का हावी होना। यही हाल हर उस इंसान का होता है जो अपनी बुराई को खुद पर हावी होने देता है। उस समय आपकी व्यवसायिक दक्षता धरी की धरी रह जाती है।
जब भी कोई कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और सही और गलत, जैसे धर्म और अधर्म/सत्य और असत्य/न्याय और अन्याय/सदाचार और अनाचार के अंतर को भूलकर अन्य बाहरी स्थितियों के प्रभाव मैं आ जाते हैं हम विचलित, दुखी और असहाय हो कर दुखी स्थिति में पहुँच जाते हैं , निर्णय नहीं ले पाते। घर हो विद्यालय हो, समाज हो या हमारे नौकरी पेशा की जगह हो कँही भी हम यदि अपने से बाहरी माहौल से यदि प्रभावित होकर व्यवहार करने लगते हैं तो हमारा व्यवहार हमारी क्षमता के अनुसार नहीं होकर बाहरी कारणों से प्रभावित होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम एक मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक बहुत काबिल सर्जन आपके अपेंडिक्स का ऑपरेशन करने वाला है और चीरा लगाने के पश्चात उसके मन में अपेंडिक्स के प्रति मोह जागृत हो जाये कि ये अपेंडिक्स तो बेचारा शरीर में जन्म से ही है तो वो इसे क्यों हटाने की कोशिश करने में लगा है, तब उस सर्जन के मन में बीमार वयक्ति की वृहत्त अच्छाई के बदले पेट दर्द का कारण बने अपेंडिक्स के प्रति करुणा का उतपन्न होना उस बीमार का अहित कर देगा। करुणा दर्द से पीड़ित के प्रति न होकर दर्द के कारण के प्रति होना भ्रम है और इस भ्रम से नुकसान उस व्यक्ति का है जो बीमार है।
इस प्रकार से विचलित मन ही चाहे वो जिसका हो एक मनोरोगी का ही है। सब सामर्थ्य रहते हुए भी मन की पीड़ा के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी अवस्था में गुरु कौन हो सकता है, मार्गदर्शक कौन बन सकता है? वह जो इस तरह के दुष्ट मनोभाव को नष्ट करता हो। श्रीकृष्ण ने मधु नाम के राक्षस का वध किया था सो मधुसूदन कहलाये। आपके अंदर के इस भ्रम रूपी राक्षस को मारने वाले में मधुसूदन की क्षमता होनी जरूरी है, यानी आपके गलत विचारों के नाश करने की ताकत और समझ होनी जरूरी है। हर कोई हमारी इस मनोदशा को खत्म भी नहीं कर सकता।
सो हम सभी को चाहे हम जिस आयु वर्ग में हों, चाहे हमारी कोई भी पृष्ठभूमि हो हम सब को चाहिए कि अपनी बाहरी परिस्थितियों का आकलन करते समय हम उन्हीं से प्रभावित होकर अपना सयम खो कर सही गलत समझने की अपनी क्षमता ही नहीं खो दें।
तरह तरह से युद्ध के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा था, और अपने ही तर्कों में बुरी तरह उलझा उसका मन व्यथित हो जाता है। परंतु श्री कृष्ण कुछ बोल नहीं रहें है, चुपचाप ध्यान से उसकी बात को सुन रहें हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से अपने तर्कों को सांकेतिक समर्थन भी न पाकर और भी व्यथित, दुखी और विचलित हो रहा है।
याद करें श्रीकृष्ण प्रथम अध्याय में अर्जुन को उसी के निदेश पर दोनों सेनाओं के मध्य ले आ कर खड़ा कर मात्र इतना ही कहें हैं कि, "पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥" यानी कि "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"। उसके पश्चात अर्जुन जो भी कह रहा होता है वह उसकी मनोस्थोति है। वह जिस दृष्टिकोण से युद्ध को देख रहा होता है उसी के अनुसार उसकी मनःस्थिति हो रही है। उसका दृष्टिकोण तात्कालिक परिस्थितियों पर उसकी समझ की व्याख्या है। हम जो समझते हैं, परिस्थितितियों का आकलन करते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कितने विवेक से अपने दैवी गुणों अथवा अपने आसुरी गुणों के अनुसार उपयोग में लाते हैं। एक ही परिस्थिति को अलग अलग इंसान अपने अलग अलग दृष्टिकोण की वजह से अलग अलग तरह से देखते हैं। जब हम परिस्थिति का आकलन/मूल्यांकन अपने भ्रम, मोह, असत्य, अहंकार के अनुसार करते हैं तो वह परिस्थिति प्रतिकूल नजर आती है, जबकि यदि उसी को यदि हम विवेक, स्तय, न्याय आदि की दृष्टि से देखते हैं तो उस परिस्थिति को हम अपने अनुकूल पाते हैं।
जब हम भ्रम में मनोरोग की अवस्था तक चले जाते हैं तो मनोचिकित्सक शॉक ट्रीटमेंट देता है, ठीक वही शॉक ट्रीटमेंट श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहें हैं।
इंसान का भ्रम उसकी कमजोरी है। भ्रम से उतपन्न मोह अविवेक को बढ़ाता है। इस अवस्था में हम अपने ही ज्ञान को भूल जाते हैं। तब हम जो करते हैं वह हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए हानिकारक ही होता है। यह परिस्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में उतपन्न हो सकती है। जैसे ही हम भ्रम और भ्रम जनित मोह में फंसते हैं हम अपना ही भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों बिगाड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
एक ज्ञानी व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह खराब स्थिति को भी अपनी समझ से अनुकूल कर सकता है लेकिन अज्ञानी तो अनुकूल को भी प्रतिकूल कर सब का नाश कर देता है। यँहा देखते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन के सारे तर्कों यथा कुलधर्म ही सनातन धर्म है, कुलधर्म नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट होगा, समाज में वर्णसंकर पैदा होंगे जो पितरों को रुष्ट करेंगे आदि आदि को श्रीकृष्ण एक झटके से नकार देते हैं और अर्जुन की भर्त्सना करते कहते हैं कि ये सब तर्क अज्ञान हैं जो मोह से उतपन्न है। मोह से इंसान का अतीत, वर्तमान और भावी तीनों खराब होता है। हर इंसान तीन बातों से उत्प्रेरित होकर अपना कार्य करता है। वह चाहता है कि उसके कार्यों से उसके खानदान का नाम रौशन हो (अतीत) , उसका नाम रौशन हो(वर्तमान) और उसका और उसकी आने वाली पीढियीं को अच्छी व्यवस्था मिले(भविष्य)। लेकिन मोह और भ्रम वश जो कार्य किये जाते हैं उनसे ये तीनों लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं। अन्याय एवम अनाचार को सहना अज्ञान ही है । जीवन की किसी भी परिस्थिति में जब हमारा कार्य मोह और भ्रम से उतपन्न मनोभाव पर आधारित होता है तो फिर वह निर्णय उचित नही होता है। परिवार के मामले हों , व्यवसाय के मामले हों, सामाजिक मामले हों , छात्र जीवन के मामले हों या फिर कुछ और, जब हम अपना कर्तव्य व्यक्ति/वस्तु/विचार विशेष के प्रति मोह से निर्धारित करते हैं तो फिर हमारा वो कर्तव्य हमें रास्ते से भटकाने वाला होता है, जिसके परिणाम में हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। आसुरी गुण यानी भ्रम और मोह से किसी भी व्यक्ति का चरित्र यानी उसकी अपनी शख्सियत यानी उसका अपना स्व(सेल्फ) समाप्त हो जाता है और वह उटपटांग और आत्मघाती निर्णय लेता है।
ध्यान दें कि श्रीकृष्ण के कथन को गीताकार ने भगवान उवाच का नाम दिया है, न कि श्रीकृष्ण उवाच। अर्थात गीताकार का मानना है कि श्रीकृष्ण उसी स्तर के साधक हैं जिस स्तर पर ईश्वर स्वम् हैं। श्रीकृष्ण उस समस्त ज्ञान, विभूति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं जिसे प्राप्त कर इंसान हर चीज को साध लेता है।
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि , एक तो हमें भ्रम और मोह के प्रभाव में निर्णय नहीं लेना चाहिए। दूसरे कि हमें अन्याय , अनाचार का समर्थन नहीं करना चाहिए। तीसरे कि हमें कुरूतियों से बचना चाहिए। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये है कि व्यक्ति का सेल्फ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का आकलन उसके कार्यों के अनुसार होता है न कि उसके साथ हमारे सम्बन्ध से। इसी प्रकार किसी भी स्थिति में स्थूल का महत्व उसके द्वारा किये गए कार्य के मूल्यांकन से होता है। किसी भी स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपने विवेक पर माया , मोह, भ्रम को हावी नहीं होने दें क्योंकि इससे हमारी स्वाभाविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और तब हम निराशा में डूब जाते हैं।
श्रीकृष्ण अपनी बात आगे बढाते हुए अर्जुन को चार बातें कहते कहते हैं
---नपुंसकता को मत प्राप्त हो
----नपुंसकता तुम्हारे लिए उचित नहीं है
----- हृदय की दुर्बलता को छोड़ो
-------युद्ध के लिए उठ खड़े हो जाओ
अर्जुन युद्ध नहीं करने के तमाम तर्क प्रस्तुत कर चुका है। बन्धु बाँधवों से युद्ध करना, भले ही वो आतताई ही क्यों न हों, उचित नहीं , क्योंकि इससे कुलधर्म यानी सनातन धर्म नष्ट होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर जनमेंगे जिससे पितर नाराज होंगे, जो सम्पत्ति और राज मिलेगा उसे साथ भोगने वाले बन्धु और मित्र नहीं होंगे आदि आदि उसके तर्क रहें हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की सोच नपुंसकता दर्शाती है जो अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। ये हृदय की कमजोरी की निशानी हैं सो अर्जुन का आह्वान करते हैं कि इसे छोड़कर वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाये।
विषयगत प्रसंग युद्ध का है सो चर्चा युद्ध की है। जैसा हम देख चुके हैं कि हर परिस्थिति में जब भ्रम और मोह हावी होते हैं तो विवेक नष्ट होता है जिससे निर्णय लेने की हमारी क्षमता प्रभावित हो जाती है। कार्य करने की तमाम तकनीकी योग्यता और ज्ञान रहने के बावजूद हम कार्य करने से भागते हैं क्योंकि हम मानसिक तौर पर उस कार्य को करने के योग्य नही रह जाते, भ्रम और मोह जनित मनोविकारों के। तब हम बहाने बनाने लगते हैं। परिवार, व्यवसाय, छात्र जीवन, समाज हर जगह लोग इस बीमारी के शिकार बराबर होते रहते हैं। ऐसे ही लोगों को श्रीकृष्ण सम्बोधित कर रहें हैं। अर्जुन तो शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं है तब श्री कृष्ण उससे नपुंसक बनने की बात भला क्यों कहते हैं। नपुंसकता तो यही है कि जिस कार्य को करने के लिए आपको स्वाभाविक रूप से सक्षम होना होता है उसी में आप अक्षमता का प्रदर्शन कर रहें हैं। जैसे सैनिक लड़ने से डरे, छात्र पढ़ने से भागे, व्यवसायी का मन व्यवसाय में न लगे तो ये सभी उनके स्वाभाविक गुण से भिन्न ही तो है।।निर्धारित भूमिका को निभाने की अक्षमता ही नपुंसकता है क्योंकि इस अक्षमता से आगे बढ़ पाने का रास्ता बन्द हो जाता है। ये आता कँहा से है? जब हम अपने सेल्फ यानी स्व को नहीं पहचानते यानी अपनी ही आत्मा को जानने से इनकार कर देते हैं तो नपुंसकता का जन्म होता है। अर्जुन युद्ध भूमि में अन्याय अधर्म का प्रतिकार करने आया है और लगता है आतताइयों की रक्षा का उपाय करने। तो स्वाभाविक है कि यह तो नपुंसकता ही है। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा है कि हमें कभी भी अपने निर्धारित कर्तव्य से नहीं मुँह मोड़ कर भागना चाहिए चाहे जीवन का कोई भी प्रसंग हो। यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें उस कार्य को करने की पूर्ण तकनीकी योग्यता और सामर्थ्य भी हो। इसीलिए ये आचरण हमारे अनुकूल नहीं होता। अर्जुन तो युद्ध विद्या के साथ साथ शास्त्रों का भी ज्ञाता है, पूर्व में कई बार अपनी योग्यता का परिचय दे चुका है , उसे पता है कि उसकी क्षमताएँ क्या हैं तो फिर नपुंसकता का आचरण उसके लिए कैसे अपेक्षित हो सकता है। इस प्रकार श्री कृष्ण अर्जुन को उसके सेल्फ की याद दिलाने की कोशिश करते हैं।
फिर हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके तर्कों और उसके मनोभावों को क्षुद्र यानी नीच श्रेणी का मानते हैं और इसे उसकी हृदय की दुर्बलता कहते हैं। विवेक और भावना दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो हमारे कार्य करने की प्रवृत्ति को निर्धारित करते हैं। जब विवेक से लिये गए निर्णय में भावना को भी स्थान मिलता है और भावना भी विवेक से संचालित होती है तो फिर हम संयमित निर्णय पर पहुंचते हैं। लेकिन यदि ये दोनों अपनी मात्रा में असन्तुलित हो जाते हैं तो फिर हमारा निर्णय, कार्यप्रणाली भी असंयमित हो जाती है। यही हमारे हृदय की दुर्बलता है, यही हमारी नीचता है। उदाहरण स्वरूप जीवन में अधर्म, अन्याय के पक्ष में खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और अनुराग अहिंसा नहीं नीचता है , ज्यादा अंको के लिए छात्र का चोरी करते पकड़ कर उसे अपना सम्बन्धी जानकर छोड़ देना नीचता है, एक अपराधी को अपने लाभ के लोभ में बख्शना नीचता है। यही नीचता हमारी दुर्बलता का परिचायक है। श्री कृष्ण इस नीचता से उबरने की सलाह देते हैं।
और तब कहते हैं कि नपनुसकता और हृदय की नीचता को छोड़कर अर्जुन यानी हम सब खड़े हो जाएं, हताश न हों और युद्ध करें यानी अपने कर्तव्य निर्वाहन के लिए तैयार हो जाएं।
जीवन में जब कभी भी हमें लगे कि हमें अपने दायित्वों को निभाने में हिचक, निराशा, भय हो रहा है तब तब हमें स्मरण करनस चाहिए कि हम वास्तव में क्या हैं, हमारी क्षमताएँ क्या हैं और हमें श्री कृष्ण की इस शिक्षा को याद कर आगे बढ़ना चाहिए।
श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को समझाना चाहा है तो अर्जुन पुनः प्रतिवाद करता है और वह स्पष्ट कहता है कि चूँकि भीष्म और द्रोण उसके लिए पूजनीय हैं सो वह उनसे युद्ध नहीं कर सकता है। श्रीकृष्ण को वह मधुसूदन और अरिसूदन नामों से सम्बोधित करता है जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का नाश करने वाला। उसका तर्क है कि आप तो शत्रुहन्ता हैं , शत्रुओं को मारने वाले हैं लेकिन भीष्म मेरे पितामह और द्रोण गुरु हैं मेरे जो मेरे लिए पूजनीय हैं तो भला मैं उनसे कैसे युद्ध कर सकता हूँ। अर्जुन कोई नई बात नहीं कह रहा है, बस अपने पुराने तर्कों को दुहरा रहा है। श्रीकृष्ण के समझाने का स्पष्ट रूप से उसपर कोई असर नहीं हुआ है। जब हम सामने वाले को अपने ही स्तर का समझदार समझते हैं तो उसकी सलाह भी नहीं मानते। अगर वो कुछ कहता भी है तो उसकी समझ को ही चुनौती दे डालते हैं। जब तक आप अपने सलाहकार की बुद्धि पर भरोसा नहीं करते उसके सुझाव को नहीं मान सकते। तभी तो श्रीकृष्ण के कठोर वचनों को भी अर्जुन गम्भीरता से नहीं लेकर अपने पुराने तर्क ही प्रस्तुत कर देता है।
हमारा मन उसी को सत्य मानता है जो हम बचपन से देखते सुनते समझते आये हैं। जो नीति अनीति सीखे हैं उससे बाहर की बात सुनना हमें मंजूर नहीं होता भले समझाने वाला कितना भी ज्ञानी क्यों न हो।
बड़ों का और गुरु का सम्मान कँही से भी गलत नहीं सो एक दफा तो लगता है कि अर्जुन ठीक ही कह रहा है कि वह भला पितामह और गुरु से कैसे लड़े। लेकिन ध्यान देने की बात है कि पितामह और गुरु एक पद हैं जो किसी व्यक्ति के द्वारा किसी समय विशेष में धारित किये जाते हैं। अगर किसी अन्य समय या परिस्थिति में वही व्यक्ति किसी अन्य भूमिका में हो तो क्या वह इस पद के सम्मान का अधिकारी है? और हमारा खुद का पद अथवा स्थिति यानी स्टेटस उस समय विशेष या परिस्थिति विशेष में क्या पहले वाला ही है? वंश परम्परा में भीष्म अर्जुन के पितामह तो हैं, गुरु शिष्य परम्परा में द्रोण उसके गुरु भी हैं लेकिन जब भीष-द्रोण एक पक्ष ले कर एक सेना के साथ आ गए और अर्जुन एक अन्य पक्ष लेकर दूसरी सेना में आ गया और दोनों पक्षों के उद्देश्य, मान मर्यादा भिन्न हो गए तो क्या पुराने सम्बन्धों के अनुसार ही वर्तमान सत्य का निर्धारण हो पाना सम्भव है? हर परिस्थिति में हमारी भूमिका बदल जाती है। भीष्म और द्रोण अधर्म, असत्य, अनाचार, अन्याय का पक्ष ले चुके हैं। उन्होंने अपनी भूमिका तय कर ली है कि वे दुर्योधन के अनाचार के समर्थन में पांडवों के सत्य, न्याय के आग्रह का विरोध करेंगे ही तो क्या सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े अर्जुन को इस बात की आजादी हो सकती है कि वह अपने सत्य और न्याय के आग्रह को छोड़कर भीष्म और द्रोण की पूजा सिर्फ इसलिए करे कि वे पितामह हैं, वे गुरु हैं? इतनी समझ अर्जुन को क्यों नहीं आ रही है?
जीवन में यही असमंजस हमें परिस्थिति के सत्य से विचलित कर देती है। और हम नहीं जानते हुए भी गलत के साथ खड़े हो जाते हैं। भ्रम से उपजे ज्ञान में अहंकार की मात्रा सबसे अधिक होती है। इस अहंकार की धुंध में सच नहीं सूझता और हम अपनी रूढ़ियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते। उसी रूढ़ि की वजह से हम नहीं समझ पाते कि हमारा विस्तार परिवार और परिवारजन्य संस्थाओं और मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है। मूल बात सम्बन्धों से नहीं तय होते बल्कि मूल बात तय होते हैं सत्य के प्रति हमारे आग्रह से। रक्त सम्बन्ध से सत्य तय नही होते, मित्रता और सम्मान के सम्बन्धों से सत्य नहीं तय होते। सत्य तो शाश्वत है, ये हमपर निर्भर करता है कि हम किधर जाना तय करते हैं। एक बलात्कारी सम्बन्धी का समान आवश्यक है या पीड़िता के पक्ष में खड़ा सत्य है ये हमें तय करना होता है। हमारे इसी निर्णय से तय होता है कि समाज में भविष्य में शांति होगी या अशांति, अनाचार फैलेगा या सदाचार। यदि हम भ्रम और अहंकार से निकल कर अपने को सदाचार, सत्य, , न्याय के प्रति समर्पित करेंगे तो हो सकता है कि हमें उन लोगों के खिलाफ भी खड़ा होना हो जो हमारे प्रिये तो हैं लेकिन असत्य और अन्याय अनाचार के साथ खड़े हैं। ये तय करने की जबाबदेही हमारी है कि हम व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्बन्धों को ज्यादा महत्व देंगे या फिर उस सत्य को जिससे समाज में न्याय की स्थापना होने में मदद मिलेगी। ये तय तभी कर पाते हैं जब हम भ्रम से बाहर निकल कर निर्णय लेते हैं। परिवार हो , मित्रमण्डली हो, सामाजिक या व्यवसायिक रिश्ते हों हर जगह दो पक्ष मिलते है। अब उन परिस्थितियों में ये तय करना हमारी जबाबदेही है कि हम किस पक्ष में जाते हैं। यदि क्षुद्र स्वार्थ वश हम गलत का साथ देते हैं तो अंततः स्वयम भी उसी गलत के शिकार हो जाते हैं। यदि सही का साथ देते हैं तो कुछ देर के विप्लव के पश्चात हम भी उस सामाजिक उन्नति का लाभ लेते हैं जो हमारे सत्य का साथ देने से उतपन्न होती है। लेकिन पहले भ्रम और भ्रम जनित अहंकार से तो खुद को निकालें, माया , मोह के मकड़जाल को तो तोड़ें।
जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए प्रवृत्त होते हैं तो उस कार्य करने का उद्देश्य हमारे मानस पटल पर स्पष्ट होना अति आवश्यक होता है अन्यथा हम विभन्न प्रकार के संशय के शिकार हो जाते हैं। यदि हमारे कार्य करने का उद्देश्य निजी और अल्पकालीन स्वार्थ होता है तो कार्य का परिणाम कुछ और निकलता है और यदि उसी कार्य का उद्देश्य व्यपक सामाजिक हित हो तो परिणाम एकदम भिन्न होता है। इसके साथ ही हमारे उद्देश्य की प्रकृति के कारण हमारे कार्य करने का उत्साह और तौर तरीके भी भिन्न हो जाते हैं। अर्जुन युद्ध में क्यों खड़ा है? क्या ये तथ्य अर्जुन को स्पष्ट है? यदि अर्जुन का उद्देश्य राज्य और राजपाट से मिलने वाले सुख भोग हैं तो बात और हो जाती है और यदि अर्जुन का उद्देश्य अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असत्य का विरोध करना होता है तो दूसरी बात होती है। अर्जुन के तर्क को देखें तो पता चलता है कि उसे लगता है कि वह तो युद्ध में मात्र राजपाट और राजपाट से मिलने वाले सुख, और भोग के लिए आया है। अगर उद्देश्य ये सब हैं तो अर्जुन का तर्क कि भीष्म और द्रोण सरीखे महान गुरुओं की हत्या कर राजपाट लेने से ज्यादा अच्छा तो भीख माँगकर जीवनयापन करना है। लेकिन क्या कुरुक्षेत्र का मैदान मात्र आपसी वैर का हिसाब किताब करने के लिए सजा है? आखिर इतने बड़े युद्ध का उद्देष्य क्या है? यही प्रश्न जीवन में हर घड़ी हम सब के सामने है। हम क्यों कुछ कर रहें हैं? हम क्यों पढ़ाई कर रहें हैं, क्यों नौकरी व्यवसाय कर रहें हैं , क्या कँही हम नौकरी या व्यवसाय या पढ़ाई करते वक़्त निजी सफ़लता को ही अपने जीवन की सफलता असफलता का पैमाना मान रहें हैं या वृत्तर उद्देश्य के प्रति सजग भी हैं आदि आदि। इन्ही सब उद्देश्यों से हमारे आचरण की परीक्षा हर पल हो रही है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गतिविधि में ये प्रश्न खड़ा है। अगर हमारी दृष्टि में व्यक्तिगत लाभ ही सब कुछ है , जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य है तो उद्देश्य के प्रति हमारा आचरण भिन्न हो जाता है और यदि उद्देश्य न्याय , सदाचार, सत्य जैसा बृहत्तर है तो आचरण भिन्न होता है। कार्य की महत्ता उसके उद्देश्य से निर्धारित होती है। अर्जुन अपने उद्देश्य के सम्बंध में भ्रमित है, हम सब भी अधिकांश समय अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति भ्रमित ही होते हैं। कौरव अपने उद्देश्य में निजी स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहें है जबकि युद्ध शुरू होने के पूर्व तक पांडवों के लिए राज्य से अधिक न्याय और सत्य का महत्व अधिक था। इस दृष्टिकोण से जो कौरव पक्ष में है वह अन्याय और असत्य की रक्षा के लिए खड़ा है , फिर ये बात गौण हो जाती है कि कौन गुरु है कौन पितामह है। सभी असत्य के रक्षक ही तो हैं। ऐसी स्थिति में यदि अर्जुन को सत्य और न्याय की रक्षा करनी है तो उसे भीष्म और द्रोण से भी लड़ना ही होगा। भीष्म और द्रोण गुरु या पितामह की भूमिका में नहीं हैं। वे तो अन्याय और असत्य के रक्षक की भूमिका में हैं। लड़ाई भीष्म या द्रोण से नहीं है, उनकी प्रवृत्ति और उद्देश्य से है। हमारे जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हम किसके साथ खड़े हैं आसुरी प्रवृत्तियों के साथ या दैवी प्रवृत्तियों के साथ। जब हमको इसका ज्ञान हो जाता है तो फिर हम निर्णय भी सही ले पाते हैं। अन्यथा हमारा भी हाल भ्रम में फँसे अर्जुन जैसा ही होता है, माया मोह में लिपटा एक नपुंसक और क्षुद्र प्रवृत्ति वाला इंसान!
वस्तुस्थिति की स्वीकारोक्ति ही सत्य का मार्ग दिखाती है। हम सच को तब तक नहीं जान पाते जब तक अपने झूठ को नहीं पकड़ लेते। हम आप सही रास्ते पर तब बढ़ते हैं जब हमें पता हो कि दूसरा रास्ता गलत है। लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के ठीक पहले तक हमारे अंदर ये द्वंद्व तो रहता ही है कि न जाने कौन सा रास्ता सही है। अर्जुन तमाम तरह के तर्क देकर अब थका हुआ प्रतीत होता है। मन में उपजा भ्रम जब आपकी योग्यता पर और आपके तकनीकी ज्ञान पर हावी होता है तो आप अपनी योग्यता या ज्ञान के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, बल्कि भ्रम और मोह के अनुसार निर्णय लेते हैं और अनिर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। भ्रम से कार्य के परिणाम की चिंता होती है। जैसे ही आप हम परिणाम के प्रति जागरूक होते हैं, हमारी कार्य दक्षता गिरने लगती है। आप जब इस मनोस्थिति में आते हैं कि आपके फलाना काम का क्या पता क्या परिणाम निकलेगा, अच्छा होगा या बुरा तब आप उस काम को करने से हिचकिचाने लगते हैं। परिणाम की चिंता आपके ज्ञान और दक्षता पर हमेशा ही भारी पड़ जाती है। नतीजा में हम निष्क्रिय होने लगते हैं। क्रियाशीलता का स्थान कुतर्क ले लेता है। यही वह स्थिति होती है जँहा से हम दो में एक मार्ग चुन सकते हैं, भ्रम को सदा सदा के लिए मिटा भी सकते हैं और सदा सदा के लिए अपना भी सकते हैं।
अर्जुन अब स्पष्ट रूप से मानसिक द्वंद्व के इस चरम पर पहुँचता दिख रहा है। वो साफ साफ स्वीकार करता है की वो अनिश्चय और अनिर्णय की हालत में है, युद्ध करना या नहीं करना कौन सा मार्ग सही है उसके लिए वो नहीं समझ पा रहा है। अब तक तो वह युद्ध करने का ही विरोध कर रहा था। अब वह स्वीकार कर रहा है कि उसे नहीं पता कि युद्ध करना सही है कि नहीं करना सही है, क्योंकि परिणाम अनिश्चित है और मारना उनको है जिनके बिना(यानी भीष्म और द्रोण ) वह जीना भी नहीं चाहता। इससे स्पष्ट होता है कि
---अर्जुन युद्ध से अधिक युद्ध के परिणाम को लेकर चिंतित है और उसी सम्भावित परिणाम के अनुसार अपने कर्तव्य तय करना चाहता है,
--- वह युद्ध का उद्देश्य राज और सुख भोग की प्राप्ति समझ रहा है,
----सुख भोग और राज पाट के लिए बन्धु बांधवों को मारना उसकी नजर में गलत है,
-----इस प्रकार उसके मन में युद्ध को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियाँ हैं।
अब आप अपने जीवन में घट रही घटनाओं की समीक्षा कीजियेगा तो पाइए कि हम जीवन का अधिकांश समय अर्जुन की तरह ही उहापोह में गंवा देते हैं। दोस्त, सम्बन्धी के कुकर्मों को जानते हुए भी आँख बंद कर लेते हैं, उनका विरोध नहीं करते, जब कि कर्तव्य निर्वाहन का समय आता है नफा नुकसान का तराजू लेकर बैठ जाते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और अनुचित है। हम सब अर्जुन की तरह दिग्भ्रमित ही बने फिर रहें होते हैं जीवन भर।
लेकिन परिवर्तन का मार्ग तब खुलता है जब हमें अपने भ्रमों की स्वीकारोक्ति होती है।
जब हमें आभास हो जाता है कि हम भ्रम में जी रहें हैं और इस भ्रम के कारण हम सही निर्णय नहीं ले पा रहें हैं तब हमारे अंदर सत्य जानने समझने की ईक्षा उतपन्न होती है और तब हम ऐसे व्यक्ति को खीजते हैं जो हमारे भ्रम को दूर कर हमें सही मार्ग दिखा सके। अर्थात तब हम गुरु की शरण खोजते हैं। जब तक ये भान नहीं होता कि हम अलग हैं परमात्मा अलग तब तक उस परम पिता परमात्मा से मिलने की उत्कंठा उतपन्न नहीं होती। जब तक हमें भ्रम का ज्ञान नहीं होता हमारे अंदर सच के प्रति अनुराग नहीं उतपन्न होता। जब ऐसा होता है तब हम ज्ञान, परमात्मा, सत्य आदि के लिए लालायित हो उठते हैं। तभी हमें गुरु यानी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो हमारेआ मार्गदर्शन कर हमें ज्ञान, सत्य और परमात्मा से मिला सके।
लेकिन इस स्थिति में हम आते कब हैं? यह स्थिति तब आती है जब हम महसूस करते हैं कि हमारा ज्ञान अधूरा है, जब हम ये समझते हैं कि हमारे पास क्षमता तो है लेकिन अपने अज्ञान के कारण हम अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहें हैं, जब हमें लगता है कि हमारा आचरण और हमारा स्वभाव में मैंन नहीं बैठ रहा है। अर्थात जब हमें अपनी अज्ञानता, अपने भ्रम का भान होने पर ही हमारे अंदर ज्ञान, सत्य, धर्म, और परमात्मा के प्रति अनुराग होता है, उसके पहले नहीं। परिवार, समाज, छात्र जीवन, व्यवसाय किसी भी क्षेत्र को ले लें हम तभी सत्य के प्रति , तभी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होते हैं जब हमें लगता है कि हम जो हो सकते हैं, हम जो कर सकते हैं वो वास्तव में हम हो नहीं पा रहें हैं, कर नहीं पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में हम किसी ज्ञानी, अनुभवी की शरण में जाना चाहते हैं। इसी तड़प से सन्मार्ग का मार्ग खुलता है।
युद्ध क्षेत्र में किसी पक्ष के किसी भी योद्धा को भ्रम नहीं हुआ है। भ्रम का शिकार मात्र और मात्र अर्जुन ही हुआ है जिसके टक्कर का योद्धा विरले ही है कोई। अर्जुन के अंदर अनुराग है, उसे तमाम ज्ञान और शक्ति हासिल होने के पश्चात भी अहंकार नहीं है। बल्कि उसे तो लगता है कि उसके ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग होना चाहिए। सो उसे जितना सही लगता है उतना तर्क करता है लेकिन चूँकि उसके अंदर सत्य और धर्म के प्रति गहरी आस्था है सो वह चाहता है कि उसे वह सलाह मिल सके जिससे सत्य और धर्म का उसका मार्ग विचलित न हो। इसी कारण से उसे अपने मत पर भरोसा नहीं होता। हम सभी को भी चाहिए कि हम खुद से जरुर प्रश्न करें कि जो हम करने जा रहें हैं क्या वह सत्य और धर्म के अनुरूप होगा।
आखिर इस धर्म का तातपर्य है क्या। वस्तुतः धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं। अब तक अर्जुन ने जो कुछ भी धर्म , सनातन धर्म या कुटुम्ब धर्म के बारे में कहा है यह उसकी परम्परागत सोच का परिणाम है। लेकिन धर्म की समझ के लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। आगे श्रीकृष्ण बताएंगे कि धर्म है क्या। अभी तो इतना ही समझना जरूरी है कि एक जागरूक विद्यार्थी की भाँति अर्जुन अपने ज्ञान के प्रति शंकालु है और चाहता है कि उसकी शंका का समाधान हो। जब हमारे अंदर शंका समाधान की ईक्षा उतपन्न होती है तब हम गुरु की शरण में जाते हैं।
ध्यान दें कि अर्जुन श्रीकृष्ण से अनुरोध करता है कि वे उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें। वह श्रीकृष्ण को गुरु नहीं कहता बल्कि खुद को उनका शिष्य बताता है। अभिव्यक्ति की यह भाषा बताती है कि अर्जुन में सत्य और धर्म को, अपने कर्तव्य कों समझने और जानने की अद्भुत बेचैनी है। यही बेचैनी हमारे अंदर आ जाये तो हमारा अहंकार मिट जाए। जैसे ही हम स्वीकार करते हैं कि हमें सत्य नहीं पता और हम सत्य का ज्ञान चाहते हैं वैसे ही हमारा भ्रम और भ्रम जनित अहंकार समाप्त हो जाता है। यंही से सत्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
प्रश्न प्रस्तुत हो तो उत्तर की उत्कंठा होती ही है। हर सोचने समझने, अच्छा बुरा की परवाह करने वाले के लिए ये जानना अति महत्वपूर्ण होता है कि अच्छा क्या है जो उसे करना होगा। हर विचारवान इंसान बुरा या गलत काम करने से बचना चाहता है और इसी कारण उसे जब भी कोई कार्य करना होता है तो वह पहले सोचता है कि उस कार्य को करना चाहिए या नहीं, उसके मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो वह करना है कँही वो कार्य ही तो गलत नहीं है। सो वह उस कार्य के प्रति तरह तरह से खुद से पहले तर्क करता है। यदि सन्तोषजनक उत्तर उसे अपने अंदर से ही मिल गया तब तो ठीक है, वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ता है, लेकिन यदि वह अपने ही उत्तर से संतुष्ट नहीं हो रहा होता है तो वह किसी ज्ञानी को खोजता है जिसे वह गुरु मानकर उससे निर्देश माँगता है। यह प्रक्रिया उसी के मन में होती है जो सही गलत की परवाह करता है। एक पेशवर हत्यारा सुपारी लेकर हत्या करते वक़्त हत्या के सही या गलत होने की परवाह नहीं करता। उसी प्रकार एक ऐसा विद्यार्थी जिसे विषय का ज्ञान नहीं वह उस विषय के प्रश्न से विचलित ही नही होता क्योंकि वह तो पढा ही नहीं है तो फिर कौन सा उत्तर सही होगा, कौन गलत उसे क्या पता, सो जो समझ में आता है उसे ही उत्तर में लिख देता है। एक जागरूक व्यवसायी या कृषक अपने हर कदम को परखता है तब आगे बढ़ता है। जब आपको एक महत्वपूर्ण पालिसी बनानी होती है तो आप उस ज्ञानी, जानकार विशेषज्ञ को खोजते हैं जिसे विषय के सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान हो। अब भला दुर्योधन को क्या दुविधा होनी है। वह तो सिर्फ एक ही काम जानता है कि छल से राज्य हड़पना है और यह नहीं हुआ तो मारकाट कर हड़पना है लेकिन अर्जुन को राज पाट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि जिस विधि से राज पाट लेने के लिए या उसे बचाने के लिए वह युद्ध के मैदान में शस्त्रों को धारण कर के आया हुआ है क्या वो विधी जायज है , धर्म संगत है , सत्य के अनुरूप है अथवा नहीं। उसके लिए साध्य(END) से ज्यादा महत्व साधन(MEANS) का है। उसके अनुसार यदि साधन गलत है तो साध्य भी गलत है। सो वह साधन की शुचिता के बारे में चिंतित है, सो वह पहले तो खुद से , और श्रीकृष्ण को सुनाकर तर्क करता है , ताकि श्रीकृष्ण उसके मत का समर्थन कर दें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि लोग बाग उसके ही तर्कों को सही मान लें। सो हर व्यक्ति अपने तर्कों को मित्रों आदि के समक्ष रखता ही है।लेकिन अपने सारे तर्कों से अर्जुन खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है तो भला श्रीकृष्ण को क्या संतुष्ट कर पायेगा बेचारा। वह खुद को खुद के तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अपने सारे तर्कों का प्रयोग कर के भी उसे शांति नहीं मिल पा रही है, वह उसी तरह से उद्विग्न है जैसे प्रारम्भ में प्रश्न रखने वक़्त था। यदि उत्तर मिल गया होता , यदि वह अपने उत्तर से अपने को संतुष्ट कर लिया होता तो श्रीकृष्ण की तरफ कभी नहीं देखता। घरबपरिवार, समाज, कार्यक्षेत्र में हम भी तो यही करते है, ऐसे हीं करते हैं। जब सही या गलत हम अपने तर्कों से खुद संतुष्ट होते हैं तब निर्णय लेते वक्त कँहा किसी की परवाह करते हैं। लेकिन जब साध्य से अधिक साधन के महत्व और उसकी शुचिता की चिंता करते हैं तो हम अपने निर्णय को साफ सुथरा, सत्यनिष्ठ, और धर्म आधारित रखना चाहते हैं। इसी सोच का परिणाम है कि अर्जुन के मन में राजपाट, यँहा तक की स्वर्ग का राज मिलने से भी प्रसन्नता नहीं मिल पाने की बात है। यदि साध्य अर्थात लक्ष्य राजपाट होता, यदि लक्ष्य सुख सुविधा को हासिल करना होता तो फिर अर्जुन के मन में कोई शंका नहीं होती, जैसे दुर्योधन को नहीं है। लेकिन एक विचारवान व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को लगता है कि जब गलत साधन से राजपाट हासिल किया जाएगा तो फिर भला मन को शांति कँहा से मिलेगी। और जिस लक्ष्य को हासिल कर शांति नहीं मिल सकती उसे हासिल कर ही क्या मिल जाएगा भला। कोई भी वस्तु जो शांति नही दे पाती हो उससे सुख क्या मिलेगा और जिस कार्य स शांति नहीं मिलने वाला उसे वह क्यों करे भला। अर्जुन तय नहीं कर पा रहा है कि वो जो कह रहा है वह सही है भी या नहीं। सो उसकी बेचैनी यथावत बनी हुई है। वह अपने ही तर्कों से हारा हुआ महसूस कर रहा है तभी तो उसकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो रहीं है अर्थात उसके SENSES काम नहीं कर रहें हैं और वह अनिर्णय से ग्रस्त हो रहा है। अधूरा ज्ञान पूर्ण होने के लिए छटपटा रहा है ,उसे गुरु की तलाश है जो उसके अधूरे ज्ञान को पूर्णता दे सके।
