श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 26
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ ।।26।।
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान।
क्षेत्र प्रकृति है , शरीर है जो अपने गुणों के साथ है और निरन्तर परिवर्तनीय है। जबकि चेतना गुणों से मुक्त अपरिवर्तनीय है। क्षेत्र का स्वरूप भिन्न भिन्न होता है और प्राणियों का भिन्न भिन्न स्वरूप प्रकृति यानी क्षेत्र की भिन्नता के कारण है। किंतु बिना पुरुष के संयोग के बिना चेतना की उपस्थिति के, बिना क्षेत्रज्ञ से जुड़े यह प्रकृति, यह शरीर अर्थात क्षेत्र अजन्मा ही रह जाता है यानी व्यक्त नहीं हो पाता है। चेतना अपने आप में प्रकृति से भिन्न और स्वतंत्र है और सभी में समान है। चेतना प्रकृति की तरह भिन्न भिन्न नहीं है और न ही परिवर्तनीय है। प्राणी की उतपत्ति तभी होती है जब प्रकृति चेतना से युक्त होती है, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ से युक्त होता है। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात प्रकृति और पुरुष दोनों होते हैं। प्रकृति के स्वरूप में , क्षेत्र के स्वरूप में भिन्नता होती है, उनके गुणों में भिन्नता होती है लेकिन चेतना तो समान रूप से सभी में एक ही है। सभी में एक ही परमात्मा है , सभी क्षेत्र/शरीर का क्षेत्रज्ञ एक ही है , सभी प्रकृति का पुरुष एक ही है जो सनातन, अजन्मा, अजर,अक्षय, और अपरिवर्तनीय है और वही सभी का परमात्मा है।
Comments
Post a Comment