श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 12
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 12
अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥ 12।।
परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान।
राजसी प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने कर्म और उसके फल से मोह रखते हैं। कर्म और कर्मफल से मोह के द्वारा बंधे होने के कारण उनके कर्मों में लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा आदि का वास होता है और वे जब भी कर्म करते हैं कर्मफल को लक्षित कर ही करते हैं। इसीलिए उनके कर्मों में पाखण्ड अथवा दम्भ दिखता है और यही क्रम राजसी यज्ञ कहे जाते हैं। वे लोक कल्याण का भी कोई कार्य करेंगे तो दिखावेंगे कि वे काम तो लोक कल्याण का कर रहें हैं किन्तु वास्तव में उस कर्म के पीछे उनकी मंशा होती है कि उनका यश बढ़े और इससे कुछ भौतिक लाभ भी होता रहे जो स्पष्टतः पाखण्ड है क्योंकि उनका लोक कल्याणकारी कार्य तो दिखावे के लिए है और असल उद्देश्य तो यश कमाना है। इसी प्रकार ऐसे लोग चूँकि अपनी स्वाभाविक वृत्ति के अनुसार कोई लोककल्याणकारी कार्य तो कर नहीं रहे हैं सो ये अहंकार पूर्वक प्रचार करते और करवाते हैं कि वे इतने परोपकारी हैं। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति लो जब लक्षित हासिल नहीं होता तो कई तरह का प्रपंच और हिंसा करने से भी नहीं हिचकते हैं। ये लोग साधन की शुचिता पर नहीं जाते हैं।
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