हर समझदार को अपनी अज्ञानता की जानकारी होनी ही चाहिए। यदि हम खुद को ज्ञानी मानते हैं तो हमारा पहला फर्ज है कि हमें इसका भी ज्ञान हो कि हमारे ज्ञान की सीमा कँहा तक है और हमें गुरु की आवश्यकता कब होगी। हमें जानना चाहिए कि हम जो करने जा रहें हैं, कर रहें हैं क्या उस साधन की सत्यता और शुचिता प्रमाणित है कि नहीं। अगर नहीं जानते तो जानने के लिए किसी की शरण में जाना बुराई नहीं है। जाना ही होगा अन्यथा गलत निर्णय लिए जाने की आशंका बनी रहेगी। लक्ष्य वही सत्य है जिससे हमें आत्मिक शांति मिलती है। धन, सम्पदा शांति नहीं देते। वे शांति के अनिवार्य शर्त नहीं हो सकते यदि उनको पाने का रास्ता असत्य और अधर्म से होकर जाता हो तो । आप खुद देखिये , परखिये अपने जीवन में, समाज के अन्य भागों में कि क्या गलत ढंग से अर्जित सम्पति, मान सम्मान, पद पदवी , डिग्री आदि से आपको या अन्य किसी को शांति नसीब हो रहा है। ये कोई सैद्धान्तिक या कागजी सत्य नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। आप खुद व्यवहार में देखें।
अब तक तो स्पष्ट हो चुका है कि अर्जुन अपनी ही बुद्धि के तर्कों के कारण शोक , भ्रम और अनिर्णय की स्थिति में है सो हथियार डालकर चुप हो जाने के सिवा उसके पास अपनी बुद्धि के अनुसार कोई और मार्ग बचा नहीं है सो वह वही करता है। लेकिन गीताकार ने शब्दों के चयन से कई तथ्यों को रेखांकित कर दिया है। अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित किया गया है, गुडाकेश और परन्तप यानी निंद्राविजयी और शत्रुओं का दमन करने वाला अर्थात अर्जुन के वास्तविक चरित्र को गीताकार में दिखाया है और हम सभी को यह भी याद दिलाया है कि महाज्ञानी, महाशक्तिशाली भी भ्रम में पड़कर अनिर्णय की स्थिति में आ सकते हैं। ये हमारे लिए वार्निंग बेल के समान है, खतरे की घण्टी है जो हमें सचेत करती है कि यदि हम भ्रम, मोह, माया में पड़े तो तमाम क्षमता के बावजूद हम कृपणता और कायरता के शिकार होकर नपुंसकता को प्राप्त कर सकते हैं जिस अवस्था में हमसे निर्णय नहीं लिया जा पाता और हम तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद भी प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं।
लेकिन इस अवस्था में अर्जुन किससे मदद माँग रहा है जरा इसपर भी देखें। श्रीकृष्ण की शरण में आया है अपनी बुद्धि शोधन के लिए और श्रीकृष्ण कौन हैं गीताकार के शब्दों में! वे हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी और गोविंद यानी सारी धरती उन्ही की है। अर्थात जब हमारा मन भ्रमित हो जाता है, जब हमें धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भान नहीं होता तब हमें किसके पास जाना चाहिए, किसकी मदद लेनी चाहिए इसपर विचार करना अत्यावश्यक है लेकिन उसके पहले हमें ये भी ध्यान रहे कि हम भ्रम में हैं इसकी स्वीकारोक्ति अनिवार्य है अन्यथा हम भी दुर्योधन की तरह अपने भ्रम और मोह , अहंकार और मूर्खता के प्रति बन्धे हीं रह जाएंगे जीवन भर। जिनको अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में आने भ्रम का अहसास तक नहीं होता वो खुद गुरुओं को ज्ञान देते फिरते हैं और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं जैसा दुर्योधन ने किया और भोग। लेकिन भ्रम के प्रति शंका और उसकी स्वीकारोक्ति हमें अर्जुन की तरह बनाती है, हम भले ही कुछ समय के लियर भ्रमित होते हैं लेकिन इन भ्रम को जैसे ही पहचानते हैं हमें चाहिए कि हम शीघ्रताशीघ्र उसके सम्पर्क में आना चाहिए जिसे खुद अपने इन्द्रियों यानी अपने सेंसेस पर नियंत्रण हो और जो अपने शरीर का खुद स्वामी हो । यानी कृष्ण की शिक्षाओं की शरण में आना चाहिए।
जब हम स्वीकारोक्ति के साथ और पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं तब हमें ज्ञान मिलता है, तभी गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारे अंदर टिकता भी है। हमारी इसी अवस्था में गुरु यानी श्री कृष्ण हमें ज्ञान देते हैं। अब चूँकि अर्जुन अपनी गलती को समझ कर पूर्ण समर्पण के साथ आ चुका है तो अब उसे परमगुरु यानी श्रीकृष्ण के द्वारा उसे दी गई शिक्षा भी मिलेगी। ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने अज्ञान को स्वीकारना और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही एक मात्र रास्ता है।
श्रीमद्भागवद गीता द्वितीय अध्याय प्रवेशिका
श्रीमद्भागवद गीता का द्वितीय अध्याय दूसरा सबसे बड़ा अध्याय है जिसमें 72 श्लोक हैं। अठारहवें अध्याय में कुल 78 श्लोक हैं और यह अध्याय सबसे बड़ा है। दूसरे अध्याय में गीता के सम्पूर्ण दर्शन से परिचय होता है। ध्यान रहे गीता किसी धर्म विशेष, सम्प्रदाय विशेष का ग्रंथ नहीं है अपितु यह उपनिषदों का सार है। गीता में एकीश्वरवाद की प्रधानता है जिसका कोई स्वरूप विशेष नहीं है । ये ग्रंथ व्यक्ति को परम् कल्याण का मार्ग बतलाती है।
प्रथम अध्याय में हम देखते हैं कि जब मन व्यथित और भ्रमित होता है तो हम विवेक खो देते हैं। नतीजा होता है कि अनिर्णय की स्थिति अथवा गलत निर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। यँहा प्रसंग युद्ध का है लेकिन विचलन की ये स्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में हो सकती है और उनसे पार पाने का रास्ता गीता बतलाती है। यूँ तो गीता की ढेरों बेहतरीन व्याख्याएँ मौजूद हैं सो किसी नई व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन गीता मात्र मोक्ष प्रदान करने का साधन भर नहीं है। हम किसी भी स्थिति से तभी पार पा सकते हैं जब यह समझ पाएँ की परिस्थिति विशेष में हमारी भूमिका क्या है। यदि हम अपने स्व यानी सेल्फ को नहीं जान पाते तो हमें सर्वाधिक भ्रम तो खुद के बारे में ही होता है कि हम तो निरीह हैं, साधन विहीन हैं अथवा हम ही सर्वज्ञ हैं। लेकिन जब हम अपनी स्थिति को जानते हैं , अपने सेल्फ को पहचानते हैं तो पता चलता है कि जीवन में हम जो भी हैं वो तो एक खास तरह के ज्ञानबोध के कारण हैं। इस सेल्फ को हम कर्म कर के ही जानते हैं । इसका मार्ग गीता बतलाती है। जब हम ये समझते हैं कि कर्म के माध्यम से हमें स्व यानी अपने सेल्फ की जानकारी हो सकती है , हम अपनी स्थिति को समझ सकते हैं तो फिर हम उस कर्म के मार्ग में चलने लगते हैं बिना किसी बाहरी दबाव के। ये रास्ता हमें परम् ज्ञान यानी परिणाम, उस परिणाम की तरफ लेकर जाता है जँहा हम अपने इस सेल्फ का विस्तार सम्पूर्ण विश्व में देखने लगते हैं। हम बड़े या छोटे ओहदे पर हो सकते हैं , अमीर या गरीब हो सकते हैं लेकिन खुद के सेल्फ का विस्तार पूरे जगत में देखने से हमारा विवेक जागृत होता है। तब हम उस लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं जिसे पाना हमारे प्रत्येक कर्म का अंतिम लक्ष्य होता है। गीता के महान टीकाकारों ने इसे साँख्ययोग, ज्ञानयोग कर्मयोग, भक्तियोग सन्यास योग जैसे नामों से पुकारा है। हम आप यदि इतना नहीं भी समझ पाते तो भी गीता को आत्मसात कर सकते हैं। इसीलिए गीता सबके लिए है।
गीता से हमारा परिचय भ्रम की अवस्था में ही होता है। अपने उहापोह को काट कर हम जीवन को जब सार्थक बनाने चलते हैं तो गीता ही हमारा पथप्रदर्शक है। इसका कोई भी सम्बध किसी सम्प्रदाय विशेष से नहीं है। प्रत्येक इंसान का लक्ष्य अपनी आत्मिक उन्नति है भले इसे व्यक्त करने की भाषा और माध्यम अलग अलग हो। ऐसा कौन होगा जो अत्याचार, अनाचार, अविवेक, असत्य, हिंसा में अपनी उन्नति देखना चाहेगा? जो ऐसा चाहता भी है तो उसका नाश वैसे ही होता है जैसे दुर्योधन का होता है। आप परिवार में हों, छात्र जीवन में हों, व्यवसाय में हों , राजनीति या नौकरी में हों या फिर सक्रिय जीवन से अवकाश लेकर रह रहे हों हर जगह आप पाते हैं कि झूठ फरेब की नींव पर खड़ी जिंदगी दरक जाती है, इंसान बर्बाद हो जाता है। आप प्रत्येक धड़ी ऐसे अगिनत उदाहरण देख सकते हैं। पर आप ये सब देखने समझने की क्षमता भी गीता से ही प्राप्त करते हैं। सो गीता सभी सम्प्रदायों से ऊपर का ज्ञान है जो मनुष्य मात्र के लिए है।
अब हम यथा सम्भव गीता के दूसरे अध्याय का अध्ययन श्लोक वार प्रारम्भ करेंगे और बिना हड़बड़ी के प्रत्येक श्लोक/श्लोक समूह को आत्मसात करने और आज के जीवम में इसका व्यवहारिक प्रशिक्षण भी लेंगे भले समय जो लगे। तभी हम वास्तव में इंसान बन पाएंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 1
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( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )
संजय उवाच
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥
संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोकयुक्त उस अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा
॥1॥
किसी विषय का बड़ा से बड़ा जानकार, बहुत बड़ा विद्वान, व्यवसायिक दृष्टिकोण से बहुत सफल आदमी भी जीवन में लड़खड़ा जाता है। आप अपने पारिवारिक, छात्र या व्यवसायिक जीवन में अचानक पाते हैं कि आप किसी बड़ी परेशानी में आ गए। ऐसा होता क्यों है कि बहुत ही जानकार आदमी भी समझ नहीं पाता कि उसे करना क्या है? और दूसरे आपके टूटे हुए मनोभाव को समझ जाते हैं? युद्ध कला में अर्जुन की कोई सानी नहीं। बड़े बड़े योद्धाओं को उसने पूर्व में पराजित भी किया है। उसकी धनुर्विद्या का लोहा सब मानते हैं। जीवन में उसने कई बुरे अनुभव भी पाए हैं और अपनी विद्या के बल पर, अपने सामर्थ्य के बल पर नाम भी खूब कमाया है लेकिन चिर प्रतीक्षित युद्ध जिसमें उसे बहुत कुछ करना है में आते लड़खड़ा जाता है। और लड़खड़ाता भी ऐसा है कि संजय भी समझ जाता है कि अर्जुन बुरी तरह व्यथित, दुखी और अनिर्णय की स्थिति में है, यानी उसकी दयनीय हालत जगजाहिर है, ठीक वैसे ही जैसे हम मुँह लटका कर बैठे हों और हर कोई समझ लेता है कि हम तो हैरान परेशान हैं , समझ ही नहीं पा रहें हैं कि आखिर करना क्या है। अर्जुन की युद्ध में ये हालत विरोधियों और अपने पक्ष में लड़ने आये उन लोगों को देख कर होती है जिनको वो शत्रु या मित्र की तरह नहीं देखता, जिनको वो धर्म और अधर्म के रक्षकों की तरह नहीं देखता बल्कि उनको परिजनों, गुरुजनों और मित्रजनों की तरह देखता है। अर्जुन की कमी व्यवसायिक ज्ञान यानी उज़के मामले में युद्ध कौशल में कमी नहीं है, उस कार्य में वह पूर्ण दक्ष है लेकिन सही गलत , अच्छा बुरा, धर्म अधर्म, न्याय अन्याय की समझ समाप्त होना उसकी कमी है। उसकी कमी है उसकी अच्छाई पर उसकी बुराई यानी भ्रम, मोह, असत्य आदि का हावी होना। यही हाल हर उस इंसान का होता है जो अपनी बुराई को खुद पर हावी होने देता है। उस समय आपकी व्यवसायिक दक्षता धरी की धरी रह जाती है।
जब भी कोई कार्य करने के लिए प्रवृत्त होते हैं और सही और गलत, जैसे धर्म और अधर्म/सत्य और असत्य/न्याय और अन्याय/सदाचार और अनाचार के अंतर को भूलकर अन्य बाहरी स्थितियों के प्रभाव मैं आ जाते हैं हम विचलित, दुखी और असहाय हो कर दुखी स्थिति में पहुँच जाते हैं , निर्णय नहीं ले पाते। घर हो विद्यालय हो, समाज हो या हमारे नौकरी पेशा की जगह हो कँही भी हम यदि अपने से बाहरी माहौल से यदि प्रभावित होकर व्यवहार करने लगते हैं तो हमारा व्यवहार हमारी क्षमता के अनुसार नहीं होकर बाहरी कारणों से प्रभावित होने लगता है। ऐसी स्थिति में हम एक मनोरोगी की तरह व्यवहार करने लगते हैं। एक बहुत काबिल सर्जन आपके अपेंडिक्स का ऑपरेशन करने वाला है और चीरा लगाने के पश्चात उसके मन में अपेंडिक्स के प्रति मोह जागृत हो जाये कि ये अपेंडिक्स तो बेचारा शरीर में जन्म से ही है तो वो इसे क्यों हटाने की कोशिश करने में लगा है, तब उस सर्जन के मन में बीमार वयक्ति की वृहत्त अच्छाई के बदले पेट दर्द का कारण बने अपेंडिक्स के प्रति करुणा का उतपन्न होना उस बीमार का अहित कर देगा। करुणा दर्द से पीड़ित के प्रति न होकर दर्द के कारण के प्रति होना भ्रम है और इस भ्रम से नुकसान उस व्यक्ति का है जो बीमार है।
इस प्रकार से विचलित मन ही चाहे वो जिसका हो एक मनोरोगी का ही है। सब सामर्थ्य रहते हुए भी मन की पीड़ा के कारण कार्य नहीं हो पा रहा है। ऐसी अवस्था में गुरु कौन हो सकता है, मार्गदर्शक कौन बन सकता है? वह जो इस तरह के दुष्ट मनोभाव को नष्ट करता हो। श्रीकृष्ण ने मधु नाम के राक्षस का वध किया था सो मधुसूदन कहलाये। आपके अंदर के इस भ्रम रूपी राक्षस को मारने वाले में मधुसूदन की क्षमता होनी जरूरी है, यानी आपके गलत विचारों के नाश करने की ताकत और समझ होनी जरूरी है। हर कोई हमारी इस मनोदशा को खत्म भी नहीं कर सकता।
सो हम सभी को चाहे हम जिस आयु वर्ग में हों, चाहे हमारी कोई भी पृष्ठभूमि हो हम सब को चाहिए कि अपनी बाहरी परिस्थितियों का आकलन करते समय हम उन्हीं से प्रभावित होकर अपना सयम खो कर सही गलत समझने की अपनी क्षमता ही नहीं खो दें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 2
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श्रीभगवानुवाच
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन।
श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है
॥2ll
श्रीमद्भगवद्गीता में सर्प्रथम श्रीकृष्ण पूरे श्लोक में बोल रहे हैं। हमने देखा कि प्रथम अध्याय में अर्जुन तरह तरह से युद्ध के विरुद्ध अपने तर्क प्रस्तुत कर रहा था, और अपने ही तर्कों में बुरी तरह उलझा उसका मन व्यथित हो जाता है। परंतु श्री कृष्ण कुछ बोल नहीं रहें है, चुपचाप ध्यान से उसकी बात को सुन रहें हैं। अर्जुन श्रीकृष्ण की तरफ से अपने तर्कों को सांकेतिक समर्थन भी न पाकर और भी व्यथित, दुखी और विचलित हो रहा है।
याद करें श्रीकृष्ण प्रथम अध्याय में अर्जुन को उसी के निदेश पर दोनों सेनाओं के मध्य ले आ कर खड़ा कर मात्र इतना ही कहें हैं कि, "पार्थ पश्यैतान् समवेतान् कुरूनिति॥" यानी कि "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"। उसके पश्चात अर्जुन जो भी कह रहा होता है वह उसकी मनोस्थोति है। वह जिस दृष्टिकोण से युद्ध को देख रहा होता है उसी के अनुसार उसकी मनःस्थिति हो रही है। उसका दृष्टिकोण तात्कालिक परिस्थितियों पर उसकी समझ की व्याख्या है। हम जो समझते हैं, परिस्थितितियों का आकलन करते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कितने विवेक से अपने दैवी गुणों अथवा अपने आसुरी गुणों के अनुसार उपयोग में लाते हैं। एक ही परिस्थिति को अलग अलग इंसान अपने अलग अलग दृष्टिकोण की वजह से अलग अलग तरह से देखते हैं। जब हम परिस्थिति का आकलन/मूल्यांकन अपने भ्रम, मोह, असत्य, अहंकार के अनुसार करते हैं तो वह परिस्थिति प्रतिकूल नजर आती है, जबकि यदि उसी को यदि हम विवेक, स्तय, न्याय आदि की दृष्टि से देखते हैं तो उस परिस्थिति को हम अपने अनुकूल पाते हैं।
जब हम भ्रम में मनोरोग की अवस्था तक चले जाते हैं तो मनोचिकित्सक शॉक ट्रीटमेंट देता है, ठीक वही शॉक ट्रीटमेंट श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहें हैं।
इंसान का भ्रम उसकी कमजोरी है। भ्रम से उतपन्न मोह अविवेक को बढ़ाता है। इस अवस्था में हम अपने ही ज्ञान को भूल जाते हैं। तब हम जो करते हैं वह हमारे भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों के लिए हानिकारक ही होता है। यह परिस्थिति जीवन के किसी भी प्रसंग में उतपन्न हो सकती है। जैसे ही हम भ्रम और भ्रम जनित मोह में फंसते हैं हम अपना ही भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों बिगाड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं।
एक ज्ञानी व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह खराब स्थिति को भी अपनी समझ से अनुकूल कर सकता है लेकिन अज्ञानी तो अनुकूल को भी प्रतिकूल कर सब का नाश कर देता है। यँहा देखते हैं कि श्री कृष्ण अर्जुन के सारे तर्कों यथा कुलधर्म ही सनातन धर्म है, कुलधर्म नष्ट होने से सनातन धर्म नष्ट होगा, समाज में वर्णसंकर पैदा होंगे जो पितरों को रुष्ट करेंगे आदि आदि को श्रीकृष्ण एक झटके से नकार देते हैं और अर्जुन की भर्त्सना करते कहते हैं कि ये सब तर्क अज्ञान हैं जो मोह से उतपन्न है। मोह से इंसान का अतीत, वर्तमान और भावी तीनों खराब होता है। हर इंसान तीन बातों से उत्प्रेरित होकर अपना कार्य करता है। वह चाहता है कि उसके कार्यों से उसके खानदान का नाम रौशन हो (अतीत) , उसका नाम रौशन हो(वर्तमान) और उसका और उसकी आने वाली पीढियीं को अच्छी व्यवस्था मिले(भविष्य)। लेकिन मोह और भ्रम वश जो कार्य किये जाते हैं उनसे ये तीनों लक्ष्य पूरे नहीं होते हैं। अन्याय एवम अनाचार को सहना अज्ञान ही है । जीवन की किसी भी परिस्थिति में जब हमारा कार्य मोह और भ्रम से उतपन्न मनोभाव पर आधारित होता है तो फिर वह निर्णय उचित नही होता है। परिवार के मामले हों , व्यवसाय के मामले हों, सामाजिक मामले हों , छात्र जीवन के मामले हों या फिर कुछ और, जब हम अपना कर्तव्य व्यक्ति/वस्तु/विचार विशेष के प्रति मोह से निर्धारित करते हैं तो फिर हमारा वो कर्तव्य हमें रास्ते से भटकाने वाला होता है, जिसके परिणाम में हम लक्ष्य से भटक जाते हैं। आसुरी गुण यानी भ्रम और मोह से किसी भी व्यक्ति का चरित्र यानी उसकी अपनी शख्सियत यानी उसका अपना स्व(सेल्फ) समाप्त हो जाता है और वह उटपटांग और आत्मघाती निर्णय लेता है।
ध्यान दें कि श्रीकृष्ण के कथन को गीताकार ने भगवान उवाच का नाम दिया है, न कि श्रीकृष्ण उवाच। अर्थात गीताकार का मानना है कि श्रीकृष्ण उसी स्तर के साधक हैं जिस स्तर पर ईश्वर स्वम् हैं। श्रीकृष्ण उस समस्त ज्ञान, विभूति और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं जिसे प्राप्त कर इंसान हर चीज को साध लेता है।
श्रीकृष्ण के कथन से स्पष्ट है कि , एक तो हमें भ्रम और मोह के प्रभाव में निर्णय नहीं लेना चाहिए। दूसरे कि हमें अन्याय , अनाचार का समर्थन नहीं करना चाहिए। तीसरे कि हमें कुरूतियों से बचना चाहिए। चौथा जो सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है वो ये है कि व्यक्ति का सेल्फ सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। व्यक्ति का आकलन उसके कार्यों के अनुसार होता है न कि उसके साथ हमारे सम्बन्ध से। इसी प्रकार किसी भी स्थिति में स्थूल का महत्व उसके द्वारा किये गए कार्य के मूल्यांकन से होता है। किसी भी स्थिति में हमें चाहिए कि हम अपने विवेक पर माया , मोह, भ्रम को हावी नहीं होने दें क्योंकि इससे हमारी स्वाभाविक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है और तब हम निराशा में डूब जाते हैं।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 3
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
इसलिए हे अर्जुन! नपुंसकता को मत प्राप्त हो, तुझमें यह उचित नहीं जान पड़ती। हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा
॥3॥
श्रीकृष्ण अपनी बात आगे बढाते हुए अर्जुन को चार बातें कहते कहते हैं
---नपुंसकता को मत प्राप्त हो
----नपुंसकता तुम्हारे लिए उचित नहीं है
----- हृदय की दुर्बलता को छोड़ो
-------युद्ध के लिए उठ खड़े हो जाओ
अर्जुन युद्ध नहीं करने के तमाम तर्क प्रस्तुत कर चुका है। बन्धु बाँधवों से युद्ध करना, भले ही वो आतताई ही क्यों न हों, उचित नहीं , क्योंकि इससे कुलधर्म यानी सनातन धर्म नष्ट होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी, वर्णसंकर जनमेंगे जिससे पितर नाराज होंगे, जो सम्पत्ति और राज मिलेगा उसे साथ भोगने वाले बन्धु और मित्र नहीं होंगे आदि आदि उसके तर्क रहें हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की सोच नपुंसकता दर्शाती है जो अर्जुन जैसे व्यक्ति के लिए उचित नहीं। ये हृदय की कमजोरी की निशानी हैं सो अर्जुन का आह्वान करते हैं कि इसे छोड़कर वह युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाये।
विषयगत प्रसंग युद्ध का है सो चर्चा युद्ध की है। जैसा हम देख चुके हैं कि हर परिस्थिति में जब भ्रम और मोह हावी होते हैं तो विवेक नष्ट होता है जिससे निर्णय लेने की हमारी क्षमता प्रभावित हो जाती है। कार्य करने की तमाम तकनीकी योग्यता और ज्ञान रहने के बावजूद हम कार्य करने से भागते हैं क्योंकि हम मानसिक तौर पर उस कार्य को करने के योग्य नही रह जाते, भ्रम और मोह जनित मनोविकारों के। तब हम बहाने बनाने लगते हैं। परिवार, व्यवसाय, छात्र जीवन, समाज हर जगह लोग इस बीमारी के शिकार बराबर होते रहते हैं। ऐसे ही लोगों को श्रीकृष्ण सम्बोधित कर रहें हैं। अर्जुन तो शारीरिक रूप से नपुंसक नहीं है तब श्री कृष्ण उससे नपुंसक बनने की बात भला क्यों कहते हैं। नपुंसकता तो यही है कि जिस कार्य को करने के लिए आपको स्वाभाविक रूप से सक्षम होना होता है उसी में आप अक्षमता का प्रदर्शन कर रहें हैं। जैसे सैनिक लड़ने से डरे, छात्र पढ़ने से भागे, व्यवसायी का मन व्यवसाय में न लगे तो ये सभी उनके स्वाभाविक गुण से भिन्न ही तो है।।निर्धारित भूमिका को निभाने की अक्षमता ही नपुंसकता है क्योंकि इस अक्षमता से आगे बढ़ पाने का रास्ता बन्द हो जाता है। ये आता कँहा से है? जब हम अपने सेल्फ यानी स्व को नहीं पहचानते यानी अपनी ही आत्मा को जानने से इनकार कर देते हैं तो नपुंसकता का जन्म होता है। अर्जुन युद्ध भूमि में अन्याय अधर्म का प्रतिकार करने आया है और लगता है आतताइयों की रक्षा का उपाय करने। तो स्वाभाविक है कि यह तो नपुंसकता ही है। सो श्रीकृष्ण की शिक्षा है कि हमें कभी भी अपने निर्धारित कर्तव्य से नहीं मुँह मोड़ कर भागना चाहिए चाहे जीवन का कोई भी प्रसंग हो। यह बात तब और महत्वपूर्ण हो जाती है जब हमें उस कार्य को करने की पूर्ण तकनीकी योग्यता और सामर्थ्य भी हो। इसीलिए ये आचरण हमारे अनुकूल नहीं होता। अर्जुन तो युद्ध विद्या के साथ साथ शास्त्रों का भी ज्ञाता है, पूर्व में कई बार अपनी योग्यता का परिचय दे चुका है , उसे पता है कि उसकी क्षमताएँ क्या हैं तो फिर नपुंसकता का आचरण उसके लिए कैसे अपेक्षित हो सकता है। इस प्रकार श्री कृष्ण अर्जुन को उसके सेल्फ की याद दिलाने की कोशिश करते हैं।
फिर हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके तर्कों और उसके मनोभावों को क्षुद्र यानी नीच श्रेणी का मानते हैं और इसे उसकी हृदय की दुर्बलता कहते हैं। विवेक और भावना दो महत्वपूर्ण कारक होते हैं जो हमारे कार्य करने की प्रवृत्ति को निर्धारित करते हैं। जब विवेक से लिये गए निर्णय में भावना को भी स्थान मिलता है और भावना भी विवेक से संचालित होती है तो फिर हम संयमित निर्णय पर पहुंचते हैं। लेकिन यदि ये दोनों अपनी मात्रा में असन्तुलित हो जाते हैं तो फिर हमारा निर्णय, कार्यप्रणाली भी असंयमित हो जाती है। यही हमारे हृदय की दुर्बलता है, यही हमारी नीचता है। उदाहरण स्वरूप जीवन में अधर्म, अन्याय के पक्ष में खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और अनुराग अहिंसा नहीं नीचता है , ज्यादा अंको के लिए छात्र का चोरी करते पकड़ कर उसे अपना सम्बन्धी जानकर छोड़ देना नीचता है, एक अपराधी को अपने लाभ के लोभ में बख्शना नीचता है। यही नीचता हमारी दुर्बलता का परिचायक है। श्री कृष्ण इस नीचता से उबरने की सलाह देते हैं।
और तब कहते हैं कि नपनुसकता और हृदय की नीचता को छोड़कर अर्जुन यानी हम सब खड़े हो जाएं, हताश न हों और युद्ध करें यानी अपने कर्तव्य निर्वाहन के लिए तैयार हो जाएं।
जीवन में जब कभी भी हमें लगे कि हमें अपने दायित्वों को निभाने में हिचक, निराशा, भय हो रहा है तब तब हमें स्मरण करनस चाहिए कि हम वास्तव में क्या हैं, हमारी क्षमताएँ क्या हैं और हमें श्री कृष्ण की इस शिक्षा को याद कर आगे बढ़ना चाहिए।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 4
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अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
अर्जुन बोले- हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे अरिसूदन! वे दोनों ही पूजनीय हैं
॥4॥
श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को समझाना चाहा है तो अर्जुन पुनः प्रतिवाद करता है और वह स्पष्ट कहता है कि चूँकि भीष्म और द्रोण उसके लिए पूजनीय हैं सो वह उनसे युद्ध नहीं कर सकता है। श्रीकृष्ण को वह मधुसूदन और अरिसूदन नामों से सम्बोधित करता है जिसका अर्थ होता है शत्रुओं का नाश करने वाला। उसका तर्क है कि आप तो शत्रुहन्ता हैं , शत्रुओं को मारने वाले हैं लेकिन भीष्म मेरे पितामह और द्रोण गुरु हैं मेरे जो मेरे लिए पूजनीय हैं तो भला मैं उनसे कैसे युद्ध कर सकता हूँ। अर्जुन कोई नई बात नहीं कह रहा है, बस अपने पुराने तर्कों को दुहरा रहा है। श्रीकृष्ण के समझाने का स्पष्ट रूप से उसपर कोई असर नहीं हुआ है। जब हम सामने वाले को अपने ही स्तर का समझदार समझते हैं तो उसकी सलाह भी नहीं मानते। अगर वो कुछ कहता भी है तो उसकी समझ को ही चुनौती दे डालते हैं। जब तक आप अपने सलाहकार की बुद्धि पर भरोसा नहीं करते उसके सुझाव को नहीं मान सकते। तभी तो श्रीकृष्ण के कठोर वचनों को भी अर्जुन गम्भीरता से नहीं लेकर अपने पुराने तर्क ही प्रस्तुत कर देता है।
हमारा मन उसी को सत्य मानता है जो हम बचपन से देखते सुनते समझते आये हैं। जो नीति अनीति सीखे हैं उससे बाहर की बात सुनना हमें मंजूर नहीं होता भले समझाने वाला कितना भी ज्ञानी क्यों न हो।
बड़ों का और गुरु का सम्मान कँही से भी गलत नहीं सो एक दफा तो लगता है कि अर्जुन ठीक ही कह रहा है कि वह भला पितामह और गुरु से कैसे लड़े। लेकिन ध्यान देने की बात है कि पितामह और गुरु एक पद हैं जो किसी व्यक्ति के द्वारा किसी समय विशेष में धारित किये जाते हैं। अगर किसी अन्य समय या परिस्थिति में वही व्यक्ति किसी अन्य भूमिका में हो तो क्या वह इस पद के सम्मान का अधिकारी है? और हमारा खुद का पद अथवा स्थिति यानी स्टेटस उस समय विशेष या परिस्थिति विशेष में क्या पहले वाला ही है? वंश परम्परा में भीष्म अर्जुन के पितामह तो हैं, गुरु शिष्य परम्परा में द्रोण उसके गुरु भी हैं लेकिन जब भीष-द्रोण एक पक्ष ले कर एक सेना के साथ आ गए और अर्जुन एक अन्य पक्ष लेकर दूसरी सेना में आ गया और दोनों पक्षों के उद्देश्य, मान मर्यादा भिन्न हो गए तो क्या पुराने सम्बन्धों के अनुसार ही वर्तमान सत्य का निर्धारण हो पाना सम्भव है? हर परिस्थिति में हमारी भूमिका बदल जाती है। भीष्म और द्रोण अधर्म, असत्य, अनाचार, अन्याय का पक्ष ले चुके हैं। उन्होंने अपनी भूमिका तय कर ली है कि वे दुर्योधन के अनाचार के समर्थन में पांडवों के सत्य, न्याय के आग्रह का विरोध करेंगे ही तो क्या सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े अर्जुन को इस बात की आजादी हो सकती है कि वह अपने सत्य और न्याय के आग्रह को छोड़कर भीष्म और द्रोण की पूजा सिर्फ इसलिए करे कि वे पितामह हैं, वे गुरु हैं? इतनी समझ अर्जुन को क्यों नहीं आ रही है?
जीवन में यही असमंजस हमें परिस्थिति के सत्य से विचलित कर देती है। और हम नहीं जानते हुए भी गलत के साथ खड़े हो जाते हैं। भ्रम से उपजे ज्ञान में अहंकार की मात्रा सबसे अधिक होती है। इस अहंकार की धुंध में सच नहीं सूझता और हम अपनी रूढ़ियों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते। उसी रूढ़ि की वजह से हम नहीं समझ पाते कि हमारा विस्तार परिवार और परिवारजन्य संस्थाओं और मान्यताओं तक ही सीमित नहीं है। मूल बात सम्बन्धों से नहीं तय होते बल्कि मूल बात तय होते हैं सत्य के प्रति हमारे आग्रह से। रक्त सम्बन्ध से सत्य तय नही होते, मित्रता और सम्मान के सम्बन्धों से सत्य नहीं तय होते। सत्य तो शाश्वत है, ये हमपर निर्भर करता है कि हम किधर जाना तय करते हैं। एक बलात्कारी सम्बन्धी का समान आवश्यक है या पीड़िता के पक्ष में खड़ा सत्य है ये हमें तय करना होता है। हमारे इसी निर्णय से तय होता है कि समाज में भविष्य में शांति होगी या अशांति, अनाचार फैलेगा या सदाचार। यदि हम भ्रम और अहंकार से निकल कर अपने को सदाचार, सत्य, , न्याय के प्रति समर्पित करेंगे तो हो सकता है कि हमें उन लोगों के खिलाफ भी खड़ा होना हो जो हमारे प्रिये तो हैं लेकिन असत्य और अन्याय अनाचार के साथ खड़े हैं। ये तय करने की जबाबदेही हमारी है कि हम व्यक्ति और व्यक्तिगत सम्बन्धों को ज्यादा महत्व देंगे या फिर उस सत्य को जिससे समाज में न्याय की स्थापना होने में मदद मिलेगी। ये तय तभी कर पाते हैं जब हम भ्रम से बाहर निकल कर निर्णय लेते हैं। परिवार हो , मित्रमण्डली हो, सामाजिक या व्यवसायिक रिश्ते हों हर जगह दो पक्ष मिलते है। अब उन परिस्थितियों में ये तय करना हमारी जबाबदेही है कि हम किस पक्ष में जाते हैं। यदि क्षुद्र स्वार्थ वश हम गलत का साथ देते हैं तो अंततः स्वयम भी उसी गलत के शिकार हो जाते हैं। यदि सही का साथ देते हैं तो कुछ देर के विप्लव के पश्चात हम भी उस सामाजिक उन्नति का लाभ लेते हैं जो हमारे सत्य का साथ देने से उतपन्न होती है। लेकिन पहले भ्रम और भ्रम जनित अहंकार से तो खुद को निकालें, माया , मोह के मकड़जाल को तो तोड़ें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 5
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गुरूनहत्वा हि महानुभावा-
ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्॥
इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी खाना कल्याणकारक समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा
॥5॥
जब भी हम किसी कार्य को करने के लिए प्रवृत्त होते हैं तो उस कार्य करने का उद्देश्य हमारे मानस पटल पर स्पष्ट होना अति आवश्यक होता है अन्यथा हम विभन्न प्रकार के संशय के शिकार हो जाते हैं। यदि हमारे कार्य करने का उद्देश्य निजी और अल्पकालीन स्वार्थ होता है तो कार्य का परिणाम कुछ और निकलता है और यदि उसी कार्य का उद्देश्य व्यपक सामाजिक हित हो तो परिणाम एकदम भिन्न होता है। इसके साथ ही हमारे उद्देश्य की प्रकृति के कारण हमारे कार्य करने का उत्साह और तौर तरीके भी भिन्न हो जाते हैं। अर्जुन युद्ध में क्यों खड़ा है? क्या ये तथ्य अर्जुन को स्पष्ट है? यदि अर्जुन का उद्देश्य राज्य और राजपाट से मिलने वाले सुख भोग हैं तो बात और हो जाती है और यदि अर्जुन का उद्देश्य अन्याय, अनाचार, अत्याचार, असत्य का विरोध करना होता है तो दूसरी बात होती है। अर्जुन के तर्क को देखें तो पता चलता है कि उसे लगता है कि वह तो युद्ध में मात्र राजपाट और राजपाट से मिलने वाले सुख, और भोग के लिए आया है। अगर उद्देश्य ये सब हैं तो अर्जुन का तर्क कि भीष्म और द्रोण सरीखे महान गुरुओं की हत्या कर राजपाट लेने से ज्यादा अच्छा तो भीख माँगकर जीवनयापन करना है। लेकिन क्या कुरुक्षेत्र का मैदान मात्र आपसी वैर का हिसाब किताब करने के लिए सजा है? आखिर इतने बड़े युद्ध का उद्देष्य क्या है? यही प्रश्न जीवन में हर घड़ी हम सब के सामने है। हम क्यों कुछ कर रहें हैं? हम क्यों पढ़ाई कर रहें हैं, क्यों नौकरी व्यवसाय कर रहें हैं , क्या कँही हम नौकरी या व्यवसाय या पढ़ाई करते वक़्त निजी सफ़लता को ही अपने जीवन की सफलता असफलता का पैमाना मान रहें हैं या वृत्तर उद्देश्य के प्रति सजग भी हैं आदि आदि। इन्ही सब उद्देश्यों से हमारे आचरण की परीक्षा हर पल हो रही है। हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी गतिविधि में ये प्रश्न खड़ा है। अगर हमारी दृष्टि में व्यक्तिगत लाभ ही सब कुछ है , जीवन का सम्पूर्ण उद्देश्य है तो उद्देश्य के प्रति हमारा आचरण भिन्न हो जाता है और यदि उद्देश्य न्याय , सदाचार, सत्य जैसा बृहत्तर है तो आचरण भिन्न होता है। कार्य की महत्ता उसके उद्देश्य से निर्धारित होती है। अर्जुन अपने उद्देश्य के सम्बंध में भ्रमित है, हम सब भी अधिकांश समय अपने जीवन के उद्देश्यों के प्रति भ्रमित ही होते हैं। कौरव अपने उद्देश्य में निजी स्वार्थ को अधिक महत्व दे रहें है जबकि युद्ध शुरू होने के पूर्व तक पांडवों के लिए राज्य से अधिक न्याय और सत्य का महत्व अधिक था। इस दृष्टिकोण से जो कौरव पक्ष में है वह अन्याय और असत्य की रक्षा के लिए खड़ा है , फिर ये बात गौण हो जाती है कि कौन गुरु है कौन पितामह है। सभी असत्य के रक्षक ही तो हैं। ऐसी स्थिति में यदि अर्जुन को सत्य और न्याय की रक्षा करनी है तो उसे भीष्म और द्रोण से भी लड़ना ही होगा। भीष्म और द्रोण गुरु या पितामह की भूमिका में नहीं हैं। वे तो अन्याय और असत्य के रक्षक की भूमिका में हैं। लड़ाई भीष्म या द्रोण से नहीं है, उनकी प्रवृत्ति और उद्देश्य से है। हमारे जीवन में भी यही महत्वपूर्ण है कि हम किसके साथ खड़े हैं आसुरी प्रवृत्तियों के साथ या दैवी प्रवृत्तियों के साथ। जब हमको इसका ज्ञान हो जाता है तो फिर हम निर्णय भी सही ले पाते हैं। अन्यथा हमारा भी हाल भ्रम में फँसे अर्जुन जैसा ही होता है, माया मोह में लिपटा एक नपुंसक और क्षुद्र प्रवृत्ति वाला इंसान!
