श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 15
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 15
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान्।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्॥ ।।15।।
अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। ।।15।।
सब कुछ ईश्वर में ही निहित है। इस सत्य को अर्जुन अपनी आँखों से देख पा रहा है। दरअसल ईश्वर के विराट विश्वरूप को देखने समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो सामान्य समझ से नहीं मिलती है। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए ज्ञान और दृढ़प्रतिज्ञ के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति कर्मयोग के रास्ते प्राप्त ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए अन्यथा मात्र अध्ययन या श्रवण से इस विराट रूप का दर्शन असम्भव होता है। लेकिन इस प्रकार की श्रद्धा होने पर ईश्वर की भी विशेष अनुकम्पा उस व्यक्ति पर होती है और तब व्यक्ति ईश्वर के उस रूप को समझ पाता है जिससे उसे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि समस्त जीव, देवी-देवता, महान विभूति यानी ऋषि, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी एक ही परमात्मा में निहित है यानी समस्त जीवन और जीवन के गुणों का निवास तो प्रभु में ही है। अर्थात सभी कुछ जो हमारी दृष्टि में है और दृष्टि से परे भी है उन सभी के उद्गम और स्थान ईश्वर में ही है यानी ईश्वर से परे कुछ भी नहीं है। इसीलिए अर्जुन कहता है कि हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। ईश्वर ही समस्त जीवन , गुण, सत्य के उद्गम हैं, ईश्वर ही इनके निवास हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भेद करने की हमारी प्रवृत्ति त्रुटिपूर्ण है।
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