श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 27
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 27
समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ ।।27।।
जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है।
क्षेत्र अथवा प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है कि हम यह समझ सके कि दरअसल क्षेत्र या प्रकृति भले ही नाशवान हो लेकिन सभी क्षेत्रों में अवस्थित परमात्मा एक ही है जो न जन्म लेता है, न मरता है और न ही उसका क्षरण ही होता है बल्कि वही चेतना स्वरूप क्षेत्र को ,प्रकृति को देखता है और उसी की उपस्थिति से क्षेत्र अथवा प्रकृति का भान हो पाता है।
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