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 6
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न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना- इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं
॥6॥
वस्तुस्थिति की स्वीकारोक्ति ही सत्य का मार्ग दिखाती है। हम सच को तब तक नहीं जान पाते जब तक अपने झूठ को नहीं पकड़ लेते। हम आप सही रास्ते पर तब बढ़ते हैं जब हमें पता हो कि दूसरा रास्ता गलत है। लेकिन इस स्थिति तक पहुँचने के ठीक पहले तक हमारे अंदर ये द्वंद्व तो रहता ही है कि न जाने कौन सा रास्ता सही है। अर्जुन तमाम तरह के तर्क देकर अब थका हुआ प्रतीत होता है। मन में उपजा भ्रम जब आपकी योग्यता पर और आपके तकनीकी ज्ञान पर हावी होता है तो आप अपनी योग्यता या ज्ञान के अनुसार निर्णय नहीं ले पाते, बल्कि भ्रम और मोह के अनुसार निर्णय लेते हैं और अनिर्णय की स्थिति में फँस जाते हैं। भ्रम से कार्य के परिणाम की चिंता होती है। जैसे ही आप हम परिणाम के प्रति जागरूक होते हैं, हमारी कार्य दक्षता गिरने लगती है। आप जब इस मनोस्थिति में आते हैं कि आपके फलाना काम का क्या पता क्या परिणाम निकलेगा, अच्छा होगा या बुरा तब आप उस काम को करने से हिचकिचाने लगते हैं। परिणाम की चिंता आपके ज्ञान और दक्षता पर हमेशा ही भारी पड़ जाती है। नतीजा में हम निष्क्रिय होने लगते हैं। क्रियाशीलता का स्थान कुतर्क ले लेता है। यही वह स्थिति होती है जँहा से हम दो में एक मार्ग चुन सकते हैं, भ्रम को सदा सदा के लिए मिटा भी सकते हैं और सदा सदा के लिए अपना भी सकते हैं।
अर्जुन अब स्पष्ट रूप से मानसिक द्वंद्व के इस चरम पर पहुँचता दिख रहा है। वो साफ साफ स्वीकार करता है की वो अनिश्चय और अनिर्णय की हालत में है, युद्ध करना या नहीं करना कौन सा मार्ग सही है उसके लिए वो नहीं समझ पा रहा है। अब तक तो वह युद्ध करने का ही विरोध कर रहा था। अब वह स्वीकार कर रहा है कि उसे नहीं पता कि युद्ध करना सही है कि नहीं करना सही है, क्योंकि परिणाम अनिश्चित है और मारना उनको है जिनके बिना(यानी भीष्म और द्रोण ) वह जीना भी नहीं चाहता। इससे स्पष्ट होता है कि
---अर्जुन युद्ध से अधिक युद्ध के परिणाम को लेकर चिंतित है और उसी सम्भावित परिणाम के अनुसार अपने कर्तव्य तय करना चाहता है,
--- वह युद्ध का उद्देश्य राज और सुख भोग की प्राप्ति समझ रहा है,
----सुख भोग और राज पाट के लिए बन्धु बांधवों को मारना उसकी नजर में गलत है,
-----इस प्रकार उसके मन में युद्ध को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियाँ हैं।
अब आप अपने जीवन में घट रही घटनाओं की समीक्षा कीजियेगा तो पाइए कि हम जीवन का अधिकांश समय अर्जुन की तरह ही उहापोह में गंवा देते हैं। दोस्त, सम्बन्धी के कुकर्मों को जानते हुए भी आँख बंद कर लेते हैं, उनका विरोध नहीं करते, जब कि कर्तव्य निर्वाहन का समय आता है नफा नुकसान का तराजू लेकर बैठ जाते हैं और भूल जाते हैं कि हमारे लिए क्या करना उचित है और अनुचित है। हम सब अर्जुन की तरह दिग्भ्रमित ही बने फिर रहें होते हैं जीवन भर।
लेकिन परिवर्तन का मार्ग तब खुलता है जब हमें आने भ्रमों की स्वीकारोक्ति होती है।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 7
----------------------------------------कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए
॥7॥
जब हमें आभास हो जाता है कि हम भ्रम में जी रहें हैं और इस भ्रम के कारण हम सही निर्णय नहीं ले पा रहें हैं तब हमारे अंदर सत्य जानने समझने की ईक्षा उतपन्न होती है और तब हम ऐसे व्यक्ति को खीजते हैं जो हमारे भ्रम को दूर कर हमें सही मार्ग दिखा सके। अर्थात तब हम गुरु की शरण खोजते हैं। जब तक ये भान नहीं होता कि हम अलग हैं परमात्मा अलग तब तक उस परम पिता परमात्मा से मिलने की उत्कंठा उतपन्न नहीं होती। जब तक हमें भ्रम का ज्ञान नहीं होता हमारे अंदर सच के प्रति अनुराग नहीं उतपन्न होता। जब ऐसा होता है तब हम ज्ञान, परमात्मा, सत्य आदि के लिए लालायित हो उठते हैं। तभी हमें गुरु यानी ऐसे व्यक्ति की तलाश होती है जो हमारेआ मार्गदर्शन कर हमें ज्ञान, सत्य और परमात्मा से मिला सके।
लेकिन इस स्थिति में हम आते कब हैं? यह स्थिति तब आती है जब हम महसूस करते हैं कि हमारा ज्ञान अधूरा है, जब हम ये समझते हैं कि हमारे पास क्षमता तो है लेकिन अपने अज्ञान के कारण हम अपनी क्षमता के अनुसार अपना कर्तव्य नहीं कर पा रहें हैं, जब हमें लगता है कि हमारा आचरण और हमारा स्वभाव में मैंन नहीं बैठ रहा है। अर्थात जब हमें अपनी अज्ञानता, अपने भ्रम का भान होने पर ही हमारे अंदर ज्ञान, सत्य, धर्म, और परमात्मा के प्रति अनुराग होता है, उसके पहले नहीं। परिवार, समाज, छात्र जीवन, व्यवसाय किसी भी क्षेत्र को ले लें हम तभी सत्य के प्रति , तभी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होते हैं जब हमें लगता है कि हम जो हो सकते हैं, हम जो कर सकते हैं वो वास्तव में हम हो नहीं पा रहें हैं, कर नहीं पा रहें हैं। ऐसी स्थिति में हम किसी ज्ञानी, अनुभवी की शरण में जाना चाहते हैं। इसी तड़प से सन्मार्ग का मार्ग खुलता है।
युद्ध क्षेत्र में किसी पक्ष के किसी भी योद्धा को भ्रम नहीं हुआ है। भ्रम का शिकार मात्र और मात्र अर्जुन ही हुआ है जिसके टक्कर का योद्धा विरले ही है कोई। अर्जुन के अंदर अनुराग है, उसे तमाम ज्ञान और शक्ति हासिल होने के पश्चात भी अहंकार नहीं है। बल्कि उसे तो लगता है कि उसके ज्ञान और शक्ति का सही उपयोग होना चाहिए। सो उसे जितना सही लगता है उतना तर्क करता है लेकिन चूँकि उसके अंदर सत्य और धर्म के प्रति गहरी आस्था है सो वह चाहता है कि उसे वह सलाह मिल सके जिससे सत्य और धर्म का उसका मार्ग विचलित न हो। इसी कारण से उसे अपने मत पर भरोसा नहीं होता। हम सभी को भी चाहिए कि हम खुद से जरुर प्रश्न करें कि जो हम करने जा रहें हैं क्या वह सत्य और धर्म के अनुरूप होगा।
आखिर इस धर्म का तातपर्य है क्या। वस्तुतः धर्म कोई सम्प्रदाय नहीं। अब तक अर्जुन ने जो कुछ भी धर्म , सनातन धर्म या कुटुम्ब धर्म के बारे में कहा है यह उसकी परम्परागत सोच का परिणाम है। लेकिन धर्म की समझ के लिए हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी। आगे श्रीकृष्ण बताएंगे कि धर्म है क्या। अभी तो इतना ही समझना जरूरी है कि एक जागरूक विद्यार्थी की भाँति अर्जुन अपने ज्ञान के प्रति शंकालु है और चाहता है कि उसकी शंका का समाधान हो। जब हमारे अंदर शंका समाधान की ईक्षा उतपन्न होती है तब हम गुरु की शरण में जाते हैं।
ध्यान दें कि अर्जुन श्रीकृष्ण से अनुरोध करता है कि वे उसे शिष्य के रूप में स्वीकार करें। वह श्रीकृष्ण को गुरु नहीं कहता बल्कि खुद को उनका शिष्य बताता है। अभिव्यक्ति की यह भाषा बताती है कि अर्जुन में सत्य और धर्म को, अपने कर्तव्य कों समझने और जानने की अद्भुत बेचैनी है। यही बेचैनी हमारे अंदर आ जाये तो हमारा अहंकार मिट जाए। जैसे ही हम स्वीकार करते हैं कि हमें सत्य नहीं पता और हम सत्य का ज्ञान चाहते हैं वैसे ही हमारा भ्रम और भ्रम जनित अहंकार समाप्त हो जाता है। यंही से सत्य का मार्ग प्रशस्त होता है।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 8
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न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-
द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-
राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्॥
क्योंकि भूमि में निष्कण्टक, धन-धान्य सम्पन्न राज्य को और देवताओं के स्वामीपने को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके
॥8॥
प्रश्न प्रस्तुत हो तो उत्तर की उत्कंठा होती ही है। हर सोचने समझने, अच्छा बुरा की परवाह करने वाले के लिए ये जानना अति महत्वपूर्ण होता है कि अच्छा क्या है जो उसे करना होगा। हर विचारवान इंसान बुरा या गलत काम करने से बचना चाहता है और इसी कारण उसे जब भी कोई कार्य करना होता है तो वह पहले सोचता है कि उस कार्य को करना चाहिए या नहीं, उसके मन में ये प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि जो वह करना है कँही वो कार्य ही तो गलत नहीं है। सो वह उस कार्य के प्रति तरह तरह से खुद से पहले तर्क करता है। यदि सन्तोषजनक उत्तर उसे अपने अंदर से ही मिल गया तब तो ठीक है, वह उसी के अनुरूप आगे बढ़ता है, लेकिन यदि वह अपने ही उत्तर से संतुष्ट नहीं हो रहा होता है तो वह किसी ज्ञानी को खोजता है जिसे वह गुरु मानकर उससे निर्देश माँगता है। यह प्रक्रिया उसी के मन में होती है जो सही गलत की परवाह करता है। एक पेशवर हत्यारा सुपारी लेकर हत्या करते वक़्त हत्या के सही या गलत होने की परवाह नहीं करता। उसी प्रकार एक ऐसा विद्यार्थी जिसे विषय का ज्ञान नहीं वह उस विषय के प्रश्न से विचलित ही नही होता क्योंकि वह तो पढा ही नहीं है तो फिर कौन सा उत्तर सही होगा, कौन गलत उसे क्या पता, सो जो समझ में आता है उसे ही उत्तर में लिख देता है। एक जागरूक व्यवसायी या कृषक अपने हर कदम को परखता है तब आगे बढ़ता है। जब आपको एक महत्वपूर्ण पालिसी बनानी होती है तो आप उस ज्ञानी, जानकार विशेषज्ञ को खोजते हैं जिसे विषय के सैद्धान्तिक और प्रायौगिक ज्ञान हो। अब भला दुर्योधन को क्या दुविधा होनी है। वह तो सिर्फ एक ही काम जानता है कि छल से राज्य हड़पना है और यह नहीं हुआ तो मारकाट कर हड़पना है लेकिन अर्जुन को राज पाट से ज्यादा चिंता इस बात की है कि जिस विधि से राज पाट लेने के लिए या उसे बचाने के लिए वह युद्ध के मैदान में शस्त्रों को धारण कर के आया हुआ है क्या वो विधी जायज है , धर्म संगत है , सत्य के अनुरूप है अथवा नहीं। उसके लिए साध्य(END) से ज्यादा महत्व साधन(MEANS) का है। उसके अनुसार यदि साधन गलत है तो साध्य भी गलत है। सो वह साधन की शुचिता के बारे में चिंतित है, सो वह पहले तो खुद से , और श्रीकृष्ण को सुनाकर तर्क करता है , ताकि श्रीकृष्ण उसके मत का समर्थन कर दें। हर व्यक्ति यही चाहता है कि लोग बाग उसके ही तर्कों को सही मान लें। सो हर व्यक्ति अपने तर्कों को मित्रों आदि के समक्ष रखता ही है।लेकिन अपने सारे तर्कों से अर्जुन खुद को संतुष्ट नहीं कर पा रहा है तो भला श्रीकृष्ण को क्या संतुष्ट कर पायेगा बेचारा। वह खुद को खुद के तर्कों से संतुष्ट नहीं कर पाता है इसका सबसे बड़ा प्रमाण है कि अपने सारे तर्कों का प्रयोग कर के भी उसे शांति नहीं मिल पा रही है, वह उसी तरह से उद्विग्न है जैसे प्रारम्भ में प्रश्न रखने वक़्त था। यदि उत्तर मिल गया होता , यदि वह अपने उत्तर से अपने को संतुष्ट कर लिया होता तो श्रीकृष्ण की तरफ कभी नहीं देखता। घरबपरिवार, समाज, कार्यक्षेत्र में हम भी तो यही करते है, ऐसे हीं करते हैं। जब सही या गलत हम अपने तर्कों से खुद संतुष्ट होते हैं तब निर्णय लेते वक्त कँहा किसी की परवाह करते हैं। लेकिन जब साध्य से अधिक साधन के महत्व और उसकी शुचिता की चिंता करते हैं तो हम अपने निर्णय को साफ सुथरा, सत्यनिष्ठ, और धर्म आधारित रखना चाहते हैं। इसी सोच का परिणाम है कि अर्जुन के मन में राजपाट, यँहा तक की स्वर्ग का राज मिलने से भी प्रसन्नता नहीं मिल पाने की बात है। यदि साध्य अर्थात लक्ष्य राजपाट होता, यदि लक्ष्य सुख सुविधा को हासिल करना होता तो फिर अर्जुन के मन में कोई शंका नहीं होती, जैसे दुर्योधन को नहीं है। लेकिन एक विचारवान व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को लगता है कि जब गलत साधन से राजपाट हासिल किया जाएगा तो फिर भला मन को शांति कँहा से मिलेगी। और जिस लक्ष्य को हासिल कर शांति नहीं मिल सकती उसे हासिल कर ही क्या मिल जाएगा भला। कोई भी वस्तु जो शांति नही दे पाती हो उससे सुख क्या मिलेगा और जिस कार्य स शांति नहीं मिलने वाला उसे वह क्यों करे भला। अर्जुन तय नहीं कर पा रहा है कि वो जो कह रहा है वह सही है भी या नहीं। सो उसकी बेचैनी यथावत बनी हुई है। वह अपने ही तर्कों से हारा हुआ महसूस कर रहा है तभी तो उसकी इन्द्रियाँ निष्क्रिय हो रहीं है अर्थात उसके SENSES काम नहीं कर रहें हैं और वह अनिर्णय से ग्रस्त हो रहा है। अधूरा ज्ञान पूर्ण होने के लिए छटपटा रहा है ,उसे गुरु की तलाश है जो उसके अधूरे ज्ञान को पूर्णता दे सके।
हर समझदार को अपनी अज्ञानता की जानकारी होनी ही चाहिए। यदि हम खुद को ज्ञानी मानते हैं तो हमारा पहला फर्ज है कि हमें इसका भी ज्ञान हो कि हमारे ज्ञान की सीमा कँहा तक है और हमें गुरु की आवश्यकता कब होगी। हमें जानना चाहिए कि हम जो करने जा रहें हैं, कर रहें हैं क्या उस साधन की सत्यता और शुचिता प्रमाणित है कि नहीं। अगर नहीं जानते तो जानने के लिए किसी की शरण में जाना बुराई नहीं है। जाना ही होगा अन्यथा गलत निर्णय लिए जाने की आशंका बनी रहेगी। लक्ष्य वही सत्य है जिससे हमें आत्मिक शांति मिलती है। धन, सम्पदा शांति नहीं देते। वे शांति के अनिवार्य शर्त नहीं हो सकते यदि उनको पाने का रास्ता असत्य और अधर्म से होकर जाता हो तो । आप खुद देखिये , परखिये अपने जीवन में, समाज के अन्य भागों में कि क्या गलत ढंग से अर्जित सम्पति, मान सम्मान, पद पदवी , डिग्री आदि से आपको या अन्य किसी को शांति नसीब हो रहा है। ये कोई सैद्धान्तिक या कागजी सत्य नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत है। आप खुद व्यवहार में देखें।
गीता द्वितीय अध्याय श्लोक 9 & 10
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संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥
संजय बोले- हे राजन्! निद्रा को जीतने वाले अर्जुन अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज के प्रति इस प्रकार कहकर फिर श्री गोविंद भगवान् से 'युद्ध नहीं करूँगा' यह स्पष्ट कहकर चुप हो गए
॥9॥
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥
हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले
॥10॥
अब तक तो स्पष्ट हो चुका है कि अर्जुन अपनी ही बुद्धि के तर्कों के कारण शोक , भ्रम और अनिर्णय की स्थिति में है सो हथियार डालकर चुप हो जाने के सिवा उसके पास अपनी बुद्धि के अनुसार कोई और मार्ग बचा नहीं है सो वह वही करता है। लेकिन गीताकार ने शब्दों के चयन से कई तथ्यों को रेखांकित कर दिया है। अर्जुन को दो नामों से सम्बोधित किया गया है, गुडाकेश और परन्तप यानी निंद्राविजयी और शत्रुओं का दमन करने वाला अर्थात अर्जुन के वास्तविक चरित्र को गीताकार में दिखाया है और हम सभी को यह भी याद दिलाया है कि महाज्ञानी, महाशक्तिशाली भी भ्रम में पड़कर अनिर्णय की स्थिति में आ सकते हैं। ये हमारे लिए वार्निंग बेल के समान है, खतरे की घण्टी है जो हमें सचेत करती है कि यदि हम भ्रम, मोह, माया में पड़े तो तमाम क्षमता के बावजूद हम कृपणता और कायरता के शिकार होकर नपुंसकता को प्राप्त कर सकते हैं जिस अवस्था में हमसे निर्णय नहीं लिया जा पाता और हम तमाम तकनीकी ज्ञान के बावजूद भी प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं।
लेकिन इस अवस्था में अर्जुन किससे मदद माँग रहा है जरा इसपर भी देखें। श्रीकृष्ण की शरण में आया है अपनी बुद्धि शोधन के लिए और श्रीकृष्ण कौन हैं गीताकार के शब्दों में! वे हृषिकेश यानी इन्द्रियों के स्वामी और गोविंद यानी सारी धरती उन्ही की है। अर्थात जब हमारा मन भ्रमित हो जाता है, जब हमें धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य का भान नहीं होता तब हमें किसके पास जाना चाहिए, किसकी मदद लेनी चाहिए इसपर विचार करना अत्यावश्यक है लेकिन उसके पहले हमें ये भी ध्यान रहे कि हम भ्रम में हैं इसकी स्वीकारोक्ति अनिवार्य है अन्यथा हम भी दुर्योधन की तरह अपने भ्रम और मोह , अहंकार और मूर्खता के प्रति बन्धे हीं रह जाएंगे जीवन भर। जिनको अपने जीवन के विभिन्न प्रसंगों में आने भ्रम का अहसास तक नहीं होता वो खुद गुरुओं को ज्ञान देते फिरते हैं और अंत में नाश को प्राप्त होते हैं जैसा दुर्योधन ने किया और भोग। लेकिन भ्रम के प्रति शंका और उसकी स्वीकारोक्ति हमें अर्जुन की तरह बनाती है, हम भले ही कुछ समय के लियर भ्रमित होते हैं लेकिन इन भ्रम को जैसे ही पहचानते हैं हमें चाहिए कि हम शीघ्रताशीघ्र उसके सम्पर्क में आना चाहिए जिसे खुद अपने इन्द्रियों यानी अपने सेंसेस पर नियंत्रण हो और जो अपने शरीर का खुद स्वामी हो । यानी कृष्ण की शिक्षाओं की शरण में आना चाहिए।
जब हम स्वीकारोक्ति के साथ और पूर्ण समर्पण के साथ गुरु की शरण में आते हैं तब हमें ज्ञान मिलता है, तभी गुरु के द्वारा प्राप्त ज्ञान हमारे अंदर टिकता भी है। हमारी इसी अवस्था में गुरु यानी श्री कृष्ण हमें ज्ञान देते हैं। अब चूँकि अर्जुन अपनी गलती को समझ कर पूर्ण समर्पण के साथ आ चुका है तो अब उसे परमगुरु यानी श्रीकृष्ण के द्वारा उसे दी गई शिक्षा भी मिलेगी। ज्ञान प्राप्त करने हेतु अपने अज्ञान को स्वीकारना और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण ही एक मात्र रास्ता है।
गीताज्ञान प्राप्त करने की तैयारी
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श्रीमद्भागवद्गीता के द्वितीय अध्याय के 11वें श्लोक से श्रीकृष्ण अर्जुन को शिक्षा देना प्रारंभ करते हैं। प्रथम अध्याय के 23वें श्लोक से द्वितीय अध्याय के 10वें श्लोक तक, बीच में दो तीन श्लोक छोड़कर अर्जुन ही लगातार बोले जा रहा है। भ्रम और अपने मोह में फंसा हुआ अर्जुन युद्ध की तमाम क्षमताओं के रहते हुए भी युद्ध नहीं करने के ढेरों तर्क तो देता है लेकिन अपने ही तर्क से अपने ही असन्तुष्ट होकर फिर श्रीकृष्ण की शरण में सही मार्ग जानने के लिए आ भी जाता है। जब हमें लगता है कि हमारी बुद्धि भ्रम का शिकार हो रही है तभी हम गुरु की शरण में जाते हैं। बिना अपनी गलती का भान हुए कोई अपनी गलती सुधारने का प्रयास भी नहीं कर सकता।जब आपको अहसास होगा कि आप गलत हैं या गलत हो सकते हैं तभी तो आप सही को खोजियेगा अन्यथा दुर्योधन की तरह अहंकार में पड़े पड़े अपने अज्ञान पर इतराते नष्ट ही हो जाइयेगा। सो ज्ञान , धर्म, सत्य का मार्ग वही पकड़ पाते हैं जो ये जानते हैं कि उनकी गलती क्या है या जिनको लगता है कि वे गलत हो सकते हैं। अज्ञान का प्रायश्चित ज्ञान ही है। सो जब अर्जुन अपने अज्ञान के प्रायश्चित के लिए खुद को प्रस्तुत कर श्रीकृष्ण के मित्र से शिष्य की भूमिका में आता है तभी श्रीकृष्ण उसे शिक्षा देना प्रारम्भ करते हैं , उसके पूर्व नहीं।
So if we want to follow the path of truth, it is important that we should have the urge to get rid of falsehood and ignorance. It does not matter what level of knowledge we have. What matters is only the fact that we realize that we are wrong or there is a possibility of being wrong. So, leaving behind our ego and attachment, let us all submit ourselves to the Gita.
Sri Krishna's teachings will introduce us to ourselves. We will see that Shrimad Bhagwat Geeta trains us to discover ourselves. We will not find any sectarian form of religion in it, we will not find any rituals, we will not find any shortcut through which we can get whatever we want quickly. On the contrary, Sri Krishna's teachings will train us how we will be able to determine our duty by knowing the reality of ourselves.
Keep in mind that every knowledge has its own terminology which sometimes differs from the popular meanings of those words. We will find the same with Shrimadbhagwad Gita. So sometimes we will go beyond the popular literal meanings of the words.
Also keep in mind that the Gita is not the key to renouncing the world, but it is a training on how to determine your duties in the world while living in it. That is why the teachings of the Gita will be found to be practical as well as exemplary at every step of life.
So from tomorrow we all will start taking training of Sri Krishna's teachings from the 11th chapter of Geeta.
Srimad Bhagavad Gita - A Practical Training - Chapter 2 Part 2 - Immortality and Change Verses 11 to 15
Gita Chapter 2 Verse 11
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(Subject of Sankhya Yoga)
Shri Bhagwanuvaach
You do not regret the unregrettable and you speak words of wisdom.
The wise do not grieve for the living or the dead
Shri Bhagwan said, O Arjun! You mourn for people who are not worth mourning for and speak like scholars, but scholars do not mourn for those who have lost their lives or even for those who have not lost their lives.
॥11॥
The first lines of Shri Krishna have a very harsh impact on the heart and mind of the grief-stricken Arjun. The arrangement of words seems to be a kind of rebuke to Arjun that he is feeling sad for people for whom there is no need to feel sad. Then once again he hears harsh words that he is talking like a wise man but he is not a wise man, because wise people neither feel sad for the dead nor for the living.
Thus we see that Shri Krishna clearly rejects Arjuna's understanding in the very first line. It is foolish to express sorrow for those who live and die. And Shri Krishna considers all the arguments given by Arjuna till now to be useless.
Now the question arises that why is Shri Krishna saying this. Arjun is not only opposing the war and killing, he is also talking about the situation that will spread in the society after the war, he is also saying that it is not right to kill great men like Bhishma and Drona. Now how is Arjun who wanted peace and argued for peace wrong? It is very important to understand this fact because without understanding this, the teachings of the Gita cannot be understood.
Shri Krishna has explained this in detail in the following verses and chapters. The point to understand here is that we see things, events in the same way as we have been understanding ourselves. Our understanding of ourselves has three parts, physical, mental/emotional and discernment. We see ourselves in three ways, one like our body, one like our emotions and one like our intellect, our conscience and according to this understanding of ours, we all see things in different ways. Someone's death makes someone sad while someone else is happy, someone's success makes someone happy while that success dazzles in the eyes of someone. A question is insoluble for someone while the same question is like a toy for someone. So does that event, that object not have any form of its own that its existence is determined by our own understanding? In such a situation, a question arises that is there no permanent form which remains the same in every situation? There is an answer to this question but before reaching that answer it is necessary that we first know who we are. Are we just ever-changing creatures who have no understanding of our own but our existence is based on circumstances? It is also essential to understand this because what truth can be determined from the ever-changing physical, emotional and intellectual state.
Shri Krishna understands this eternal truth and therefore, he finds Arjuna's behavior contrary to the truth. Till now, Arjuna was ready for the war, then from where did this knowledge suddenly appear on seeing Bhishma and Drona? Was Arjuna not aware of the horrors of war before the war began? Was war something new for him? We can raise many such questions about Arjuna. Then why this confusion?
We all have become accustomed to living in this confusion in different contexts of our lives, due to which we spend most of our time in stress and depression, whether we are at home, in school, with friends, in business or completely alone. If we make a time chart of our mental state for one day, we will find that most of our time is spent in stress and worry. It is not that only those who have less knowledge and less resources are in such a situation. Those who have abundance also live in such a situation. So it is certain that the reason for our stress and depression is less in the outside world and more in our inner world. Resources are required but it is not at all necessary that resources alone determine our satisfaction and happiness. What happens is that we spend most of our time reacting to external factors without knowing who we really are and without understanding that external factors can affect us as much as we consider ourselves to be. The people of the countries and societies that are at the top of the world's economic development and resources are not necessarily living the happiest lives. The recently developed Happiness Index also confirms this. So it is most important that we first understand who we really are, what are our actions? Shri Krishna is pointing towards this truth, which he will further explain.
Shree Krishna will present this truth to all of us through Arjuna in the context of immortality and change, soul, fame, karma, dharma, divine and demonic qualities, devotion etc.
Gita Chapter 2 Verse
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Neither I nor you nor these rulers of men have ever existed
Neither shall we all be hereafter
It is not the case that I did not exist at some time, you did not exist, or these kings did not exist, nor is it the case that we will not exist in the future
॥12॥
While explaining the reason for Arjuna's sadness being without any reason, Shri Krishna for the first time indirectly draws attention towards the immortality and agelessness of the soul, which he further clarifies. Who can have sadness or sorrow? We feel sadness or sorrow when we feel that something is leaving us or has been left or will be left. The fear of separation makes us sad. Arjuna is also sad because of this. But Shri Krishna says that what we are considering as separation is not actually separation at all. Continuity is the truth, even if the form is different. We consider the form to be primary, we feel that that which has a shape, which has vibration, which has the ability to take decisions, is the only identity of life.
Our knowledge is limited to the fact that the existence of a living being ends with the end of the body. This thinking and understanding is completely wrong. The end of the form or body is a natural process. But when we think deeply, we find that the body is not our identity. Even the ugliest person can be different from his form and expression. In fact, the feeling of being oneself or others, that is, the ego, is made up of the gross body, emotions and intellect, whereas the expression is from the self, which is formless. We know that everything is made up of matter, and matter is ultimately made up of atoms. Matter and energy are interchangeable. Energy is neither created nor destroyed, it can only change its form. We have the illusion that we have created electricity, produced heat, brought light, etc. All this is just our illusion. We do not create energy but change its form. Similarly, we are not able to destroy matter. Matter does not perish, it takes the form of energy. Similarly, a living being does not perish, its form changes. This is why Shri Krishna says that in every period of time, Krishna has existed, Arjun has existed and all others have existed and all of them will always exist, whatever their form may be.
Immortality is very important in every context of life. Nothing is immortal, it is only changeable. So it is important for us to understand every time that if any energy is affecting us negatively, then it is not the energy but our ego that is responsible for it. How to achieve positivity from it depends on the understanding of self. The nature of energy is changeable. When we understand this, then there can be no sadness, no confusion.
This understanding of immortality helps us not only at the philosophical level but also at the practical level. In every context, there are two aspects of decision and action according to the decision. One aspect takes us towards truth, justice, dharma and the other towards its exact opposite, untruth, injustice and adharma. The battlefield is the same, the objective i.e. the kingdom to be achieved is also the same i.e. Hastinapur but the means are different. Arjuna is still trying to understand the righteousness, truth and justice aspects of the war. Being a warrior, if he wanted, he could have directly talked about the war, looked at the objective, but he has to understand the means of war before the war. Both sides are equally capable in the art of war but Arjuna wants to determine the purity of the means despite all his capabilities. On the contrary, the Kaurava side does not keep in mind the nature of the war, the purity of the means does not matter to them.
We should understand the continuity and immortality of energy in our own life situations. In very simple terms, it is just this that truth has always existed. If we choose the eternal truth at any point of time, then we can defeat the untruth, no matter what form of untruth we face, whether it is war or something else.
It is also worth noting that we have to experience this eternal flow of energy within ourselves. Not outside. This can happen at the level of our self-realization and not at the level of our ego i.e. the physical form. The function of the physical is only that it provides the basis for the body which is changeable but self-realization is eternal and the search for this self-realization is our battle. Further, Shri Krishna will explain this with the definition of Kshetra Kshetragya.
Gita Chapter 2 Verse
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As in this body of the embodied, childhood, youth and old age.
Thus, having attained the other body, the steadfast is not deluded there.
Just as the soul experiences childhood, youth and old age in this body, similarly it also gets another body; a patient person is not fascinated by this. 13.
Taking his teachings further, Shri Krishna again explains that the death of the body is a natural process on which unnatural reactions cannot be expressed. The various stages of the body after birth include childhood, youth, old age and death is also a stage like birth and other stages after birth. Nothing happens with the end of the body. After birth, we form a social identity and we live with that social identity throughout our life with an ego. But apart from this ego, there is also a self-awareness, a SELF which always remains the same no matter what the condition is. Before death, our self is in a particular body through which we claim to recognize ourselves externally. But our self has nothing to do with the structure of the body. It is free from the structure of the body, its form and color. Our body is different in childhood, different in youth and different in old age, but our self does not change in every condition. Similarly, after death, only the body changes, not our soul, not our self, not our energy. It then takes on a new body.
Arjuna is worried only about the issue of death in the war. He has not paid attention to the other causes and consequences of the war, so Shri Krishna is also talking to him about death first, but later he takes up the bigger questions of life which resolves that more important than life and death is the account of our deeds which stop the chain of change of bodies. In fact, death is a natural process which is bound to happen. Why be sad for that which is bound to happen. What difference does it make whether it happens today or tomorrow. So Shri Krishna later takes up the questions of life, raises those questions himself because Arjuna's vision is not able to reach there.
We all live in the fear of destruction. In the fear of the end of our body, in the fear of the end of the body of our loved ones. This fear does not let us live, and due to this ignorance of life and death, we keep doing all kinds of wrong deeds. Even if Duryodhan had got the kingdom, would he have been able to enjoy it for eternity? No. Then he too would have ended. Whoever comes after that would also have perished. Then why so much confusion, so much attachment? Because the real meaning of life was not understood due to the fear of death.
We all are living in this fear. Today this one is gone, tomorrow that one is gone, tomorrow that one will be gone. We are so worried about the fear of ending. But still we are unable to stop this body form from ending. Due to this fear we stop living. While the truth remains that the self of the one who is dead remains.
Gita Chapter 2 Verse
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The touches of matter, O Arjuna, are the causes of cold, heat, pleasure and pain.
They come and go and are impermanent; bear with them, O Arjuna.
O son of Kunti! The association of senses and objects which give cold and heat and happiness and sorrow are born and destroyed and are temporary, therefore, O Bharata! You should tolerate them.
॥14॥
Change is the law of the world. After explaining the immortality of the soul, Lord Krishna explains the importance of continuity to Arjuna. Whatever is physical in this world changes with time. Our senses make us experience this. Form, sound, smell, taste and touch are expressed by our senses which are sequentially felt by the eyes, ears, nose, tongue and skin. Our senses experience physical objects through these senses. Then the brain interprets these experiences and we express our feelings towards a physical object, like it is beautiful, it is far away, its sound is harsh, it tastes sweet, it is hot etc. The senses do feel the physical element according to its quality but the mental state of each person expresses this experience according to his own. Just as an object looks beautiful to some and ordinary to others, someone cannot tolerate spiciness while for some it tastes delicious, the touch of something gives us pleasure while the same touch evokes a different kind of feeling in the mind of others. The senses find the same feeling in all but the expression of our feelings is different.
Similarly, with time, the feelings received from the senses also change. What is dear to us today may become unpleasant tomorrow, what is dear to us now may become unpleasant in the near future. The opposite can also happen. The child for whom the mother cannot control her affection may become painful for the mother when he grows up. Today we do not like the taste of tea, tomorrow we may start liking tea. There is nothing unusual in all this.
Thus, with time, every physical manifestation, every natural object undergoes change. Some changes are sudden, some are gradual. But nature cannot exist without change. A living being is born, changes with the passage of time, grows, grows old, and finally dies. Birth is like death. Death is also just a change. The physically active becomes physically inactive, as is the case with other physical or natural forms.
When change is so widespread and inevitable, then why should there be happiness or sadness when change comes? This is bound to happen. It is a very natural thing.
Now the question arises that when change is so certain, then why this happiness and sadness on change? Actually our thinking depends on our interpretation of the experiences of the senses, only then we feel happy or sad on change. We consider an event to be related to us whereas that event has an independent existence, like someone's death. A person towards whom we do not have any feelings, he too has to die under the law of change of nature. But his death does not affect us in any way. But if we consider that person to be related to us, then his death causes us pain or happiness. Death is neutral, it is bound to happen. We feel sad or happy about it only when we feel that the dead person has some relation with us. This relation is not an objective thing but is just an emotion arising from our understanding of self and other. Due to our understanding, our illusion, our attachment, we give so much importance to a neutral and inevitable change that we start feeling sad or happy.
The inevitability of change is not just about death. Here the context is of war and Arjuna is aware of it because he is facing his beloved grandfather and Guru. If Duryodhan or Dushasan were in front of Arjuna, then it is possible that Arjuna's feelings would have been different. So it is important to understand that we have feelings for every living being or thing towards which we have feelings. This can be anything, including death. Some have feelings related to wealth, some to position, some to intoxication, some to friend, some to woman or man, some to job, some to country, some to society, some to rituals, some to book or building or vehicle, in other words, any physical form can have feelings related to it. Then when the senses convey that feeling-filled form to the brain, then our feelings burst out and flow out.
As long as our illusion is alive, these joys and sorrows will be there. So, until the illusion ends, we should adopt the habit of being indifferent towards our sorrow and happiness, considering them as natural movements of our illusion.
अभी तो श्रीकृष्ण परिवर्तन को एक निश्चित क्रिया मानकर इसे सहन करने को कह रहे हैं, आगे देखेंगे कि श्रीकृष्ण इस भावना से ही मुक्त होने का मार्ग प्रशस्त कर देंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 15
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यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है
॥15॥
अभी तक की व्याख्या में श्रीकृष्ण ने शोक,विषाद एवं हर्ष के कारणों को स्पष्ट कर दिया है। अब वे दो तथ्य और बताते हैं, पहला की किस प्रकार के व्यक्ति को हर्ष या विषाद नहीं हो पाता और दूसरा की इस प्रकार के व्यक्ति की क्या उपलब्धि होती है जीवन में।
हमने देखा कि जब इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति और भौतिक चीजों को महसूस करने और उस अनुभव को हमारे मस्तिष्क की अनुभूतियों द्वारा व्यख्या की जाती है तब हमें सुख या दुख का अनुभव होता है। इन्द्रियों को हम प्रकृति से जितना विलग करेंगे इस सुख दुख की अनुभूति से हम उतना ही दूर होंगे क्योंकि इन्द्रियाँ यानी सेंसेस ही सुख और दुख जैसी भावनाओं की उत्पादक और वाहक हैं। लेकिन ये अचानक नहीं हो सकता। इसके लिए सतत अभ्यास की जरूरत होती है। इन्द्रियों को उनके विषयों से समेटने का अभ्यास तब तक करना होता है जब तक इन्द्रियाँ बाह्य प्रकृति से स्वतंत्र न हो जाएं। जब तक ये अभ्यास पूरा नहीं होता तब तक पूरी सावधानी जरूरी है। साथ ही परिवर्तन के अपरिवर्तनिय सिद्धांत को याद रखना अनिवार्य है। याद रखना होता है कि हर वो चीज जो प्रकृति से निकलती है, हर वो चीज जो भौतिक है वो सतत परिवर्तनीय है । वो बिना परिवर्तित हुए नहीं रह सकता। और ये परिवर्तन अंततः स्वरूप परिवर्तन का कारण बनता है। ये सब इतना स्वाभाविक होता है कि इसपर हर्ष या विषाद करने का कोई कारण नहीं । जिसे बदलना है उसे बदलना ही है।
अब देखें कि इस स्थिति को जो इंसान हासिल करता है क्या वो पत्थर की तरह होता है। जी नहीं। अगर वो इंसान पत्थर की तरह हो गया तो फिर उसे ये भी नहीं पता चल सकता कि उसकी वास्तविक प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिए। वस्तुतः ऐसा इंसान धैर्यवान होता है। दरअसल वो जानता है कि उसे करना क्या है। उसे पता होता है कि उसे परिवर्तन को स्वाभाविक रूप में लेना है और अपनी इन्द्रियों यानी अपने सेन्स को प्रकृति से किस तरह विलग रखना है।
जब हम अभ्यास कर इस परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को आत्मसात कर लेते हैं तब हमारी इन्द्रियाँ वाह्य संसार से मुक्त हो जाती हैं, बाहरी प्रकृति से प्रभावित होकर न तो सुख दे सकती हैं न ही कोई दुख। यही वो अवस्था होती है जब इंसान प्रकृति से मुक्त हो जाता है। वो अपने जीवन काल में ही प्रकृति से मुक्त हो सकता है। प्रकृति से उसकी यही मुक्ति उसका मोक्ष कहलाता है। ऐसा इंसान वाह्य संसार से अपने को नहीं निर्धारित करता। इस स्थिति में उसका ईगो जो उसके शरीर, उसके इन्द्रियों/भावना और उसकी बौद्धिकता से बने होते हैं तिरोहित हो जाते हैं, उसका अहम और वहम दोनों समाप्त हो जाता और तब उसे मोक्ष यानी मुक्ति मिलती है।
ध्यान दें कि ये शिक्षा श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध के परिपेक्ष्य में दिया है। लेकिन जब आप नितांत अकेले होते हैं, समाज में होते हैं, व्यवसाय में होते हैं, या किसी भी अन्य अवस्था में होते हैं अपनी इन्द्रियों के प्रकृति के संयोग के कारण हमें बराबर सुख और दुख मिलते रहते हैं, जिस कारण से हम हम अतिरिक्त तनाव या अत्यधिक लापरवाह और दम्भ की अवस्था में रहते हैं। इससे हमारा जीवन निरुदेश्य हो जाता है। हमें पहुँचना होता है कँही और पहुँच जाते हैं कंहीं। रास्ते से भटकना सिर्फ इसिलए हो पाता है क्योंकि हम सब वाह्य प्रकृति को खोज कर उसी के साथ हम अपने ईगो को जोड़ लेते हैं।
इससे मुक्ति ही मोक्ष है।
अर्जुन को श्रीकृष्ण ने पुरुष श्रेष्ठ कह कर सम्बोधित किया है। दरअसल हम खुद को वैसा ही देखते हैं जैसा लोग हमें देखते हैं। ये प्रवृत्ति हम सब में होती है जो हमारे सेन्स के दूसरों से सम्पर्क के कारण होता है। अतएव अगर हम किसी को प्रोत्साहित करना चाहते हैं तो जरूरी है कि हम उसे अहसास दिलाये कि उस इंसान में बहुत अच्छी क्षमताएँ हैं। अगर उस व्यक्ति को खुद पर भरोसा बढ़ता है तो वह निश्चित ही अच्छा करने के लिए प्रोत्साहित होता है।
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श्रीमद्भागवद्गीता
सारांश
श्लोक 11 से 15
अर्जुन के विषाद को और धर्म यानी सन्मार्ग की नासमझी को दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने सर्प्रथम जिस शिक्षा को दिया है उसके महत्वपूर्ण तत्व निम्न लिखित हैं-----
1.इस भौतिक संसार में जो कुछ है वह नश्वर है।
2.ये नश्वरता अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त के कारण है, अर्थात प्रत्येक भौतिक वस्तु और जीव का स्वरूप परिवर्तन अनिवार्यतः होता ही है।
3.इस भौतिक संसार और इसके अवयवों को हम अपनी इन्द्रियों के माध्यम से समझते हैं यानी हमारी इन्द्रियाँ निरन्तर इस संसार और इसके अवयवों के सम्पर्क में आती हैं और इन्द्रियों द्वारा अपने गुणों के अनुसार इनका अनुभव किया जाता है जिसे हम अपना अनुभव कहते हैं।
4. जब परिवर्तन और स्वरूप परिवर्तन अवश्यम्भावी है ही तो फिर इन परिवर्तनों पर इन्द्रियों के द्वारा सम्प्रेषित सुख और दुख के अनुसार ही सुखी या दुखी होने का कोई कारण नहीं है। अर्थात हमें इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचना के प्रति स्थिर रहना चाहिए और सुखी या दुखी होने से बचना चाहिए।
5.परिवर्तन के सिद्धांत के अनुसार सुख दुख के ये सभी भाव अस्थाई ही हैं सो भी इनके प्रभाव से बचना चाहिए।
6. इन्द्रियों द्वारा प्रकृति के अनुभव किये जाने और उन अनुभवों से अपने को अप्रभावित रखने हेतु ताकि हम स्थिरचित्त बने रहें ये आवश्यक है कि हमारा नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर यानी अपने सेंसेज पर बना रहे।
7. इन्द्रियों की अनुभूति हमें अस्थिर न कर दे इसके लिए जरूरी है कि अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धांत को आत्मसात कर लें।
8. प्रकृति में हर क्षण होने वाले परिवर्तन को समझने के लिए ये जरूरी है कि हम स्वयम को चलायमान न होने दें। अगर हम स्वयम चलायमान होंगे तो फिर प्रकृति के परिवर्तन को समझ नहीं पाएंगे, उसकी गति और दिशा को नहीं जान पाएंगे और भ्रम में पड़ जायेंगे।
9.जिस इंसान में उपरोक्त क्षमताएँ विकसित अवस्था में हो जाती हैं उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत अमरत्व प्रदान करता है। तो इसका अर्थ हुआ कि इस तरह का इंसान नश्वरता से और परिवर्तन अर्थात स्वरूप परिवर्तन से जीते जी मुक्त हो जाता है। उसका ईगो यानी उसका अहम समाप्त हो जाता है क्योंकि प्रकृति के परिवर्तनों से वह अप्रभावित होता है।
10. जब इस प्रकार अप्रभावित होता है तो उस समय उसका स्व यानी उसका SELF उसके समक्ष उपस्थित होता है जो नितांत अपरिवर्तनीय, अनश्वर और सभी प्राणियों में एक समान होता है अर्थात हर किसी का SELF यानी स्व यानी आत्मबोध एक समान होता है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति ही मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। यानी मोक्ष जीवित रहते प्राप्त होता है न कि मरने के पश्चात।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने सभी को समान स्थिति में होने का रास्ता सुझाया दिया है।
इन शिक्षाओं की भाषा निश्चित रूप से हमारे दैनिक जीवन की भाषा से भिन्न है। लेकिन ये सीख सिर्फ उनके लिए ही नहीं है जो धर्म के मर्म को समझते हैं बल्कि ये शिक्षाएँ इतनी सरल हैं कि अगर हम आप मनोयोग से उन्हें सुने जाने तो हमें लगने लगेगा कि अभी तक हम सिर्फ इसलिए परेशान रहते आएं हैं क्योंकि हम खुद को इस सच्चाई से रूबरू नहीं होने दिए थे। हमारे जीवन में प्रयुक्त होने वाले अगितन मुहावरों, लोकोक्तियों में ये शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं , उनका कहने सुनने में हम उपयोग भी करते आये हैं लेकिन कभी ध्यान से इनका चिंतन नहीं किये। अगर किये रहते तो सुखी भी होते और खुश भो रहते। और तब लक्ष्य से दूर भी नहीं रह जाते।
ये सारी शिक्षा युद्ध के मैदान में युद्ध से विमुख अपने काल के एक सबसे बड़े योद्धा को दी गई है। प्रश्न उठता कि युद्धकाल की शिक्षा का अभी क्या महत्व हो सकता है। वजह दो हैं।
पहली वजह तो यही है कि ये शिक्षाएँ काल विशेष से बंधी नहीं हैं। वस्तुतः ये शिक्षाएँ समय की सीमा से बाहर हैं, सर्वकालिक हैं
दूसरी बात कि जीवन में हमारी व्यवसायिक सफलता चाहे जतनी बड़ी हो जीवन में शांति तभी मिलती है जब जीवन जीने का ढंग पता हो, दृष्टिकोण परिपक्व हो। ये परिपक्वता शैक्षणिक और तकनीकी ज्ञान की और आर्थिक संसाधनों की प्रचुरता से नहीं आती। इन प्रचुरताओं के बावजूद भी यदि जीवन को देखने का ढंग सही नहीं है तो हम बार बार कभी प्रसन्नता और कभी दुख के अतिरेक में फंस कर तनावग्रस्त हुए रहते हैं। तनाव हमारे मानसिक अवस्था को आंदोलित (agitated) करते रहता है जिससे हम बार बार अस्थिर होते रहते हैं। स्थायित्व का अभाव ध्यान बँटाता है। नतीजे में हम न केवल आत्मिक लक्ष्य से दूर होते जाते हैं बल्कि अपने भौतिक लक्ष्यों से भी भटकते हैं। इससे हमारी न केवल आत्मिक यात्रा दुष्प्रभावित होती है, बल्कि हमारी भौतिक यात्रा भी दुष्प्रभावित होती है।
के कारण हमारे अंदर इस प्रकार का आत्म
इन शिक्षाओं को अपने दैनिक जीवन के प्रसंगों में में लागू करके देखें। जीवन की हर छोटी बड़ी घटना के परिपेक्ष्य में देखें और इन शिक्षाओं को उन प्रसंगों की कसौटी पर कसें। घर की अच्छी बुरी बात हो, छात्र जीवन की सफलता असफलता हो, व्यवसाय की भली बुरी बातें हों, रिश्तों की बातें हों या अन्य कोई भी प्रसंग, हम पाते हैं कि ये शिक्षाएँ न सिर्फ व्यवहारिक हैं बल्कि हर प्रसंग में एक आत्मबल भी प्रदान करती हैं। ये हमें सुख में खुश होकर बौराने से बचाती हैं और दुख में निराश होकर बिखरने से भी बचाती हैं। ये शिक्षाएँ हमें हर परिस्थिति से अछूता रहकर साध्य की तरफ बढ़ने का रास्ता बताती हैं। मोक्ष परम् स्थिति है, जो निरन्तर अभ्यास से मिलती है लेकिन इसके लिए निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है । अभ्यास की पहली सीढ़ी अपने जीवन के दैनिक प्रसंग ही होते हैं। यदि हम अपने दैनिक प्रसंग में खुद को अनुशासित नही रख सकते तो फिर बड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना भी असम्भव ही रह जाता है।अवश्यभावी परिवर्तन और नश्वरता के इस शिक्षा से हमारे अंदर अपने सेल्फ को खोज पा लेने के कारण हमें सत्य के प्रति जो लगाव मिलता है उससे हमें एक आत्मबल प्राप्त होता है । ऐसा क्षमता युक्त व्यक्ति अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय हो जाता है।
आत्मा से परिचय- श्लोक 16 से 30
गीता अध्याय 2 श्लोक 16
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नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥
असत् वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत् का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है
॥16॥
परिवर्तन के नियम को समझाने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि दो तरह की वस्तुएँ होती हैं-सत और असत यानी REAL और NOT REAL या UNREAL । श्रीकृष्ण के अनुसार ये तथ्य नया नहीं है बल्कि बहुत पहले से उन लोगों के द्वारा कहे गये हैं जिनको सत्य का ज्ञान रहा। जिनको सत्य का ज्ञान होता है उनको तत्वदर्शी कहते हैं।
सत, असत और तत्वदर्शी शब्दों के अर्थ आपस में जुड़े हुए हैं। इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में हर वो चीज जो निरन्तर परिवर्तनशील होती है वही असत है। परिवर्तनशील वस्तुओं की खाशियत है कि वे सिर्फ वर्तमान में होते हैं, अतीत में और भविष्य में उनका कोई वजूद नहीं होता है। अर्थात अस्थाई ही असत है। लेकिन इस असत का अनुभव तो होता ही है न। आखिर इस तथ्य का कैसे उद्घाटन हो पाता है । परिवर्तनशीलता को समझने के लिए जिसकी आवश्यकता है वही सत है, अर्थात सत हो है जिसका किसी काल में नाश नही होता, जो परिवर्तन के नियम से परे होता है। इसी सत की अनुभूति से असत का ज्ञान हो पाता है। जीवन बाल्यकाल, युवा अवस्था और वृद्धावस्था के अनुभवों का संकलन होता है जो निरन्तर बदलते रहते हैं। इस अनुभव को दो तरह से जीने की विधि होती है। एक है इस परिवर्तन को बिना समझे परिवर्तन को वास्तविकता मान कर जीते जाना जिसमें हम असत को ही जीते जाते हैं। हर परिवर्तन से , उसके अच्छे बुरे प्रभावों से प्रभावित होते कभी सुखी, कभी दुखी होते रहते हैं। इस अवस्था में सत का ज्ञान नहीं होता। दूसरा तरीका है जीवन में घट रहे परिवर्तन को देखते समझते , इन परिवर्तनों के प्रभाव से अलग रहते जीना। इस अवस्था में हमको पता होता है कि जो घट रहा है वह तो मात्र परिवर्तन है। उससे भला क्यों प्रभावित होंना। ये परिवर्तित स्वरूप आज कुछ और है, कल परिवर्तन के कारण कुछ और हो जाएगा और पहले भी कुछ और ही था। इस क्षमता को ही सत कहते हैं। यही हमारा आपका सबका सत है जो हमें परिवर्तनों से परिचित कराता है। ये सत ही आत्मबोध यानी हमारा SELF है। अपने SELF यानी अपने आत्मबोध से परिचित इंसान जीवन को, परिवर्तनों को उनसे विलग रहकर जीता है, उनके साथ रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होता है। परिवर्तन यानी असत आते हैं जाते हैं वो हर स्थिति में अपने आत्मबोध से इनको देखता तो है लेकिन अपने आत्मबोध के कारण इनसे अप्रभावित ही रहता है। यानी ऐसा इंसान परिवर्तनों के साथ जीता तो है लेकिन परिवर्तन से विलग अपने स्व यानी अपने आत्मबोध यानी अपने सेल्फ में रहते हुए इन परिवर्तनों के प्रभाव से मुक्त होता है। जो सत और असत के इस भेद को जानता समझता है वही तत्वदर्शी होता है, क्योकि वह मूल तत्व को समझता है।
सत और असत के इस द्वैत यानी DUALITY की समझ ही हमें अपने सत की खोज में बढ़ने के लिए प्रेरित भी करता है।
इस DUALITY यानी द्वैत की समझ से जीवन के कठिन प्रश्नों का समाधान निकल आता है। जब हम समझने लगते हैं कि परिवर्तन अस्थाई है ,इसके प्रभाव भी अस्थाई ही हैं तो फिर इनके परिवर्तन से सूखी या दुखी नहीं होते। समभाव में स्थित रहकर ही अपना आचरण निर्धारित करते हैं।
इस सत-असत की समझ से उत्पन्न समभाव के कारण इंसान अपने वास्तविक रूप में आता है जिसके कारण उसे ज्ञात होता है कि उसमें असीम सम्भावनाएँ हैं जिनके कारण वह उन्नति के अंतिम शिखर , अर्थात जिसके बाद कोई शिखर नहीं होता वँहा तक जा सकता है।
परिवर्तन से अप्रभावित होने का अर्थ आप निष्क्रियता मत निकालें । इस शिक्षा को नहीं समझ पाने का ये खतरा तो है कि हम समझने लगे कि संसार तो निरन्तर परिवर्तनशील है तो फिर इस संसार में घटित घटनाक्रम से हमें क्या लेना देना, हम तो इनसे अप्रभावित रहकर बुद्ध हो गए हैं। इसी भ्रम को मिटाने के लिए श्रीकृष्ण आगे चलकर कर्मयोग का सिद्धांत समझाते हैं। बिना कर्म में प्रवृत्त हुए सत असत के सिद्धांत को आत्मसात करना असम्भव है और विनाशकारी भी।
अब आगे देखेंगे कि सत क्या है और सत को प्राप्त करने का कर्मयोग का सिद्धांत क्या है। ये शिक्षा क्रमिक है, , एक एक कर हम सीखते है, बढ़ते हैं। परिवर्तन के नियम को जानने समझने के बाद हम सत यानी आत्मा के ज्ञान की तरफ बढ़ते हैं और फिर तब कर्मयोग की तरफ।
गीता अध्याय 2 श्लोक 17
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अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥
नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्- दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है
॥17॥
अनश्वरता और अवश्यम्भावी परिवर्तन के सिद्धान्त से जो मूल बात निकल कर सामने आती है वो है इस निरन्तर परिवर्तनशील संसार में कुछ ऐसा भी है जो निरन्तर अपरिवर्तनशील है, सनातन अनश्वर है। यँहा एक बा त बात बहुत मायने रखती है। हम ऊर्जा को देख नहीं सकते, लेकिन ऊर्जा व्याप्त है। ऊर्जा का मेनिफेस्टेशन हम देखते हैं, जैसे अग्नि, विधुत, गति, प्रकाश , स्थिरता आदि। इसे हम जानते भले न हो लेकिन मानते जरूर हैं। दुनिया के बहुतेरे बातों को जिनको हम समझ नहीं पाते मानते हैं, फिर जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिक ज्ञान का स्तर बढ़ता है हम धीरे धीरे गलत से सही को जानने लगते हैं। विज्ञान वह विशेष ज्ञान है जिसके पीछे अकाट्य तर्क होता है, सार्वभौमिक प्रमाण होता है। यह ज्ञान स्वयम में निरन्तरता लिए हुए होता है। इसकी खोज का जो प्रमाणिक तरीका है उसके अनुसार सबसे पहले हम अपने अनुभव से, उस अनुभव से जिसमें निरन्तरता होती है उससे एक परिकल्पना यानी HYPOTHESIS गढ़ते हैं।।तत्पश्चात उस परिकल्पना के आधार पर प्रयोग करते हैं । यह प्रयोग हमेशा प्रयोगशालों के नियंत्रित वातावरण में ही हो जरूरी नहीं। कई बार हमारी प्रयोगशाला हमारा मस्तिष्क ही होता है। हम तरह तरह की गणनाएँ उपयोग में लाते हैं, फिर हिट ऐंड ट्रायल के तरीके से हम उन गणनाओं को व्यवस्थित कर एक अंतिम गणितीय सिद्धान्त गढ़ते हैं । तत्पश्चात अलग अलग समय काल और स्थान में उसका उपयोग कर ये देखते हैं कि क्या हमारी गणना का परिणाम हर समय काल और स्थान में एक ही है। यदि ऐसा है तो फिर हम एक सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं जो हर समय काल स्थान में एक समान होता है। यही प्रक्रिया प्रयोगशालाओं के नियंत्रित वातावरण में भी की जाती है, जिनमें हो सकता है कि गणना के अतिरिक्त या उसके बिना सिर्फ पदार्थ का उपयोग किया जाता हो। उसके सर्वव्यापी परिणाम को ही मान्यता दी जाती है। इन प्रक्रियाओं में कुछ तथ्य समान हैं
1.सर्वप्रथम एक परिकल्पना की आवश्यकता होती है जो संसार के निरन्तर पर्यवेक्षण से सम्भव होता है।
2.प्रयोग की विधि निर्धारित होती है।
3.परिणाम सर्वकालिक होता है अर्थात स्थाई होता है निरन्तर परिवर्तित नहीं होता।
ज्ञान प्राप्ति की इसी विधा को जिसमें परिकल्पना, प्रयोग, परिणाम और सर्वकालिकता हो उसे ही विज्ञान कहा जाता है। इसके परिणाम में स्थाई सत्य को प्राप्त किया जाता है जो निरन्तर परिवर्तनीय नही होता बल्कि हमेशा एक ही रहता है।
अब ठीक यही बात जीवन विज्ञान को समझने के लिए भी अपनाई जाती रही है। श्रीकृष्ण ने इसी वैज्ञानिकता का सहारा लिया है अर्जुन को समझाने के लिए। सर्वप्रथम उन्होंने अर्जुन को संसार का पर्यवेक्षण करने के लिए प्रेरित किया यानी उसे ये देखने के लिए प्रेरित किया कि वह स्वयम देखे कि संसार कैसे चलता है। हमने देखा कि पूरा संसार गीता की भाषा में सत और असत में बंटा है। असत यानी जो निरन्तर परिवर्तनीय है। इस असत को हम तब देखने में सक्षम होते हैं जब सत को समझते हैं यानी ये समझते हैं कि कुछ ऐसा है जो परिवर्तित नही होता, जो स्वरूप नहीं बदलता, जो अनश्वर होता है। इसे ऐसे समझे। कोई वस्तु गति में है ये तभी समझा जा सकता है जब हम गतिहीन यानी स्थिर होते हैं।
अब दूसरे स्तर पर हम ये समझते हैं कि इस सम्पूर्ण चलायमान संसार को चलायमान रखने के लिए कोई एक सत्ता तो होगी जो उनकी गति और परिवर्तन का कारण होगी। यही सत्ता सर्व्यापी और सर्वकालिक होती है। अभी आपको ये बात कल्पना लग सकती है, लेकिन लक्षित ज्ञान को जानने समझने के लिए इस कल्पना पर परिकल्पना की तरह आपको भरोसा करना होगा।भरोसा होगा तो आप अन्वेषण के लिए बढ़ेंगे और सत्य को पाएंगे। नही। भरोसा करेंगे तो इस परिकल्पना को कोरी कल्पना मानकर छोड़ देंगे और सत्य का अन्वेषण अधूरा छूट जाएगा, आप कँही नही। पहुंचेंगे। जीवन भर भटकते रह जायेगे। यदि आप इस परिकल्पना पर भरोसा करते हैं तो आप ये देखने में सक्षम होंगे कि इस सर्वकालिक सर्वव्यापी सत्ता ही है जिसके कारण आप खुद को और खुद के बाहर के परिवर्तन को देख समझ पाते हैं। आप इस सत्ता की समझ के कारण सर्वाधिक ऊर्जा संग्रहण के स्थिर अवस्था में आ जाते हैं, परिवर्तन के प्रभाव से एकदम मुक्त। यही तो परम् वैज्ञानिकता है और गीता की भाषा में परम् योग की अवस्था भी।
इस परम् सत्ता को जो पूर्णतः अनश्वर, अविनाशी, अव्यय(जिसका व्यय नहीं होता हो) होती है यही हमारे अंदर से हमारे परिवर्तनशील बुद्धि और भावना को निकालकर हमारे आत्मबोध यानी SELF को बाहर लाता है। यही वह सेल्फ है जो अपरिवर्तनीय अनश्वर अविनाशी है और जो सभी में समान रूप से मौजूद है। यह आत्मा उस परमसत्ता का ही स्वरूप है जिसे आप ब्रह्म, परमब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर, भगवान या फिर अपने धार्मिक-सम्प्रदाय के मतानुसार और भाषानुसार अलग अलग नामों से सम्बोधित करते है और यही सता सब में व्याप्त होकर सभी परिवर्तनों को नियंत्रित करता है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 18
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अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
॥18॥
आत्मा से परिचय कराने के पश्चात श्रीकृष्ण एक बार फिर से सत की तरफ लौटकर समझाते हैं कि सत यानी आत्मा का नाश नहीं होता है, न ही इसका परिवर्तन होता है और न ही ये जानने में आता है। इस बात को समझने में थोड़ी सावधानी बरतनी होगी। आत्मा अनश्वर और अपरिवर्तनीय है ये तो हम हमझे हैं लेकिन ये अप्रमेय है इसे कैसे समझे। अप्रमेय यानी जिसका प्रमाण नहीं होता अर्थात जिसे प्रमाण के द्वारा नहीं जाना जा सकता। तो क्या आत्मा का ज्ञान होना असम्भव है?
