श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 23

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ ।।23।।

इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।
      इस संसार को प्रकृति और पुरुष  के द्वारा समझा गया है। प्रकृति यानी क्षेत्र और पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ। प्रकृति यानी पदार्थ और पुरुष यानी चेतना। सो पुरुष की उपस्थिति में ही प्रकृति की समझ बनती है। और यह पुरुष तभी समझ में आता है जब पुरुष प्रकृति से जुड़ता है। इस प्रकार प्रकृति से पुरुष अलग होता है किंतु उसको समझने के लिए प्रकृति का साथ चाहिए होता है। लेकिन प्रकृति नित्यप्रिवर्तनधर्मा है क्योंकि यह तीन गुणों-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से युक्त है और जबकि चेतना हर परिस्थिति में एक समान है। इस चेतना की उपस्थिति में ही प्रकृति का ज्ञान होता है। यदि चेतना न हो यानी पुरुष न हो तो प्रकृति का कोई अस्तित्व नहीं दिखता है। प्रत्येक व्यक्ति के अंदर भी प्रकृति और पुरुष विद्यमान हैं। क्षेत्र(अर्थात शरीर) और उसके विकार प्राणी के प्रकृति हैं जबकि उसकी चेतना उसका पुरुष है। प्रकृति में नित्य परिवर्तन होता है और अगर पुरुष प्रकृति से बन्ध जाता है तो पुरुष स्वयं के अस्तित्व को भूल कर प्रकृतिमय हो जाता उसी का भोक्ता बन जाता है। लेकिन यदि प्राणी सजग है इस सत्य के प्रति की प्रकृति तो अपने गुणों के अनुसार नित्य परिवर्तनीय बनी रहेगी, जबकि चेतना के रूप में उसका पुरुष इस प्रकृति और इसके गुणों से स्वतंत्र सदा एक ही तरह बना रहता है तो उसका प्रकृति से बन्धन खत्म होने लगता है। तब वह प्राणी अपने पुरुसग को  पहचानता है द्रष्टा, अनुमन्ता, महेश्वर और परमात्मा स्वरूप में समझ पाता है। ऐसी स्थिति प्राप्त करने पर प्राणी अपने शरीर यानी क्षेत्र से क्षेत्र के इन्द्रियों के नियत कर्म तो करता है लेकिन उन कर्मों से बंधता नहीं है। और इस स्थिति में प्राणी प्रकृति से मुक्त होकर मात्र चेतना के स्तर पर जीता है। यही अवस्था उसकी मोक्ष की अवस्था होती है जब वह प्रकृति और उसके गुणों से स्वतन्त्र होकर कर्म करता हुआ उनके प्रभाव से मुक्त रहता है। इस प्रकार प्राणी को मृत्यु के पूर्व ही अपने कर्मों को संचालित करते हुए मोक्ष की प्राप्ति होती है जिस अवस्था में प्राणी प्रकृति से मुक्त मात्र चेतना को ही जीता है।

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