श्रीकृष्ण की इस शिक्षा को समझने के लिए ये जरूरी है कि पहले हम ये तो समझे कि हमें ज्ञान मिलता कैसे है। ज्ञान प्राप्त करने का हमारा सबसे महत्वपूर्ण साधन हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हैं। बाहरी जानकारी इन्द्रियों के माध्यम से ही हमें प्राप्त होती है। इसके माध्यम निम्न हैं---
1.प्रत्यक्ष प्रमाण, जिसे हम सीधे अपनी इन्द्रियों से ग्रहण करते हैं। (डायरेक्ट इनफार्मेशन)
2.अनुमान, किसी एक चीज के आधार पर हम दूसरी चीज के बारे में परिणाम निकालते हैं यानी
उपलब्ध सूचना के आधार पर कोई राय बनाते हैं या सत्यता का निर्णय करते हैं, से (इनफरेंस)
3.तुलना, दो चीजों की तुलना कर जानकारी इकट्ठा करते हैं(कंपेरिजन)
4.कारण-परिणाम, परिणाम का अध्ययन कर कारण जानने की प्रक्रिया (कॉज-इफ़ेक्ट रिलेशन)
5. अनुपलब्धि, किसी चीज के नही होने का तथ्य जानकर समझना कि वो चीज नहीं है या नहीं होती है(अनवैलबिलिटी)
6.शब्द प्रमाण, स्थापित/विद्वान गुरु के द्वारा कही बात को सही मानकर(वर्ड्स ऑफ ए रियलआइज़्ड मास्टर)
ये सभी माध्यम इन्द्रियों पर निर्भर करते हैं लेकिन इनमें से किसी से भी आत्मा यानी सत यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं मिलता है। चूंकि आत्मा/सत/सेल्फ की जानकरी इन्द्रियों से नहीं मिलती सो श्रीकृष्ण इसे अप्रमेय यानी प्रमाण से परे मानते हैं।
तब हम सेल्फ यानी आत्मा को कैसे जानते हैं? दरअसल उपरोक्त सभी प्रकार के माध्यमों से आत्मा/सेल्फ का ज्ञान भले न मिलता हो , होता ये है कि हमारे सेल्फ के ऊपर अज्ञान की जो परत पड़ी होती है वो एक एक कर साफ होती जाती है। इससे अंततः हम ये समझ पाते हैं कि हमारी आत्मा /हमारा सेल्फ वास्तव में क्या है। अर्थात अज्ञान का सम्पूर्ण नाश ही आत्मबोध/आत्मज्ञान/आत्मा का ज्ञान/सेल्फ का ज्ञान देता है। दरअसल ज्ञान प्रकाश है जो अंधकार और उससे पैदा हुए भ्रम को समाप्त कर वास्तविकता को सामने ला देता है। यदि आप कँही जा रहें है या स्थिर बैठे हैं और घोर अंधकार है। आपको लगता है कि सड़क पर कुछ परा हुआ है। आपको लगता है कि अरे ये लम्बी सी चीज तो साँप प्रतीत होता है । आप डर कर पीछे हट जातें हैं और टार्च की रोशनी करते हैं । तब आप पाते हैं कि अरे जिसे मैं साँप समझ रहा था वो तो रस्सी है। दरअसल प्रारम्भ से ही वँहा रस्सी ही है। ये तो अँधकार और उससे उपजा भ्रम था जिसके कारण हम उसे साँप समझ रहे थे। रौशनी होते अँधकार छंटता है यानी भ्रम खत्म होता है और तब आप वास्तविकता देख पाते हैं। ज्ञान ने साँप को रस्सी नहीं बना दिया, बल्कि ज्ञान ने अंधकार और भ्रम को हटा दिया जिससे हम वास्तविकता को जान पाए। इसीप्रकार ज्ञान जब हमारे सारे भ्रमों को मार देता है तब हमको पता चलता है कि हमारा सेल्फ/आत्मबोध/आत्मा क्या है। ज्ञान आत्मा को बनाता नहीं है, उससे परिचय कराता है।
अब ये समझना भी जरूरी है कि आत्मा का निवास कँहा है। दरअसल आत्मा शरीर को धारण करती है। अविनाशी , अपरिवर्तनीय आत्मा का निवास देह है अर्थात इस परिवर्तनीय नाशवान शरीर का अस्तित्व तभी तक है जब तक इसमें अनश्वर अपरिवर्तनीय आत्मा है अन्यथा इसका कोई अस्तित्व नहीं है।
इतनी शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण अर्जुन का आह्वाहन करते हैं कि इन्ही कारणों से तुम युद्ध करो। तो क्या श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध के लिए उकसा रहें हैं। जी नहीं। बल्कि वे तो ये कह रहे हैं कि जब तुमको ये बात समझ में आ गई कि आज्ञान का नाश ही सत्य को उद्घाटित करता है, आत्मा से परिचय कराता है सेल्फ यानी आत्मबोध को प्रत्यक्ष करता है तो फिर आज्ञान को हराना ही होगा, उससे युद्ध करके असत के भ्रम को समाप्त तो करना ही होगा। यही युद्ध है जो आज्ञान को पराजित करने के लिए है, सत को उद्घाटित करने के लिए है। ये युद्ध क्या है, इसकी प्रकृति क्या है, ये होता कैसा है, परिणाम में क्या होता है इसे श्रीकृष्ण आगे स्पष्ट करते हैं।
इस प्रकार हम देख रहें हैं कि कैसे आज्ञान के कारण हम अपने कर्तव्य से भागते हैं और आज्ञान वश ही इसी अकर्मण्यता को महान बताने का उपक्रम करते रहते हैं। लेकिन हम तब तक अपनी अकर्मण्यता को और अपने कुतर्कों को नहीं समझ पाते जब तक हम अपने आत्मबोध से दूर होते हैं। "हम हैं" ये तो प्रमाणित है लेकिन "हम क्या है" ये अभी जानते हैं जब हमें अपनी आत्मा का बोध होता है, सेल्फ से परिचित होते हैं, और तभी हमको अपने कर्तव्यों की सही जानकारी भी मिल पाती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 19
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य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥
जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है
॥19॥
एक बार पुनः श्रीकृष्ण स्पष्ट करते है कि आत्मा अनश्वर और अविनाशी है। यह न मारता है न मरता है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मा वास्तव में किसी भी तरह के कृत्य से मुक्त होता है। हम आप जो भी करते हैं उसमें हमारे आपके विशुद्ध स्वरूप यानी हमारे आत्मस्वरूप यानी सेल्फ का कोई योगदान नहीं होता। हम जो भी करते हैं उसकी जबाबदेही हमारे ईगो पर होती है जो हमारी शारीरिक, मानसिक/भवानात्मक और बौद्धिक गुणों का मिश्रण होता है। हम आगे चलकर पाएंगे कि हमारे कृत्य हमारे गुणों पर निर्भर करते हैं । लेकिन फिलहाल इस श्लोक से स्पष्ट है कि वस्तुतः आत्मा न तो कर्ता है न कारक। साथ ही स्पष्ट होता है जीवन समाप्त होता है न कि जीवन का सेल्फ।
हमारा अस्तित्व हमारा शरीर नहीं होता। पूर्व में ही स्पष्ट हो चुका है कि भौतिक स्वरूप का परिवर्तन अवश्यम्भावी है लेकिन सेल्फ में, आत्मस्वरूप में यानी आत्मा में कोई परिवर्तन नहीं होता। यह जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त होता है। तो फिर किसी की मृत्यु या जन्म के लिए आत्मस्वरूप को कर्ता नहीं ठहराया जा सकता।
आत्मा की उपस्थिति में ही सारी क्रियाएँ होती हैं लेकिन आपका सेल्फ/आपकी आत्मा उसमें लिप्त नहीं होती। इसे महसूस करने, समझने के लिए जरूरी है कि हम अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े आवरण को एक एक कर हटाएँ। ये कैसे कर सकते हैं इसे आगे समझेंगे। अभी तो इतना ही समझें कि जब श्री कृष्ण अर्जुन को युद्ध करने का आवाह्न करते हैं तो ये भी समझा देते हैं कि आत्मा का न तो आदि है न अंत, कोई स्वरूप परिवर्तन नहीं है। न ही आत्मा कुछ कर रहा होता है न इसपर कुछ हो रहा होता है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 20
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न जायते म्रियते वा कदाचि-
न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-
न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता
॥20॥
श्रीकृष्ण एक बार फिर से अपनी बात दुहराते हैं। हम जानते हैं कि यदि कोई बात बहुत जरूरी होती है या फिर जिस बात को समझना थोड़ा मुश्किल होता है तो वक्ता उस बात को बार बार कहता है ताकि श्रोता उस बात को और उसके अर्थ एवम महत्व को समझ सके। आत्मा जन्म मृत्यु से परे है। यह पुरातन है अर्थात अत्यंत पुराने काल से वर्तमान तक अपरिवर्तनीय ही बना हुआ है जो शरीरों के जन्म मृत्यु से अछूता रहता है। साथ ही आत्मा सनातन भी है, न आदि है न अंत है। अर्जुन जिस सनातन धर्म की बात कह रहा था पूर्व में उससे यह विचार एकदम भिन्न है। वस्तुतः अर्जुन द्वारा जिसे सनातन धर्म कहा जा रहा था वह तो मनुष्य की मृत्यु के साथ छिन्न भिन्न हो जाने वाला था। ऐसी आशंका तो अर्जुन के द्वारा स्वयम व्यक्त की जा रही थी। उसका सनातन धर्म तो कुलधर्म था। लेकिन यँहा तो श्री कृष्ण अर्जुन को समझा रहें हैं कि सनातन तो आत्मा है, देह कँहा से सनातन हो गया।
और यह आत्मा सब में समान है। इसका कोई रूप , रंग, आकार, नहीं , इसका कोई निश्चित देह नहीं, यह तो काल से परे है। तो ऐसी स्थिति में वो सभी सनातनी ही हैं तो आत्मा के अन्वेषण मड़इन लगे हैं। इसका सम्बन्ध हमारे जन्म और कुल से नहीं है। यह तो सभी में समान भाव से गुणों से मुक्त है। इसी से वसुधैव कुटुम्बकम् निकलता है। फिर अपना कौन पराया कौन।
गीता अध्याय 2 श्लोक 21
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वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्॥
हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मरवाता है और कैसे किसको मारता है?
॥21॥
श्रीकृष्ण ने अबतक आत्मा की विशेषताओं को बताया है। अब वे आत्मा को जानने समझने वाले कि विशेषताओं की चर्चा करते हैं। हमने पहले ही देखा समझा है कि इस संसार में व्यक्ति के द्वारा जो जो कुछ भी किया जाता है वह इंसान के ईगो के द्वारा किया जाता है अर्थात जो कुछ इंसान के द्वारा किया जाता है वह सब उस इंसान के शारीरिक रूप, भावनात्मक स्थिति और बौद्धिक क्षमता के द्वारा किया जाता है और यही तीन किये गया कार्य का प्रभाव भी झेलते हैं या उसका आनंद उठाते हैं। उसकी आत्मा यानी उसका स्व न तो कुछ करता है, न ही कुछ भी करवाता है। इंसान श्रीकृष्ण वर्णित तीन गुणों के अधीन रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं।।
जब आत्मा न कुछ करता है न कराता है तो फिर हम कैसे कहते हैं कि मैंने किया। मैं स्व को व्यक्त करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है लेकिन यँहा स्व ईगो के स्थान पर भ्रम वश समझ लिया जाता है।आत्मा न तो कर्ता है न भोक्ता है। आत्मा तो मात्र द्रष्टा है। निर्विकार भाव से चीजों को होते देखता है। स्व की उपस्थिति में हमारा ईगो कुछ न कुछ करते रहता है और प्रभावित होते रहता है। इसे एक छोटे उदाहरण से समझा जा सकता है। सूर्य के उदय के साथ रौशनी आने के साथ ही तरह तरह की गतिविधियाँ प्रारम्भ हो जाती हैं। तो क्या सूर्य इन गतिविधियों को करता है। ये आप भी जानते हैं कि नहीं। सूर्य को आपकी गतिविधि से कोई लेना देना नहीं है। सूर्य की अपनी गति है। मात्र उसकी उपस्थिति में चीजें घटित होती हैं। इसी प्रकार आत्मा न कर्त्ता है न भोक्ता है। ऐसी स्थिति में जिसे अपने स्व का ज्ञान है, जिसे आत्मा का ज्ञान है, जिसे आत्मबोध हो चुका है , इसे पता है कि उसका सेल्फ उसके ईगो से भिन्न अपरिवर्तनीय, अविकारी , अजन्मा, पुरातन और सनातन है। उसे यह भी ज्ञात है कि वह न तो कुछ करता है न भोगता है। बस वह तो द्रष्टा मात्र है। लेकिन इस स्थिति में पहुँचा कैसे जाता है ये अभी आगे स्पष्ट करेंगे श्रीकृष्ण।
गीता अध्याय 2 श्लोक 22
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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्रों को ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है
॥22॥
श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि शरीर और आत्मा का क्या सम्बन्ध होता है। पहले समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अजन्मा, अपरिवर्तनीय, सनातन, पुरातन है जबकि शरीर निरन्तर परिवर्तनीय है जो जन्म से लेकर मृत्यु तक नित्य परिवर्तित होता रहता है और कहते हैं कि मृत्यु भी मात्र एक परिवर्तन ही है क्योंकि अनश्वर आत्मा को जब प्रतीत होता है कि शरीर जीर्ण हो चुका है तो वह उस शरीर को त्याग कर अन्य नया शरीर धारण कर लेता है। शरीर का अंत हो जाता है लेकिन उस शरीर को धारण करने वाले आत्मा का नहीं। मृत्य अंत नहीं परिवर्तन मात्र है। तो क्या शरीर के अंत से हमारा नाश नहीं होता है?
वस्तुतः आत्मा की यात्रा शरीर की मृत्यु से रुकती नहीं है। हम जो कुछ करते धरते हैं उनसे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। हम देख चुके हैं कि आत्मा न तो कुछ करता है न कराता है। मात्र उसकी उपस्तिति में हमारी भावनाएँ, और बौद्धिकता कुछ न कुछ करती कराती रहती हैं। इससे हमारे संस्कार संकलित होते जाते हैं। शरीरों का जीर्ण होने का तातपर्य शरीर का भौतिक दृष्टि से कमजोर या रुग्ण होने से नहीं है।
शरीर आत्मा के वस्त्र की तरह होता है। वस्त्र के पुराने पर जाने पर और विभिन्न अवसरों पर हम अपना वस्त्र बदलते हैं। लेकिन वस्त्रों के बदलने से हम तो नहीं बदल जाते हैं। हम तो वही रहते हैं हमारा प्रस्तुतिकरण बदल जाता है, लेकिन वास्तविकता में हम वही रहते हैं। इसी प्रकार शरीर के बदलने से आत्मा की वास्तविकता में कोई परिवर्तन नहीं आता।
अब देखिए कि वस्त्र बदलने पर क्या हमें पीड़ा का अनुभव होता है? यदि उस बदले जाने वाले वस्त्र से हम जुड़ाव महसूस करते हैं तो उसे छोड़ने या बदलने के समय हमें पीड़ा होती है। यदि जुड़ाव नहीं है तो कोई पीड़ा नहीं होती। यही हाल शरीर के परिवर्तन पर भी होता है। जिस शरीर से हम जितना जुड़े रहते हैं उसके मृत्यु या प्रस्थान पर हमें उतनी ही पीड़ा होती है। हमारे घर या इष्ट मित्र आदि के यँहा यदि किसी का देहावसान होता है तो हम कितने दुखी हो जाते हैं , लेकिन रास्ते पर ले जा रहे मृतकों को देख कर हम उन्हें मात्र नाश या शव मानकर नजरअंदाज कर देते हैं । उनसे हमें कोई पीड़ा नहीं होती क्योंकि उनसे हमारा कोई जुड़ाव नहीं होता है। लेकिन नय जन्म पर हम फिर उल्लासित भी होते हैं जैसे नय वस्त्र पाकर। लेकिन ध्यान रहे ये सब भावनात्मक क्रिया प्रतिक्रिया हमारी आत्मा के स्तर पर नहीं होता है बल्कि ये सब हमारे नश्वर इगो के स्तर पर होता है।
तो प्रश्न उठता है कि आत्मा जीवन को कैसे चुनती है। हम देखते जानते हैं कि हर प्राणी का शरीर मैटर से बना होता है और ये मैटर भी सभी में समान ही होता है। एक प्रजाति में एक ही अनुपात में भी होता है। लेकिन मैटर तो निश्चेष्ट और प्राणविहीन होता है। यदि सभी कुछ समानुपातिक ढंग से उस रूप मरीन ढाल भी दिया जाए तो भी उसमें जीवन का संचार नहीं होता है । इस जीव के संचार को तभी सम्भव किया जा सकता है जब उसमें आत्मा का निवास हो, अन्यथा नहीं। आत्मा और स्थूल शरीर के मध्य सूक्ष्म शरीर होता है जो दिखता तो नहीं है लेकिन स्थूल शरीर को क्रियाशील रखता है। यह सूक्ष्म हमारी बौद्धिकता का परिणाम होता है। आत्मा से मैटर को जीवन मिलता है लेकिन आत्मा स्वयम मैटर नहीं होता है। आत्मा मैटर से भिन्न होता है। मैटर चारो तरफ होता है लेकिन सभी में जीवन नहीं होता है। मैटर जब आत्मा से मिलता है तभी उसमें जीव का प्रवाह हो पाता है। मृत्यु के पश्चात शरीर का अंत होता है, मैटर का नहीं, उसका स्वरूप परिवर्तन सम्भव है। लेकिन जीवनपर्यंत संचित संस्कार कँही नहीं जाते। वे तो सूक्ष्म अवस्था में बने ही रहते हैं। हम देखते हैं कि एक अमरूद के फल में ढेरों बीज होते हैं। उन बीजों का रंग रूप स्वरूप अमरूद से तो नहीं मिलता लेकिन प्रतेक बीज में एक पेड़ को जन्मने की क्षमता होती है और उस पेड़ से फिर ढेर सारे अमरूद के जन्म लेने की। और पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे ही चलता है। साथ ही पेड़ के प्राकृतिक आवास के आबोहवा के अनुसार परिवर्तन भी संचित होते और स्थानांतरित होते जाते हैं। वैसे ही जैसे संस्कार संचित होते जाते हैं और मैटर का संयोग जब आत्मा से होता है तो वो संस्कार तो आगे जाते ही हैं वो उसी के अनुसार जीव में परिवर्तन भो करते जाते हैं।
सनद रहे कि आत्मा का विस्तार समझने के लिए आकाश की तरह होता है जो शरीर के समाप्त होने से संकुचित नहीं होता है। उसके विस्तार पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस प्रकार हम समझते हैं कि जब आत्मा एक शरीर को त्याग कर दूसरा शरीर धारण करती है तो वो उन संचित संस्कारों को भी अपने में समाहित कर लेती है। और आपकी यात्रा उन संचित संस्कारों के आगे से शुरू होती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 23 & 24
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नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता
॥23॥
एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेद्य और निःसंदेह अशोष्य है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है
॥24
श्रीकृष्ण आत्मा की विशेषताओं को अर्जुन को समझा चुके हैं। एक बार फिर वे आत्मा की विशिष्टताओं को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि आत्मा प्रकृति से मुक्त है। प्रकृति का आत्मा पर कोई असर नहीं पड़ता है। सो प्रकृति की कोई भी शक्ति आत्मा को किसी भी तरह से प्रभावित नहीं कर सकती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बार बार समझा चुके हैं कि आत्मा अजर, अनश्वर, अपरिवर्तनीय है । इसी तथ्य को श्रीकृष्ण और भी स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि प्रकृति आत्मा पर कुछ भी असर नहीं डाल पाती है क्योंकि आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।
आत्मा पुरातन काल से है परन्तु हमेशा नूतन ही है। यह निरन्तर बना हुआ रहता है क्योंकि इसका कोई भूत या वर्तमान नहीं होता है। आत्मा समय से अप्रभावित होता है। समय का भान स्थान और गति के कारण होता है। हमारी चिंतन प्रक्रिया चलायमान होती है। चिन्तनप्रक्रिया गतिमान होती है। ये एक सिरे से दूसरे सिरे की तरफ गतिशील होता है। स्थान के परिपेक्ष्य में गति समय का भान देती है। यदि गति न हो तो समय भी नहीं है। गति के अभाव में आत्मा हमेशा स्थिर और अचल है। इस कारण आत्मा भूत और भविष्य से परे हमेशा वर्त्तमान में ही है। इस वजह से आत्मा नित्य है।
अब इसे ऐसे समझ सकते हैं। श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि आत्मा का कोई स्वरूप नहीं होता, कोई आकार नहीं होता , उसका कोई भौतिक पिण्ड नही होता। इस प्रकार आत्मा आकारविहीन और प्राकृतिक स्वरूप से मुक्त तो है ही वह प्रकृति की समस्त शक्तियों और उनके प्रभाव से भी परे है। जिसका कोई आकार नहीं, जो अपने स्वरूप के लिए प्रकृति पर निर्भर नही। जिसका कोई आकार नहीं उसकी कोई सीमा भी नहीं है। सो
निश्चित ही वह आत्मा सर्वत्र है यानी सर्वायापी है। सीमाविहीन , आकार विहीन , सर्वव्यापी आत्मा किसी के अधीन नहीं , बल्कि सारी प्रकृति उसी के अधीन आ जाती है।
समय, काल, स्थान, गति और प्रकृति से मुक्त आत्मा अचल भी है अर्थात जिसमें कोई गति नहीं है। हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने आत्मा को समझाते हुए इसे स्थिर और अचल दोनों कहा है। आत्मा स्थिर है क्योंकि इसमें क्षैतिज गति नही है, यह स्थानांतरित नहीं होती एक स्थान से दूसरे स्थान तक। चूँकि आत्मा गति से मुक्त है सो ऊर्ध्व गति भी नहीं होती। इस कारण ऐसा नहीं होता है कि एक स्थान पर स्थिर आत्मा ऊपर की तरफ चलायमान हो अर्थात आत्मा क्षैतिज गति के साथ साथ ऊर्ध्व गति से भी मुक्त होती है, किसी भी दिशा में नहीं चलती यानी अचल है।
आत्मा सनातन भी है। जैसा कि पहले कहा गया है कि आत्मा पुरातन तो है लेकिन समय की अवधारणा से मुक्त होने के कारण हमेशा नूतन भी है , नित्य भी है सो यह शाश्वत सनातन है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आत्मा प्रकृति के समस्त गुणों से इतर है, यह प्रकृति की सत्ता से बाहर नित्य, शाश्वत, अपरवर्तनिय, अविकारी और सर्वव्याप्त होकर हर स्थान, काल और प्राणी में है। चूँकि यह स्वरूप विहीन, अपरिवर्तनीय, अविकारी, शाश्वत और सनातन है , सर्वव्यापी है सो यह सभी में समान भी है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 25
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अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥॥
यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर तू शोक करने के योग्य नहीं है अर्थात् तुझे शोक करना उचित नहीं है
॥25
अर्जुन को शोक नहीं करने के कारणों को समझाने के क्रम में श्रीकृष्ण उसे आत्मा से सम्बंधित शिक्षा दे रहें हैं। उन्होंने आत्मा की सभी विशिष्टताओं को अर्जुन के सामने रख दिया है। वे बार बार अर्जुन को बता चुके हैं कि आत्मा यानी हमारा स्व यानी सेल्फ ऐसा है जिसे इन्द्रियों /सेंसेज की मदद से नहीं जाना जा सकता है,(अव्यक्त)।
इसके साथ ही आआत्मा सोचने समझने की परिधि से बाहर है। आकारविहीन, रंगविहीन, रूपविहीन प्रकृति के किसी भी प्रदर्शन से विहीन आआत्मा सोचने समझने से बाहर है(अचिन्त्य)। शब्द, तस्वीर आदि से इसे परिभाषित करना सम्भव नहीं है।
इसके साथ ही आत्मा यह जैसा है वैसा ही है अर्थात समय, काल और स्थान आदि से इसमें कोई परिवर्तन नहीं होता(विकाररहित) है।
आत्मा की विशेषताओं की व्याख्या से स्पष्ट है कि प्रत्येक जीव का शरीर आत्मा को धारण करता है लेकिन जीव के शरीर की समाप्ति से उसके आत्मा यानी स्व पर कोई भी फर्क नहीं पड़ता। वह जस का तस बना रहता है।
उपरोक्त कथनों से स्पष्ट है कि मृत्यु से व्यक्ति का सेल्फ(उसकी आत्मा) का नाश नहीं होता। बल्कि कहें तो मृत्यु के किसी भी प्रभाव से आत्मा अछूती रहती है। तो फिर किसी की मृत्यु का शोक कोई क्यों करे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 26,27,28
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अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥
किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है
॥26॥
जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है
॥27॥
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
॥28॥
जीवन मूल्यों को देखने का दो दृष्टिकोण होता है। एक आध्यात्मिक जिसे हम अभी तक देखते आये हैं और दूसरा भौतिक। भौतिक दृष्टिकोण से प्रत्येक चीज, प्रत्येक जीवन मात्र पदार्थ(मैटर) और ऊर्जा से बना होता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार प्रत्यक्ष जानकारी ही अर्थात जिस जानकारी को हम इन्द्रियों यानी अपने सेंसेज से प्राप्त करते हैं वही अंतिम सत्य है और जो दिखता नहीं है उसकी कोई चर्चा नहीं होती। अतः इस दृष्टिकोण से आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है। भौतिकवादी दृष्टिकोण के अनुसार आत्मा आपका दृश्य स्व है जो सदा मरता और पैदा होता है। जीवन मृत्यु निरन्तर चलता रहता है। जन्म लेने वाले कि मृत्यु निशिचित है। अगर इस दृष्टिकोण को भी सही मान लिया जाए तो भी जिसकी मृत्यु होती है उसके लिए किसी तरह का शोक अवांछनीय है क्योंकि ये तो एकदम स्वाभाविक है क्योंकि इसकी मृत्यु तो निश्चित है।
तत्पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब जन्म लेने वाले की मृत्यु निशिचित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है तो फिर ये परिवर्तन तो अपरिहार्य है, अटल है। जब ऐसा है तो फिर मरने पर शोक क्यों करना।
ध्यान देने की बात है कि आध्यात्म का दृष्टिकोण देह से परे आत्मा की सत्ता को मानता है और मानता है कि एक जन्म के संस्कार संचित होकर सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरे जीवन में प्रवेश करता है और इस प्रकार जीव निरन्तर विकास की अवस्था प्राप्त करता अंत में उस स्थिति तक पहुँचता है जँहा वह दृश्य संसार के परे की सत्ता का परिचय प्राप्त कर उसी में विलीन हो जाता है और शरीर की यात्रा का अंत हो जाता है। इस प्रकार अध्यात्म आत्मा से इतर उन सब को जो प्रकृति से हैं को सदा परिवर्तनीय मानता है और एकमात्र आत्मा ही अपरिवर्तनीय होती है सो मृत्यु शरीर का होता है, स्वरूप का होता है आत्मा का नहीं और संस्कार एक जन्म से दूसरे जन्म में स्थानांतरित होते रहते हैं सो स्व का कभी नाश नहीं होता जब तक वह ब्रह्म में विलीन नहीं होता। इस प्रकार जीव की आत्मा कभी मरती नहीं। दूसरी तरफ भौतिकवाद भी जीवन मृत्यु को एक श्रृंखला में मानता है और मानता है कि जो जन्म लिया है उसकी मृत्यु तय है ओर मृत्यु के बाद फिर जीवन का प्रादुर्भाव होता है। इस प्रकार दोनों ही दृष्टिकोण से शरीर की मृत्यु तो अवश्यम्भावी है सो इस विषय पर शोक क्यों करें भला। शोक करने से निश्चित घटना नहीं टलने वाली है। तो फिर शोक करने से शोक बढ़ेगा ही शोक का कारण मृत्यु नहीं टलेगी। इस स्थिति में शोक करना अर्थहीन है।
इसी को और स्पष्ट करते हुए श्रीकृष्ण पुनः समझाते हैं कि जन्म लेने और मृत्यु के पश्चात सभी अव्यक्त होते हैं , दिखते नहीं हैं, उनकी उपस्तिति नहीं होती। सिर्फ जन्म से मृत्यु तक के बीच में ही जीव व्यक्त रहता है, और अपने व्यक्तित्व यानी इगो के अनुसार जीवन जीता है। उस जीव के जन्म लेने के पूर्व भी और मृत्यु के पश्चात भी जीवन चलता रहता है। सभी अलग अलग समय पर जन्म लेते हैं , अलग अलग समय पर मृत्यु को प्राप्त होते हैं, परन्तु समय का प्रवाह उनके जन्म के पूर्व भी रहता है और मृत्यु के बाद भी। जीवन काल का समय इसके अनुपात में अत्यल्प ही होता है और यही सत्य भी है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 29 & 30
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आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्॥
कोई एक महापुरुष ही इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता है और वैसे ही दूसरा कोई महापुरुष ही इसके तत्व का आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा दूसरा कोई अधिकारी पुरुष ही इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जानता
॥29॥
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥
हे अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों के लिए तू शोक करने योग्य नहीं है
॥30॥
इस प्रकार अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसे परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त, शरीर की नश्वरता और आत्मा/सेल्फ की शिक्षा दिया है और इस शिक्षा को पूरी करने के पश्चात अर्जुन को इस शिक्षा की गूढ़ता के सम्बंध में समझाते हैं कि आत्मा की शिक्षा सभी को नहीं मिल पाती। इसका कारण है कि हममें से अधिकांश लोग चाहे धर्म के रास्ते चलने वाले ही क्यों न हों , आत्मा के अन्वेषण की बिधि नहीं समझ पाते सो इससे दूर ही रहते हैं और जो इस शिक्षा के सम्बंध में सुनते भी हैं वो सांसारिक मोह वश उस ज्ञान को नहीं समझ पाते जो उनके दृश्य इगो के परे होता है। इस कारण से सुनने वाला भी नहीं जान पाता। तब सवाल उठता है कि जानता कौन है। आत्मा यानी अपने सेल्फ जो सभी में समान रूप से एक ही होता है जो मोह को त्यागता है, भ्रम से बाहर निकल पाता है अर्थात जो अवश्यम्भावी परिवर्तन के अपरिवर्तनीय सिद्धान्त को समझ पाता है और ऐसा कोई व्यक्ति विरले ही मिलता है। इस स्तर पर पहुँचने का मार्ग ज्ञानयोग और कर्मयोग है जिसे श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं।
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को स्मरण कराते हैं कि चूँकि सभी जीवों में अनश्वर, अविकारी आत्मा का वास है जो जीव की मृत्यु से अप्रभावित रहती है सो किसी की मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद को दूर करने हेतु आत्मा से सम्बंधित शिक्षा को पूरी करते हैं।
सारांश
श्लोक 16 से 30
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उपरोक्त विवेचना से दो चीजें स्पष्ट है, एक कि प्रकृति के कारण जो कुछ है वो सदा परिवर्तनीय है और दूसरा कि प्रत्येक जड़ चेतन की मूल अभिव्यक्ति उसके सेल्फ यानी आत्मस्वरूप यानी उसकी आत्मा से होती है जो प्रकृति से परे है, अपनिवर्तनिये, अविकारी, अनश्वर, अव्यक्त है और वही जीव का वास्तविक स्वरूप है जो सभी में समान है।
आत्मा के इस स्वरूप का ज्ञान होना सहज नहीं होता है। इसके लिए ज्ञान के क्रमिक विकास के द्वारा अज्ञान को दूर करना होता है। यह ज्ञान इन्द्रीयजनित तो होता है किंतु यह इन्द्रियों के वश में नहीं होता है।
आत्मा के इस स्वरूप का एक अनर्थ भी कई लोग निकाल लेते हैं कि चूँकि सभी भौतिक चीजें नश्वर हैं सो उनको त्याग कर देना चाहिए। अध्यात्म को प्राप्त करने का साधन भौतिक शरीर ही होता है सो इस शरीर से भागना, इस संसार से भागना हमें अध्यात्म से दूर ले जाता है। मोह त्यागने का अर्थ ये नहीं कि हम अपने दायित्वों से भाग जाएँ। आत्मा का ज्ञान इसी संसार में रहकर होगा और इसके लिए श्रीकृष्ण आगे दो वैकल्पिक रास्ते सुझाते हैं, ज्ञानययोग और कर्मयोग। दोनों ही कर्मप्रधान मार्ग हैं । कर्म कर ही हम आत्मसाक्षात्कार कर सकते हैं।
आत्मा /अपने स्व/अपने सेल्फ को प्राप्त करने का स्वधर्म पालन का मार्ग(द्वितीय अध्याय श्लोक 31 से 38)
श्रीकृष्ण ने आत्मा की समझ अर्जुन देने के पश्चात उसे आगे का मार्ग भी सुझाया है। इस मार्ग पर चलकर इंसान ब्रह्म को प्राप्त होता है जँहा ईश्वर और मनुष्य में कोई फर्क नहीं रह जाता। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कर की है। ये मार्ग योग का है-ज्ञान योग और कर्म योग का। आगे के श्लोको में बारी बारी से योग और इसके दोनों स्वरूपों और दोनों की अपरिहार्यता को समझते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 31
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स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
तथा अपने धर्म को देखकर भी तू भय करने योग्य नहीं है अर्थात् तुझे भय नहीं करना चाहिए क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है
॥31॥
ऊपरी तौर पर तो यह श्लोक युद्ध के लिए प्रेरित करता प्रतीत होता है जो इस श्लोक के वास्तविक अर्थ का अधूरा स्वरूप ही है। श्रीकृष्ण ने अभी तक आत्मा को ही धर्म का प्रतीक बताए हैं किंतु इस श्लोक में उन्होंने स्वधर्म की बात की है। वस्तुतः आत्मा के सत्य तक पहुँचने के लिए जो मार्ग है उसी का नाम स्वधर्म है। स्वधर्म का अर्थ है खुद के स्वभाव के अनुसार धर्म यानी कर्तव्य।
सनातन धर्म के अनुसार प्रत्येक मुनष्य में तीन तरह के गुण होते हैं, तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण। इन गुणों के अनुपात विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न स्तर के होते हैं।
गीता के 16वें अध्याय के अनुसार करने लायक अच्छे गुण यानी दैवी गुण और
न करने लायक बुरे गुण यानी आसुरी गुण निम्न हैं--
दैवी गुण
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अभयता
अन्तःकरण की शुद्धता
ध्यान में लग्न
सर्वस्व का समर्पण
इन्द्रियों पर नियंत्रण
अहिंसा
सत्य
क्रोध का न होना
कर्मफल का त्याग
चित्त की चंचलता का अभाव
सभी के प्रति दयाभाव
अनासक्ति
कोमलता
लक्ष्य के प्रति समर्पण
व्यर्थ की चेष्टा का अभाव
क्षमा
तेज
शत्रुभाव का अभाव
लालच का अभाव
पूजे जाने की भावना का अभाव
मान अपमान के भाव का अभाव
आसुरी गुण
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पाखण्ड
घमण्ड
अभिमान
क्रोध
कठोर वाणी
अज्ञानता
दम्भ
मान अपमान की चिंता
मद
कर्मफल में आसक्ति
इन्द्रियों में आसक्ति
निंदा
अहंकार
कामना
लोभ
मोह
तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण के अनुपात से व्यक्ति का स्वभाव निर्धारित होता है। इन गुणों के अनुपात के अनुसार श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के मनुष्य बताए हैं,
1.जिस व्यक्ति में तमोगुण की अधिकता होती है उसे शुद्र का नाम दिया गया है। ऐसा व्यक्ति प्रकृति के मायाजाल में फँसा रहता है और सद्कर्मों में उसकी रुचि न्यूनतम होती है।
2. जब शुद्र श्रेणी का व्यक्ति उच्चकोटि की व्यक्ति की सेवा करता है, उनके सानिध्य में रहता है तो उसके तमोगुण कम होते जाते हैं, सद्गुण आने लगते हैं। दैवी सम्पद की वृद्धि के साथ ही वही व्यक्ति शुद्र से वैश्य श्रेणी का साधक हो जाता है।
3. जैसे जैसे सद्गुणों का विकास इंसान के अंदर होते जाता है आसुरी गुण भी उस व्यक्ति पर हावी होने का प्रयास करते हैं। आप जब जब अच्छा इंसान बनने की कोशिश में लगते हैं हमारी इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हमें उकसाते हैं, काम क्रोध की अधिकता होने लगती है। दैवी और आसुरी गुणों के संघर्ष की ये अवस्था आंतरिक युद्ध को जन्म देती है। जब इंसान इस अवस्था में पहुँचता है तो उसमें प्रकृति से उत्पन्न गुणों को काटने की क्षमता विकसित हो जाती है। यही उसके क्षत्रिय श्रेणी का साधक बनाता है। इसी अवस्था में ही सद्गुणों का आसुरी गुणों से युद्ध होता है। यही तो क्षत्रिय धर्म है यानी क्षत्रिय का कर्तव्य है कि वह दुर्गुणों, आसुरी गुणों और इन गुणों से उपजे अव्ववस्था और इन गुणों के वाहकों का अंत करे अर्थात उनके विरुद्ध युद्ध करे।
4.आसुरी गुणों के विरुद्ध दैवी गुणों के संघर्ष के परिणाम में जब दैवी गुण दुर्गुणों को समाप्त कर देते हैं तो मन का शमन, इन्द्रियों का दमन हो जाता है । इस अवस्था में सरलता, सहजता, ज्ञान, दया, प्रेम, जैसे सद्गुण ही बच जाते हैं जो ब्राह्मण का प्रतीक है। ब्राह्मणत्व के विकास के साथ ही वह व्यक्ति परमब्रह्म में प्रवेश पाता है।
ब्राह्मणत्व की प्राप्ति ही आत्मसाक्षात्कर है। इस अवस्था में व्यक्ति को अपने वास्तविक बोध यानी सेल्फ यानी अपनी आत्मा अर्थात आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है।
प्रत्येक व्यक्ति की आत्मा तो समान है लेकिन उसका व्यक्तित्व उसके मन-मस्तिष्क और बौद्धिकता से बनता है जो हमें दिखता है। इस व्यक्तित्व का निर्धारण व्यक्ति के अंदर के तीनों गुणों की अनुपातिक मात्रा पर निर्भर करता है। इन गुणों की मात्रा स्थिर नहीं होती बल्कि बढ़ती घटती रहती है और इस प्रकार एक ही शुद्र से लेकर ब्राह्मण तक कि यात्रा करता है।
अब पुनः हम श्रीकृष्ण की इस शिक्षा पर ध्यान दें कि हमारा आचरण हमारे स्वधर्म के अनुसार होना चाहिए। अर्थात हमें अपना कर्तव्य अपने गुणों के अनुसार ही निर्धारित कर आगे की यात्रा करनी चाहिए। तभी हम कर्मिक विकास कर आत्मा को पहचान पाते हैं। किसी दूसरे की नकल करने से हम उसके गुणों को नहीं पा सकते। कोई अन्य अगर अन्य श्रेणी का है और अगर हम बिना उन गुणों को प्राप्त किये मात्र उस व्यक्ति की नकल करेंगे तो उस व्यक्ति के अनुसार तो आचरण नहीं ही कर पाएंगे, अपने अंदर जो करने की क्षमता है वह भी नहीं कर पाएंगे। इसी को कहते हैं कि न माया मिली न राम!
प्रत्येक व्यक्ति का अपना कुछ कर्तव्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति का स्वयं के प्रति, परिवार के प्रति, समाज के प्रति, अन्य जीव जंतुओं और परिवेश के प्रति और ईश्वर के प्रति कुछ कर्तव्य होते हीं हैं जिनका निर्वाहन करना ही धर्माचरण होता है। यदि हम इन कर्तव्यों को नहीं करते तो हम अपने धर्म का पालन नहीं करते। हम लाख ज्ञान बघारें, जो भेष धारण कर लें उससे कुछ नहीं होने वाला । यदि आप धर्म के मार्ग पर चलना चाहते हैं तो हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना ही होगा। हो सकता है कि हमारे कुछ कर्तव्य हमें अच्छे नहीं लगें लेकिन उनको करना ही अगर हमारा कर्तव्य है तो करना ही एकमात्र सही रास्ता है।
अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है तो उसका दायित्व है कि वह अनाचार अत्याचार, अधर्म के विरुद्ध खड़ा हो, उनसे युद्ध करे। साथ ही उसका दायित्व है कि खुद के अंदर के आसुरी गुणों। जैसे माया , मोह , भ्रम आदि को काटे।
अर्जुन का युद्ध हम सब का युद्ध है। हम सभी गुणों की विकासयात्रा के अलग अलग पड़ाव पर होते हैं और अपने गुणों। के अनुसार हमारे निम्न दायित्व हैं---
1.हमारा आचरण हमारे गुण के अनुसार हो।
2.हम जिस गुण की अवस्था में हैं उससे विकसित अवस्था में पहुँचने हेतु अपने गुणों को परिमार्जित करें।
3. गुण की जो अवस्था है, उसके अनुसार हमारे जो कर्तव्य हैं उनका भली प्रकार पालन करें
इसी मार्ग से हम आत्मसाक्षात्कार के उपरांत ब्रह्म को प्राप्त होंगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 32
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यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं
॥32॥
कर्तव्य पालन की आवश्यकता को समझाने के बाद श्रीकृष्ण कर्तव्यपालन के महत्व को बताते हैं। जब हम अपने निर्धारित कर्म को करते हैं तो हमें परम शांति की प्राप्ति होती है। जब हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करते हैं तो निश्चित रूप से हम अपनी वर्तमान अवस्था से ऊपर ही उठते हैं और हमारे गुण और ज्यादा परिष्कृत होते हैं । ये तथ्य भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टिकोण से सही है।
यदि भौतिक दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि जब हम अपना कर्तव्य पूरा करते हैं तो हम अपने लक्ष्य को हासिल करते हैं और एक कदम आगे ही बढ़ते हैं। इस दृष्टिकोण से देखे तो पाते हैं कि अर्जुन एक क्षत्रिय है जिसका परम् कर्तव्य समाज से अनाचार, अत्याचार को समाप्त करना होता है ओर यदि आवश्यक हुआ तो इसके लिए आतताई का संहार भी करे। कौरव पक्ष छल से पांडवों का हक मारे हैं। ऐसे में अर्जुन और पांडव पक्ष का यही कर्तव्य है कि वे इस अत्याचार, असत्य, अनाचार को समाप्त करने के लिए कौरवों का नाश करें।
दूसरी ओर यदि हम इसके आध्यात्मिक पक्ष को देखें तो पाते हैं कि आसुरी गुणों से युक्त तमोगुण को समाप्त करने हेतु ये आवश्यक है कि देवी सम्पद आसुरी सम्पद को समाप्त करें। जब भी दैवी सम्पद को हम अपने अंदर मजबूत करने का प्रयास करते हैं, क्रोध, मोह, माया, अहंकार, भ्रम आदि आसुरी गुण रास्ते में खड़े हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में इन आसुरी सम्पद का नाश करना ही एकमात्र विकल्प होता है। यही हमारा कर्तव्य भी होता है। जब हम ऐसा करते हैं तो हमारे गुणों का स्तर बढ़ता है और हमारा वर्ण क्रमशः आगे बढ़ते बढ़ते हमें आत्मसाक्षात्कार यानी अपनी आत्मा की प्राप्ति की तरफ ले जाता है। आत्मसाक्षात्कार के पश्चात ही हमें ब्रह्म में प्रवेश की योग्यता मिल पाती है।
अपने कर्तव्यों का पालन कर लक्ष्य की तरफ बढ़ने का अवसर विरले लोगों को ही मिलता है। कई स्थितियों में तो हम पाते हैं कि कर्तव्य का भान रहने के बावजूद भी स्थितियाँ इस तरह से प्रतिकूल होती हैं कि हमें जो करना चाहिए उसे हम कर भी नहीं पाते, सो कर्तव्यपालन का सुअवसर मिलना भी एक बड़ी उपलब्धि होती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 33
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अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥
किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा
॥33॥
कर्तव्यपालन के दायित्व से भागने वाले को हानि ही हानि मिलती है। श्रीकृष्ण के अनुसार हानियों की श्रृंखला लम्बी है। इनका वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्तव्य पालन से भागने के कारण निम्न हानि होते हैं---
स्वधर्म से च्युत होना
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अपने स्वभाव/गुण के अनुसार जो हमारे कर्तव्य हैं उनको हम गँवा देते हैं जिसके कारण गुणों की वर्तमान अवस्था से हम आगे नहीं बढ़ पाते, बल्कि उससे नीचे ही गिरते हैं। स्वभाव में। दैवी सम्पद कम होने से आसुरी गुणों में वृद्धि ही होती है जिसके कारण साधना की उच्च अवस्था से निम्न अवस्था में हमारी अवनति होती है।
इस कारण से सांसारिक/भौतिक रूप से हमारी पहचान भी प्रभावित होती है । हम जिस मेधा के लिए जाने जाते हैं उसका क्षरण होता है। ये तथ्य समाज के हर स्तर पर हर व्यक्ति के साथ लागू होता है।
अपकीर्ति प्राप्त होना
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जब हम स्वभाव से उत्पन्न क्षमता के अनुसार क्रियाशील नहीं होते तो न सिर्फ साधना की अवस्था से गिरते हैं बल्कि इस पतन के कारण बढ़े हुए आसुरी गुण हमारी अपकीर्ति को ही बढ़ाता है। साधना की अवस्था के अनुसार कर्तव्य का निर्वहन कीर्ति देता है लेकिन इसका प्रतिकूल होने पर अपकीर्ति मिलती है।
भौतिक संसार में भी जब हम अपनी क्षमता और योग्यता के अनुसार कार्य नहीं करते हैं तो हमारी बदनामी होती है। व्यक्ति विशेष से उस व्यक्ति की क्षमता के अनुसार समाज को हमसे कर्तव्य पालन की उम्मीद होती है। यदि हम ऐसा नहीं करते तो हम जिस अवस्था में होते हैं , जिस सोपान पर होते हैं उसी के अनुसार बदनामी भी मिलती है हमें।
पाप प्राप्त होना
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पाप और पुण्य की अवधारणा हमारे स्वभाव के गुण की अवस्था पर निर्भर करती है। स्वभाव यह स्व गुण की अवस्था के अनुसार हमारे जो कर्तव्य होते हैं उनका निर्वहन ही पूण्य है और उनका निर्वहन नहीं करना ही पाप है। जब हम कर्तव्य का पालन करते हैं तब हमारे अंदर दैवी गुण बढ़ते हैं , आसुरी गुण कम होते हैं , हम साधना की उच्चतर अवस्था में प्रवृत्त होते हैं अर्थात पूण्य को प्राप्त होते हैं। यदि इसके विपरीत होता है तो आसुरी गुण बढ़ते हैं जिससे पाप की वृद्धि होती है।
भौतिक /सांसारिक समाज में भी इसी को दुहराया जाता है। यदि हम अपने निर्धारित कर्तव्य को करने में असमर्थ होते हैं तो हमारी जगहँसाई ही होती है। कर्तव्य से गिरा इंसान ही पापी कहलाता है।
प्रस्तुत स्थिति युद्ध की है सो श्रीकृष्ण युद्ध के सम्बंध में कह रहे हैं, अन्य स्थितियों में भी यही बात लागू होती है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के आंतरिक युद्ध में जब हम गुणों के अनुसार आचरण कर दैवी सम्पदाओं की वृद्धि करने में असमर्थ होते हैं हमारे अंदर आसुरी गुणों की वृद्धि होती है जिससे पाप वृत्ति की बढ़ोत्तरी होती है। समझने वाली बात यही है कि व्यक्ति का जो कार्य उसके कर्तव्य से परे है वही उस व्यक्ति के लिए पापकर्म है।
उपरोक्त तीनों अधोगति अपरिहार्य युद्ध सहित किसी भी निर्धारित कर्तब्य से मुँह मोड़ने पर प्राप्त होता ही है।
इस बात का ध्यान रहे कि पाप और पुण्य कोई बाहरी सत्ता निर्धारित नहीं करती है। हम स्वयम के कर्मों का ही परिणाम भुगतते हैं। पाप और पुण्य, कीर्ति और अपकीर्ति हमारे अपने ही कर्मों के स्वाभाविक परिणाम होते हैं। सो हमें इस बात पर ध्यान रहे कि किसी भी परिस्थिति में हम कर्तव्यच्युत नहीं हों अन्यथा हमें जो भुगतना होगा भुगतेंगे हीं साथ साथ हमारी वजह से समाज में भी अनाचार, अत्याचार, असत्य, हिंसा, घृणा जैसे आसुरी प्रवित्तियों का जोर बढ़ेगा जिसकी कीमत समाज और प्रकृति को भुगतना ही होगा। आप स्वयं देखें कि आज की परिस्थिति में हमारी कमजोरी के कारण ही समाज और उसके भौतिक , प्राकृतिक और बौद्धिक वातावरण की क्या दुर्गति हो रही है। हम आप सभी यदि खुद का आत्मपरीक्षण करें तो पाते हैं कि हम तो अपने निर्धारित कर्तव्य से विमुख होकर जो कर रहें हैं उसे हीं वापस पा रहें हैं। बोया पेड़ बबूर का तो आम कँहा से पाओगे।
गीता अध्याय 2 श्लोक 34, 35, 36
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अकीर्तिं चापि भूतानि
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
सम्भावितस्य चाकीर्ति-
र्मरणादतिरिच्यते॥
तथा सब लोग तेरी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति का भी कथन करेंगे और माननीय पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी बढ़कर है
॥34॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्॥
और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे
॥35॥
अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्॥
तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख और क्या होगा?
॥36॥
युद्ध से विमुख अर्जुन को कर्तव्य पालन की शिक्षा देते हुए श्रीकृष्ण उसे बताते हैं कि जब व्यक्ति अपने नियत कर्तव्य अर्थात अपने गुणों के अनुसार निर्धारित कर्तव्य से विमुख होता है तो अपकीर्ति और पाप का भागी तो बनता ही है साथ साथ उसकी कीर्ति सदा सदा के लिए धूमिल हो जाती है। आप एक कर्तव्य से भागते हैं तो उससे मिलने वाली बदनामी उसी तक सीमित नहीं रहती बल्कि सामान्य जन मानस से लेकर आपके समकक्षी तक आपकी बदनामी को कहानी बनाकर प्रचारित करते हैं। कर्तव्य पालन से आप भागते एक बार हैं लेकिन उससे आपकी जो छवि बनती है वो हमेशा हमेशा के लिए लोगों के मन मस्तिष्क पर रह जाती है। इस तरह की बदनामी से क्या हासिल होता है? एक ओर तो आप कर्तव्य पालन के दायित्व निर्वहन से च्युत होकर स्वधर्म, पूण्य और कीर्ति तो गँवाते ही हैं साथ साथ दूसरी ओर इसका कलंक जीवन भर ढोते हैं। इस तरह से जीवन पर्यंत तिल तिल कर जिल्लत भरी जिंदगी जीने के लिए अभिशप्त भी हो जाते हैं। तब आपको लगता है कि इस तरह से जीने से तो ज्यादा अच्छा मर जाना होता।
इस तथ्य को आध्यात्मिक स्तर पर समझें। जब हम अपने दैवी गुणों को गँवाते हैं तो आसुरी गुण ही बढ़ते हैं। ऐसे आसुरी गुण हमारे अंदर के दुर्गणों को उभरते हैं और हम अपने अंदर के दैवी-आसुरी गुणों के बीच के युद्ध से भाग अपनी समझ को आज्ञान से आच्छादित करते हैं। इस कारण हमारे अंदर की आसुरी प्रवृत्तियाँ हमें आत्मसाक्षात्कर से रोकती हैं। इस कारण समाज में अव्यवस्था , अनाचार, अधर्म भी हम फैलाते हैं जिसके कारण हमारे आसुरी गुण हमें अपकीर्ति देते हैं।
अब हम इस प्रसंग के भौतिक पक्ष को देखें।प्रस्तुत प्रसंग युद्ध का है। युद्ध के मैदान से भागे हुए को भला कौन वीर कहेगा। आप लाख तर्क वितर्क कर लें, अहिंसा और धर्म की दुहाई दे लें लेकिन जन समुदाय से लेकर विशिष्ट जन इसे युद्ध में प्रदर्शित कायरता ही कहेंगे। अर्जुन के युद्ध छोड़ देने से क्या युद्ध रुक जाने वाला था? कतई नहीं। दुर्योधन की जिद्द से भीष्म और द्रोण जैसे भले लोगों को भी युद्ध तो करना ही था। इसी प्रकार अन्य योद्धा भी लड़ते ही। तब जो लड़ते वो अर्जुन को क्या कहते? कायर ही न कहते! दूसरी तरफ अर्जुन के नहीं लड़ने से इस बात की भी सम्भावना बढ़ती कि कौरव युद्ध जीत जाते। तब वो विजय अत्याचार, अनाचार, असत्य, छल की विजय होती जिससे पांडव के साथ साथ आम जन भी प्रभावित होते। तब वो सब अत्याचार, अनाचार की वृद्धि के लिए स्वाभाविक रूप से अर्जुन को ही न दोषी मानते!
आप युद्ध की भूमि से बाहर निकल कर अपने आस पास देखें। व्यक्तियों के कर्तव्य पालन से विमुख होने से समाज और उसकी व्यवस्था चरमराती है तब हम उन उत्तरदायी व्यक्तियों को दोषी ठहरा कर वर्तमान और भविष्य के समस्त इतिहास में उन्हें कोसते रहते हैं। भावी पीढ़ियों के द्वारा भी उन कर्तव्य च्युत व्यक्तियों की कर्तव्यहीनता को कोसते रहते हैं। सो अपकीर्ति तात्कालिक नहीं रहकर सर्वकालिक हो जाती है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 37 एवम 38
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हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा
॥37॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥
जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा
॥38॥
अंत में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्तव्य पालन का परिणाम भी समझाते हैं। कर्तव्य पालन के क्रम में सफलता भी मिल सकती है या फिर आप असफल भी हो सकते हैं लेकिन कर्तव्य पालन में सफलता और विफलता का विकल्प नहीं होता। सफलता और असफलता की चिंता करना व्यक्ति का दायित्व नहीं होता है क्योंकि इन विकल्पों से कर्तव्य पालन का कोई सम्बन्ध नहीं है। व्यक्ति को तो कर्तव्य करना है अन्यथा उसका पतन निश्चित है। कर्तव्य पालन के क्रम में यदि आप सफल होते हैं तो सत्ता की प्राप्ति होती है और असफल होकर वीरगति को प्राप्त होते हैं तो स्वर्ग मिलता है।
अब इस शिक्षा का आध्यात्मिक पक्ष देखे। श्रीकृष्ण किस राजपाट और स्वर्ग की बात कर रहें हैं? स्मरण हो कि अर्जुन तो अपना विषाद व्यक्त करते हुए पूर्व में ही कह चुका है कि उसे यदि स्वर्ग भी मिल जाये, इंद्र पद भी मिल जाये तो भी वो बन्धु बांधवों को मारने वाला युद्ध नहीं करेगा। उसे तो वो राज सुख चाहिए ही नहीं जिसे भोगने के लिए उसके बन्धु, बांधव और मित्रगण न हों। तब भला श्रीकृष्ण अर्जुन को किस स्वर्ग और राजसत्ता का लोभ दे रहें हैं? ध्यान रहे यह युद्ध सिर्फ मैदानों में लड़े जाने वाले युद्ध को नहीं लक्षित है। हम सबके अंदर आसुरी सम्पद और दैवी सम्पद के बीच जो युद्ध चलते रहता है और जब हम अपने अंदर के दैवी सम्पद को समृद्ध करते जाते हैं तो अंतिम विजय नहीं प्राप्त होने की स्थिति में भी हमारा उत्थान ही होता है, हम ऊपर ही उठते हैं अर्थात स्वर्ग की तरफ ही जाते हैं जिसे दैवी सम्पद का वास माना जाता है। और यदि शरीर रहते हमारी दैवी सम्पदाएँ हमारी आसुरी प्रवृत्तियों को समाप्त कर देने में सफल हो जाती हैं तो हम महीम की स्थिति प्राप्त करते हैं यानी ब्रह्म की महिमा का उपभोग कर ब्रह्म में ही मिल जाये हैं। दोनों ही स्थितियों में सफलता तो कर्तव्य में प्रवृत्त होने से ही मिल पाती है, कर्तव्य से भागने से नहीं।
इसी प्रसंग को हम भौतिक रूप से भी समझ सकते हैं। कर्तव्य पालन करने पर यदि हम असफल ही हो जाते हैं तो भी समाज की नजर में हमारी प्रतिष्ठा बढ़ती ही है। जो कर्तव्य से भाग जाते हैं वे तो अपकीर्ति के भागी होते हैं लेकिन जो कर्तव्य का पालन करते हैं वे अगर सफल होते हैं तो उनको इक्षित स्थान प्राप्त होता है और वे सुखी होते हैं। यदि असफल भी हो गए तो उनके प्रयासों की सराहना तो होती हीं है, वे प्रसंसा के पात्र तो होते ही हैं। वस्तुतः व्यक्ति को अपनी मानसिक दुर्बलता को त्याग कर बिना हार या जीत की चिंता किये अपने निर्धारित कर्तव्य में लगा रहना चाहिए, यही श्रीकृष्ण समझा रहें हैं।
उपरोक्त आचरण करने से कर्तव्य च्युत को कर उसके परिणाम पाप से मुक्त रहेगा व्यक्ति।
सो श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी का आवाहन करते हैं कि हर चिंता, विषाद को त्यागकर हम अपने गुणों की अवस्था के अनुसार, अपनी परिस्थिति के अनुसार अपने कर्तव्य यानी युद्ध में प्रवृत्त हों।
सारांश
आत्मबोध की शिक्षा देने के पश्चात श्रीकृष्ण रुकते नहीं हैं वरन उस शिक्षा के अन्य आयामों को सामने रखते हैं। श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण स्वधर्म की शिक्षा देते हैं। वस्तुतः श्रीकृष्ण क्रमिक रूप से अर्जुन को शिक्षा दे रहें हैं। विषादयुक्त अर्जुन जब श्रीकृष्ण की शरण में समाधान हेतु आता है तो श्रीकृष्ण उसे निम्न क्रम से शिक्षा दे रहें हैं
1.सत् यानी सेल्फ यानी आत्मा का बोध कराते हैं जो परम् सत्य है और जिसकी समझ ही विषादों का अंत कर सकती है।
2.तत्पश्चात श्रीकृष्ण समझाते हैं कि व्यक्ति के लिए कौन सा कार्य करना आवश्यक है
3. इसके बाद श्रीकृष्ण उस दृष्टिकोण को बताते हैं जिसके बिना मनुष्य स्वधर्म का पालन अर्थात अपना निर्धारित कर्तव्य नहीं कर सकता है।
4.इसके उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म करने की विधि बताते हैं।
5.तब समझाते हैं कि इस प्रकार कर्म में प्रवृत्त मनुष्य के लक्षण क्या होते हैं।
अभी तक श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय में उपरोक्त तीन चरणों को पूरा कर चुके हैं। तीसरे चरण में अर्जुन को दृष्टिकोण के सम्बंध में प्रारंभिक ज्ञान दे चुके हैं श्रीकृष्ण। हम भी इस अध्ययन के क्रम में पाए हैं कि श्रीकृष्ण की शिक्षाओं को हम आध्यात्मिक और भौतिक रूप से किस प्रकार अपने जीवन के हर प्रसंग में लागू कर सकते हैं।
मनुष्य संसार को, अपने परिवेश को, अपने जीवन को तीन कारकों के मेल से समझता है, उनको अवधारणा के स्तर पर महसूस करता है-ये तीन कारक हैं शरीर, इन्द्रियाँ,एवम बौद्धिकता। इन तीन के मेल से मनुष्य संसार को, परिवेश को, जीवन को समझता है, उनकी व्यख्या करता है। आत्मसाक्षात्कार के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु मनुष्य को स्वधर्म के मार्ग पर चलना होता है जो उस मनुष्य विशेष की गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। ये स्वधर्म उसके गुणों की अवस्था से निर्धारित किये गए कर्तव्य ही होते हैं जिनका पालन करना उसके लिए लक्ष्य प्राप्ति हेतु अनिवार्य है। अंत में श्रीकृष्ण बताते हैं कि मात्र कर्तव्य की समझ हो जाना और उसके पालन करने का प्रयास करना ही यथेष्ट नहीं है बल्कि कर्तव्यपालन का दृष्टिकोण भी सही होना चाहिए।
यँहा योग की अवधारणा को अतिसंक्षेप में जान लेना जरूरी है। मनुष्य का अपने स्व/सेल्फ/आत्मा से जुड़ना ही योग है जिसकी अंतिम परिणति में आत्मा का परम ब्रह्म से जुड़ना होता है। अर्थात मोक्ष की प्राप्ति होना ही योग है लेकिन ये योग का परिणाम है, उसके पूर्व जो मार्ग है उसके विभिन्न प्रकार हैं, यथा ज्ञानयोग, कर्मयोग, समत्व योग आदि।
अभी हमने देखा कि आत्मबोध के लक्ष्य का ज्ञान होने के उपरांत उस हेतु कर्तव्यबोध होना और उस कर्तव्य का पालन करना तो अनिवार्य है ही लेकिन यह तभी सम्भव है जब उस कर्तव्यपालन का यथेष्ट दृष्टिकोण भी हो हमारी बौद्धिकता में।
ये दृष्टिकोण है स्मतवयोग का। ये समतवयोग तीन स्तर पर होता है
1. अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति में सुख और दुख का अनुभव होना,
2.लाभ और हानि की परिस्थिति में हर्ष और विषाद का अनुभव होना
3.उपलब्धि और अनुपलब्धि की स्थिति में जय और पराजय का अनुभव होना।
इन्ही तीन भावनाओं की परिधि में भौतिक संसार के हमारे अनुभवों पर हमारी प्रतिक्रिया होती रहती है और सामान्य जन इन्हीं से प्रभावित होकर अपनी चेष्टाओं को क्रिया रूप देते रहते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से समझाते हुए कहते हैं कि उक्त तीनों परिस्थितियों में हमें प्रतिक्रियाविहीन होना चहिये अर्थात अनुकूल परिस्थिति में न तो सुखी होनी चाहिए और न ही प्रतिकूल परिस्थितियों में दुखी; लाभ में न तो हर्ष होना चाहिए न ही हानि में विषाद; सफलता की स्थिति में जय का भाव और असफलता की स्थिति में पराजय का भाव नहीं होना चाहिए, बल्कि सभी स्थिति में समान रूप से रहना चाहिये। यही समभाव की स्थिति होती है। यही समत्व योग है। इस दृष्टिकोण से कर्तव्य पालन में लगने वाला मनुष्य हर प्रतिकूल भाव से मुक्त होता है , उसके मन पर कोई बोझ नही। होता, वह हर हाल में प्रफ्फुलित रहते हुए कर्तव्य पालन में लीन होता है।
ध्यान रहे श्रीकृष्ण ये नही कहते कि ईश्वर आपके दुखों को हर लेगा। कोई तंत्र मंत्र से आपकी परेशानियाँ खत्म हो जाएंगी और हमेशा आपके अनुकूल ही सबकुछ होगा। गजतनाएँ घटित होती रहती हैं , देखने में वे अनुकूल और प्रतिकूल प्रतीत होती हैं लेकिन हमपर आप पर उनका उतना ही अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है जितना हम उनको अनुमति देते हैं। यदि हम सम भाव में रहने की शिक्षा को अपनाते हैं तो ये घटनाएँ कोई भी प्रभाव छोड़ने में निष्फल रहती हैं। लेकिन यदि यह समभाव नही। है हम में तो फिर हम सदा ही हर्ष विषाद में डूबते उतराते रहते हैं और क्षण में खुश हो जाते हैं , क्षण में दुखी। इस कारण से हम आत्मावलोकन करने से वंचित रह जाते हैं। यदि हम अपने कर्तव्य को समझ भी लें लेकिन हम में समत्व का भाव नही। है तो हम कर्तव्य का पालन कर ही नही। सकते। ऐसी स्थिति में विषाद, दुख और पराजय के डर से कर्तव्य से पलायन कर जाते हैं। कर्तव्य निर्वहन की इस प्रक्रिया में आवश्यक है कि हम आध्यात्मिक, भौतिक, व्यवहारिक, नैतिक स्तर से समग्रता से चीजों का आकलन करें।
अर्जुन युद्धक्षेत्र में खड़ा है , युद्ध की विभीषिका के सम्बंध में सोचकर व्यथित है, युद्ध नहीं करना चाह रहा है सो श्रीकृष्ण उसे युद्ध की पृष्ठभूमि में समझा रहें हैं। द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!
हमारे जीवन में हर घड़ी यही द्वंद्व लगा रहता है। हमेशा एक युद्ध की स्थिति हमारे अंदर बनी हुई रहती है कि ये करें कि वो करें। सो श्रीकृष्ण की ये शिक्षा हर कदम पर हमारा मार्गदर्शन करती है। बिना दर्शनशास्त्र की शब्दावली में उलझे यदि हम श्रीकृष्ण की शिक्षा को सहजता से स्वीकारते हैं तो हम हर कदम पर सारे संशय से मुक्त होकर कर्म करते आगे बढ़ते जाते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 39
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( कर्मयोग का विषय )
एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
हे पार्थ! यह बुद्धि तेरे लिए ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तू इसको कर्मयोग के विषय में सुन- जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा
॥39॥
अगर हमें कुछ प्राप्त करना होता है तो उसके निम्न चार चरण हैं
1.उद्देश्य का निर्धारण और उसकी समझ
2.उद्देश्य प्राप्ति के मार्ग की जानकारी
3.उद्देश्य तक पहुँचने के मार्ग पर चलना
4.मार्ग पर अंत तक चलकर उस उद्देश्य को प्राप्त करना।
ये चारों चरण क्रमिक हैं, किसी को लाँघ कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता है।
अर्जुन युद्धभूमि में युद्ध करने की तैयारी के साथ पहुँच कर दिग्भ्रमित और विषादयुक हो जाता है। उसे उद्देश्य का ज्ञान नहीं रहता है सो भटक जाता है। ऐसे में उसके अनुरोध पर श्रीकृष्ण उसकी रक्षा में आगे आते हैं, उसके भ्रम को समाप्त करने हेतु। अर्जुन की नजर में उसका उद्देश्य युद्ध है सो युद्ध की सम्भावित विभीषिका और परिणाम से वह व्यथित हो जाता है। तब श्रीकृष्ण उसे समझाते हैं , ज्ञान देते हैं। श्रीकृष्ण द्वारा दिया गया ज्ञान उक्त चार चरणों में है। क्रमिक है।
सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को उसके उद्देश्य से परिचित कराते हैं। उद्देश्य वही है जो सबका है, अर्थात आत्मसाक्षात्कार करना यानी अपनी आत्मा का बोध करना यानी सेल्फ को खोजना और उसे प्राप्त कर परमात्मा से मिल जाना। युद्ध तो मात्र इस मार्ग के क्रम में घटित होने वाली घटना है जिसका निर्वहन अनिवार्य है ताकि क्रमिक रूप से आगे बढ़ा जा सके। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में नित्य नए नए अवसर आते रहते हैं जिनका उसे निर्वहन करना होता है, उनको छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता। आपको पढ़ना है, परीक्षा उत्तीर्ण करनी है, कमाना है, आदि आदि। लेकिन ये सब आपके उद्देश्य नहीं हैं। आपका हमारा उद्देश्य है अपने स्व को पाना और उसे पाकर परमात्मा से मिल जाना। सर्वप्रथम इसी उद्देश्य को श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक परिभाषित करते हैं। यही साँख्य योग है। योग यानी खुद से जुड़ना। जब हम जन्म लेते हैं और धीरे धीरे बड़े होते हैं तो उस समय हमें अपने शरीर और बौद्धिकता का तो ज्ञान होता है लेकिन हम अपनी आत्मा से ,अपने स्व/सेल्फ से अनजान बने रहते हैं। जब हमें इसका भान होता है , जब हमें लगता है कि हमें ये पता नहीं कि हम वास्तव में कौन हैं तब हम अपने सेल्फ की खोज का उद्देश्य पाते हैं। आत्मसाक्षात्कार की यह पहली सीढ़ी है जिसपर हमें चढ़ना होता है। जीवन का लक्ष्य बड़ा पद, पैसा आदि ही होते तो हम उन्हें पाकर हमेशा सन्तुष्ट , प्रसन्न और सुखी होते। लेकिन ऐसा नहीं होता है अर्थात ये सब जीवन के लक्ष्य नहीं हैं, बीच की अवस्थाएँ हैं। अंतिम लक्ष्य तो स्व की प्राप्ति और उस प्राप्ति के साथ परमात्मा से मिलन है। अर्थात सत् की प्राप्ति हमारा उद्देश्य है जिसकी प्राप्ति के साथ जीवन के प्रति हमारा भय समाप्त हो जाता है। श्रीकृष्ण की यही शिक्षा सांख्ययोग है।
द्वितीय चरण में श्रीकृष्ण उस मार्ग का ज्ञान देते हैं जिससे इस सत् की प्राप्ति होती है। ये मार्ग योग और कर्म का है। इसे श्रीकृष्ण कर्मयोग कहते है । लेकिन उसके पूर्व द्वितीय अध्याय के श्लोक 31 से 38 तक श्रीकृष्ण इस ज्ञानयोग और कर्मयोग के बीच फँसी हमारी व्यवहारिक/सांसारिक बुद्धि को भी स्पष्ट करते हैं , दुनियादारी भी समझाते हैं। वे यह भी समझाते हैं कि आगे जो मार्ग है वो कर्म का तो है लेकिन वो बुद्धि युक्त है अर्थात उसमें एक दृष्टिकोण भी है। मात्र करने से कुछ नहीं होगा, करने के पीछे एक स्पष्ट बुद्धि भी होनी चाहिए। अर्थात चित्त की समझ और संशय का अभाव होना चाहिए।
तब हम तृतीय चरण में प्रवेश करते हैं यानी अपनी यात्रा प्रारम्भ करते हैं जो कर्मयोग के मार्ग से चलती है।
अंत में हम अपने उद्देश्य को प्राप्त करते हैं । उद्देश्य की प्राप्ति के साथ ही मार्ग से मुक्त हो जाते हैं। कर्म करते हुए लक्ष्य हासिल होने के साथ ही कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। जब लक्ष्य मिल गया तो बन्धन कैसा। इस अवस्था में हमें आनंद की प्राप्ति होती है यानी सभी दुखों से मुक्ति प्राप्त होती है। परमब्रह्म की प्राप्ति होती है। सत् चित और आनंद से युक्त हमें सच्चिदानंद स्वरूप मिलता है जो अंतिम लक्ष्य है!
गीता अध्याय 2 श्लोक 40
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यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥
इस कर्मयोग में आरंभ का अर्थात बीज का नाश नहीं है और उलटा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोड़ा-सा भी साधन जन्म-मृत्यु रूप महान भय से रक्षा कर लेता है
॥40॥
कर्मयोग का प्रारंभिक परिचय देने के पश्चात श्रीकृष्ण कर्मयोग के महत्व और विशेषताओं पर प्रकाश डालते हैं। हम आप देखते हैं कि जब हम सामान्य सांसारिक कार्यों को सामान्य सांसारिक दृष्टिकोण से करते हैं तो दो बातें होती हैं
1.ये कोई भी कार्य स्थाई नही होता है।
2.चूँकि कार्य करने का हमारा दृष्टिकोण भी सामान्य सांसारिक होता है हम कार्य के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं, जो निम्न प्रकार के हो सकते हैं
1. हो सकता है कि हम अपने कार्य में सफल हो तब हमें प्रसन्नता होती है, हम सुख का अनुभव करते हैं।
2.हो सकता है कि हम असफल हो, तब दुखी होते हैं, विरह और विषाद से ग्रस्त हो जाते हैं
3.हो सकता है कि हमें जो परिणाम मिले वो अपेक्षित ही न हो, सोचते कुछ हों और हो कुछ जाए जो हमारे मनोकुल भी हो सकता है या नहीं भी और उसी के अनुसार हम खुशी या दुख का भी अनुभव करते हैं
इस प्रकार हम बराबर अपने कार्यों के परिणाम से प्रभावित होते रहते हैं और उन परिणामों के अनुसार ही दुख सुख पाते रहते हैं। इस प्रकार हममें स्थायित्व नहीं रहता और दिन भर में कई बार हमारे मनोभाव बदलते रहते हैं। इतने अस्थिर चित्त से हम सत्य की खोज नहीं कर सकते और नहीं कर पाते। परिणाम के प्रति हमारा लगाव हमें परिणाम के प्रभाव से हमेशा डरे रहते हैं। सफलता असफलता, लाभ हानि, जय पराजय के डर से हमारा जीवन इतना हलचल भरा होता है कि हमें हमेशा अपने तात्कालिक स्थान से गिरने का भय लगा रहता है। अब आप खुद के जीवन को देखें। हम आप बराबर इसी डर में रहते हैं और नतीजा में एकदम बेचैन हुए रहते हैं।
अब समझने की कोशिश करें कि श्रीकृष्ण इस विषय में क्या कह रहे हैं। जब हम कर्तव्य के परिणाम के प्रति समत्व भाव यानी सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में सम भाव से रहते हैं तो स्वाभाविक रूप से परिणाम के प्रति हम निरपेक्ष होते हैं। इसे दूसरी तरह से देखें तो पाते हैं यदि हम अपने कर्मों के परिणाम से अप्रभावित/निरपेक्ष होते हैं तो फिर हमपर इस बात का कोई असर नही। पड़ता कि हमारे कर्तव्य पालन का क्या परिणाम निकलता है।
यँहा एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। परिणाम के प्रति समत्व का भाव यदि समझ में नहीं आता तो इस शिक्षा से आपको नकरारात्मता भी आ सकती है, हम निश्चिंत हो सकते है कि हमारा काम तो कर देना है बाकी भगवान जाने कि क्या फल देंगे। समत्व भाव का अर्थ ये कदापि नहीं है कि परिणाम के लिए हम ईश्वर पर निर्भर करें। श्रीमद्भागवत गीता में ही श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि भगवान न कुछ करते है न कुछ कराते हैं। बल्कि ये हमारा प्रयास है और प्रयास के पीछे हमारी श्रद्धा है जो निर्धारित करती है कि परिणाम कैसा होगा।
समत्व भाव की शिक्षा का तात्पर्य ये है कि हमें सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय में परिणाम के प्रभाव में बह नही जाना चाहिए । अगर हम इन प्रभावों से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो असफलता की स्थिति में भी हतोत्साहित नहीं होते बल्कि इस बात पर ध्यान देते हैं कि कर्तव्य पालन में हम पूरी सावधानी बरतें र
ताकि कोई चूक न हो जाये। ऐसी स्थिति में हम पूरे सावधानी से कर्तव्य पालन करते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इसमें बीज का नाश नही होता अर्थात एक बार धुनि लग गई तो मन की भावनाएँ, इन्द्रियों के प्रयास संयमित हो जाते हैं , हम अस्थिर होकर भटकते नहीं बल्कि अपने लक्ष्य जो स्व की प्राप्ति है और जो कर्म करने से ही पाप्त होता है उसी में शांत चित्त लगे रहते हैं।
सनद रहे कि श्रीकृष्ण ने कर्म को अभी तक परिभाषित नहीं किया है। कर्म को आगे के अध्याय में स्पष्ट करेंगे। अभी तो मात्र निष्काम कर्म करने में बरतने जाने वाली सावधानियों और कर्म की विशेषता पर ही वे चर्चा कर रहें हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 41
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व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥
हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिका बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं
॥41॥
कर्मयोग की विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे मनुष्य जीवन के लक्ष्य प्राप्ति के सम्बंध में समझाते हैं। हमारे जीवन के लक्ष्य क्या होने चाहिए , इसका निर्णय कैसे होता है। इसका निर्णय मनुष्य की बुद्धि से होता है। किंतु मनुष्य की बुद्धि हो तो कैसी हो जो उसके लक्ष्यों को निर्धारित करें।
बुद्धि दो तरह की हो सकती है
1.एक ऐसी बुद्धि जो एक लक्ष्य को सामने रखे, उसमें कोई विवाद न हो। जिसे साँख्य का ज्ञान है उसका लक्ष्य तो निर्धारित है। उसका लक्ष्य उसकी बुद्धि के अनुसार अपने आत्मबोध का परिचय प्राप्त करना होता है।
2.दूसरी तरफ बुद्धि अस्थिर भी हो सकती है जिसमें लक्ष्यों की भरमार हो लेकिन जो आत्मपरिचय के लक्ष्य से दूर हो। यह बुद्धि उन्ही चीजों को लक्ष्य बनाती है जिसे हमारी इन्द्रियाँ अनुभव कर सकती हैं और चूँकि इन्द्रियों का अनुभव भिन्न भिन्न प्रकार का होता है लक्ष्य भी भिन्न भिन्न तरह के हो जाते हैं । नतीजा ये निकलता है कि इस तरह का मनुष्य बार बार भ्रमित होते रहता है, एक छोर से दूसरे छोर तक जीवन भर भागते रह जाता है।
अगर हमें स्थिर बुद्धि आत्मबोध के लक्ष्य के साथ चाहिए तो दृढ़ता से उस ज्ञान को प्राप्त करना चाहिए। इस तरह के ज्ञान प्राप्ति के लिए निम्न तरीके हैं---
1प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा, जो हमें इन्द्रियों के अनुभव से प्राप्त होते हैं,
2.किसी एक जानकारी से दूसरी जानकारी का निष्कर्ष निकाल कर,
3. अज्ञात की तुलना ज्ञात से कर के,
4. परिणाम और उसके कारक को समझ कर
5. प्रमाणिक पुस्तक/शास्त्र एवम उसके शिक्षक से, तथा
6.किसी की अनुपस्थिति को जानकर।
मनुष्य की बौद्धिकता प्रतिरोधात्मक होती है यानी वह नए ज्ञान को सहजता से नहीं स्वीकारती। इसी कारण जब लक्ष्यों की पोषक बुद्धि को एक निश्चयात्मक होने का निर्देश दिया जाता है तो वह प्रतिरोध के रूप में विवाद करती है, इन्द्रिय जनित सुख देने वाले लक्ष्यों से हटना नहीं चाहती।वह चाहता तो है सुख, शांति, अमरत्व, स्वतंत्रता लेकिन इसके लिए साधनों का उपयोग करना चाहता है उससे उसे ये सब मिल नहीं सकते। इन साध्यों को प्राप्त करने के लिए हमारी बुद्धि का उधेश्य उस ज्ञान की प्राप्ति होनी चाहिए जिसे पाकर हम परम् सत्य यानी आत्मबोध को प्राप्त कर सकें।
गीता अध्याय 2 श्लोक 42, 43 , 44, & 45
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यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥
हे अर्जुन! जो भोगों में तन्मय हो रहे हैं, जो कर्मफल के प्रशंसक वेदवाक्यों में ही प्रीति रखते हैं, जिनकी बुद्धि में स्वर्ग ही परम प्राप्य वस्तु है और जो स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है- ऐसा कहने वाले हैं, वे अविवेकीजन इस प्रकार की जिस पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी को कहा करते हैं, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत-सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है, उस वाणी द्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती
॥42-44॥
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्॥
हे अर्जुन! वेद उपर्युक्त प्रकार से तीनों गुणों के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए तू उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष-शोकादि द्वंद्वों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम 'योग' है।) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम 'क्षेम' है।) को न चाहने वाला और स्वाधीन अन्तःकरण वाला हो
॥45॥
आदमी का क्या लक्ष्य होना चहिये ये समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझते हैं कि जब इंसान के जीवन में परम् लक्ष्य न होकर कई भोग विलास से सम्बंधित लक्ष्यों को पालता है तो उसका क्या व्यवहार होता है। जब हमारी नजर सिर्फ सुख, सुविधा , धन संपत्ति, पर होती है तो फिर ऐसी स्थिति में हम सिर्फ इसी उपाय में लगे रहते हैं कि किस प्रकार हमारे भौतिक सुखों में हमेशा बढ़ोत्तरी होती रहे।
इस प्रकार के लक्ष्यों को रखने वाले लोग भी दो तरह के होते हैं।
एक वैसे लोग होते हैं जो हमेशा हर कीमत पर सिर्फ अपने भौतिक उपलब्धियों को पूरा करने में लगे रहते हैं। इस हेतु यदि उनको लगता है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ गलत भी करना हो तो ये लोग नहीं हिचकते हैं। ऐसे मनुष्य इस बात में यकीन करते हैं कि यदि कोई वस्तु या सामग्री या कोई भी चीज यदि उनके सामर्थ्य में है तो हर हालत में वो उनको मिलनी चाहिए चाहे इसके लिए अनैतिक कार्य करना हो तो वो भी कर लेंगे।
दूसरे उस तरह के लोग होते हैं जो अनैतिक कामों से तो बचना चाहते हैं लेकिन उनकी नजर भी उन्हीं सुख सुविधाओं पर टिकी रहती है और इसके लिए वे शास्त्रों में वर्णित तरह तरह के कर्मकांड में लिप्त रहते हैं। ये लोग स्वर्ग की कल्पना और उसकी इक्षा में लगे रहते हैं। ऐसे लोग जीवन कि सुविधाओं को बढ़ाने में लगे रहते हैं। सुख, सुविधा, भौतिक ऐशो आराम, बाल बच्चों का उज्ज्वल भविष्य बस यही सब उनका लक्ष्य होते हैं। सुविधाओं में बढ़ोत्तरी ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
हब हमारा प्राथमिक उद्देश्य सिर्फ भौतिक सुख सुविधाओं में बढ़ोत्तरी, धन संपत्ति में बढ़ोत्तरी, बच्चों के भविष्य, उच्च पद प्रतिष्ठा जैसी चीजें ही होती हैं तो फिर इनको सही ठहराने के लिए आलंकारिक भाषा में कई तर्क भी देते रहते हैं जिनमें वे आध्यात्मिकता का पुट भी डालते रहते हैं ताकि उनके तर्क आकर्षक बन सके।
जब हमारे पास इतने काम हों, जब हमारे पास इतने लक्ष्य हों तो फिर स्थिर मन से भला कब हम आत्मसाक्षात्कार का प्रयास कर पाएंगे। सुख सुविधा को पूरा करने के चक्कर में चंचल मन भला कब समय निकाल पाए कि उसे आत्मशोध करने का समय मिले।
जब हम सिर्फ भौतिक सुख सुविधा के भँवर में फँसे होते है तब हम क्या करते हैं जरा इसका अवलोकन करें। सुबह से शाम तक हम इसी प्रयास में लगे होते हैं कि हम कौन उपाय करें कि हमारी संपत्ति बढ़ जाये, कैसे हमारा ऐश्वर्य और सुख सुविधा बढ़ जाये , कैसे हमारा पद बढ़ जाये, आदि। इस स्थिति में हम अनैतिक साधन अपनाने से भी परहेज नहीं करते। या फिर कुछ लोग परलोक की चिंता में पूण्य बटोरने के चक्कर में , अपने जीवन में सुख सुविधा बढाने के लिए तरह तरह के कर्म कांड भी करते हैं।
अंतिम लक्ष्य तो सुख की प्राप्ति ही होता है लेकिन ये सुख भौतिक और शारीरिक होता है और इसको पूरा करने का मार्ग ऐसा होता है जिसमें हमें फुर्सत ही नहीं मिलता। एक सुख मिला नहीं कि दूसरे के फेरा में पर गए! पूरा जीवन इसी में बीत गया। ऐसे इंसान के जीवन में सुख मृगमरीचिका है।
इसी प्रकार सुख की इक्षा पूर्ति के लिए तरह तरह के कर्मकांडी भी सुख तो कभी नहीं पाते लेकिन सुख की चाह में हमेशा दर दर भटकते दुखी ही रह जाते हैं। कभी अपने लिए, कभी पत्नी के लिए , कभी सन्तान के लिए, कभी पूण्य बटोरने के लिए, कभी पापकर्म के प्रभाव को काटने के लिए। अंतहीन सिलसिला है। तब सुख कँहा है?
सुख तो उसी दृढ़ बुद्धि में है जो ये सिखाती है कि हम अपने अंदर सुख खोजे, इस हेतु निर्धारित तरीके से जिये यानी निष्काम भाव से।
एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या जीवन को बेहतर बनाने के जो भौतिक प्रयास किये जाते हैं वे अर्थहीन हैं? कदापि नहीं। निष्काम कर्मयोग की शिक्षा कदापि कर्महीनता नहीं है। कर्म तो करना ही है। कर्म कर के ही हम उस सुखद स्थिति को पाते हैं जिसमें सुख के उपरांत दुख नहीं है। लेकिन कार्योग कर्म करने की विधि को बताता है जिसे अभी श्लोक 39-40 में हम देखे हैं और जिसके बारे में आगे विस्तार से श्रीकृष्ण व्यक्त भी करेंगे। अभी के लिए इतना ही कि निष्काम कर्मयोग का तातपर्य कर्महीनता नहीं है बल्कि कर्म करने की वो विधि है जिसमें कर्म के परिणाम के प्रति आसक्ति और मोह नहीं होता है। ये कैसे सम्भब है आगे देखेंगे।
श्रीकृष्ण ऊपर समझायें हैं कि भौतिक भोगो की अभिलाषा में रत मनुष्य भौतिक सुख सविधाओं की प्राप्ति का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए शास्त्रों (वेद) का तर्क देते हैं। सभी व्यक्ति जो ये प्रयास करते हैं कि भौतिकता में उनकी अनुरक्तता को आध्यात्मिक मान्यता मिल जाये वे यह दिखाने की कोशिश करते रहते हैं कि उनके आचरण को अध्यात्म अथवा धर्म का समर्थन हासिल है , सो वे अपने पक्ष में वेदों यानी धर्म शास्त्रों का उदाहरण देते हैं। हम देखते हैं कि समाज की हर रीति कुरीति को सही ठहराने के लिए उसके समर्थक धार्मिकता का आवरण चढ़ाने से बाज नहीं आते और तरह तरह की क्रियाओं से अपने आचरण को आडम्बरयुक्त कर उसे महिमामंडित करने की कोशिश करते रहते हैं। प्रतिदिन हमारे समक्ष ऐसे अगिनत उदाहरण आते रहते हैं। तकनीक के इस युग में संचार के अतिसुलभ साधन उपलब्ध हैं,यथा टेलीविजन और इंटरनेट आधारित उपकरण। सोशल मीडिया के माध्यम से एक जगह बैठा एक व्यक्ति एक ही समय में अत्यंत तीव्र गति से असंख्य लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकता है। इसका परिणाम होता है कि हर भौतिक भोग विलास के पक्ष में एक धार्मिक उद्धरण सहजता से प्रचलित कर देते हैं जबकि उनका वास्तविक प्रसंग कुछ अन्य ही होता है।
श्रीकृष्ण बताते हैं कि शास्त्र के वे पक्ष जो भौतिक भोगों की पूर्ति से जुड़े हैं वे मनुष्य के तीनों गुणों यथा सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से उत्पन्न आवश्यकताओं की ही पूर्ति करते हैं। ये जरूरी भले सकते हों अनिवार्य और अंतिम सत्य तो नहीं हैं क्योंकि जब तक हम इन गुणों में उलझे रहते हैं हमारे सामने नित्य नई नई आवश्यकताएँ और क्रियाएँ औए भावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं जिनकी पूर्ति में लगा मनुष्य सारा समय उसी पूर्ति के प्रयास में गँवा देता है। इस स्थिति में आपको फुर्सत कँहा कि हम आप आत्मसाक्षात्कार का प्रयास भी कर पाएं। सो हम अपने सेल्फ से, अपनी आत्मा से दूर चले जाते हैं। हमारा सारा समय जो हमारे पास नहीं है उसको पाने की कोशिश यानी योग और जो है उसको बचाने में यानी क्षेम में निकल जाता है।
इसी स्थिति को ध्यान में रखकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से सभी मनुष्यों को ये संदेश दिया है कि हम इंसान अपने गुणों के प्रभाव से बाहर निकलें, गुणों से परे हों। अगर हम थोड़ा सा ध्यान दें तो तो पाते हैं कि पशु पक्षी आदि जो भी करते हैं वे सभी उनके गुणों के अनुसार ही होते हैं। प्रशिक्षण देने पर कुछेक पशुओं के व्यवहार में थोड़ा परिवर्तन तो होता है लेकिन वो भी स्थाई नहीं है। मनुष्य ही एकमात्र जीव है जिसमें अपने गुणों को काटने की क्षमता होती है। जो जितना त्रिगुणों से परे होता है वो उतना ही निश्चिंत और शांत होता है। तब वह व्यक्ति सारी आवश्यकताओं के रहते और उनकी पूर्ति करते भी उन आवश्यकताओं से बंधता नही है।
वे आवश्यकताएँ उसके लिए मोह का कारण नहीं बंध पाते। सो इस तरह का मनुष्य सत्य के प्रति विशेष आग्रह रखता है, उसका सत्य होता है उसका अपना सेल्फ/अपनी आत्मा। इन्द्रियों और इन्द्रीयजनित बुद्धि से आगे जाकर वह व्यक्ति सत को खोजता है। उसे न तो किसी वस्तु विशेष को पाने की बेचैनी होती है , न ही जो सुख सुविधा है खोने का डर होता है। वह इन बेचैनियों से मुक्त आत्म में निष्ठ होता है।
इस प्रकार श्रीकृष्ण मनुष्य को जब तीनों गुणों से बाहर निकलने की बात कहते हैं तो उसके लिए चार तरीकों को बताया भी है
1.न तो किसी वस्तु को जो उसके पास नहीं है को पाने का प्रयास, न ही जो है उसे सुरक्षित रखने का प्रयास।
2.इस प्रकार का निर्विकार मनुष्य लाभ- हानि, जय-पराजय, हर्ष-विषाद के विरोधाभासी द्वंद्व से मुक्ति।
3.उक्त विशेषता से युक्त मनुष्य के अंदर के तमोंगुण ,रजोगुण और सत्वगुण नष्ट हो जाते हैं और मात्र सत्य का आग्रह होता है। मन और बुद्धि से परे व्यक्ति अहंकार, मोह आदि से अलग हो चुका होता है,शुद्ध रूप में आतंदर्शन की तरफ अग्रसर होता है।
4.इस स्थिति में व्यक्ति आत्मावान यानी आत्मिक अवस्था में ही होता है।
इस तरह हम देखते हैं कि कर्मयोग के रास्ते चलता व्यक्ति किस तरह से कर्म करते आत्मसाक्षात्कार के तरफ अग्रसर होता है। उपरोक्त चारों को यदि हम उल्टे क्रम से देखेंगे तो पाएंगे कि आत्मनिष्ठ व्यक्ति की प्रकृति किस तरह की होती है जिसे श्रीकृष्ण आगे इस अध्याय के अंत में थोड़ा विस्तार से बताएंगे। उपरोक्त क्रमों के अभ्यास से हम भी, आप भी, सभी भ्रम और मोह और उनसे जनित व्याधियों से मुक्त हो सकते हैं। ये अवस्था अभ्यास से मिलती है। यदि दैनिक जीवन के प्रत्येक प्रसंग में हम इनका अभ्यास करें तो स्वाभाविक रुप से हम भी वही पहुँचते हैं जँहा श्रीकृष्ण जाने के लिए कहते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 46
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यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥
सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे जलाशय में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है, ब्रह्म को तत्व से जानने वाले ब्राह्मण का समस्त वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है
॥46॥
निष्काम भाव से कर्म करते करते आत्मवान बनने की शिक्षा देने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन और अर्जुन के माध्यम से हम सबको समझाते हैं कि जब हम आत्मवान होते हैं अर्थात जब जम नियत तरीके से जीवन को जीते हैं , जैसा कि ऊपर बतलाया गया है तब हम मन बुद्धि और कर्म यानी तीनों गुणों से मुक्त होकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जैसा कि पूर्व में श्रीकृष्ण बता आये हैं कि आत्मशोधन की इस यात्रा में हम अपनी इन्द्रियों और उनसे जनित सुखों से अलग होते जाते हैं, समत्व के भाव में आते जाते हैं, ऐसी स्थिति में वो धार्मिक विधि विशेष भी बहुत महत्व नहीं रखती जिससे हम इस लोक या परलोक में सुख की अपेक्षा करते हैं। ऐसी स्थिति में सांसारिक सुखों की कामनाओं से युक्त वेदों का भी उस व्यक्ति के लिए विशेष महत्व नहीं होता। परम् सुख की अवस्था में ये सब अब निष्प्रभावी लगने लगते हैं।
जब मनुष्य इस परम् लक्ष्य के मार्ग पर चलता है तो मार्ग के छोटे छोटे लक्ष्यों की प्राप्ति से उसे कोई बहुत मतलब नहीं होता है। इस प्रकार से जब हम कार्य करने हेतु प्रवृत्त होते हैं तो चूंकि इस अवस्था में रजोगुण और तमोगुण और उनसे उत्पन्न प्रभाव भी अत्यल्प से अत्यल्प होते जाते हैं हमारे अंदर सत्वगुण की मात्रा बढ़ती जाती है जिसके कारण हम परम् की यात्रा के दौरान जो कुछ अन्य कार्य भी करते हैं उनका सकारात्मक प्रभाव ही पड़ता है भले इनसे हमें कोई विशेष मतलब हो नहीं हो।
इसीप्रकार चूँकि आतंबोध की यात्रा में द्वंद्व को छोड़ते जाते हैं हमारी बुद्धि भी साथ साथ अपनी बेचैनी को भी छोड़ते जाते हैं। इस तरह से हमें जीवन की विषमता प्रभावित नहीं कर पाते।
इस अवस्था में जब व्यक्ति अपनी यात्रा को पूरी करता है उसे परम् सुख और शांति प्राप्त होती है। ध्यान रहे जब तक व्यक्ति इस अवस्था को नहीं पाता तब तक वह उन चीजों में सुख खोजता है जो उसके बाहर इस संसार में है। एक ही वस्तु कभी उसे अच्छी लगती है तो कभी किसी अन्य अवस्था में वही चीज उसके लिए सूखकर नही रह जाता। जो आज प्रिय है कल अप्रिय। इस प्रकार वस्तु तो वही रहता है परंतु व्यक्ति अपनी मानसिक अवस्था में परिवर्तन के कारण उसे कभी पसन्द कर सुख प्राप्त करता है तो कभी नापसन्द कर दुखी भी होता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सुख हमारे बाहर नहीं होता है। मन की शांत अवस्था में जब हम द्वंद्व से मुक्त होते हैं हमें उस सुख-शांति की प्राप्ति होती है जो किसी वस्तु या मानसिक अवस्था में परिवर्तन पर नहीं निर्भर करते हैं। ये अवस्था आत्मसाक्षात्कार की अवस्था में मिलती है। इस कारण से इस प्रकार के व्यक्ति के जीवन में भौतिक सुख देने वाले भोग विलास सुख सुविधा का कोई महत्व नहीं होता है। जिसे अपनी परम् अवस्था प्राप्त हो जाती है उसे तो सुख ही सुख है तो जो भी सुख उसे अन्यत्र भौतिक रूप से मिल सकता था वो भो उसके परम् अवस्था में स्वतः सम्मिलित होते हैं।
ध्यान रहे गुणातीत यानी गुणों से मुक्त होने की ये अवस्था अचानक ही नहीं प्राप्त होती है, बल्कि ये अवस्था क्रमिक रूप से ही मिल सकती है, क्रम क्रम से ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होता है, समत्व में आता है, विपरीत प्रभावों के द्वंद्वात्मक जोड़े के प्रभाव को खत्म करता है। सो उस अवस्था में पहुँच जाने के बाद भी इस क्रम का महत्व बना रहता है। दूसरे व्यक्तियों को भी अगर उस अवस्था में पहुंचना है तो इसी क्रम को अपनाना है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 47
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कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल हेतु मत हो तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो
॥47॥
कर्मपथ की सावधानियों और विशेषताओं को बताते हुए श्रीकृष्ण इस पथ के सम्बंध में समझाये हैं कि अन्तिम लक्ष्य तो साँख्य बुद्धि को प्राप्त करना है लेकिन उस तक पहुंचने का मार्ग योग है, कर्मपथ है। इस पथ को ध्यान पूर्वक समझना और उसका अभ्यास करना बहुत जरूरी है तभी हम साँख्य और उसके पश्चात परमब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त कोई और रास्ता नहीं है जो हमारेके कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सके।
श्रीकृष्ण समझते हुए कहते हैं कि कर्म ही वो मार्ग है जिसपर हम चलकर के परम नैष्कर्म्य की स्थिति तक पहुँच सकते हैं लेकिन जब हम कर्म करते हैं तो उस कर्म की विशेषता और सावधानियों को समझना अनिवार्य है अन्यथा हम कर्मपथ से भटक जाते हैं।
ये विशेषताएँ और सावधानियाँ निम्नवत हैं-----
1.जब हम कर्म करते हैं तो हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में होता है उसके परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता है। श्रीकृष्ण पहले समझा आये हैं कि जब हम कर्म करें तो हमारी बुद्धि एकनिष्ठ होनी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हम तरह तरह की उम्मीद पल बैठते हैं, तरह तरह के लक्ष्य बना लेते हैं जिसका नतीजा होता है कि हम सदा उनको पूरा करने की दौड़ धूप में लगे रहते हैं, हमारा मन हमारी इन्द्रियों यानी सेनेज से मिलने वाले तरह तरह के अनुभवों से बेचैन हुआ रहता है। जब मन विभिन्न लक्ष्य की पूर्ति हेतु भटकता रहता है तो फिर मन में शांति नहीं होती और बिना शांति के हम परम् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु वस्तुनिष्ठ ढंग से ध्यानमग्न नहीं हो पाते। थोड़ा ये भी मिल जाये, थोड़ा वो भी मिल जाये, थोड़ा उसे भी प्राप्त कर लिया जाए, अच्छा जब ये पूरा कर लेते हैं तब उस परम लक्ष्य के बारे में सोचेंगे, फिर वह मिला नहीं कि दूसरा काम आ गया है पहले उसे कर लें, थोड़ा और भोग की वस्तु को इकठ्ठा कर लें तो थोड़ा वो भी कर लें। ऐसी स्थिति में शांति कँहा!
इस स्थिति में हम अपने गुणों-तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुण की अवस्था के अधीन होकर उनके अनुसार अपनी क्रियाएँ करते रहते हैं और मानसिक रूप से उद्वेलित हुए रहते हैं। यदि परम् लक्ष्य की चाह है तो इस गुणों से मुक्त होना ही होगा और तभी साँख्य की प्राप्ति होगी। इस हेतु जरूरी है कि हम ध्यान करें ।लेकिन क्या जबरन ध्यान सम्भव है? कदापि नहीं। होता ये है कि हम अपने स्व की तलाश में सुख चाहते हैं। लेकिन जब तक अपने तीनों गुणों के प्रभाव में होते हैं हम अपने वास्तविक सेल्फ यानी आतंबोध को नहीं पहचान पाते। तब हम सुख की चाहत में अपने बाहर देखते हैं, अपने बाहर भटकते हैं, जो हमारे बाहर है उसमें हम सुख खोजते हैं जँहा हमारी खुशी , हमारा सुख होता ही नहीं। वो तो हमारे अंदर है जिसे हम उपासना और ध्यान कर ही प्राप्त कर सकते हैं। और ये अवस्था जबरन नहीं हासिल होती है। ये अवस्था सही कर्म कर के ही मिलती है, सही ढंग से कर्मपथ पर चलकर ही हम सब उस अवस्था में पहुंचते हैं जँहा ध्यान करने के अधिकारी बन पाते हैं। बिना गुणों से पार पाए ध्यान सम्भव नहीं । यदि हम करते हैं तो जितनी देर ध्यान करते हैं हमारे मन में कुछ न कुछ चलते रहता है, हमारे अंदर की इक्षाएँ जोर मरती रहती हैं। जिनसे निकलने का एक मात्र तरीका गुणों के प्रभाव से मुक्त होना ही है। लेकिन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो तो कैसे हों? ये प्रश्न तो है। इसका इकलौता तरीका है कि हम सही तरह से कर्म करें , निर्धारित तरीके से कर्म करें। तब जाकर हमको वह अवस्था मिलती है जब हम कर्मों से मुक्त हो पाते हैं। तभी हमें आत्मसाक्षात्कार हो पाता है। यदि हम बीच में चाहें कि आत्मसाक्षात्कार हो जाये और इसके लिए हम कर्म का मार्ग छोड़ दें तो मुँह के बल गिर जाएंगे अर्थात हमारा पतन हो जाएगा, हम पथभ्रष्ट हो जाएंगे। अतएव कर्म कर के ही हम उस ऊंचाई को प्राप्त कर सकते हैं जँहा पहुँच कर हम कर्म को छोड़ भी देते हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि तब हम आत्मसाक्षात्केकार की स्थिति में होते हैं।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि यदि हम अपना वास्तविक स्वरूप जानना चाहते हैं , आत्मबोध करना चाहते हैं , ब्रह्म को पाना चाहते हैं, वो सुख चाहते हैं जिसे प्राप्त कर कभी दुखी न हों , ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं, मोक्ष चाहते हैं तो हमको सबसे पहले कर्म ही करना होगा क्योंकि कर्म करके ही हम अपने अंदर के तीनों गुणों को समाप्त कर सकते है और जब ये गुण खत्म हो जाते हैं तब हम साफ नजर से अपनी आत्मा यानी अपने स्व को देख समझ पाते है और तभी हम आतंबोध भी कर पाते हैं।
सो आतंबोध की यात्रा में पहली अनिवार्य शर्त है कर्म करना।
2. ये स्पष्ट है कि हमारा अधिकार कर्म करने पर है, परिणाम क्या होगा ये हमारे अधिकार से बाहर है। हम मात्र कर्म कर भर सकते हैं परिणाम तो प्रकृति देती है।
जब हमारा अधिकार कर्म करने भर पर है तो फिर तीन परिस्थिति में से कोई एक हो सकती है
(क) हम कर्म कर सकते हैं,
(ख) हम कर्म नहीं कर सकते हैं
(ग) हम कर्म किसी अन्य तरीके से भी कर सकते हैं।
हमारे मन में तरह तरह के विचार आते रहते हैं। ये विचार हमारे समय , काल और परिस्थिति के अनुसार तो होते हैं और बराबर बदलते भी रहते हैं। इन विचारों की गुणवत्ता हमारे अपने गुणों की अवस्था पर भी निर्भर करती है और प्रतिक्रिया स्वरूप हम क्या करते हैं उन विचारों के साथ ये भी हमारे समय, काल, परिस्थिति और हमारे गुणों की अवस्था पर निर्भर करता है। एक ही विचार के प्रति एक ही व्यक्ति की अलग अलग परिस्थिति में अलग अलग प्रतिक्रिया हो सकती है और अलग अलग व्यक्तियों की भी प्रतिक्रिया अलग अलग हो सकती है। ये व्यक्ति के अपने समय, काल और परिस्थिति और उसके तीनों गुणों के अनुपातिक प्रभाव के अनुसार ही होती है। इस प्रकार अपनी इक्षाओं के प्रति हमारी क्या प्रतिक्रिया है ये इन्हीं चार चीजो से तय होती है , हम इक्षा के प्रति समर्पित हो सकते हैं, उसे अस्वीकार भी कर सकते हैं और खुद को किसी अन्य चीज में भी व्यस्त कर सकते हैं।इस प्रकार कर्म पर हमारा अधिकार होता है जो हम अपने समय , काल, परिस्थिति और गुणों की परिस्थिति पर निर्भर करता है। इससे स्पष्ट होता है कि कर्मों को करने पर हमारा अधिकार है और जो हम करते हैं उसके लिए हम ही उत्तरदायी भी हैं। यदि हम अपने गुणों। के सम्बंध में सचेत रहते हैं, तमोगुण और रजोगुण को नियंत्रित कर सत्वगुण की मात्रा को बढ़ाते है तो फिर हमारे कर्मों की कोटि भी उत्तम होगी।
3.परिणाम पर हमारा कोई अधिकार नहीं होता। हम जो करते हैं उसपर तो हमारा नियंत्रण है लेकिन परिणाम कई ऐसी चीजों पर निर्भर करता है जिसके बारे में हमें कुछ भी जानकारी नहीं होती। ध्यान रहे we perform action, we don't perform results; rather comes. जब परिणाम पर हमारा अपना कोई अधिकार ही नहीं तो फिर परिणाम पर क्यों माथापच्ची करना। हमारा अधिकार कर्म पर है तो हमारी सारी सावधानी कर्म करने में ही होनी चाहिए।
4. इसके आलोक में परिणाम , जिसपर हमारा वश नहीं उसके प्रति कोई मोह रखना भी तो गलत ही है। सो हमें चाहिए कि हम अपने कर्मों को कर उनसे सुख को प्राप्त करें क्योंकि ये कर्म ही हैं जिनको हम अपने अनुसार कर सकते हैं, परिणाम के सम्बंध में तो कोई निश्चितता नहीं है, सिर्फ अनुमान भर ही लगा सकते हैं। सो हमें चाहिए कि हम आने कर्मों को कर उनसे सुख प्राप्त करें। यदि हमारी स्पृहा परिणाम में लगी रहेगी तो देखिए कितनी बड़ी मूर्खता हम करते हैं। जिस चीज पर हमारा वश है उसको तो कर हम सुख नहीं प्राप्त कर रहें और जिस परिणाम पर हमारा कोई वश नहीं उसकी चिंता में हम गले जा रहें हैं , उससे भी सुख नहीं मिल रहा है।
5.इसे अन्य प्रकार से भी देखें। कर्म हम वर्तमान में करते हैं और परिणाम भविष्य में आता है। अब देखिए, वर्तमान में किये जा रहे कर्म से हमें सुख नहीं मिल रहा है और हम सुख के लिए परिणाम पर निर्भर हो कर अपने ही कर्मों से मिल सकने वाले सुख को भविष्य में मिलने वाले अनिश्चित परिणाम पर टाल रहें हैं। इस प्रकार हम खुद ही अपने से अपने सुख को विलग कर रहें हैं। भला ये कौन सी समझदारी है!! अब सोचिए कोई एक काम करता है और सोचता है कि इस काम का जब उसके मनोकुल परिणाम आएगा तब वो खुशी मनाएगा। इस प्रकार उस काम को करने से मिल सकने वाली खुशी को वो खुद ही बर्बाद कर देता है इस उम्मीद में कि जब उसे भविष्य में मनोकुल परिणाम मिलेगा तो वो खुश होगा। अब सोचिए यदि उसे मनोकुल परिणाम मिल जाये तो क्या हो सकता है। सुख के एक निष्चित अवसर को उसने गँवा कर इसे वो प्राप्त करता है। ये भी सम्भव है कि जब उसे वो इक्षित परिणाम मिले तब तक उसकी परिस्थिति, उसकी आवश्यकता, उसके मनोभाव ही बदल चुके हों और इक्षित परिणाम मिलने पर भी वो सुख न प्राप्त कर सके। ये भी सम्भव है कि उसे मनवांछित परिणाम मील ही न पाए। तब तो वो व्यक्ति दोगुने दुख को ही न अनुभव करेगा! अगर हमारा सुख हमारे कर्म में नहीं अनिश्चित परिणाम में है तब तो हम जीवन भर निश्चित कर्म वाले सुख को छोड़कर उसी अनिश्चित परिणाम वाली अनिश्चित खुशी के लिए इधर से उधर भागते रह जाएंगे।
6.एक और बात अति महत्वपूर्ण है। यदि हम कर्म को छोड़कर उसके परिणाम पर ही केंद्रित रहते हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि हम वर्तमान से अधिक भविष्य की चिंता में जी रहें हैं । कर्म तो हम आज करते हैं , लेकिन भविष्य में मिलने वाले परिणाम से लगाव के कारण हम चाहते हैं कि हम भविष्य में भी रहे और भविष्य में भी कर्म करते रहे और इस प्रकार हम खुद को कर्मों के बंधन में बाँध लेते हैं, उनसे मुक्त नही हो पाते। कर्मों के इसी बन्धन से तो पुनर्जन्म का सिद्धांत निकल कर आता है । तब भला आत्मसाक्षात्कार का कँहा अवसर मिलता है। तब तो हम कर्मों से मिलने वाली शांति भी गँवा देते है। और हमेशा एक उत्तेजित मानसिक अवस्था में रहते हैं। इस प्रकार हम खुद को गुणों में बाँध कर रखते हैं। इस बन्धन के कारण हम आत्मसाक्षात्कार से वंचित हुए रहते हैं।
7. तो क्या कर्मों को त्यागने से परिणाम की चिंता खत्म हो जाएगी? चूँकि लगाव परिणाम से है सो उस मोह के कारण चिंता तो खत्म नहीं होगी, उल्टे कर्मों को नहीं करने से कर्म कर अपने गुणों से मुक्त होने, सुख को प्राप्त करने और अंततः आत्मसाक्षात्कार करने के अवसर को भी हम गँवा देते हैं।
कर्मयोग को समझने के लिए ये एक अतिमहत्वपूर्ण पड़ाव है जँहा यदि हम इसे नही समझ सके तो फिर कभी नहीं समझ पाएंगे, सो जरूरी है कि इसे आत्मसात करने के लिए इस श्लोक में श्रीकृष्ण की शिक्षा को बारंबार पढ़ें, अपने जीवन चरित्र में अभ्यास में लाये।
गीता अध्याय 2 श्लोक 48
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योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित हुआ कर्तव्य कर्मों को कर, समत्व (जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में समभाव रहने का नाम 'समत्व' है।) ही योग कहलाता है
॥48॥
पिछले श्लोक में श्रीकृष्ण ने कर्म करने के सम्बंध में चार बाते समझाई हैं
1.आपका अधिकार मात्र कर्म करने में है।
2.फल पर आपका कोई अधिकार नहीं है।
3.फल से लगाव मत रखें। फल भविष्य में मिलता है, सो फल के लगाव से मुक्त होकर आप भविष्य के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।
4.कर्म नहीं करने में आपकी कोई श्रद्धा नहीं हो।
ये चारों बातें जिस चीज को समझाती हैं उनको श्रीकृष्ण एक बार फिर से कहते हैं कि आपको कर्म तो करना लेकिन उसे योग भाव से करना है। इसका अर्थ बताते हुए कहते हैं कि ये योग है द्वंद्वात्मक विलोम के युग्मों से मुक्त होकर कर्म करना अर्थात जय-पराजय, लाभ-हानि, हर्ष-विषाद, सफलता-असफलता, रिद्धियों-सिद्धियों से मुक्त होकर कर्म करना,। यानी परिणाम जो हो सभी में समान भाव रखकर कर्म करना। हमारा अधिकार सिर्फ कर्म करने में है, फल के निर्धारण में नहीं। सो फल के चरित्र से मुक्त होना चाहिए कर्म करते वक्त। मतलब समान भाव अर्थात समत्व योग! हमारा कर्तव्य है अपने कर्मों को सही ढंग से करना न कि किये गए या किये जा रहे या किये जाने वाले कर्मों का परिणाम सोचकर करना। जो उचित है, सत्य है, अर्थात जो rigjteous है उसे करना, भले परिणाम जो हो।
ध्यान रहे WE SHOULD DO WHAT IS RIGHT AND NOT WHAT IS OUR LIKE. जरूरी नहीं कि हम जो पसन्द करते हों वो सही भी हो। जो सही नहीं नहीं है , जो धर्मानुकूल नहीं है वो भले हमें प्रिये हो हमें नही। करना चाहिए। सनद रहे कि हमें अपने कर्मों पर ही अधिकार है, परिणाम पर नहीं। चूँकि हमें ये अधिकार है कि हम सही या गलत जो कर्म चाहें कर सकते हैं तो फिर हमें फिर सही , (righeous) कर्म ही करना चाहिए भले ही हो सकता है कि उस कर्म का वो परिणाम हमें नहीं मिल पाए जिसकी हम उम्मीद कर रहे थे। वस्तुतः हमको तो इसी उम्मीद को त्यागने की शिक्षा श्रीकृष्ण दे रहें हैं क्योंकि उम्मीद तो एक अनुमान भर है जो हमारे अधिकार से बाहर है, जिसके पूरा होने या न होने पर हमारा कोई वश नहीं है।
इस प्रकार कर्म करने में कर्मयोग की शिक्षा के अनुसार निम्न पाँच तरह की सावधानियों को बरतने की जरूरत होती है:-
1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
इन सभी के संयोग से किया गया कर्म ही कर्मयोग है जिसे कर के साँख्य यानी परम् ज्ञान की प्राप्ति होती है जो अपनी आत्मा का साक्षात्कार कराता है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 49
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दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
इस समत्वरूप बुद्धियोग से सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात् बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर क्योंकि फल के हेतु बनने वाले अत्यन्त दीन हैं
॥49॥
श्रीकृष्ण ने गत समझाया कि किस तरह कर्मयोग की बुद्धि में परिणाम के मोह से मुक्त रहकर कर्म करना होता है और किस तरह इस तरह कर्म करते करते हम कर्मबन्धन से मुक्त होकर अपने सत्य यानी अपनी आत्मा को समझ पाते हैं , अपने ईगो से आगे बढ़कर अपने सेल्फ को पाते हैं। इस हेतु कर्मयोग की बुद्धि में समत्व का विशेष महत्व होता है अर्थात परिणाम से लगाव का अभाव। हम अच्छे से अच्छे परिणाम का प्रयास करें, निशित करे। करें यानी कर्म करे, करने के पूर्व अपने स्वधर्म के अनुसार सर्वश्रेष्ठ परिणाम को प्राप्त करने की योजना भी बनाये लेकिन कर्म करते वक़्त समत्व की बुद्धि से कर्म करें, यानी उसी परिणाम से लगाव को त्याग दें। तभी हम कर्मयोग की बुद्धि से कर्म कर पाएंगे। इसी स्थिति में हम अपने अंदर से प्रसन्नता को प्राप्त करते हैं। ये प्रसन्नता हमारे अंदर से निकलती है जो चिरस्थाई होती है क्योंकि उस समय हम अपनी आत्मा में ही अवस्थित होते हैं जो हमारा परम् लक्ष्य रहा है। लेकिन जो व्यक्ति इस बुद्धि से कर्म नहीं करते वे तो परिणाम से ही सुखी और दुखी होते रहते हैं, कर्म की गुणवत्ता से उनको प्रसन्नता नहीं मिलती। वे तो भविष्य में मिलने वाले परिणाम से सूखी या दुखी होते रहते हैं। ऐसे लोग परिणाम से बंधे होते हैं। वे अपने कर्म से नही। आनंदित होते हैं। वे इंतजार करते हैं अच्छे परिणामों की ताकि वे प्रसन्नता को पा सकें। उनके लिए अनेक लक्ष्य होते हैं और हर लक्ष्य के परिणाम से सुखी दुखी होने के कारण उनकी मानसिक अवस्था भी विचलित होते रहती है। ध्यान रहे , परिणाम तो भविष्य में मिलता है। हम जो कर्म पहले किये थे उसका परिणाम आज मिलता है। अब यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिला तो आज का भी कर्म हम अच्छे से नही कर पाते सो आज के कर्म का भी परिणाम हमारे मनोकुल नहीं आने वाला। इस प्रकार भविष्य में प्राप्त होने वाले परिणाम से बंधकर हम खुद को भविष्य से बाँध लेते हैं। चूँकि ऐसे लोग प्रसन्नता और स्थायित्व अपने बाहर खोजते हैं तो नित परिवर्तनशील संसार के परिवर्तनों से हम सुखी दुखी होकर अस्थिर होते रहते हैं। ऐसे में सत्य यानी आत्मा यानी सेल्फ यानी चिरस्थाई प्रसन्नता कँहा मिलने वाली।
इस प्रकार कर्मयोग से युक्त कर्म और सामान्य कर्म में कर्म में प्रयुक्त बुद्धि या दृष्टिकोण का महत्व होता है। मनुष्य हमेशा कुछ न कुछ करता ही रहता है। लेकिन जिस कर्म में कर्मयोग की बुद्धि सन्निहित होती है अर्थात जो कर्म कर्मयोग की उपरोक्त बुद्धि से युक्त होकर किया जाता है अर्थात जिसे करने में स्वधर्म, समत्व, असंगत, समर्पण और प्रसाद बुद्धि होती है वो कर्म तो कर्मयोग का कर्म है जो अंतिम सत्य तक पहुँचाता है, शेष जो इन बुद्धियों या दृष्टिकोण से युक्त नही होते वे सामान्य कर्म हैं जो पीड़ादायक होते हैं। इसलिए ये सामान्य कर्म निम्नकोटि के होते हैं।
जब भी हम कोई कर्म करते हैं दो तरह के परिणाम मिलते हैं, एक हमारे बाहर और दूसरा हमारे अपने अंदर। यदि हम बाहरी परिणाम से प्रभावित होते हैं तो परिणाम के स्वरूप के अनुसार कभी सुखी होते हैं तो कभी दुखी क्योंकि दोनों तरह के परिणाम मिलते रहते हैं। बाहरी संसार तो हमेशा परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन के कारण हम भी परिवर्तित होते रहते हैं क्योंकि हम इनके प्रभाव में होते हैं। लेकिन यदि हम आंतरिक परिणाम के वश में हों, बाहरी परिणाम में समत्व हो, उनसे असंगत हों तो फिर हम अपने कर्म से ही आनंदित होते रहते हैं, स्थायित्व रहता है हममे जो हमें चिर आनंद की तरफ ले जाता है।
यदि बाहरी परिणाम हमपर हावी हैं और परिणाम बुरा आ गया तो हममे अपने कर्म के प्रति , अपने मानसिक अवस्था के प्रति नकरात्मकता आ जाती है। ये नकस्रात्मकता आगे के कर्मों को भी दूषित कर देती है। नतीजा होता है कि इस नकस्रात्मकता से बाहर आना सहज नहीं रह जाता। ये तभी सम्भव हो पाता है जब हम कर्मयोग की बुद्धि का अभ्यास शुरू करते हैं। आइये देखते हैं कि कर्मयोग से हीन बुद्धि के अनुसार कर्म करने से किस तरह से हम नकारात्मकता को प्राप्त होते हैं, किस तरह से हमारा पतन हो जाता है।
1.जब हम अपने स्वधर्म के अनुसार ही करटे हैं तो सही कर्म करते हैं । इस तरह के कर्म में हम ध्यान रखते की हम धर्म के अनुसार ही कोई कार्य करें। इसके विपरीत जब हम स्वधर्म का ख्याल रखे बिना कोई कर्म करते हैं तो हम अपनी पसंद नापसन्द के अनुसार कोई कर्म करते हैं। ऐसी स्थिति में हमें धर्म का ध्यान नहीं रहता बल्कि हमें जो अच्छा लगता है वही करते हैं। इस स्थिति में हम अपने मोह, माया ,आवेश, गर्व, अहंकार, भ्रम, मित्रता, शत्रुता , भय आदि के भाव के वश में होकर कर्म करते हैं। इस तरह के कर्म से उद्धार की बात सोचना भी बेमानी ही है।
2.जब हमारे कर्मों में समत्व का भाव होता है तो परिणाम से लगाव के बिना बड़ी निश्चिंतता से हम कर्म भी करते हैं और करने वक़्त आनंदित भी रहते हैं। ये आनंद परिणाम में नहीं कर्म में निहित होती है। लेकिन जब हम समत्व के भाव के बिना कर्म करते हैं तो परिणाम के लिए ही कर्म करते हैं। तब हम कर्म करने वक़्त उत्तेजित और बेचैन हुए रहते हैं। हम नसम की अवस्था में होते हैं , परिणामतः अपने कर्मों से हम भी हम असन्तुलन ही पैदा करते हैं.
3.जब हमारे कर्म में ईश के प्रति समर्पण का भाव होता है तो हम बड़े कैनवास पर काम करते हैं। हमारे कर्मों का उद्देश्य जीव का कल्याण होता है। लेकिन जब ये समर्पण ईश के प्रति न होकर खुद के प्रति ही होता है तब हम जो भी करते हैं उसमें अपनी भलाई का भाव रहता है। तब हम ये नहीं सोचते कि जो हम कर रहें हैं उससे समाज का कितना भला होगा, जीव मात्र का कितना भला होगा। ये संकुचित दृष्टिकोण स्वार्थ को जन्म देता है जिससे जन कल्याण की बात हम नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में हमारे कर्मों से समाज को नुकसान नुकसान पहुंच सकता है।
4. जब हम परिणाम से असंगत होते हैं अर्थात उससे जुड़े नहीं होते तो परिणामों का हमपर कोई प्रभाव ही नहीं पड़ता। लेकिन जब हमारे कर्मों में असंगत का भाव नहीं होता तब हम अपने कर्मों के परिणाम के अनुसार ही प्रतिक्रिया भी देते हैं और आगे का अपना कर्म भी निर्धारित करते हैं। यदि परिणाम मनोकुल नहीं मिले तो हम दुखी हो जाते हैं, गुस्सा से भर जाते हैं, और अपने अगले बगल के लोगों को भी अपने व्यवहार से विचलित कर देते हैं। इस तरह जब हम परिणाम से बन्ध जाते हैं तो लगता है कि जो करते हैं हम ही करते हैं, और परिणाम स्वरूप सभी को कोसने लगते हैं। हमारे अगल बगल का भी माहौल खराब हो जाता है। खुद हम भी आगे के अपने कर्म पूर्व के परुणामों के अनुसाय तय कर किसी का भी बुरा करने पर उद्धत हो जाते हैं।
5. प्रसाद बुद्धि से युक्त कर्म में जो भी परिणाम प्राप्त होता है उसे स्थिर भाव से हम स्वीकार कर लेते हैं। इसके विपरीत प्रसाद बुद्धि से हीन कर्म में कर्म के परिणामस्वरुप जो भी हमें मिलता है उससे हमें असन्तोष ही बना रहता है, जिसके कारण हमारी मनः स्थिति हमेशा दुख की बनी रहती है। हम चिरसन्तोषी और चिर दुखी हुए रहते हैं। प्रसन्ता के साथ स्वीकार नहीं करने के कारण हम हमेशा हमेशा दुःखी ही बने रहते हैं।
इन कारणों से कर्मयोग के बुद्धि से विहीन कर्म हीन ही है। सो इसे त्यागने में ही भलाई है। अतः हमें सामान्य कर्मों को छोड़कर इस कर्मयोग की बुद्धि ही अपनानी चाहिए। तभी हमारा कल्याण सम्भव है। तभी हम कर्म करते हुए कर्म बन्धन से मुक्त हो सकते हैं । अन्यथा सामान्य कर्मों को करते हम हमेशा कर्मबन्धन में बंधे रहते हैं। ध्यान रहे कर्म करना कर्मयोग नही है। कर्मयोग की बुद्धि से कर्म करना ही कर्मयोग है। जो ऐसा नहीं कर पाते वे कृपण हैं अर्थात कंजूस हैं। उनमें क्षमता तो होती है लेकिन वे इस क्षमता का उपयोग नहीं करते और स्व यानी अपनी आत्मा को नहीं पहचान कर बन्धन में बंधे रह जाते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 50
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बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है
॥50॥
श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि को स्पष्ट कर देने के बाद इस बुद्धि की अन्य विशेषता पर प्रकाश डालते हुए आगे कहते हैं कि मनुष्य को लगता है कि इस जीवन में उसके द्वारा अर्जित पूण्य और पाप की उसकी उपलब्धि हैं। लेकिन हमारे पूण्य और पाप भी इसी जन्म कर्म के बंधन हैं जो हमें हमारा सेल्फ यानी आत्मा का बोध नहीं करा पाते। परिणामों के बंधन ने बन्धा मन आत्मसाक्षात्कार करने में असमर्थ होता है। लेकिन यदि हममे कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार कर्म करने की कुशलता आ जाती है तो हम इस पाप पुण्य के द्वंद्वात्मक युग्म से बाहर निकल आते हैं क्योंकि तब हमारे पास परिणाम के प्रभाव से मुक्त रह पाने की दक्षता होती है।
जब हम परिणाम से बढ़ी नहीं होते तो भविष्य की चिंता से न तो खुश होते हैं न दुखी। इसी प्रकार अतीत के प्रभाव से भी हम मुक्त रहते हैं क्योंकि अतीत के कर्मों का ही परिणाम भविष्य में मिलता है। सो हमारी दृष्टि मात्र वर्तमान के कर्म पर टिक जाती है और हमारा सारा प्रयास उस कर्म को उच्च कोटि का बनाने में होता है। पाप और पुण्य तो अतीत के कर्म और भविष्य के फल हैं लेकिन जब इनसे हम पार चले जाते हैं तो हमारी दृष्टि वर्तमान पर ही होती है, जब हम कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म पर ध्यान देते हैं और इसे कर हम बन्धन से मुक्त होते हैं।
गीता अध्याय 2 श्लोक 51
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कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥
क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं
॥51॥
कर्मयोग बुद्धि के परिणामों को बताते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जब इस तरह की समत्व की बुद्धि प्राप्त व्यक्ति ही ज्ञानी कहलाता है। परिणाम से निर्विकार व्यक्ति के लिए परिणाम बन्धनकारी नही हो पाते। जब हम फल से बँधे रहेंगे तब न हमें परिणामों के कारण सुख या दुख की अनुभूति होगी। जब परिणाम का बंधन ही नहीं तो फिर उनके कारण सुख या दुख कैसा! इस स्थिति में तो हमें सिर्फ कर्म करने से प्राप्त अवश्यम्भावी प्रसन्नताआ ही मिलती है। समर्पण के साथ एवम स्वधर्म के अनुरूप किये गए कर्म में तो कर्म करने में प्रसन्नता ही प्रसन्नता है। सो हम चिर प्रसन्न रहते हैं। दुख या क्षणिक सुख देने वाला परिणाम तो बेअसर है समत्व बुद्धि वाले ज्ञानी व्यक्ति पर। इस तरह की चिरस्थाई प्रसन्नता मन को स्थिर करती है। स्थिर मन व्यक्ति ही अपने स्व यानी आत्मा यानी सेल्फ को देख समझ पाता है। सुख दुख के बीच झूलते व्यक्ति की बुद्धि, मन, दृष्टि आदि सभी चायमान होते हैं। सारी इन्द्रियाँ एक साथ ही सक्रिय हुई होती हैं। आप खुद अपनी ही अवस्था पर दृष्टि डाल लें। क्षण में इधर, क्षण में उधर। मन के अंदर भारी उथल पुथल और कोलाहल रहता है परिणामों या परिणामों की उम्मीद अथवा आशंका से। लेकिन परिणाम से निर्विकार समत्व बुद्धि युक्त व्यक्ति शांतचित्त, प्रन्नचित्त, रहते हुए स्वम् की अनुभूति में लीन रहता है। अपने स्व के माध्यम से वह खुद को परमात्मा के समीप पाता है। जब व्यक्ति परमात्मा के समीप ही है तो फिर उसे जन मृत्य के बंधन कैसे बाँध सकते, वह तो इनसे मुक्त रहता है। आप याद करें प्रारम्भ में अर्जुन युद्ध करने से क्यों मना कर रहा था? उसकी दृष्टि युद्ध यानी कर्म पर नहीं थी, उसकी दृष्टि युद्ध के परिणाम पर थी जिसमें उसे जय और पराजय दोनों से मिलने वाले परिणामों से असन्तुष्टि थी। वह सम्भावित परिणामों से निर्विकार नहीं होता बल्कि उनसे बन्धनकारी ही मानता है तभी तो दुखी हो रहा था, तभी तो त्रिलोक का साम्राज्य मिल जाने वाला परिणाम भी उसे स्वीकार नहीं था। लेकिन ये उसके परिणामों के साथ गहरे बन्धन के कारण था। लेकिन श्रीकृष्ण तो यँहा उसे कर्मबुद्धि के द्वारा जन्म मृत्यु के चक्र से ही छूट जाने का ज्ञान दे रहे हैं जो उन परिणामों से बहुत आगे है।
सो हमारा उद्देश्य समत्व की प्राप्ति होनी चाहिए न कि क्षुद्र परिणामों पर हमारी नजर होनी चाहिए।
गीता अध्याय 2 श्लोक 52
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यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा
॥52॥
जब व्यक्ति परिणामों से विच्छेदित होना सिख लेता है तब उसमें मोह नहीं रह जाता। जब आपका मोह समाप्त हो जाता है तो इसका अर्थ यही है कि तब आपको परिणाम से लगाव नही। रह जाता। परिणामों के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति को किसी भी चीज के प्रति आसक्ति नहीं रह जाती। तो क्या ये सम्भव है? सुनने में तो ये सम्भव नहीं लगता कि परिणाम के प्रभाव से पूर्णतः मुक्त होकर भूत , वर्तमान और भविष्य की सारी आसक्तियों से मुक्त भी हुआ जा सकता है। ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि परिणाम के प्रति आकर्षण बना हुआ है। लेकिन जैसे जैसे अभ्यास करते जाते हैं धीरे धीरे परिणाम की चिंता कम से कमतर होती जाती है। कर्मयोग की बुद्धि का निरन्तर अभ्यास परिणामों के प्रभाव को कम करता है। इस बुद्धि को , यानी इस ज्ञान को सतत स्मरण में रखिये। कर्म की महत्ता को समझने से परिणाम की चिंता कम होती है। जब व्यक्ति की कर्मयोग की बुद्धि व्यक्ति के अंदर के परिणाम से लगाव की आसक्ति को पार कर जाती है तो भूत, वर्तमान और भविष्य की समस्त आसक्ति समाप्त हो जाती है। जब व्यक्ति इस अवस्था में पहुँचता है तब माना जाता है कि वह वैराग की अवस्था में आ गया है।
यहाँ सावधानी बरतने की जरूरत है। ध्यान दें कि श्रीकृष्ण ने अभी जिस वैराग्य की चर्चा की है वह किस चीज से है? भोगो से वैराग्य की बात कही गई है श्रीकृष्ण के द्वारा। भोग परिणाम ही हैं कर्म के। परिणाम के प्रति समत्व में स्थित व्यक्ति को जब परिणाम प्रभावित करने में असमर्थ हो जाते हैं तो वह वैराग्य की अवस्था है। सनद रहे इस वैराग्य में कँही भी कर्म से वैराग्य की बात नहीं की गई है, अतएव हमें इस भ्रम में कभी भी नहीं पड़ना चाहिए कि श्रीकृष्ण कर्म से विरत होने को कह रहे हैं, वे मात्र कर्म के परिणाम में समत्व की ही शिक्षा दे रहें हैं। इस अवस्था में मन शांत हो चलता है और तब हम इस अवस्था में आ जाते हैं कि हम सेल्फ को यानी अपने वास्तविक रूप को समझ पाए कि दरअसल हम कौन हैं। स्वयम को जान लेना ही सबसे बड़ा ज्ञान है क्योंकि स्वयं का ज्ञान ही परमात्मा का ज्ञान होना है। व्यक्ति के जीवन का उद्देश्य भोगों ( धनात्मक और ऋणात्मक दोनों,) को ही भोगना नहीं है। जब हम कर्म करते हुए परिणाम के प्रति समत्व की भावना रखते हूं अर्थात अच्छे परिणाम से प्रसन्न नही। होते और बुरे परिणाम से दुखी नहीं होते बल्कि दोनों को समान भाव रखते हैं तो मन शांत होता है। इस अवस्था में जीवन में मिल चुके, मिल रहे और मिल सकने वाले भोगों से भी नही। प्रभावित नहीं होते। ये वैराग्य की अवस्था है, जिसमें मन, चित्त शांत होता है, आनंदित रहता है और यही सत्य की अवस्था है अर्थात हमारा सच्चिदानंद स्वरूप इसी अवस्था में हमें मिलता है।
ये बातें थोड़ी रहस्यमयी लग सकती हैं। लेकिन ध्यान रहे जब तक हम मोह में लगे हैं , परिणाम में हमारी आसक्ति बनी हुई है तभी तक ये बातें रहस्यमयी प्रतीति होती हैं । जैसे ही कर्मयोग के अभ्यास से हम परिणाम जनित प्रभाव से हम खुद को अलग करते हैं प्रसन्नता अनुभव करते हैं , मन शांत और हल्का हो जाता है। दैनिक जीवन के एक छोटे से उदाहरण से समझा जा सकता है। अगर आप छोटे बच्चों के साथ खेल रहें हैं और बच्चे आपको हरा देते हैं। आप हार कर भी दुखी नही होते। उसी प्रकार यदि आप बच्चों को हरा देते हैं तो भी आप फरव नहीं करते। बल्कि आप तो दोनों परिणामों को समान रूप से लेते हैं और परिणाम के प्रभाव में नहीं होते। इसे विस्तारित करने पर हम अपने कर्म में इसे देख समझ सकते हैं। मनुष्य का जीवन ही अपने स्व की प्राप्ति के लिए हुआ है। यदि हम आप कर्म में स्वधर्म और समर्पण से रत हैं और परिणाम के प्रभाव से मुक्त हैं तो इसी वैराग्य की अवस्था में हैं। वैराग्य के लिए न तो कोई उम्र निर्धारित है, न ही विशेष भेषभूषा या कोई विधि विशेष हीं। वैराग्य को श्रीकृष्ण ने जिस तरह यँहा प्रस्तुत किया है वह एकदम अनुकरणीय है बशर्ते कि कर्मयोग का अभ्यास करते करते हम अपनी बुद्धि पर पड़े माया और मोह के आवरण को हटा सकें। कर्मयोग का आचरण करने पर ऐसा होगा ही ये भी निश्चित ही है।
गीता अध्याय 2 श्लोक 53
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श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग हो जाएगा
॥53॥
अब श्रीकृष्ण कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा बताते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर जिज्ञासा होती है, जानने की इक्षा होती है। यही जिज्ञासा व्यक्ति को अन्वेषण के मार्ग पर ले जाती है। इस संसार में कर्म करने के सम्बंध में भी तरह तरह के सिद्धान्त, ज्ञान मौजूद हैं। व्यक्ति अपने जिज्ञासा वश इनके सम्पर्क में आता है और भाँती भाँति के तर्कों को सुनकर, जानकर दिग्भ्रमित भी हो जाता है। किंतु यदि वह अपनी बुद्धि कर्मयोग में स्थिर करता है और अब तक बताए गये मार्ग पर चलता है तो उसकी बुद्धि का भ्रम दूर होता है जैसा कि पूर्व की चर्चा से स्पष्ट हो जाता है। जब बुद्धि का भ्रम छँट जाता है तो उसे पता चलता है कि उसका सेल्फ/स्व/उसकी आत्मा क्या है, उसे ज्ञात होता है कि वह वास्तव में कौन है। उसे समझ में आ जाता है कि वह देह नहीं है, दिमाग भी नहीं है, किसी कुल का प्रतिनिधि भी नहीं है , किसी जाति और धर्म का सदस्य नहीं है, कोई पेशेवर नहीं है बल्कि वह तो विशुद्ध आत्मा यानी परमात्मा स्वरूप ही है। ये बात पढ़कर, रट कर समझने की बात नहीं है बल्कि कर्मयोग के रास्ते चलकर अनुभूत करने वाला ज्ञान है और इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद इस व्यक्ति की बुद्धि संसार से मुक्त होकर परमात्मा में स्थिर हो जाती है यानी व्यक्ति की आत्मा और परमात्मा का संयोग हो जाता है। यही अवस्था योग की है। उसी अवस्था में व्यक्ति अपना सर्वश्रेष्ठ कर्म भी करता है जिसका एकमात्र उद्देश्य जनकल्याण ही होता है क्योंकि ईश्वर जन जन में होता है। यह बात वह व्यक्ति पढ़कर , रट कर नहीं बल्कि अनुभूति कर समझता है।
इसकी प्रक्रिया को समझने की आवश्यकता है। इसे निम्न चरणों में सरलता से समझा जा सकता है।
(1) व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जिज्ञासु होता है। जिज्ञासा की हद तो देखिए, दूध पीता शिशु भी चाँद और तारों की जिद्द करता है। आप खुद देख लें कि व्यक्ति अपने शैशव अवस्था से ही कितना कुछ जानने के लिए विकल रहता है।
(2) अब समझने वाली बात है कि सत्य तो एक ही होता है, बाकी सब असत्य ही होते हैं। हर व्यक्ति इस सत्य को पकड़ने और जानने के लिए प्रश्नवाचक मानसिकता/बौद्धिकता लिए अपनी समझ के अनुसार सत्य खोजते रहता है।
(3) व्यक्ति की जिज्ञासा उसे तरह तरह के ज्ञान और अनुभव से रु ब रु कराती है। लेकिन होता ये है कि सत्य पाने की जगह वह इन भाँति भाँति के ज्ञान और अनुभव के चक्कर में पड़कर भ्रम और आज्ञान का शिकार हो जाता है। इस अवस्था में उसकी भ्रमित बुद्धि उसे एकलौते सत्य से दूर लेकर चली जाती है। आज भी आप सामाजिक विज्ञान पढिये या दर्शन या भौतिकी, रसायन या जीवशास्त्र, आप हम सब अंतिम सत्य की खोज में लगे होते हैं लेकिन ज्ञान के नाम पर अज्ञानता के कचड़े में फंस जाने की वजग से सत्य तक नहीं पहुँच पाते।
(4) अज्ञानता के मकड़जाल में फड़फड़ाते हम सब तो अर्जुन हीं है न! श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि इतने अज्ञानता से पार पाना है तो हमें कर्मयोग की बुद्धि पर भरोसा करना होगा जो अपने तकनीक से हमारी बुद्धि के भ्रम और भ्रम की जननी माया को समाप्त कर देता है। तब हम सत्य को देख पाते हैं। तब हमारी जिज्ञासाएँ शांत होने लगती हैं क्योंकि तब हमें अपने प्रश्नों के विश्वसनीय उत्तर मिलने लगते हैं।
(5) जिज्ञासा के शांत होने से बुद्धि भी शान्त होती है, प्रश्न करने की ललक कम होती है क्योंकि तब एक एक कर हमारे प्रश्न खत्म होते जाते हैं , उनके उत्तर मिल जाते हैं।
(6) इस प्रकार से शांत चित्त की अवस्था में हमें वैराग्य का ज्ञान होता है और हम अपने स्व को समझने की योग्यता पाते हैं।
(7) अब स्व को समझ कर हम जीवन का समाधान कर सकते हैं यानी समाधिस्थ हो जाते हैं।
(8) समाधि की इस अवस्था में हम जान पा लेते हैं कि हम किस तरह से परमात्मा के ही अंश हैं, हमारी आत्मा परमात्मा के साथ संयोग कर लेती है।
(9) ये वो अवस्था है जब हमारे सारे कर्म परमात्मा को अर्पित हो जाते हैं । इस अवस्था में हम न केवल अपने अंदर को खोज पाते हैं बल्कि बाहरी संसार के रहस्यों को भी सहजता से समझ सकते हैं।
(10) ये अवस्था कर्मयोग की बुद्धि की पराकाष्ठा है।
आगे श्रीकृष्ण इसी तरह से कर्मयोग के सैद्धान्तिक पहलुओं और इसके क्रियात्मकता को और भी स्पष्ट करते हैं, जिसके लिए हमें थोड़ा धैर्य रखना होगा।
सारांश
अध्याय 2 श्लोक 39 से 53
अर्जुन के विषाद, दुख, भ्रम को दूर करने के लिए अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उसे सही मार्ग अपनाने की शिक्षा दे रहें हैं। इस क्रम में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को परम् सत्य से अवगत कराया जो आत्मा का ज्ञान कहलाता है और जिसे भारतीय दर्शन में साँख्ययोग का नाम दिया गया है। श्रीमद्भागवद गीता के द्वितीय अध्याय के श्लोक 11 से 30 तक इस साँख्ययोग की शिक्षा दी गई है। इस ज्ञान को प्राप्त करने का मार्ग कर्मयोग है जिसकी प्रारम्भिक शिक्षा श्रीकृष्ण ने द्वितीय अध्याय के श्लोक 39 से 53 तक दिया है । कर्मयोग के माध्यम से प्राप्त शिक्षा का सारांश यही है कि हमें कर्मविशेष का निष्पादन हमको एक विशेष दृष्टिकोण से ही करना चाहिए। इस मार्ग पर जब हम चलते हैं तो पूर्ण समर्पण से बिना परिणाम से प्रभावित हुए कर्म करते हैं। इस मार्ग पर चलने से परिणाम से विरागरत होते हैं हम जिससे परम् शांति और चिर प्रसन्नता प्राप्त होती है। इस शांत चित्त की परमानंद की अवस्था में ही समाधि की प्राप्ति होती है जिसमें हमें परम् आत्मा यानी अपने सेल्फ अथवा आत्मा का ज्ञान होता है।
आगे श्रीकृष्ण अर्जुन के आग्रह पर बताते हैं कि जब व्यक्ति समाधि की परमानंद अवस्था को प्राप्त होता है तो उसकी प्रकृति किस प्रकार की होती है।
कर्मयोग की बुद्धि से युक्त कर्म से जो परिणामों के प्रभाव से मुक्त होता है जो शांति मिलती है वही स्थिति होती है जब मन शांत होता है और कर्म करने से ही आनंद मिलता रहता है। निष्काम कर्मयोग के मूल में दो बातें हैं, पहला की कर्म तो करना ही है, बिना कर्म किये कल्याण नही है। दूसरी बात है कि जब हम कर्म करते हैं तो कर्म के परिणाम से असम्बद्ध होते हैं क्योंकि परिणाम पर हमारा कोई वश नही होता है। चूँकि हम परिणाम से असम्बद्ध होते हैं सो परिणामों के भले या बुरे प्रभाव से हमारी मनःस्थिति अप्रभावित होती है। हम कर्म करते हैं और उसी में श्रद्धा रखते हैं यानी पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं।
कर्मयोग की बुद्धि को मात्र पढ़कर नहीं प्राप्त किया जा सकता है। द्वितीय अध्याय के श्लोक 39 से 53 तक का बार बार अध्ययन करना होता है और उसको अपने व्यवहार में उतारना होता है। बार बार किये गए अभ्यास से ही इस बुद्धि में महारत हासिल होती है। एकबार पढ़ लेने से यह ज्ञान आत्मसात नहीं होता है। इसके साथ साथ हमें बार बार अपना पुरमूल्यांकन भी करते रहना चाहिए कि हम इस बुद्धि को कितना व्यहार में उतार पा रहें हैं। बारम्बार किये गए अभ्यास से हम एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाते हैं जब हमें इस बुद्धि में क्रियात्मक दक्षता हासिल हो जाती है। तब हम समाधिस्थ हो जाते हैं। इस अवस्था में हमारा व्यवहार कैसा होता है इसकी व्यख्या श्रीकृष्ण द्वितीय अध्याय के 55वें श्लोक से करना प्रारम्भ करते हैं ।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54 से 61
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स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
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स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 54
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्॥
अर्जुन बोले- हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है? ।।54।।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का अर्थ समझाया जिसके परिणाम में व्यक्ति परम् शांति, और अपने स्व को प्राप्त होता है। इस ज्ञान को पाकर अर्जुन के अंदर एक स्वाभाविक उत्कंठा उत्पन्न होती है। यदि हम कोई बात , कोई व्याख्यान बहुत मनोयोग से सुनते और समझते हैं तो हमारे अंदर और आगे जानने की इक्षा होती है, कई तरह के प्रश्न मन में उठते हैं। चूँकि श्रीकृष्ण की बात को अर्जुन ध्यान से सुन रहा है सो स्पष्टता के लिए वह आगे का प्रश्न भी कर देता है। अर्जुन के प्रश्न के मुख्य भाग निम्न हैं---
1.समाधि में अवस्थित स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की परिभाषा/लक्षण क्या हैं?
2.वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वो है जिसका ज्ञान स्थिर है अर्थात ऐसा व्यक्ति जिसे अंतिम सत्य प्राप्त हो चुका है। हम सब जानते हैं कि हमारा ज्ञान निरन्तर परिष्कृत होता है। इस संसार के विषय में हम जितना पहले जानते थे उससे अधिक आज जानते हैं , और भविष्य में आज से भी अधिक जानेंगे। संसार नित्य परिवर्तनशील है सो इससे सम्बन्धित हमारा ज्ञान भी परिवर्तनशील होता है। वैज्ञानिक ज्ञान भी जिसके माध्यम से हम संसार की गतिविधि को समझते हैं वो निरन्तर परिष्कृत होते रहता है। इस ज्ञान का कोई और छोर नहीं है, इसका कोई अंत नहीं। हम जितना जानते हैं उससे कई गुणा नहीं जानते हैं जिसे जानने के लिए हम नियमित अग्रसर रहते हैं। न तो प्रकृति में होने वाले परिवर्तन रुकेंगे, न ही हमारा प्रकृति का ज्ञान। सो भौतिक संसार का ज्ञान प्राप्त कर कोई भी अंतिम रूप से ज्ञानी नहीं हो सकता, सो ऐसे व्यक्ति का कोई अंतिम ज्ञानी हो ही नहीं सकता । अतएव इस तरह के व्यक्ति के सम्बंध में अर्जुन का कोई प्रश्न नहीं हो सकता है।
तो फिर कौन व्यक्ति स्तित्प्रज्ञ कौन है? स्तित्प्रज्ञ वो है जिसे अपरिवर्तनीय का ज्ञान प्राप्त है। अपरिवर्तनशील क्या है? अपरिवर्तनशील, अक्षय, अविकारी हमारा सेल्फ है, हमारा स्व है, हमारी आत्मा है और जो अपने सेल्फ को जनता है वही स्थितप्रज्ञ है। यदि हम खुद को परिभाषित करते हैं तो हम खुद की वर्तमान स्थिति बताते हैं। ये स्थिति बदलती रहती है। लेकिन जो व्यक्ति नियत रास्ते पर चलकर , जो कर्मयोग का रास्ता है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा के अस्तित्व को पहचान लेता है वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। अर्जुन इसी व्यक्ति की रहनी को समझना चाहता है।
जो व्यक्ति उपरोक्त ढंग से स्थितप्रज्ञ है वो निश्चित ही समाधिस्थ है। समाधि में अवस्थिति का क्या अर्थ है? जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग समझा रहे होते हैं तो बताताते हैं कि कर्मयोगी विरागरत होता है। यही विराग समाधि की अवस्था होती है। समाधि की अवस्था ध्यान केंद्रित करने की अवस्था से भिन्न है। ध्यान केंद्रित करना एक मानसिक अवस्था होती है जिसमें हमारा ध्यान किसी एक चीज पर केंद्रित होता है, उसके अतिरिक्त किसी अन्य चीज पर नहीं। लेकिन इस अवस्था में व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से भी विरागरत होता हो कोई आवश्यक नहीं, सो ध्यान की यह क्रिया जिसमें वैराग्य का भाव ही नहीं हो एक तन्द्रा मात्र है जिसके टूटते व्यक्ति फिर से उसी परिवर्तनशील संसार के मोहजाल, उसी परिणाम की दुनिया में लौट जाता है। लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग की दृष्टि से कर्म करते करते परिणाम के प्रभाव से मुक्त होकर वैराग्य की अवस्था में आता है तब उसको ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ता बल्कि वो तो सोते जागते अपने ही आत्मा में , अपने ही सेल्फ में रहता है। यही समाधि की स्थिति है। समाधि की स्थिति भभूत लगागकर, दाढ़ी मूँछ बढाकर, जटा लटकाकर, विचित्र भेष भूषा धारण कर नहीं मिलता है।
इस प्रकार जो स्थितप्रज्ञ है वो समाधिस्थ भी है हीं। यदि हम भी अपने सेल्फ को समझना जानना चाहते हैं तो ये आवश्यक है कि हम इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षणों को जाने समझें और आत्मसात करें। सो अर्जुन इस तरह के व्यक्ति के लक्षणों को जानने की इक्षा व्यक्त करता है।
अर्जुन जानना चाहता है कि इस प्रकार का स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कैसे बोलता, बैठता और चलता है अर्थात वह जानना चाहता है कि इस प्रकार के व्यक्ति की रहनी कैसी होती है, उसका सामाजिक समव्यव्हार कैसा होता है। अर्थात यह व्यक्ति अपना सामाजिक जीवन कैसे व्यतीत करता है, अपने वातावरण से उसका सामाजिक लेन देन किस तरह से होता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी लक्ष्य तक पहुँचना चाहे तो दो बातें अनिवार्य हैं
1. पहला तो उसे लक्ष्य स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए, उसे स्पष्ट होना चाहिए कि दरअसल वो चाहता क्या है।
2.दूसरे की उसका लक्ष्य ही उसकी प्रेरणा हो। जब लक्ष्य प्रेरणा में बदल जाता है तो लक्ष्य स्वपोषित हो जाता है। उस स्थिति में व्यक्ति को किसी अन्य उत्प्रेरक या प्रेरणाश्रोत की आवश्यकता नही रह जाती है। वह स्वतः हो उस लक्ष्य की ओर बढ़ा चला जाता है। गीताकार ने अर्जुन के माध्यम से हमें समझाया है कि हम किस तरह से अपने को अपने सेल्फ को खोजने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ध्यान रहे कि किसी भी चीज को देखने का दो नजरिया होता है। एक कि हम खुद उसे कैसे देखते हैं। और दूसरा की अन्य लोग उस चीज को कैसे देखते हैं। जब हम स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को जानना चाहते हैं तो एक नजरिया तो यह है कि वह स्थितप्रज्ञ व्यक्ति खुद को कैसे और किस रूप में देख पाता है और दूसरे कि हम उसे किस तरह से समझ पाते हैं।
सवाल उठता है कि अर्जुन इस प्रकार का प्रश्न ही क्यों करता है। जब हम गहरे विषाद की अवस्था में होते हैं और यदि उस समय हमें कर्मयोग सदृश्य समझ दी जाती है तो सहज ही कई प्रश्न मन में उठने लगते हैं, यथा हमें कर्म न कर मात्र बुद्धि के ही शरण में क्यों नही रहना चाहिए, क्यों हम वैराग्य और सन्यास की बात करें, क्यों न हम भी सारे जंजाल को छोड़कर वैराग्य और समाधि का मार्ग पकड़ लें, आदि आदि। हम सब वैराग्य और समाधि के उन प्रचलित अर्थों से ही वाकिफ होते हैं जो समाज में बोल चाल की भाषा में प्रचलित हैं। हम श्रीकृष्ण की शब्दावली में इनका अर्थ नहीं समझ पा रहे होते हैं। दृष्टि को साफ कर देने के लिए, समझ से भ्रांति को दूर करने के लिए ये जरूरी है कि हम जाने कि श्रीकृष्ण जिस अवस्था को प्राप्त करने की शिक्षा दे रहें हैं उस अवस्था को प्राप्त कर लेने पर व्यक्ति क्या और कैसे कुछ भी करता धरता है।
अर्जुन का प्रश्न हमारी समझ को झझकोरता है, उद्वेलित करता है, हमें प्रेरित करता है कि कर्मयोग का व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात हम समझ सकें कि हमे किस तरह के व्यक्ति के रुप में विकसित होना चाहिए।
जब श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग की बुद्धि को समझा देते हैं तो अर्जुन उस व्यक्ति की विशिष्टताओं को जानने की इक्षा व्यक्त करता है कि जो कर्मयोग की बुद्धि से युक्त होता है। तब श्रीकृष्ण इस तरह के व्यक्ति के विशेषताओं को भी बताते हैं जो निम्न हैं-
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
1.कामना का सर्वथा अभाव
2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि
3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,
4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित
5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण
6.इन्द्रियों के विषयों से अनासक्ति
इनको समझाते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 55,
श्रीभगवानुवाच
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
श्री भगवान् बोले- हे अर्जुन! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है
॥55॥
अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण उस व्यक्ति के विशेषताओं को बताना प्रारम्भ करते हैं जो स्थितप्रज्ञ है अर्थात जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है , जिसे हम REALIZED MASTER कहते हैं।
पूर्व में हम देख चुके हैं कि श्रीकृष्ण ने समझाया है कि कर्मयोग की बुद्धि से युक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसके कर्म की निम्न विशेषताएँ होती हैं:--
1. स्वधर्म के अनुसार ही कर्म करना चाहिए, न कि किसी की नकल कर या न कि पसन्द नापसन्द के आधार पर।अगर हम अपनी अच्छाई चाहते हैं तो हमारे कर्म दूसरों की अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।
2.परिणाम के सम्बंध में समत्व का भाव रखना अनिवार्य है अर्थात हर परिणाम के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं रखना चाहिए।
3.कर्म करें तो उसे पूरे समर्पण की भावना से करें। सभी कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर करें। ईश्वर हर जीव में है, सो आपके कर्म करने की भावना में सभी के प्रति समर्पण के भाव हों यानी सभी जीवों के कल्याण की बात हो।किसी को हानि पहुँचाने की भावना नहीं हो। अगर हम कोई कर्म करते हैं तो इसके पीछे हमारी भावना या तो अपना ईगो या अन्य के ईगो को सन्तुष्ट करने की भावना होती है। इससे बाहर निकल कर हमारे कर्म सभी के प्रति समर्पित होने चाहिए अर्थात ईश्वर के प्रति समर्पित होने चाहिए।
4. परिणाम से लगाव नहीं रखना चाहिए। सही कर्म करें, परिणाम अच्छा या बुरा होगा बिना इससे लगाव रखे। अच्छा और बुरा तो होना ही है, हमारा काम है सही कर्म करना।
5.जो भी परिणाम मिले, सभी में समत्व की भावना रखते हुए, बिना उससे लगाव रखे उसे स्वीकार कर लेना चाहिए।
उपरोक्त बुद्धि से युक्त व्यक्ति के कर्म उसे कर्मों के बंधन से मुक्त करते हैं और उसे अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा का ज्ञान होता है जिसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं । यही व्यक्ति वैरागी भी है, समाधि में अवस्थित भी है , और यही स्थितप्रज्ञ भी है। कर्मयोग की बुद्धि की उपरोक्त विशेषताओं में ही इस व्यक्ति की विशेषताएँ भी छिपी हैं जिनको अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण विस्तार से बताते हैं, ये विशेषताएँ निम्नवत हैं:--
1. इस व्यक्ति की कोई कामना अर्थात कोई इक्षा नहीं होती। जो व्यक्ति कर्म के परिणाम से अप्रभावित होता है , जिसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते , जो हमेशा निर्लेप भाव से समत्व की बुद्धि से कर्म करता है उसके कर्मों में कोई कामना नहीं होती, कोई इक्षा नहीं होती है। वह कर्म किसी कामना पूर्ति के लिए नहीं करता है।
हमारी कामनाएँ मुख्य रूप से निम्न चीजों से जुड़ी होती हैं
क. अस्तित्व की रक्षा
ख. सुरक्षा
ग. ज्ञान की प्राप्ति
घ. सुख और आनंद की प्राप्ति
जब तक ये कामनाएँ रहती हैं हमारे कर्म भी इनकी पूर्ति के लिए ही लगे रहते हैं और हम कर्मों के परिणाम से बंधकर रहते हैं । तब न स्वधर्म की चिंता रह जाती है, न समर्पण की भावना जन्म ले सकती है। बस हम स्वार्थ वश इन कामनाओं की पूर्ति में लगे रहते हैं। ये हमारे जीवन का अंधकार युग होता है।
लेकिन कामनाओं से मुक्त व्यक्ति अपने स्व/सेल्फ/आत्मा में ही रचा बसा होता है जँहा वह सुख की , ज्ञान की प्राप्ति के लिए अपने बाहर के वातावरण पर , परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट होता है। चूँकि उसकी कोई कामना पूर्ति शेष ही नहीं होती सो यह व्यक्ति परम् संतुष्ट होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 56
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दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हैं, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है
॥56॥
2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।
वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।
जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।
इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।
3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है।
और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा।
और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।
2. श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए आगे बताते हैं कि यह व्यक्ति दुखों से उद्वेलित नही। होता है और न ह सुखों में अतिरेक उत्साह ही होता है उसे।
वस्तुतः सुख और दुख लगाव यानी ATTACHMENT के परिणाम होते हैं। जब हम परिणाम की कामना से मुक्त होकर स्वधर्म के अनुसार पूर्ण समर्पण से कर्म करते हैं तो कर्म से कोई लगाव नही। होता है बल्कि कर्म हम इसलिए करते है क्योंकि वह करना हमारा स्वधर्म है। ऐसी स्थिति में हम कर्मों के परिणाम से नहीं बंधे होते हैं। जब परिणाम से हमारे कर्म बंधे नहीं हों तो फिर परिणाम से सुख या दुख भला कैसे मिल सकता है। सो यह व्यक्ति इस बात से प्रभावित ही नही होता है कि जो परिणाम उसे मील रहें हैं वो प्रतिकूल हूं या अनुकूल। वह तो जो मिला उसी से संतुष्ट है। ऐसी स्थिति में कोई परिणाम उसके मन को उद्वेलित नहीं कर पाता है। वह तो आत्मा में ही लीन, अपने ही सेल्फ में रचा बसा हर हाल में चिर आनंद की अवस्था में होता है।
जिस व्यक्ति को दुख की अनुभूति होती है वह उससे छुटकारा चाहता है और जब उसी व्यक्ति को किसी अन्य परिणाम से सुख मिलता है तो वह चाहता है कि बार बार वही परिणाम दुहराया जाए उसके जीवन में। दुहराव की यह आकांक्षा उसे मोह से बंधता है। मोहयुक्त इंसान संसार चक्र से निकलना ही नहीं चाहता है। उसे वही सुख की उम्मीद जो लगी होती है।
इन सब के विपरीत कामनाओं से रहित व्यक्ति सुख और दुख के प्रभाव से मुक्त सेल्फ की अनुभूति में ही चिर आनंदित होते रहता है।
3. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को न तो राग होता है , न क्रोध, न भय। यँहा फिर उसी समत्व के भाव का असर दिखता है। कामना लगाव का परिणाम है और लगाव मोह से जन्म लेता है। यह मोह भ्रम से आता है। जब लगाव होता है तो हम परिणाम से बँधे होते हैं। यही लगाव हमें किसी चीज से अनुरक्त या विरक्त करता है। अनुरक्ति या विरक्ति दोनों ही लगाव के परिणाम हैं । जब जुड़ाव होता है तो उस जुड़ाव से विलग होने पर दुख होता है और उससे जुड़े रहने पर खुशी और सुख मिलता है। इस प्रकार यह लगाव ही राग है।
और यही लगाव डर भी जन्म देता है। जब लगाव होगा तो उससे विलग हो जाने का भय भी होगा।
और जब लगाव और राग की पूर्ति में बाधा आती है तो मन खिन्न हो उठता है और अंततः क्रोध का जन्म होता है।
लेकिन जिस व्यक्ति को कर्मयोग की बुद्धि प्राप्त है और जिसके कर्म इस बुद्धि के अनुसार हैं वह तो कामना और इक्षा रहित होकर परिणाम से मुक्त होकर कर्म करता है, तो फिर उसके कर्म भी निश्चित हैं। वह तो बाहरी परिस्थिति और अपने like के अनुसार कर्म करता ही नहीं है, बल्कि वह तो वो निश्चित कर्म करता है जो उसके स्वधर्म के अनुसार है। ऐसी स्थिति में कर्मों और परिणामों से उसे राग नहीं होता है, और न ही कुछ छूट जाने का भय और न ही किसी बाधा से उसे उत्तेजना ही होती है, सो वह बाहरी किसी भी कारक से अप्रभावित होता है। उसका मन मस्तिष्क एकदम शांत होते हैं अर्थात वह मन के स्तर पर मौन ही होता है सो मुनि कहलाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 57
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यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ उस-उस शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है
॥57॥
4. कर्मयोग की बुद्धि को बताते समय श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करने में परिणामों के प्रति समत्व का भाव होना चाहिए अर्थात सभी तरह के परिणाम में स्थिर होना चाहिए, चाहे वो अच्छे हों या बुरे। साथ ही उन्होंने ये भी समझाया है कि जो भी परिणाम आये उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए और पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ स्वधर्म के अनुसार अपना कर्म करते रहना चाहिए। इस तरह की बुद्धि से युक्त व्यक्ति को न तो किसी से लगाव होता है न विलगाव यानी इस तरह का व्यक्ति स्नेह रहित होता है। स्नेह तो तब होता है जब लगाव हो अर्थात अटैचमेंट हो।
यँहा ध्यान देने की बात है कि श्रीकृष्ण ने स्नेह से रहित होने की शिक्षा दी है न कि विलगाव से रहित होने की। अर्थात श्रीकृष्ण ने पॉजिटिव रूप से बातों को कहा है यानी कि सुख की प्राप्ति की ओर संकेत किया है। हम स्नेह और लगाव से सुख पाने के लिए इस संसार के द्वारा प्रशिक्षित किये गए होते हैं किंतु इसी लगाव के कारण हमारे अंदर आसक्ति का जन्म होता है जो सारे दुखों का जड़ होता है। श्रीकृष्ण तो ये समझा रहें है कि हमारे अंदर न तो लगाव हो न विलगाव। सांसारिक रूप से हर अच्छे या बुरे को, शुभ और अशुभ को बिना उस अच्छा या बुरा की प्रकृति से प्रभावित हुए जस का तस स्वीकार करना चाहिए। ये हमारा इगो है जो कुछ को अच्छा और कुछ को बुरा की संज्ञा देता है , हम अपनी पसंद और नापसन्द के कारण अच्छे और बुरे से प्रभावित होते हैं। लेकिन कर्मयोग की बुद्धि से युक्त स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि इन बाहरी कारकों से अप्रभावित रहती है और वह चीजों के रूप रंग प्रकृति से अप्रभावित रहते हुए उनको जस का तस ही लेता है। चूँकि वह तो अपने आत्मस्वरूप में ही अवस्थित रहता है, बाहरी परिणामों से अप्रभावित होता है, समत्व के भाव में बना रहता है, श्रद्धा के साथ रहता है और परिणाम को समान रूप से लेता है सो सांसारिक शुभ से खुश नहीं होता है और सांसारिक दुख से दुखी नहीं होता। उसके लिए तो सभी समान रूप से अपनी प्रकृति के अनुसार हैं। उसकी प्रसन्नता किसी बाहरी कारणों से निर्धारित ही नहीं होती है , वह तो अपनी ही आत्मा में लीन प्रसन्न रहता है।
तो क्या इस स्थिति में व्यक्ति पलायनवादी नहीं हो सकता है? अर्जुन भी तो सब कुछ छोड़ देने की बात कर रहा था, तो फिर अर्जुन की प्रतिक्रिया और श्रीकृष्ण की शिक्षा में अंतर कँहा है? वस्तुतः पलायन विलगाव के कारण नहीं होता बल्कि उसके अंदर एक भय की भावना होती है, जो उसे भागने के लिए प्रेरित करती है। वह तो परिणामों का दास है तभी तो परिणामों से भागकर एकांत में चला जाना चाहता है अथवा आत्महन्ता बनने का विचार करता है। कर्मयोगी तो परिणामों का सामना करता है, बस उसे परिणाम प्रभावित नहीं कर पाते, क्योंकि परिणामों से और यँहा तक कि उसे अपने कर्मों से कोई लगाव नहीं होता, वह किसी कारण वश कुछ करता ही नहीं। वह तो वही करता है जो उसके स्वधर्म यानी उसकी स्थिति से निर्धारित है और इस कारण उसे परिणामों के स्वरूप से कोई लगाव नहीं होता। जब हमें अपने कर्म से लगाव होगा तब हम परिणाम की चिंता करेंगे। जब हम कर्म करते वक़्त कोई मकसद रखेंगे तब मकसद को पूरा होने पर खुश होंगे, उसे शुभ मानेंगे और मकसद के पूरा नहीं होने पर दुखी होंगे और इसे अशुभ मानेंगे।
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इन सब से मुक्त होकर कर्म में स्वधर्म के अनुसार, श्रद्धा और समर्पण से बिना परिणाम से बंधे कर्म करता है तो उसे स्नेह या दुराव कैसा।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 58
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यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है (ऐसा समझना चाहिए)
॥58॥
5. जब व्यक्ति का कर्म स्वधर्म के अनुसार होता हो, जब कर्म समर्पण और श्रद्धा से हो, जब कर्म में आनंद की अनुभूति हो, जब कर्मों के परिणाम में समत्व का भाव हो तो निश्चित ही ऐसे व्यक्ति का अपने इन्द्रियों यानी सेंसेज पर भी पूर्ण नियंत्रण होगा ही। बिना इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्रण के कर्मयोग का अभ्यास भी असम्भव है।
और यदि ये इन्द्रियाँ बाह्य जगत के क्रिया कलाप से नियंत्रित होंगी तो फिर कर्मयोग की शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं। चूँकि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति वाह्य परिणामों और कारकों से अप्रभावित रहता है , यह उसी स्थिति में सम्भव है जब व्यक्ति का अपने इन्द्रियों के क्रियाकलापों पर पूर्ण नियन्त्रण हो, अर्थात इन्द्रियाँ व्यक्ति को नहीं चलाये बल्कि व्यक्ति के अनुसार इन्द्रियाँ व्यवहार करें। हमारी इन्द्रियाँ हमें वाह्य संसार की अनुभूति कराती हैं। यदि हमारी इन्द्रियों का हमपर नियंत्रण होगा तो हमारी समस्त चेष्टाएँ भी वाह्य संसार की प्रतिक्रिया में ही रह जाएंगी। हम हमेशा अस्थिर बने रहेंगे। तब भला स्व की खोज क्या कर पाएँगे।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 59,60
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विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है
॥59॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥
हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात् हर लेती हैं
॥60॥
6. .श्रीकृष्ण अर्जुन को स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए एक बार पुनः इन्द्रियों पर नियंत्रण की महत्ता को निरूपित करते हुए बताते हैं कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर इस तरह का नियन्त्रण होता है कि उसकी आसक्ति सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
इसको समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो व्यक्ति इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है वो भी इन्द्रियों के प्रभाव से तब तक मुक्त नहीं होता जब तक उसे अपने सेल्फ की समझ नहीं हो जाती और उस काल में वह व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार के साथ पूर्ण आसक्ति मुक्त हुआ परमात्मा में ही विलीन हो जाता है। अर्थात स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का इन्द्रियों पर सिर्फ नियंत्रण ही नहीं होता है बल्कि उससे आगे जाकर इन्द्रियों के प्रभाव से उसे मुक्ति मिल जाती है।
इन्द्रियाँ वाह्य जगत की अनुभूतियों में आसक्ति पैदा करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में व्यक्ति के अंदर आसक्ति को जन्म देती है। जिस व्यक्ति ने इन्द्रियों पर नियंत्रण कर भी लिया है उसकी आसक्ति इन्द्रिय के विषय से विरक्ति नहीं हो पाती है, जैसे यदि कोई वस्तु या व्यक्ति जिसके प्रति एक विशेष लगाव हो उससे यदि हम विलग होकर उससे सम्बन्धित इन्द्रिय के प्रभाव को निरस्त करते हैं तो भी उसमें आसक्ति बनी हुई रहती है। यदि किसी खाने में हमे विशेष स्वाद मिलता हो, किसी आवाज या गन्ध के प्रति विशेष आकर्षण हो या किसी स्त्री अथवा पुरुष से अनुराग हो और यदि हम खुद को बलात उनसे अलग कर लेते हैं तो हमें लगता है कि हमने इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में ले लिया है, अब उस खाने, आवाज या स्त्री/पुरुष के प्रति हमारी इन्द्रियाँ हमें उद्वेलित नहीं करेंगी। लेकिन सच्चाई ये है कि जैसे ही हम पुनः उनके सम्पर्क में आते हैं हमारी इन्द्रियाँ सक्रिय हो उठती हैं। इन्द्रियों का यही व्यवहार आसक्ति है। वस्तुतः बिना ज्ञान प्राप्ति के , बिना सात्मसाक्षात्कार के मात्र कारक से दूरी बनाकर जो इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लेने की बात सोचते हैं वे सच्चाई में इन्द्रिय के प्रभाव से, उसकी आसक्ति से मुक्त नहीं हुए होते हैं। होता ये है कि प्रत्येक कारक में एक रस होता है, एक स्वाद होता है जिसे हम इन्द्रिय विशेष से अनुभव करते हैं। यदि हम जबरन इन्द्रिय पर नियंत्रण का प्रयास करते हैं तो हमें लगता है कि हमने ये महारथ हासिल कर लिया है, लेकिन उस कारक के रस और स्वाद से हमारा लगाव बना रह गया होता है, वो खत्म नहीं होता है और जैसे वो रस और स्वाद पुनः उपलब्ध होता है इन्द्रियाँ सक्रिय होकर उसकी तरफ आकर्षित हो जाती है। इसलिये महत्वपूर्ण बात ये है कि हम इन्द्रियों के प और स्वाद के लगाव(अटैचमेंट) से खुद को अलग कर लें। इस स्थिति में कारक की उपस्तिति में भी हमारी इन्द्रियाँ उत्तेजित नहीं होती, उनको अनुभव नहीं करती हैं।
लेकिन स्थितप्रज्ञ व्यक्ति जिसे कामना ही नहीं होती उसकी आसक्ति भी समाप्त हो चुकीं होती है। जब हम आत्मसाक्षात्कर कि अवस्था में आते हैं तो हमें अपने स्व के ज्ञान के साथ वो स्वाद और रस मिल जाता है जिसके आगे सारे स्वाद अर्थहीन हैं। व्यक्ति के अंदर जब तमोंगुण कि प्रधानता होती है और वह रजोगुण के संपर्क में आता है तो उसका तमोगुण के प्रति लगाव समाप्त हो जाता है। इसी प्रकार जब वह सत्वगुण का स्वाद प्राप्त करता है तो उसके अंदर से रजोगुण का लगाव समाप्त हो जाता है। अंततः जब उसे आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति होती है तो उसे परमात्मा का स्वाद प्राप्त हो जाता है और उस स्थिति में सत्वगुण के प्रति भी उसका लगाव समाप्त हो जाता है। इस प्रकार ज्ञान की प्राप्ति के पश्चात ही हम इन्द्रियों के आसक्ति से मुक्त होते हैं। यही ज्ञान हमें असक्तिमुक्त करता है।
हमारा शरीर एक रथ के सदृश्य है, उसके घोड़े उसकी इन्द्रियाँ हैं , मन लगाम है और बुद्धि सारथी है। मन एक तरफ इन्द्रियों से जुड़ा हुआ है तो दूसरी तरफ बुद्धि से। यदि बुद्धि मन का लगाम ठीक से नहीं थामे तो इन्द्रिय रूपी घोड़े रथ रूपी शरीर को लेकर इधर उधर भागने लगे। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि इन्द्रियाँ बहुत ही बलवती होती हैं। इतनी कि कई बार बहुत बुद्धिमान की बुद्धि भी काम नहीं करती। बुद्धि का यदि किसी भी इन्द्रिय पर से लगाम ढीला हुआ नहीं कि रथ की दिशा बिगड़ जाती है, उसकी चाल अनियंत्रित हो जाती है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति का अपनी बुद्धि पर और उसके माध्यम से इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण होता है और यह नियंत्रण इन्द्रियों के विषयों के रस और स्वाद से लगाव,( अटैचमेंट) के विओप से सम्भव हो पाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोकन 61
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तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
इसलिए साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है
॥61॥
अर्जुन के इस प्रश्न पर कि स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं श्रीकृष्ण उसे स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण समझाते हुए अब तक बताए हैं कि
स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षण
1.कामना का सर्वथा अभाव
2.आत्मा में ही आत्मसंतुष्टि
3.सुख, दुख, राग, भय और क्रोध से मुक्त,
4.स्नेहरहित,शुभ अशुभ रहित, प्रसन्नता और द्वेष से रहित
5.इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण
6.इन्द्रियों की विषयों से अनासक्ति
7.अहंकार का अभाव
उपरोक्त से स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्द्रियों पर नियंत्रण की शिक्षा दे रहें हैं क्योंकि इन्द्रियों पर नियंत्रण से ही उपरोक्त गुणों की प्राप्ति सम्भव है। श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जबरन इन्द्रियों पर नियंत्रण से इन्द्रियाँ संयमित होकर नहीं रहती हैं। इसके लिए श्रीकृष्ण अर्जुन को वो विधि बताते हैं जिससे इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से वश में रहती हैं, वे सिर्फ नियंत्रित ही नहीं होती बल्कि तिरोहित भी हो जाती हैं। इन्द्रियों के वश से मुक्त हुआ व्यक्ति ही बाह्य संसार के प्रभावों से मुक्त होता है और शांत मन से अपने स्व को प्राप्त कर पाता है।
हमने देखा है कि इन्द्रियाँ मन के वश में होती हैं। मन हमारे पसन्द और नापसन्द पर निर्भर करता है और पसन्द नापसन्द हमारे बुद्धि यानी INTELLECT पर निर्भर करता है। जब हम इन्द्रियों को वश में करने चलते हैं तो मन चंचल हो कर हमारे पसन्द और नापसन्द के अनुसार इधर उधर भागता है, परिणामस्वरूप इन्द्रियाँ भी अनियंत्रित हो जाती हैं। लेकिन यदि हमारे पसन्द नापसन्द पर हमारी बुद्धि का नियंत्रण हो तो बुद्धि बताती है कि क्या सही है, क्या गलत है और तब मन उस बुद्धि के अनुरूप संचालित होता है और वह इन्द्रियों को उसी सही और गलत के अनुसार कार्य करने का निदेश जारी करता है और तब इन्द्रियाँ नियंत्रित भाव से प्रभाव डालती हैं।
अब देखें कि ये सम्भव कैसे हो पाता है। बलात नियंत्रण हमेशा विरोध और विद्रोह को जन्म देते हैं। यदि बिना किसी कारण के हम किसी भी चीज को बाँधते दबाते हैं तो उसकी ऊर्जा अनियंत्रित होकर बाहर आने के लिए बेचैन हो जाती है जिससे शांति की अवस्था भंग होकर अशांति और अस्थिरता उत्पन्न होते हैं जो मन को एकाग्र होकर आत्मपरायण नहीं होने देते हैं। लेकिन यदि बुद्धि के द्वारा मन को और मन के द्वारा इन्द्रियों को एक बड़ा लक्ष्य दिया जाता है तो इन्द्रियाँ उनको पूरा करने में लग जाती हैं , वे उत्पात करना बंद कर उस लक्ष्य पूर्ति में सहायक बन जाती हैं। जैसे यदि नदी पर बाँध बान्धा जाए और पानी निकलने का कोई चैनल नहीं बनाया जाए तो पानी का दबाव अंततः बाँध को तोड़ डालता है, लेकिन यदि चैनल है तो पानी की दिशा मुङ जाती है, उसका दबाव बिखर जाता है। उसी प्रकार यदि आपको खूब भोर में कँही जाना अनिवार्य हो तो बिना अलार्म के भी आपकी नींद खुल जाती है और आप बिस्तर छोड़ देते हैं। यदि परीक्षा सर पर हो तो सिनेमा देखने की आपकी इक्षा स्वाभाविक रूप से उस समय खत्म हो जाती है। सो श्रीकृष्ण कहते हैं कि इन्द्रियों को बड़ा लक्ष्य दें, उन्हें ब्रह्म पर केंद्रित करें, वे स्वतः सब ओर से सिमट कर ब्रह्म के तलाश में जुट जाएंगी । इन्द्रियाँ विरोध न कर अपने गुणों के अनुसार एक जगह यानी परम् ब्रह्म में केंद्रित होकर स्थिर हो जाती हैं जो परम् शांति की अवस्था होती है। इसी अवस्था में व्यक्ति अपने आत्मा को, अपने सेल्फ को पहचान पाता है।
उपरोक्त से स्पष्ट है कि हमें जीवन के लक्ष्य ऐसे निर्धारित करने चाहिए जिनसे परम् सुख और शांति मील पाए और यह तभी सम्भव है जब लक्ष्य स्व की प्राप्ति, आत्मसाक्षात्कार हो, परम् ब्रह्म की प्राप्ति हो, तब उसी के अनुसार हमारी बुद्धि भी कार्य करेगी, हमारे पसन्द -नापसन्द को भी निर्धारित करेगी जिससे मन इन्द्रियों को उस उच्चतर लक्ष्य के अनुरूप ही व्यवहार करने का निदेश देगा और इन्द्रियाँ असंयमित होकर इधर उधर नहीं भागेंगी।
व्यक्ति के पतन का कारण
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ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है
॥62॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है
॥63॥
अब श्रीकृष्ण इन्द्रियों में आसक्ति के कारण व्यक्ति के पतन की प्रक्रिया को भी समझाते हैं। उन्होंने बहुत ही आसान तरीके से समझाया है कि इन्द्रियों के राग रस में डूबे रहने के कारण किस प्रकार मनुष्य का पतन होता है। यह बहुत ही स्वाभाविक सी बात है कि हम जिस चीज के बारे में बहुत चिंतन करते हैं उनके प्रति हमारे मन में आसक्ति का भाव जन्म लेता है। वाह्य संसार की अनुभूति इन्द्रियों यानी सेंसेज के माध्यम से ही होती है । खुद से बाहर की विषयों वस्तुओं और व्यक्तियों में जब हम आनंद और सुख की खोज करते हैं तो हम निरन्तर उनकी ही सोच में लगे रहते हैं, व यदि हम उन अनुभूतियों में डूबते हैं तो उनके प्रति एक लगाव भी उत्पन्न होता है। हम उस विषय, वस्तु, व्यक्ति के बारे में जिनसे हम सुख और आनंद की अपेक्षा करते हैं खुश और प्रसन्न होते रहते हैं। जैसे यदि हमको लगता है कि फलाना पद मिल जाने से अथवा फलाना वस्तु मिल जाने से अथवा फलाना व्यक्ति के मिल जाने से अथवा इतना धन हो जाने से हमें बहुत आनंद मिलेगा तो हम निरन्तर उसी के बारे में चिंतन करते रहते हैं। यँहा तक कि उसके वास्तविक प्राप्ति के पूर्व ही हम मात्र उसके मिलने की कल्पना कर के ही खुश होते रहते हैं और उसी में डूबे रहते हैं, उसी के चिंतन और ध्यान में लगे रहते हैं।
जिन विषयों पर बहुत चिंतन करते हैं उनसे लगाव हो जाता है। इस लगाव से उन विषयों के प्रति कामना का जन्म होता है हमारे मब में । हम अपनी खुशी, अपने आनंद, और सुख के लिए उन इक्षित वस्तुओं , विषयों आदि पर निर्भर हो जाते हैं और उनके बिना हम अपने सुख की कल्पना भी नहीं कर पाते। हमें लगता है कि यदि वो हमें नहीं मिला तो हस्रा अस्तित्व ही मिट जाएगा। हम इस हद तक उसमें दुबे रहते हैं कि जागृत से लेकर सुप्त अवस्था तक बिना सचेष्ट प्रयास के ही उनका ध्यान करते रहते हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि कब हम उसकी सोच में , उसके ध्यान में डूब गए और दुब जाते हैं। हमारा ध्यान यानी MEDITATION उसी में लग जाता है क्योंकि हमारा उसी में लगाव होता है। हम उसी वस्तु, विषय, व्यक्ति में समाधिस्थ हो जाते हैं क्योकि उसी में हमें सुख मिलता है।
जब किसी विषय, वस्तु या व्यक्ति से आकर्षित होकर उसी में डूब जाते हैं तो उस विषय, वस्तु या व्यक्ति पर अपनी अधिकारिकता की भी इक्षा करते हैं, चाहते है कि वह हमारे पास हो हमेशा, हमारा ही अधिकार रहे उसपर। इस कामना का क्या परिणाम होता है, अब हम इसे समझने की कोशिश करें
1.मोह
हम जिसके प्रति कामना रखते हैं उससे बन्ध जाते हैं, उसके बिना हम अपनी कल्पना भी नहीं करते, उसके बिना हम सुख की उम्मीद भी नहीं करते। इससे हमें उस विषय, वस्तु, व्यक्ति, घटना आदि के प्रति मोह हो जाता है।
2.लोभ
यदि हमारी कामना पूरी होती है तो हम उसमें और उलझते हैं, चाहते हैं कि ये सुख हमें हमेशा प्राप्त होता रहे। तब हम अपनी कामना पूर्ति के लिए अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों से बन्ध जाते हैं, हम स्वयम इनसे मुक्त नहीं होना चाहते। यह बन्धन हमें हर वो जायज नाजयाज कर्म करते हैं जिससे कामना पूर्ति हो सके। यही लोभ है, अधिक से अधिक के लिए , बार बार प्राप्ति के लिए लोभ हमें प्रेरित करता है, सो काम का बन्धन, उसकी पूर्ति लोभ को जन्म देता है। और मिल जाये, बार बार मिल जाये।
3.क्रोध
यदि कामना पूर्ति की दिशा में बाधा उत्पन्न होती है तो पहले चिड़चिड़ापन होता है हमारे मन में जो बढ़ते बढ़ते क्रोध में बदल जाता है। कामना और उसकी पूर्ति के बीच जितना गहरा लगाव होता है अर्थात जिस चीज को हम जितनी तीव्रता से प्राप्त करना चाहते हैं उसकी पूर्ति में अत्यल्प बाधा पर भी हम उतनी ही तीवता से प्रतिक्रिया भी देते हैं अर्थात हमारा क्रोध भी उतना ही तीव्र होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि काम और क्रोध एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं, जँहा काम होगा क्रोध भी स्वतः ही उपस्थित हो जाएगा। बिना क्रोध के काम हो नहीं सकता। इस क्रोध के कई रूप हैं, यथा क्रोध, निराशा, चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, घृणा आदि। इस प्रकार काम कई तरह के नकारात्मक भावों को जन्म देता है।
4.ईष्या
इस कामना के अन्य परिणाम भी होते हैं।
यदि हमारी कामना की पूर्ति तो हो गई लेकिन किसी अन्य की कामना की पूर्ति अधिक हुई तो भी हमें समस्या होती है, हमारे अंदर उस व्यक्ति के जिसकी कामना की अधिक पूर्ति हुई है उससे ईष्या होती है हमें कि उसे अधिक क्यों मिला। हम जिसके जितने करीब होते हैं उसके प्रति हमारी ईर्ष्या की भावना भी उतनी ही तीव्र होती है।
5.
घमंड.यदि हमारी कामना की अन्य की कामना से अधिक पूर्ति होती है तो हमारे अंदर घमंड का भाव आता है। हमने उससे ज्यादा पा लिया।
वस्तुतः घमंड और ईर्ष्या साथ साथ चलते हैं। एक तरफ वैसे लोग होते हैं जिनकी हमसे अधिक कामना की पूर्ति हुई होती है, उनसे हम ईर्ष्या करते हैं, दूसरी तरफ वे लोग होते हैं जिनसे अधिक हमारी कामना की पूर्ति हुई होती है, हम उनके प्रति अपने अंदर घमंड का भाव भी रखते हैं। इस प्रकार हम एक साथ ईर्ष्या और घमंड दोनों में जीते हैं।
इस तरह हमारे सेल्फ की यात्रा के छह प्रमुख शत्रु हैं
1.काम
2.मोह
3.क्रोध
4.लोभ
5.ईर्ष्या
6.घमंड
और ये पाँच यानी मोह, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और घमंड पहले यानी काम की ही सन्तति होते हैं अर्थात प्रथम शत्रु काम है यानी संगत है , परिणाम का बन्धन है।
अब हम देखते हैं कि इनका परिणाम क्या निकलता है।
1.क्रोध की कई अभिव्यक्ति होती है, जैसे व्यक्ति दूसरे को हानि करने या खुद को हानि पहुँचाने की कोशिश कर सकता है , निराशा में जा सकता है, आदि। मतलब ये है कि क्रोध के समय व्यक्ति ये नहीं समझ पाता कि क्या करना सही है क्या करना गलत है और न दूसरे ही अनुमान कर पाते हैं कि क्रोधित व्यक्ति कौन सा कदम उठाएगा। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उसकी बुद्धि मूढ़ हो जाती है, क्रोध की वजह से वह विवेक से काम नहीं कर पाता। विवेक से सोचने की क्षमता जाती रहती है।
2. क्रोध से दिग्भर्मित विवेक से स्मृति भी साथ छोड़ देती है। हम जीवन में बहुत कुछ सीखते रहते हैं, समाजिक और व्यवसायिक जीवन में हमें बहुत सारा ज्ञान मिलते रहता है जो हमारी स्मृति में सुरक्षित रहता है और उस तरह की परिस्थिति आने पर वही स्मृति हमारे सुरक्षित ज्ञान को क्रियाशील कराकर हमसे सही कार्य करा लेती है। हमने अगर सीखा है कि हमें अपने से बड़ों को प्रणाम करना चाहिए तो अगर कोई बड़ा सामने आता है तो वही स्मृति हमें प्रेरित करती है कि हम तुरत उन्हें प्रणाम करें। यदि किसी चिकित्सक ने सीखा है कि शल्यचिकित्सा कैसे की जाती है तो रोगी के बीमारी के दूर करने के लिए वह चिकित्सक अपनी उसी स्मृति के कारण उसका इलाज कर पाता है। लेकिन क्रोध की अवस्था में यह स्मृति साथ छोड़ देती है। क्रोधित मन के जेहन में सीखा हुआ ज्ञान रहता तो है लेकिन वो क्रोध से अस्थिर हुए दिमाग से बाहर आकर हमारे कार्य में नहीं बदल पाता और क्रोध की अवस्था बीतने पर याद आता है कि अरे हम तो ये जानते ही थे, हमें याद ही नहीं आया। इस प्रकार क्रोध की अवस्था में विवेक और स्मृति दोनों साथ छोड़ देते हैं जिसके कारण हम सही काम नहीं कर पाते।
3.क्रोध से नष्ट स्मृति व्यक्ति के बुद्धि को समाप्त कर देता है। बुद्धि और विवेक स्मृति के आधार पर ही काम करते हैं। स्मृति में संचित ज्ञान यदि समय पर कार्यरूप में नहीं बदल पाता है तो फिर बुद्धि विवेक बेकार के हथियार हो जाते हैं। हमारे पास बहुत ज्ञान का भंडार हो सकता है लेकिन क्रोध की अवस्था में नष्ट हुए स्मृति के कारण यदि यह ज्ञान स्मृति में नहीं रह जाता है तो बुद्धि उसे कार्यरूप में नहीं बदल पाती। इस प्रकार क्रोध से मूढ़ हुए विवेक के कारण नष्ट हुई स्मृति बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाती और सारा का सारा ज्ञान धरा का धरा रह जाता है।
4. अब जब क्रोध के कारण इस अवस्था में व्यक्ति पहुँच जाता हैं तो कोई भी लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो जाता है और उसका पतन निश्चित हो जाता है।
इस प्रकार हम देखते कि कामना से वशीभूत व्यक्ति की क्या हालत होती है। इस तरह काम के जाल में फँसा व्यक्ति पतनशील होकर आत्मपथ से विलग हो जाता है। यही व्यक्ति अयोग्य, नीच प्रकृति का कहा जाता है। यह व्यक्ति कुछ भी करने के लायक नहीं होता है।
जीवन के प्रत्येक स्थिति में हम इसे अनुभव करते है। ऐसी स्थिति खुद से बाहर खुशी तलाशने से होती है। जब भी हम अपने सुख शांति और आनंद के लिए बाह्य वस्तुओं पर निर्भर करते रहेंगे हमारा पतन अवश्यम्भावी होगा, तरह तरह के लोभ , हिंसा, निराशा आदि बने रहेंगे। तमाम भौतिक उपलब्धि भी हमें उस स्थिति में सुख चैन नहीं दे सकेंगे। हर काल में कामनाओं से बन्धने का यही फलाफल होता है कि इंसान हमेशा नीच से नीच हरकत पर उतरते रहता है। यह बन्धन हमें जीवन में जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं होने देता है, हम आत्मपथ से विमुख तमाम भौतिक सुख सुविधा के बावजूद दुखी और असन्तुष्ट ही रहते हैं, हमारी खुशी, और हमारे सुख क्षणिक ही रह जाते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 66
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नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
॥66॥
अब तक श्रीकृष्ण बता चुके हैं मनुष्य को परम् शांति और सुख तभी मिलता है जब मनुष्य कर्मयोग का आचरण करता हुआ अपने मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण रखता है। ऐसा व्यक्ति अपने स्व यानी सेल्फ यानी आत्मा में ही निष्ठ रतात अवस्थित रहता हुआ परम् सुख और शांति की स्थिति में रहता है। इस तरह के व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती है। इस व्यक्ति को कोई कामना इसलिए नहीं होती है क्योंकि उसे अपना ही स्व मिल चुका होता है, उसे अपनी आत्मा से तारतम्य हो चुका होता है जिसके कारण उसे वह सुख, शांति, और आनंद मिल चुका होता है जिसके आगे कोई और सुख शांति या आनंद की इक्षा शेष नहीं होती। कामना रहित यह व्यक्ति अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण में रखता है । इस स्थिति में व्यक्ति के सेनेज/इन्द्रियाँ उतना ही अनुभव उसे सम्प्रेषित कर पाती हैं जितना वह चाहता है। तब इन्द्रियाँ मन के वश में नहीं होती। मन पूरी तरह से स्थिर होता है । उसे इधर उधर भागने की जरूरत नहीं होती है क्योंकि यह व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के माध्यम से कोई सुख प्राप्ति की कामना रखता है नहीं। स्थिर मन इस व्यक्ति की बुद्धि भी परमात्मा में एक निष्ठ स्थिर होती है, भटकती नहीं। इस तरह के व्यक्ति को इस अवस्था में आनंद की प्राप्ति होती है जिसे श्रीकृष्ण ने प्रसाद कहा है जिसे प्राप्त व्यक्ति शांत चित्त हुआ, प्रसन्न और सुखी मन हुआ ध्यानरत हो पाता है। इस प्रक्रिया को श्रीकृष्ण ने पहले विस्तार से समझाया है।
अब वे आगे कहते हैं कि जिस व्यक्ति की ये अवस्था नहीं होती है अर्थात जिस व्यक्ति की अपने इन्द्रियों पर, मन पर कोई नियंत्रण नहीं होता है उसकी बुद्धि भी स्थिर नहीं होती है। इस तरह की विशेषता वाले व्यक्ति को आत्मज्ञान नहीं होता जिसके कारण उसका पतन होना तय होता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के विपरीत यह व्यक्ति अयुक्त व्यक्ति होता है जिसकी बुद्धि, जिसके मन और जिसकी इन्द्रियाँ एक लड़ी में नहीं होती हैं बल्कि सभी तीनों एक दूसरे से स्वतंत्र इधर उधर भटकती रहती हैं। न बुद्धि स्थिर रहती है। बुद्धि भटकती रहती है, कभी इधर सुख खोजती है, कभी उधर। इस कारण बुद्धि मन को नियंत्रित नहीं कर पाती। अनियंत्रित मन का इन्द्रियों पर कोई वश नहीं होता और इन्द्रियाँ उच्छऋंखल व्यवहार पर उतर आती हैं। इस तरह के व्यक्ति का जीवन इन्द्रियों के वश में होता है , हमेशा अनिश्चित इक्षाओं के पीछे भागता रहता है। नतीजा ये होता है कि व्यक्ति का जीवन तरह तरह की कामना पूर्ति के प्रयासों का झुंड बन कर रह जाता है और अंततः बिखर जाता है। इस तरह अस्थिर चित्त हुआ व्यक्ति आत्मज्ञान नहीं पा सकता क्योंकि उसकी इक्षाएँ, उसका मन और उसकी बुद्धि एक ही समय में सभी दिशाओं में भटकती रहती है। उसे भौतिक मैटर में ही लक्ष्य दिखता है जबकि भौतिक मैटर तो निष्प्राण हैं। भौतिक मैटर को एक पहचान जीवन देता है। यह जीवन मैटर को आत्मा से प्राप्त होता है जो मैटर का सेल्फ होता है। निष्प्राण भौतिक मैटर को जीवन उसका सेल्फ देता है। यदि सेल्फ की पहचान नही हो पाई तो प्राणी भी जीवित रहकर भी भौतिक मैटर का समूह भर रह कर हो जाता है, उसके अंदर कोई भावना यानी ध्यान की क्षमता ही नहीं पनप पाती है। अतएव स्थिर बुद्धि होने के लिए अनिवार्य है कि हम अपनी आत्मा को , अपने स्व, अपने सेल्फ को पहचाने तभी हम वह सब कर सकते है जो एक ज्ञानी व्यक्ति को करना चाहिए अन्यथा हम कुछ नहीं कर पाते और इन्द्रियाँ हमसे कराती रहती हैं , हम कामनाओं के पीछे इधर उधर भागकर मृत्यु की तरफ अकारण ही बढ़ते जाते हैं।
सो जरूरी है कि हम स्व को पहचाने और ध्यानरत हों। अगर ऐसा नहीं कर पाते तो जीवन में शांति नहीं मिल पाती। ये वो शांति होती है जिसके पश्चात कोई विवाद, कोई संघर्ष नहीं , कोई युद्ध नहीं। इसी अवस्था में परम् सुख मिल पाता है। विवाद, संघर्ष, युद्ध से रहित शांत मन जो स्व प्राप्त ध्यान से सम्भव है परम् सुख देता है । स्थितप्रज्ञ व्यक्ति इसी अवस्था में होता है।
अगर व्यक्ति ऐसा करने से बचता है, बुद्धि, मन और इन्द्रियों को एक लड़ी में नहीं ला पाता है, यानी कर्मयोग की बुद्धि से क्रियाशील नहीं हो पाता है तो उसका विखराव, उसका पतन अवश्यम्भावी है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 67
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इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥
क्योंकि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु हर लेती है, वैसे ही विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों में से मन जिस इन्द्रिय के साथ रहता है, वह एक ही इन्द्रिय इस अयुक्त पुरुष की बुद्धि को हर लेती है
॥67॥
आगे श्रीकृष्ण समझते हैं कि इस प्रकार के अयुक्त व्यक्ति की इन्द्रियाँ बिना किसी नियंत्रण के, बिना किसी लगाम के अपने विषयों में डूबी रहती हैं। एक स्थितप्रज्ञ व्यक्ति की बुद्धि उच्च जीवन लक्ष्यों के साथ मन को नियंत्रित करती है और मन इन्द्रियों को वश में रखता है लेकिन अयुक्त व्यक्ति के साथ उल्टा होता है, विषयों में डूबी इन्द्रियाँ मन को उधर ही खिंचती हैं और इस प्रकार विषयों में रमा मन बुद्धि को भी उसी में डुबाये रखता है और बुद्धि उच्च लक्ष्यों से दूर विषयों में डूबी रहती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि विषयों में डूब कर उसको तर्क से सही साबित करने का प्रयास करती है। इस प्रकार बुध्दि अपना काम छोड़कर मन की कामना और इन्द्रियों की वासना को सही साबित करने में लग जाती है। बुद्धि पर मन और इन्द्रियों का नियंत्रण हो जाता है और बुद्धि अपने विवेक से निर्णय लेने में अक्षम हो जाती है। इस प्रकार का अयुक्त व्यक्ति अपनी कामनाओं और वासनाओं में उसी प्रकार अनियंत्रित भटकता रहता है जैसे बिना नियंत्रण की नाव वायु के प्रभाव से इधर उधर भटकती रहती है। मन और इन्द्रियाँ बुद्धि को नियंत्रित कर उसे अपने उद्देश्य की पूर्ति में लगा देते हैं। घोड़ा रथ को अपनी इक्षा से इधर उधर ले जाने लगता है। मन का लगाम घोड़े के अनुसार रहकर ढीला पड़ जाता है और लगाम थामे सारथी रूपी बुद्धि लगाम को , और उसके कारण घोड़े को ढीला छोड़कर उनके अनुसार ही हो जाता है। नतीजा में ये शरीर रूपी रथ किधर जाता है ये उस अयुक्त व्यक्ति को भी पता नहीं होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 64 & 65
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रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष रहित इन्द्रियों द्वारा विषयों में विचरण करता हुआ अन्तःकरण की प्रसन्नता को प्राप्त होता है
॥64॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है
॥65॥
व्यक्ति को पतन से बचने का जो रास्ता श्रीकृष्ण सुझाते हैं वह रास्ता भी कर्मयोग का ही है। श्रीकृष्ण पूर्व में कर्मयोग की बुद्धि को बताते हुए कहा चुके हैं कि परिणामों पर निर्भरता ही दुखों का कारण होता है और परिणामों पर सुख प्राप्त करने की ये निर्भरता इसलिए होती है क्योंकि हम समझते हैं हमारे सुख शांति और आनंद का स्रोत हमसे बाहर कार्य के परिणाम पर निर्भर होता है और इस कारणवश हम खुश के बाहर के परिणाम से बन्धे होते हैं। स्वयम के बाहर अवस्थित व्यस्तुओं और परिणामों पर निर्भरता के कारण हमें कुछ चीजों से गहरा लगाव हो जाता है जो राग है तो कुछ से अलगाव/विलगाव होता है जो द्वेष है। ये राग और द्वेष हमसे बाहर होते हैं। इसी कारण श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जब हम कार्यों के परिणाम के बंधन से स्वयं के बंधन से स्वयं को अलग कर लेते हैं तो हमें किसी भी चीज से जो हमसे वाह्य है तो फिर हम राग और द्वेष से मुक्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बाह्य चीजों से हम अप्रभावित होते हैं और तब हमें जो सुख, शांति और आनंद प्राप्त होता है वही स्थाई होता है। उस स्थिति में हम इन्द्रियों के वश से मुक्त होते हैं। इन्द्रियाँ यानी सेंसेज हमें उत्तेजित नहीं कर पाती।
श्रीकृष्ण कभी भी कँही भी इन्द्रियों से यानी संसार से भागने के लिए नहीं कहते। बल्कि वे ये कहते हैं कि जब हम कर्म के परिणाम से असंगत रहते हैं यानी उनसे लगाव नहीं रखते तब हमारी इन्द्रियाँ अपने विषयों में रहती हुई भी हमारे मन को मिलने वाले सुख, शांति और आनंद को विचलित नहीं कर पाती। इन्द्रियो के अपने जो विषय हैं इन्द्रियाँ उनको करती तो हैं किंतु चूँकि हम उनसे अप्रभावित होते हैं सो ये हमें अपने विषयों से सूखी या दुखी नहीं कर पाती।
ऐसी स्थिति में व्यक्ति ये जानता है कि उसकी प्रसन्नता बाह्य व्यस्तुओं में नहीं है। सो उनसे असंगत व्यक्ति हमेशा हर स्थिति में प्रसन्न होता है। इस स्थिति में मन सुख प्राप्ति के लिए वाह्य जगत में नहीं भटकता है। वह इसी संसार में रहते हुए संसार के क्रिया प्रतिक्रिया से अछूता स्वयम में रमा,अपने स्व में लीन होता है। मन की इसी शांत अवस्था में उसकी बुद्धि परमात्मा में लग जाती है। यानी जब व्यक्ति सुख शांति के लिए बाहर नहीं देखता, परिणाम और वाह्य जगत की व्यस्तुओं से जुड़ा नहीं होता है तो उसके समस्त वैर भाव खत्म हो जाते हैं , उसके अंदर किसी के लिए न तो लगाव (राग) रह जाता है, न ही विलगाव (द्वेष) रह जाता है, उसकी इन्द्रियाँ अपने कार्य को करती हुई भी उसके मन और भावना को वाह्य प्रभावों की अनुभूति से प्रभावित नहीं कर पाती और तब हम शांत चित्त आत्मसाक्षत्कार की स्थिति यानी परमात्मा में स्थिर होने की अवस्था में होते हैं जो परम् अनंद की अवस्था में ही हो पाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण व्यक्ति के उत्थान हेतु बारम्बार कर्मयोग का मार्ग ही अलग अलग तरह से सुझाते हैं जिसमें स्वधर्म के अनुसार कर्म, परिणाम से असंगतता, इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण जैसे उपाए बताए गए हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 68
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तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार निग्रह की हुई हैं, उसी की बुद्धि स्थिर है
॥68॥
इतनी व्यख्या करने के पश्चात श्रीकृष्ण कहते हैं कि जिस व्यक्ति का इन्द्रियों पर सब प्रकार से नियंत्रण होता है वही स्थिर बुद्धि होता है अर्थात जिसका नियंत्रण अपनी इन्द्रियों पर नहीं है उसका पतन निश्चित है। यह नियंत्रण जबरन नहीं बल्कि कर्मयोग की बुद्धि के अनुसार ही होना चाहिए तभी ये नियंत्रण चिरस्थाई होता है। इस तरह के व्यक्ति की बुद्धि इन्द्रीयिओं के विषय से अलग होती है और बुद्धि बड़े लक्ष्य की पूर्ति में लगी होती है। इस तरह का व्यक्ति सभी इन्द्रियों के साथ रहते हुए भी अपने स्व /आत्मा/सेल्फ में स्थिर रहता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 69
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या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है
॥69॥
स्थितप्रज्ञ मनुष्य की विशेषताओं का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि सेल्फ/आत्मा/स्व का ज्ञान नहीं होना ही अंधकार है और इसका ज्ञान होना प्रकाश है। रात्रि अंधकार का और दिन प्रकाश का प्रतिनिधित्व करते हैं। अंधकार वो अवस्था है जिसमें सबकुछ अस्पष्ट होता है, ढँका होता है , कुछ भी दिखता नहीं है, चीजों में भेद करना नहीं हो पाता, वे फहचान में नहीं आ पाती हैं। इस अवस्था में सामान्य व्यक्ति जो संसार में ही रमा बसा है वह कुछ नहीं समझ पाता और ऐसा लगता है कि सुसुप्ता अवस्था में होता है। यह आज्ञान की अवस्था होती है क्योंकि कुछ सूझता नहीं है। यह आज्ञान आखिर है क्या? विभिन्न विषयों की जानकारी होना , व्यवहारिक बातों की जानकारी होना ये सब संसार की जानकारियाँ हैं। इनके होते हुए भी हम अज्ञानी ही होते हैं जब तक हमें अपने आत्मा यानी सेल्फ का ज्ञान नहीं होता है। यही वजह है कि तमाम सांसारिक विषयों का ज्ञान रहते हुए भी व्यक्ति तमाम तरह की गलत बातें करते रहता है, अनिष्ट करते रहता है यानी वह तो अंधकार में ही रह जाता है। इसके विपरीत जिसे यह ज्ञान हो चुका है वह तो हमेशा प्रकाश में रहता है और विभिन्न सांसारिक कृत्यों को ही अंधकार मानता है क्योंकि ये सब बिना आत्मज्ञान के किये जा रहे होते हैं।
अतः प्रकाश पाना है तो पहले आत्मज्ञानी ही बनें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 70
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आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥
जैसे नाना नदियों के जल सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में उसको विचलित न करते हुए ही समा जाते हैं, वैसे ही सब भोग जिस स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है, भोगों को चाहने वाला नहीं
॥70॥
अब श्रीकृष्ण स्तित्प्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हुए कहते हैं जिस प्रकार नदियों के समुद्र में गिरने से समुद्र को फर्क नहीं पड़ता है उसी प्रकार जो व्यक्ति अपने आत्मा में स्थिर होता है उसे कोई कोई कामना नहीं होती, उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण नियंत्रण में होती हैं, मन बुद्धि के वश में होता है उसे कोई भोग प्राप्त भी हो तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता, उससे आप कुछ सुविधा वापस भी ले लें तब भी उसपर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जिन व्यक्तियों के अंदर कामनाएँ होती हैं, नई कामनाओं के लिए कामनाएँ होती हैं वे तो हमेशा उनकी पूर्ति में ही लगे रहते हैं, अशांत रहते हैं जबकि स्थितप्रज्ञ तो भोगों से अप्रभावित शांत अवस्था में रहता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 71
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विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥
जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वही शांति को प्राप्त होता है अर्थात वह शान्ति को प्राप्त है
॥71॥
श्रीकृष्ण स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के लक्षणों को विस्तार से समझाने के पश्चात एक बार पुनः बताते हैं कि
1. स्थितप्रज्ञ व्यक्ति को कोई कामना नहीं होती, क्योंकि हम पहले ही देख चुके हैं कि उसकी इन्द्रियाँ पूर्ण रूप से बुद्धि के नियंत्रण में होती हैं,
2.यह व्यक्ति अहंकार और ममता से मुक्त होता है, उसके अंदर ""मैं""का भाव नहीं होता क्योंकि उसका मैं तो सम्पूर्ण संसार के साथ मिला हुआ है,
3. उस व्यक्ति को किसी भी चीज को धारण करने की यानी पोजेसिवनेस की भावना नहीं होती, उसका कोई #MY# यानी "मेरा" नहीं होता, उसे किसी भी वस्तु , व्यक्ति आदि से कोई लगाव यानी ATTAcHMENT नहीं होता है।
इन्हीं गुणों से लैस व्यक्ति को शांति मिल पाती है क्योंकि तब ही व्यक्ति को अपने आत्मा से साक्षात्कार हो पाता है। इस प्रकार का व्यक्ति तमाम सांसारिक चीजों के साथ रहते हुए भी उनके साथ नहीं होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 श्लोक 72
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एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥
हे अर्जुन! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर योगी कभी मोहित नहीं होता और अंतकाल में भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है
॥72॥
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन के आग्रह पर उस व्यक्ति के लक्षण अथवा उस व्यक्ति की विशेषताओं को बताए हैं जिसे अर्जुन स्थितप्रज्ञ कहता है, जिसे हम बोलचाल में सिद्ध पुरुष कहते हैं या फिर जिसे REALIZED MASTER अर्थात जिसने सब प्राप्त कर लिया है । क्या इस संसार में ऐसा भी कोई होता है जिसे सबकुछ प्राप्त हो? हाँ , होता है। उसके पास सांसारिक वस्तुओं का सांसारिक नजर से अभाव या प्रचुरता तो हो सकती है लेकिन इस व्यक्ति को सबकुछ इस कारण प्राप्त होता है क्योंकि उसे स्वयं का, अपने सेल्फ का, अपनी आत्मा का ज्ञान हो चुका होता है, वह कामनाओं, परिणामों, अहंकार, लालसा, ममत्व, लगाव, अपने इन्द्रियों के विषयों के प्रभाव से सर्वथा मुक्त होकर स्वधर्म में क्रियाशील होता है, वह हमसे आपसे ज्यादा ही व्यस्त रहते हुए भी निष्काम भाव में रहता है। यही व्यक्ति ब्रह्म को प्राप्त होता है। उसके यही लक्षण उसे ब्रह्म को जानने योग्य बनाते हैं अर्थात वही ब्रह्म भी होता है। वह व्यक्ति चर अचर संसार, यानी सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अपना विस्तार देख पाता है और सम्पूर्ण ब्रह्मांड को भी अपने अंदर ही पाता है। उसके लिए कुछ भी अपना या पराया नहीं होता , वह सभी में अपनी ही अभिव्यक्ति देख पाता है और सबको अपने ही अभिव्यक्ति में समझता है। यही व्यक्ति ब्रह्मी है।
अपनी आत्मा में निष्ठ व्यक्ति ब्रह्मांड की दृष्टि से ब्रह्म है और व्यक्ति की दृष्टि से आत्मा है।
जब कोई व्यक्ति इस अवस्था में आ जाता है तो फिर इस आत्मसाक्षत्कार के पश्चात पुनः उसका पतन नहीं होता , वह सर्वथा सभी तरह के बंधनों से मुक्त हो चुका होता है। ये अवस्था ही निर्वाण अर्थात मोक्ष की अवस्था होती है जो जीते जी प्राप्त होती है, मरने के बाद नहीं। ये अवस्था जीवन के किसी भी चरण में मिल सकती है, हम आप चलना तो शुरू करें। श्रीकृष्ण ने तो बहुत शुरू में ही कह दिया था कि सत का कभी अभाव नहीं, हम सत पर चलें तो।
इस प्रकार सिद्ध पुरुष की सारी विशेषताओं को बताकर गीताकार ने यंही द्वितीय अध्याय को विराम दिया है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 2 उपसंहार
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युद्धक्षेत्र में अपने विरोध में अपने बंधु बांधवों, इष्ट मित्रों को देखकर व्यथित अर्जुन जब युद्ध करने से मना कर श्रीकृष्ण से उसे उचित मार्ग बताने को कहता है तब श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन का लक्ष्य और उसे प्राप्त करने का मार्ग बताते हैं। वस्तुतः द्वितीय अध्याय एक तरह से गीता का सारांश है जिसमें श्रीकृष्ण जीवन की समस्त शिक्षा का निचोड़ प्रस्तुत करते हैं और तत्पश्चात आगे उनकी व्यख्या करते हैं। द्वितीय अध्याय में संक्षिप्त में दी गई शिक्षा का क्रम निम्न है
1.सर्वप्रथम श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन के लक्ष्य को बताते हैं और इस क्रम में उसे आत्मा यानी सेल्फ का अर्थ समझाते हुए उसे ही प्राप्ति योग्य लक्ष्य बताते हैं।
2. तत्पश्चात उसे प्राप्त करने का मार्ग यानी कर्मयोग का ज्ञान देते हैं। यह स्वाभाविक भी है कि जब तक लक्ष्य पता न हो चलने का औचित्य क्या!
3. फिर श्रीकृष्ण त्याग, उपासना, वैराग्य और सन्यास को समझाते हैं जिससे होते हुए हम अंतिम लक्ष्य यानी अपनी आत्मा तक पहुंचते हैं
4.श्रीकृष्ण व्यक्ति के पतन का कारण भी बताते हैं और लक्ष्य सिद्ध व्यक्ति यानी ENLIGHTENED MASTER की खूबियों को भी बताते हैं।
5. And finally Shri Krishna also tells this Siddha Purusha about attaining salvation, in which time the Siddha Purusha, despite doing everything worldly, gets established in his own soul i.e. self and attains the state of Brahma.
And this entire process takes place during lifetime only, not after death.
It is important to note some facts here. As we all know that Shri Krishna gave the teachings of Gita to Arjuna who was averse to war in the battlefield to fight but we find that Shri Krishna neither reminds Arjuna of the atrocities committed on him and his family nor does he ask him to go to war. Shri Krishna very calmly teaches him about the soul, swadharma, indifference to the result, faith and surrender, detachment and samadhi and finally attainment of salvation, all of which are states of complete mental peace.
In fact, Shri Krishna is showing Arjuna the path to the ultimate salvation i.e. Nirvana. Shri Krishna is telling that we can get out of the bondage of the world only by doing work armed with the wisdom of Karmayoga. Karma is the only way. War is just an opportunity which is Arjuna's swadharma according to his current situation but the war, the victory that can be achieved in it, the wealth and empire that can be obtained from it are not told to be the goal. The goal is self-realization whose path is Karmayoga.
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